Monday, October 24, 2011

मैं देह नहीं, बुद्धि नहीं.......


विनय बिहारी सिंह



निश्चय ही मनुष्य शरीर नहीं है। वह मन, बुद्धि, अहं या चित्त भी नहीं है। सोचने की इसी प्रक्रिया को नेति- नेति कहते हैं। मैं शरीर नहीं हूं। मैं इंद्रियां नहीं हूं। मैं बुद्धि नहीं हूं। नेति- नेति। तो मैं क्या हूं? यानी मनुष्य क्या है? वह है शुद्ध आत्मा। ध्यान में इसी विचार को केंद्र में रख कर हम अपनी आत्मा को परमात्मा में मिला देते हैं। ध्यान की गहराई धीरे- धीरे आती है। एकदम से कोई चाहे कि गहरा ध्यान लग जाए तो यह संभव नहीं है। इसका पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ अभ्यास करना होता है। ईश्वर की कृपा से मैंने पिछले दिनों एक आध्यात्मिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया और खूब आनंद मिला। इस दौरान द्वादस शिवलिंगों में से एक त्र्यंबकेश्वर का दर्शन किया। फिर संयोग जुटा तो शिरडी के साईंबाबा के दिव्य मंदिर में भी गया और सोने के सिंहासन पर सोने के मुकुट से सुशोभित साईंबाबा की सुंदर मूर्ति देखी। साईंबाबा के मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर उनका भोजनालय है। आप फ्री में वहां से कूपन लीजिए और बैठ कर शुद्ध सात्विक भोजन कीजिए। साईंबाबा के भोजनालय के बाहर साईंबाबा की एक विशाल मूर्ति है जो एक बड़े हंडे से भोजन निकाल रही है। यानी इस भोजनालय में आप साईंबाबा का दिया भोजन कर रहे हैं। हमें सबसे पहले जलेबी दी गई। फिर पूड़ी। इसके बाद चावल, दाल और दो किस्म की सब्जी। जब हम भोजन कर रहे थे तो शाम के साढ़े पांच बज रहे थे। लेकिन चूंकि हमने दिन में भोजन नहीं किया था इसलिए शाम का यह भोजन बहुत स्वादिष्ट लग रहा था। भोजनालय में एक साथ ३००० (तीन हजार) लोग एक साथ भोजन कर सकते हैं। दोनों तरफ मेजें लगी हुई हैं और बीच में ट्राली में रखे व्यंजन लिए परोसने वाले सेवक आते हैं और आपको देते जाते हैं। शिरडी के साईंबाबा के दरबार में तृप्त होकर हमें फिर रात को भोजन करने की जरूरत नहीं महसूस हुई। रात को हम यूं ही फल फूल खा कर रह गए। त्र्यंबकेश्वर भगवान (भगवान शिव) का दर्शन अत्यंत सुखद था। मंदिर पुराना हो गया है। इसका जीर्णोद्धार अत्यंत आवश्यक है। नंदी वाला मंदिर की खिड़कियां टूट चुकी हैं। इस पर न तो पुरातत्व विभाग के लोग ध्यान दे रहे हैं और न ही मंदिर का प्रबंधन। एक अत्यंत बहुमूल्य धरोहर हमारे सामने जीर्ण- शीर्ण पड़ा हुआ है।
नासिक (महाराष्ट्र) के पास इगतपुरी नामक स्थान सुरम्य है। चारो तरफ से पहाड़ियों से घिरे योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया (संक्षेप में वाईएसएस) के इगतपुरी आश्रम में छह दिन तक आध्यात्मिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर सुख मिला। इस कार्यक्रम का नाम था- शरद संगम। इसमें परमहंस योगानंद जी के देश- विदेश के शिष्य एक जगह इकट्ठा होते हैं और विशेष रूप से आयोजित आध्यात्मिक कार्यक्रमों में सामूहिक रूप से हिस्सा लेते हैं। सभी एक साथ बैठ कर शांति और आनंद के साथ नाश्ता और भोजन करते हैं। कार्यक्रम यूं होता था- सुबह उठ कर शक्ति संचार व्यायाम और गहरा ध्यान। फिर आठ बजे जलपान। उसके बाद परमहंस योगानंद जी की शिक्षाओं को केंद्र में रख कर किसी आध्यात्मिक विषय पर अत्यंत ग्यानवर्द्धक प्रवचन। दिन के १२ बजे भोजन। फिर किसी विषय पर गहरी जानकारी देने वाला प्रवचन। शाम को चार बजे चाय। इसके बाद शक्ति संचार व्यायाम और गहरा ध्यान। रात के आठ बजे भोजन। फिर या तो भजन या वीडियो फिल्म जो आध्यात्मिक भूख को एक हद तक मिटाती है। इसी दौरान १७ अक्तूबर को क्रिया दीक्षा का कार्यक्रम था। स्वामी कृष्णानंद जी के माध्यम से अनेक लोगों को दीक्षा मिली।
शरद संगम में स्वामी कृष्णानंद, स्वामी ओंकारानंद और ब्रह्मचारी सदानंद जी के साथ बिताए सुखद दिन कभी नहीं भूलेंगे।

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