Monday, March 17, 2014


धरती के गर्भ में है महासागरों से ज़्यादा पानी


नीला खनिज
हीरे के अंदर संरक्षित खनिजों ने धरती के गर्भ में दबी चमकदार नीली चट्टानों के बारे में संकेत दिए हैं, जिनमें इतना पानी हो सकता है जितना सारे महासागरों में है.
मध्य-पश्चिम ब्राज़ील से मिले एक हीरे में ऐसे खनिज मौजूद हैं जो धरती से करीब 600 किलोमीटर अंदर बनते हैं और इनके अंदर पर्याप्त मात्रा में पानी मौजूद है.
इस शोध को विज्ञान की पत्रिका नेचर में प्रकाशित किया गया है. इस शोध से यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि पत्थरों से पटे बहुत से ग्रहों की गहराई में पानी हो सकता है.

प्राकृतिक हीरा

बहुत गहरे ज्वालामुखी पहाड़ के फटने से जो चट्टान या पत्थर धरती की सतह पर आए और इनमें जो हीरे के टुकड़े मिले वो धरती की बड़ी ही दिलचस्प तस्वीर दिखाते हैं.
कनाडा के अल्बर्टा विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर ग्राहम पीयरसन के नेतृत्व वाले शोध दल ने एक विस्तृत परियोजना के तहत दस करोड़ साल पुराने किंबरलाइट से निकले और ब्राज़ील के जुइना में मिले एक हीरे का अध्ययन किया.
उन्होंने देखा कि इसमें रिंगवूडाइट नाम का एक खनिज है जो धरती के अंदर 410 से 660 किलोमीटर की गहराई में ही बन सकता है. इससे यह भी पता चला कि कुछ हीरे कितनी गहराई में तैयार होते हैं.
इससे पहले रिंगवूडाइट सिर्फ़ उल्कापिडों में ही पाया गया था, ऐसा पहली बार हुआ है कि धरती में रिंगवूडाइट पाया गया. इससे भी आश्चर्यजनक बात यह है कि इस खनिज का तक़रीबन एक फ़ीसद हिस्सा पानी है.
हालांकि यह सुनने में बहुत कम लगता है लेकिन क्योंकि रिंगवूडाइट धरती की गहराई के बहुत बड़े हिस्से में पाया जाता है, इसलिए इसका मतलब हुआ कि धरती के अंदर बहुत सारा पानी होगा.
ब्राज़ील से मिला हीरा
कैंब्रिज विश्वविद्यालय की डॉ सैली गिबसन इस शोध में शामिल थीं. वह कहती हैं, "पानी का इतनी भारी मात्रा में पाया जाना हमारी धरती की सतह पर सबसे पहले पानी मिलने की अवधारणा में बेहद महत्वपूर्ण नई जानकारी है."
यह अवलोकन हमारे ग्रह की गहराई में पानी जमा होने का पहला भौतिक सबूत तो है ही इसके साथ ही यह धरती के अंदरूनी हिस्से के सूखे, तरल या कई हिस्सों में तरल होने के 25 साल पुराने विवाद पर भी विराम लगाता है.
हीरे के इन नमूनों की व्याख्या करते हुए प्रोफ़ेसर पीयरसन कहते हैं, "ऐसा लगता है कि यह नरक तक जाकर वापस आया है, जो इसमें मौजूद है."

नीला ग्रह

कोलोराडो विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर जोसेफ़ स्मिथ कई सालों से रिंगवूडाइट का अध्ययन कर रहे हैं और उनकी प्रयोगशाला में ऐसे कई खनिजों का अध्ययन किया गया है.
वह कहते हैं, "मुझे यह अचंभित करने वाली बात लगती है! इसका मतलब यह हुआ कि धरती के गर्भ में महासागरों से कई गुना ज़्यादा पानी जमा हो सकता है. इससे हमें यह भी पता चलता है कि हाइड्रोजन धरती का आधारभूत तत्व है और वो बाद में धूमकेतुओं से नहीं आया है."
पृथ्वी
"इस खोज के आधार पर कहा जा सकता है कि हाइड्रोजन धरती की अंदरूनी व्यवहार को वैसे ही नियंत्रित करता होगा जैसे कि वह सतह पर करता है. और धरती जैसे पानी वाले ग्रह हमारे सौरमंडल में और भी हो सकते हैं."
यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि दूसरे चट्टानी ग्रहों में किस मात्रा में पानी हो जमा हो सकता है.
प्रोफ़ेसर स्मिथ की प्रयोगशाला में भी इसी तरह के खनिज के कण है जो माइक्रोस्कोप से देखने पर चमकदार नीले नज़र आते हैं.
रिंगवूडाइट के पानी धारण करने की क्षमता की खोज, धरती की गहराई में इसकी प्रचुरता और इसके ख़ूबसूरत रंग को देखते हुए धरती को मिला "नीले ग्रह" का नाम और भी सार्थक हो जाता है.

Monday, March 10, 2014



वैज्ञानिकों को ऐसी चार नई मानव-निर्मित गैसों का पता चला है, जो ओज़ोन परत को नुक़सान पहुँचा रही हैं.
इनमें से दो गैसें ओज़ोन परत को इतनी तेज़ी से नुकसान पहुँचा रही हैं कि वैज्ञानिक इसे लेकर काफ़ी चिंतित हैं.
ज़मीन से 15 से 30 किलोमीटर की ऊंचाई पर वायुमंडल में पाई जाने वाली ओज़ोन की परत मनुष्यों और जानवरों को हानिकारक अल्ट्रावायलट (यूवी) किरणों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. यूवी किरणों से मनुष्यों में कैंसर होता है. जानवरों की प्रजनन क्षमता पर भी इनका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
क्लिक करें ओज़ोन परत में बढ़ते छेद के कारण 1980 के दशक के मध्य से क्लोरोफ़्लोरोकार्बन (सीएफ़सी) गैस के उत्पादन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है.

गैस की उत्पत्ति

"हमारे शोध से पता चलता है कि ये चार गैसें 1960 तक वायुमंडल में नहीं थीं. इससे पता चलता है कि ये मानव निर्मित गैसें हैं."
डॉक्टर जॉनसन लाउबे, प्रमुख शोधकर्ता
सीएफ़सी से मिलती-जुलती इन गैसों की उत्पत्ति का सटीक कारण अभी भी रहस्य है.
सबसे पहले ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के वैज्ञानिकों ने 1985 में अंटार्कटिक के ऊपर ओज़ोन परत में एक बड़े छेद की खोज की थी.
वैज्ञानिकों को पता चला कि इसके लिए सीएफ़सी गैस ज़िम्मेदार है, जिसकी खोज 1920 में हुई थी. इस गैस का प्रयोग रेफ्रिज़रेटर, हेयरस्प्रे और डिऑडरेंट बनाने वाले प्रोपेलेंट में अधिकता से होता है.
सीएफ़सी पर नियंत्रण पाने के लिए 1987 में दुनिया के देशों में सहमति बनी और इसके उत्पादन को नियंत्रित करने के लिए मांट्रियल संधि अस्तित्व में आई.
साल 2010 में सीएफ़सी के उत्पादन पर वैश्विक स्तर पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया.

इंसान ने बनाया

ओज़ोन परत में छेद
ओज़ोन परत में छेद का पता सबसे पहले ब्रितानी वैज्ञानिकों ने 1985 में लगाया था.
इन चार नई क्लिक करें गैसों की मौज़ूदगी का पता लगाया है ईस्ट एंजिलिया विश्वविद्लय के शोधकर्ताओं ने.
इनमें से तीन गैसें सीएफ़सी हैं और एक गैस हाइड्रोक्लोरोफ़्लोरोकार्बन (एचसीएफ़सी) है, यह गैस भी ओज़ोन परत को नुक़सान पहुँचा सकती है.
इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर जॉनसन लाउबे कहते हैं, ''हमारे शोध से पता चलता है कि ये चार गैसें 1960 तक वायुमंडल में नहीं थीं यानी ये मानवनिर्मित गैसें हैं.''
वैज्ञानिक ध्रुवीय बर्फ़ से निकाली गई हवा के विश्लेषण से पता लगा सकते हैं कि आज से 100 साल पहले कैसा वायुमंडल कैसा था.
शोधकर्ताओं ने इनकी तुलना वर्तमान वायुमंडल में पाई जाने वाली गैसों के नमूने से भी की. इसके लिए तस्मानिया के दूर-दराज़ के इलाक़े से नमूने लाए गए.
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वायुमंडल में 74 हज़ार टन ऐसी गैस मौजूद हैं. इनमें से दो गैसें ओज़ोन परत में क्षरण की दर में उल्लेखनीय वृद्धि कर रही हैं.
डॉक्टर लाउबे कहते हैं, ''इन चार गैसों की पहचान बहुत चिंताजनक है, क्योंकि वो ओज़ोन परत के क्षरण में योगदान देंगी.''

बहुत बड़ा ख़तरा नहीं

वो कहते हैं, ''हम यह नहीं जानते कि इन नई गैसों का उत्सर्जन कहाँ से हो रहा है, इसकी जाँच की जानी चाहिए. कीटनाशक के निर्माण में उपयोग होने वाला कच्चा माल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अवयवों की धुलाई में काम आने वाले विलायक इसके संभावित स्रोत हो सकते हैं.''
वो कहते हैं कि ये तीन सीएफ़सी वायुमंडल में बहुत धीरे-धीरे नष्ट होते हैं. इसलिए अगर इनके उत्सर्जन को तत्काल प्रभाव से रोक भी दिया जाए, तो भी वो कई दशक तक वायुमंडल में बने रहेंगे.
वहीं अन्य वैज्ञानिकों का मानना है कि अभी इन गैसों की मात्रा कम है और इनसे अभी कोई तात्कालिक ख़तरा नहीं है लेकिन इनके स्रोत का पता लगाने की ज़रूरत है.
लीड्स विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पाइरस फॉरेस्टर को कहते हैं, ''इस अध्ययन से पता चलता है कि ओज़ोन परत का क्षरण अभी भी पुरानी बात नहीं हुई है.''
वो कहते हैं, ''जो चार गैसें खोजी गई हैं, उनमें से सीएफ़सी-113ए ज़्यादा चिंता पैदा करने वाली प्रतीत हो रही है क्योंकि कहीं से इसका मामूली उत्सर्जन हो रहा है, लेकिन यह बढ़ता जा रहा है. हो सकता है कि यह कीटनाशकों के निर्माण से पैदा हो रही हो. हमें इसकी पहचान करनी चाहिए और इसका उत्पादन रोक देना चाहिए."

Wednesday, December 25, 2013

Happy Christmas

A very warm and happy Christmas my dear friends. May Lord Jesus shower all His blessings always on you. May Christ always present in your hearts.

Tuesday, December 10, 2013

Life is struggle for joy


Vinay Bihari Singh

Paramahansa Yogananda ji has said- Life is struggle for joy. Many times, I find- it is true. I am passing through difficult phase of life. I am searching groom for my daughter who woks in IBM, Calcutta. In the search of suitable groom,I am wandered in different cities but could not find any boy. So according to my Guru Paramahansa Yogananda this can be the test and trials of Divine mother. Divine mother loves us. Thats why she put us in tests and trials to let us learn test and trials. To think like this- I am  feeling peaceful. This is a good way to pass through difficult days.

Saturday, September 7, 2013

जीवन की गति न्यारी



      मित्रों, काफी दिनों तक अपने ब्लाग से अलग रहा। लेकिन दुबारा यह अपने पास खींच ही लाया। इस बीच कई नए अनुभव  प्राप्त हुए। उनकी चर्चा फिर कभी। आज भगवत गीता पढ़ रहा था। भगवान कृष्ण ने कितनी सुंदर बातें कहीं हैं इस पवित्र पुस्तक में। भगवान ने कहा है- मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। कैसा भक्त? जो अनन्य भक्ति करता हो। यानी उसकी हर गतिविधि में भगवान का स्मरण हो। ईश्वर ही जिसके आधार हों, वह व्यक्ति कभी नष्ट नहीं होता। भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। पढ़ कर अच्छा लगा। एक औऱ प्रसंग है- भगवान कहते हैं कि जो सुख औऱ दुख में, सर्दी और गर्मी में, मान और अपमान में सम हो वह  मेरा अत्यंत प्रिय है। जो भय, घृणा या कामना से रहित हो गया हो वह मेरा अत्यंत प्रिय है। भगवत गीता तो हमें रोज ही पढ़नी चाहिए।

Saturday, July 6, 2013

कब्ज कैसे दूर करें





कब्ज हमेशा से मनुष्य के लिए परेशानी का कारण रहा है। लेकिन इसे तोड़ने का एक उपाय पा कर मुझे बहुत खुशी हो रही है। क्या करें कि कब्ज टूटे?  या कब्ज ही न हो।
   योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया के संस्थापक और मेरे गुरुदेव परमहंस योगानंद जी का फार्मूला अत्यंत कारगर है। फलों पर या बिना चीनी के फलों के रस पर एक दिन उपवास करें। सुबह औऱ शाम एक या दो चम्मच इसबगोल की भूसी पानी में घोल कर पी लें। यह सप्ताह में सिर्फ एक ही दिन करना है। अन्यथा इसबगोल के भूसी की आदत पड़ जाएगी। सिर्फ एक दिन। इससे आदत भी नहीं पड़ेगी और पेट भी अच्छी तरह साफ हो जाएगा। अगले दिन हल्की सी खिचड़ी खाएं। तो मन प्रसन्न रहेगा। कई लोग उपवास के अगले दिन गरिष्ठ भोजन कर लेते हैं क्योंकि उन्हें काफी भूख लगी होती है।  लेकिन थोड़ा सा संयम बरत कर खिचड़ी खाने वाले दिन के अगले दिन से सामान्य भोजन शुरू करें तो काफी फायदा होता है। इसे आप आजमा कर देख सकते हैं। निश्चित फायदा होगा। हां, उपवास के दौरान पर्याप्त पानी पीने से और ज्यादा लाभ होगा।

Tuesday, July 2, 2013

संगीत का ककहरा


मित्रों, पिछले दिनों एक बहन ने अपने घर ले जाकर मुझे हारमोनियम बजाने की शिक्षा दी। अभी तो बस एक ही दिन शिक्षा ली है। लेकिन यह अचानक हुआ। उस बहन ने खुद आ कर मुझसे कहा कि चलिए मैं आपकों हारमोनियम सिखा देती हूं। ईश्वर की असीम अनुकंपा। उस बहन का नाम है- पिऊ घोष भौमिक। पहले दिन मैंने सा रे ग म प ध नी सा का अभ्यास किया। हारमोनियम के स्ट्रिंग्स पर हाथ आजमाया। मैंने पाया कि सा रे ग म  इत्यादि गाते वक्त जो संतुलन चाहिए वह मुझमें नहीं था। लेकिन सिखाने वाली बहन ने मुझे वह संतुलन सिखा दिया। तब लगा कि यह तो एक और क्षेत्र है जिसके बारे मैं बिल्कुल नहीं जानता था। एक नया संसार।  ठीक इसी तरह जीवन में भी एक सकारात्मक लय की जरूरत है। वह लय तभी आ सकती है जब ईश्वर के प्रति उत्सुकता हो। ईश्वर, ईश्वर औऱ ईश्वर।