Wednesday, January 14, 2009

विष्णु और शिव की संतान हैं अयप्पा


विनय बिहारी सिंह

शैव मत के लोग कहते हैं कि भगवान यानी शिव। शिव का ही दूसरा नाम शंकर, रुद्र और महादेव इत्यादि है। उधर वैष्णव मत के लोग कहते हैं कि भगवान यानी विष्णु या कृष्ण या राम। क्योंकि राम और कृष्ण विष्णु के ही अवतार कहे जाते हैं। एक समय में शैव और वैष्णवों में काफी विरोध था। शैव शिव के अलावा किसी का नाम नहीं सुन सकते थे औऱ वैष्णव कृष्ण के अलावा। इस तनाव को खत्म करने के लिए दक्षिण भारत के ऋषियों ने एक कथा की याद दिलाई। कथा है- जब समुद्र मंथन के समय अमृत निकला तो राक्षसों का ध्यान बंटाने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया। इस रूप पर भगवान शंकर मोहित हो गए। तब दोनों के संपर्क से अयप्पा का जन्म हो गया। अयप्पा का जब जन्म हुआ तो उन्हें घनघोर जंगल के बीचोबीच पाया गया। उनके गले में रत्नों की माला थी। उधर से एक राजा शिकार से लौट रहे थे। उन्होंने अयप्पा को देख कर जान लिया कि यह कोई असाधारण बालक है।
अयप्पा जब १४ साल के हुए तो उनकी मां के पेट में दर्द होना शुरू हुआ। जब यह दर्द होता था तो मां छटपटाने लगती थीं। किसी वैद्य ने बताया कि मादा चीते का दूध अगर मिल जाए तो एक औषधि तैयार हो सकती है। अयप्पा ने सुना तो वे जंगल में निकल गए। वहां से लौटे तो सबने देखा- अयप्पा एक चीते की पीठ पर बैठे हुए हैं और उनके पीछे- पीछे बाकी चीते भी चल रहे हैं। यह दृश्य दंग करने वाला था। यानी मादा चीतों का एक झुंड अयप्पा ने राजमहल में उपस्थित कर दिया। चीते के दूध में औषधि खा कर अयप्पा की मां पूरी तरह स्वस्थ हो गईँ।
इन्हीं अयप्पा का मंदिर आज दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय है। यह सबरीमाला में है। अयप्पा मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। लोगों में यह विश्वास है कि अयप्पा भगवान से जो भी मन्नत मांगी जाती है वह पूरी हो कर रहती है। वजह यह है कि वे शिव और विष्णु दोनों के पुत्र हैं।
दरअसल यह शिव और विष्णु को एक कर देने की कथा है। यानी जो शिव हैं, वही विष्णु भी हैं। सच्चिदानंद तो एक ही हैं। वही माता, पिता, बंधु और सखा हैं। वही जगत में व्याप्त हैं। वही हमारे अंदर भी व्याप्त हैं।