Thursday, December 30, 2010

हां, इस सृष्टि में चमत्कार होते हैं


विनय बिहारी सिंह


क्या इस साल डिहिका आश्रम में आपने परमहंस योगानंद जी को साक्षात शरीर में देखा? मैंने इकसठ साल के तारापद चट्टराज से चकित होकर पूछा।चट्टराज पास के नगर बर्नपुर के रहने वाले हैं और आश्रम में सेवा कार्य करते रहते हैं। उन्होंने कहा- हां, बिल्कुल शरीर में देखा। आश्चर्य इसलिए कि परमहंस जी ने सन १९५२ में अपनी देह का त्याग कर महासमाधि ले ली थी। जिन्हें मालूम नहीं है उन्हें बता दें- महान योगी परमहंस योगानंद जी की आत्मकथा - आटोबायोग्राफी आफ अ योगी, दुनिया की अनेक भाषाओं में अनूदित हो चुकी है। उर्दू में भी। हिंदी में योगी कथामृत नाम से यह अपार लोकप्रिय है। योगी कथामृत के २७ वें अध्याय में डिहिका के ब्रह्मचर्य विद्यालय का उल्लेख है। चट्टराज जी कह रहे थे कि उन्होंने १३ मई २०१० को उन्हें सशरीर देखा। मैंने उनसे पूछा- किस समय उन्होंने इस देव तुल्य परम योगी को देखा?
उन्होंने कहा- शाम का समय था। मैं योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया के डिहिका स्थित आश्रम में बैठा हुआ था। आश्रम में मुझे छोड़ कर कोई नहीं था। लेकिन जरा ठहरिए। यह अत्यंत रोचक घटना बताने से पहले मैं आपको बता दूं कि अपने गुरु स्वामी श्री युक्तेश्वर जी की प्रेरणा से परमहंस जी ने २२ मार्च १९१७ को डिहिका में अपने पहले आश्रम स्कूल की स्थापना की। डिहिका बर्दवान जिले के आसनसोल से १० किलोमीटर दूर दामोदर नदी के पास है। बाद में छात्रों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। डिहिका में जगह कम थी। इसलिए यह स्कूल यह रांची स्थानांतरित हो गया। वहीं यानी रांची में उसी स्थान पर आज पवित्र योगदा आश्रम है। डिहिका और रांची की जमीन कासिम बाजार के महाराजा मणिंद्र चंद्र नंदी ने दी थी। इसकी चर्चा इसी लेख में बाद में आएगी।
आइए अब रोमांचकारी घटना की तरफ मुड़ें। चट्टराज जी ने कहा- शाम का समय था। मैं अकेल आश्रम में मुख्य गेट के बगल में एक पेड़ के पास बैठा था। तभी देखा- एक लंबे बालों वाले बलिष्ट सन्यासी तेजी से आश्रम में घुसे और आज जहां ध्यान मंदिर बन रहा है, उसमें थोड़ी देर के लिए रुके। फिर आश्रम में स्थित तालाब के भीतर गए। तब तालाब में पानी नहीं था। वहां तालाब के बीचोबीच गए और वहां चारो तरफ घूम कर देखा। मैं तो खड़ा होकर अवाक् उन्हें देख रहा था। फिर वे वापस आए। जब वे नजदीक आए तब मैंने पहचान लिया- अरे, यह तो साक्षात परमहंस योगानंद जी हैं। वही चेहरा, वही जादुई आंखें और वही बलिष्ट शरीर। गेट से बाहर जाने के पहले उन्होंने तीन बार कहा- माई गॉड इज लव, माई गॉड इज लव, माई गॉड इज लव। ( मेरे ईश्वर प्रेम हैं यानी प्रेम ही ईश्वर हैं ) और वे तेजी से चले गए। तब मैं उनके पीछे भागा। गेट के बाहर गया। लेकिन आश्चर्य। उनका कहीं पता नहीं था। गेट के बाहर लोग आ जा रहे थे। लेकिन गुरु जी नहीं दिखे। यहां गुरु जी परमहंस जी के लिए कहा गया है।
मैंने उनसे पूछा- परमहंस जी ने क्या पहना था? चट्टराज जी ने कहा- उन्होंने भूरे रंग का सन्यासियों का गाउन पहन रखा था। मैंने पूछा- गेरुए रंग का नहीं। उन्होंने कहा- नहीं। उनका वस्त्र भूरा था। वे जिस तेजी से आए आश्रम में घूमे और गए, वह चकित करने वाला था। अब मैं सोचता हूं कि उनके पैर छू लेता तो मेरा जीवन सार्थक हो जाता। लेकिन वे तो मानो हवा की तरह चल रहे थे। मैं उन्हें छू ही कैसे सकता था।
जीवन में पहली बार मैं किसी व्यक्ति से मिला, जिसने एक दिव्य योगी का शरीर छोड़ने के बाद दर्शन किया है। मैंने चट्टराज जी से कई प्रश्न किए। पर वे तो उसी क्षण के बारे में बार- बार बता रहे थे। मानो वह उनके जीवन का केंद्रीय अनुभव बन गया हो। मैं उनके सौभाग्य को महसूस कर सकता हूं।
जब यह आश्रम स्कूल रांची स्थानांतरित हो गया तो यह डिहिका की यह जमीन कई लोगों के हाथों में बिकी। तभी सन १९९२ में योगदा आश्रम के एक भक्त ने अचानक उस जगह की पहचान की। उसने कहा- यही वह जगह है जहां गुरुदेव ने अपना पहला आश्रम स्कूल खोला था। यहीं पर परमहंस जी के संस्कृत अध्यापक स्वामी केवलानंद जी ने बच्चों को पढ़ाया और अपनी साधना भी जारी रखी। यहीं पर स्वामी केवलानंद जी ने सन्यास लेकर गेरुआ वस्त्र धारण किया। वे स्कूल के धर्माचार्य थे। इसी वयोवृद्ध भक्त ने बताया कि किस सेमल के वृक्ष के नीचे बैठ कर परमहंस जी ध्यान करते थे। उसने अब तक मौजूद उस पेड़ को भी दिखाया। संयोग यह कि सन १९३५ में परमहंस योगानंद जब अपने गुरु से मिलने अमेरिका से भारत आए तो डिहिका आए और उसी पेड़ के नीचे बैठ कर गहन ध्यान किया। योगदा सत्संग सोसाइटी (वाईएसएस) और सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप (एसआरएफ) की संघमाता और अध्यक्ष दयामाता भी जब भारत आईं तो उन्होंने इस पवित्र स्थल पर आईं। मूल आश्रम की दो तिहाई जमीन लेकर विभिन्न लोगों ने अपना घर बना लिया है। मार्च १९९७ में सिर्फ एक तिहाई जमीन यानी ६५००० स्क्वायर फीट जमीन आश्रम खरीद सका। डिहिका में यहीं पर है योगदा सत्संग ध्यान केंद्र। तालाब के घाट पर एक तरफ प्राचीन पत्थर की सीढ़ियां हैं। इन पत्थरों पर परमहंस जी ने अपने पैर रखे होंगे, यह सोच कर मैंने उन्हें छू कर अपने माथे पर लगाया। वहां एक सुखद गेस्ट हाउस, ध्यान केंद्र बन गया है। आश्रम के चारो तरफ चारदीवारी बना दी गई है। इस आश्रम के कायाकल्प की तैयारियां चल रही हैं। अभी बहुत काम बाकी है। उस पवित्र सेमल के पेड़ को जहां परमहंस जी बैठते थे, वेस्ट बेंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बार- बार काट रहा है। उसका कहना है कि ऊपर से बिजली के जा रहे तारों को यह पेड़ डिस्टर्ब कर रहा है। आश्रम के कर्मचारी आग्रह करते हैं कि इन तारों और खंभों को हटाने की जगह तो है, हटा क्यों नहीं देते। तो वेस्ट बेंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड कह रहा है- आश्रम रुपए देगा तब हम खंभा और तार हटाएंगे। वेस्ट बेंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड की यह बात सुन कर ईश्वर परायण लोग चकित हैं. जिस परमहंस योगानंद जी की स्मृति में भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया था, जिन्होंने अमेरिका और समूचे विश्व में क्रिया योग का प्रचार प्रसार किया ऐसे महान योगी का स्मृति चिन्ह भी बनाए रखने की शालीनता वेस्ट वेस्ट बेंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड नहीं कर पा रहा है। क्या विडंबना है। ईश्वर करें इस पवित्र पेड़ का महत्व उनकी समझ में आए।
परमहंस योगानंद के इस ब्रह्मचर्य स्कूल में भोर से ही गतिविधियां शुरू हो जाती थीं। बच्चे अपने अध्यापकों के साथ वेदों और पुराणों के श्लोक गाते थे। इसकी गूंज पूरे माहौल को पवित्र बना देती थी। फिर ध्यान। इसके बाद जलपान। स्कूल इसके बाद ही शुरू हो जाता था। विभिन्न विषयों का गहन अध्ययन। एक से एक विद्वान अध्यापक। स्कूल की सफाई, बर्तनों की सफाई खाना इत्यादि सब छात्र करते थे। वे समय पर ध्यान करते थे। योगानंद जी चाहते थे कि स्कूलों में नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा भी दी जाए ताकि स्कूल से पास हो कर निकले बच्चे देश और दुनिया के लिए कुछ करें। एक स्वस्थ राष्ट्र और समाज का निरंतर विकास हो। शनिवार की शाम को योगानंद जी का प्रवचन होता था। पास ही दामोदर रेलवे स्टेशन है। वहां के कुछ कर्मचारी आ जाते थे। आसपास के गांवों के लोग भी आते थे। कभी- कभी आसपास के जंगल और पहाड़ों पर योगानंद जी के साथ अध्यापक और छात्र घूमने जाते थे। वहां उन्हें प्रकृति के असली रूपों का दर्शन होता था। नदी और पहाड़ बच्चों से मौन संवाद करते जान पड़ते थे। परमहंस योगानंद जी तब स्वामी योगानंद जी थे। वे कभी- कभी खुद खाना बनाते थे। देर होने पर कहते- यह देर क्षमा करने योग्य है क्योंकि भोजन पकाना एक कला है। देर हो ही सकती है। वे भोजन बनाने के नए तरीकों पर प्रयोग करते रहते थे। लेकिन बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। योगानंद जी ने कासिम बाजार के महाराजा से कहा कि वे इस स्कूल में और कमरे बनवा दें। लेकिन महाराजा नंदी ने कहा- इससे ज्यादा स्थान रांची में है। कृपया वह जगह आप ले लें। स्कूल के अध्यापक यह मनोरम स्थल छोड़ना नहीं चाहते थे। लेकिन कोई उपाय नहीं था। साल भर बाद उन्हें स्कूल को रांची स्थानांतरित करना पड़ा। कई उत्सुक लोग पूछते हैं कि इस स्कूल की स्थापना का संयोग कैसे बैठा। उनके लिए यह जानकारी जरूरी है कि जब योगानंद जी के मन में एक आदर्श स्कूल की कल्पना चल रही थी तो अपना संक्षिप्त ब्लू प्रिंट लेकर वे कासिम बाजार के महाराजा मणिंद्र चंद्र नंदी से मिले। महाराजा नंदी तो ब्लू प्रिंट देखते ही खुशी से उछल पड़े और कहा- स्वामी जी, क्या अद्भुत संयोग है। मैं भी एक ऐसा ही स्कूल खोलना चाहता था। कृपा कर इस योजना की विस्तृत रूपरेखा बनाएं। योगानंद जी ने वहीं बैठ कर विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत कर दी। महाराजा इस स्कूल को खोलने के लिए तत्पर हो गए। स्कूल खुला और खूब लोकप्रिय हुआ। वेस्ट बेंगाल इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के उच्चाधिकारी इन सारे तथ्यों से शायद परिचित नहीं हैं। उन्होंने कहा- हां, बिल्कुल शरीर में देखा। आश्चर्य इसलिए कि परमहंस जी ने सन १९५२ में अपनी देह का त्याग कर महासमाधि ले ली थी। जिन्हें मालूम नहीं है उन्हें बता दें- महान योगी परमहंस योगानंद जी की आत्मकथा - आटोबायोग्राफी आफ अ योगी, दुनिया की अनेक भाषाओं में अनूदित हो चुकी है। उर्दू में भी। हिंदी में योगी कथामृत नाम से यह अपार लोकप्रिय है। योगी कथामृत के २७ वें अध्याय में डिहिका के ब्रह्मचर्य विद्यालय का उल्लेख है। चट्टराज जी कह रहे थे कि उन्होंने १३ मई २०१० को उन्हें सशरीर देखा। मैंने उनसे पूछा- किस समय उन्होंने इस देव तुल्य परम योगी को देखा। उन्होंने कहा- शाम का समय था। मैं योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया के डिहिका स्थित आश्रम में बैठा हुआ था। आश्रम में मुझे छोड़ कर कोई नहीं था। लेकिन जरा ठहरिए। यह अत्यंत रोचक घटना बताने से पहले मैं आपको बता दूं कि अपने गुरु स्वामी श्री युक्तेश्वर जी की प्रेरणा से परमहंस जी ने २२ मार्च १९१७ को डिहिका में अपने पहले आश्रम स्कूल की स्थापना की। डिहिका बर्दवान जिले के आसनसोल से १० किलोमीटर दूर दामोदर नदी के पास है। बाद में छात्रों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। डिहिका में जगह कम थी। इसलिए यह स्कूल यह रांची स्थानांतरित हो गया। वहीं यानी रांची में उसी स्थान पर आज पवित्र योगदा आश्रम है। डिहिका और रांची की जमीन कासिम बाजार के महाराजा मणिंद्र चंद्र नंदी ने दी थी। इसकी चर्चा इसी लेख में बाद में आएगी।
आइए अब रोमांचकारी घटना की तरफ मुड़ें। चट्टराज जी ने कहा- शाम का समय था। मैं अकेल आश्रम में मुख्य गेट के बगल में एक पेड़ के पास बैठा था। तभी देखा- एक लंबे बालों वाले बलिष्ट सन्यासी तेजी से आश्रम में घुसे और आज जहां ध्यान मंदिर बन रहा है, उसमें थोड़ी देर के लिए रुके। फिर आश्रम में स्थित तालाब के भीतर गए। तब तालाब में पानी नहीं था। वहां तालाब के बीचोबीच गए और वहां चारो तरफ घूम कर देखा। मैं तो खड़ा होकर अवाक् उन्हें देख रहा था। फिर वे वापस आए। जब वे नजदीक आए तब मैंने पहचान लिया- अरे, यह तो साक्षात परमहंस योगानंद जी हैं। वही चेहरा, वही जादुई आंखें और वही बलिष्ट शरीर। गेट से बाहर जाने के पहले उन्होंने तीन बार कहा- माई गॉड इज लव, माई गॉड इज लव, माई गॉड इज लव। और वे तेजी से चले गए। तब मैं उनके पीछे भागा। गेट के बाहर गया। लेकिन आश्चर्य। उनका कहीं पता नहीं था। गेट के बाहर लोग आ जा रहे थे। लेकिन गुरु जी नहीं दिखे। यहां गुरु जी परमहंस जी के लिए कहा गया है।
मैंने उनसे पूछा- परमहंस जी ने क्या पहना था। चट्टराज जी ने कहा- उन्होंने भूरे रंग का सन्यासियों का गाउन पहन रखा था। मैंने पूछा- गेरुए रंग का नहीं। उन्होंने कहा- नहीं। उनका वस्त्र भूरा था। वे जिस तेजी से आए आश्रम में घूमे और गए, वह चकित करने वाला था। अब मैं सोचता हूं कि उनके पैर छू लेता तो मेरा जीवन सार्थक हो जाता। लेकिन वे तो मानो हवा की तरह चल रहे थे। मैं उन्हें छू ही कैसे सकता था।
जीवन में पहली बार मैं किसी व्यक्ति से मिला, जिसने एक दिव्य योगी का शरीर छोड़ने के बाद दर्शन किया है। मैंने चट्टराज जी से कई प्रश्न किए। पर वे तो उसी क्षण के बारे में बार- बार बता रहे थे। मानो वह उनके जीवन का केंद्रीय अनुभव बन गया हो। मैं उनके सौभाग्य को महसूस कर सकता हूं।
जब यह आश्रम स्कूल रांची स्थानांतरित हो गया तो यह डिहिका की यह जमीन कई लोगों के हाथों में बिकी। तभी सन १९९२ में योगदा आश्रम के एक भक्त ने अचानक उस जगह की पहचान की। उसने कहा- यही वह जगह है जहां गुरुदेव ने अपना पहला आश्रम स्कूल खोला था। यहीं पर परमहंस जी के संस्कृत अध्यापक स्वामी केवलानंद जी ने बच्चों को पढ़ाया और अपनी साधना भी जारी रखी। यहीं पर स्वामी केवलानंद जी ने सन्यास लेकर गेरुआ वस्त्र धारण किया। वे स्कूल के धर्माचार्य थे। इसी वयोवृद्ध भक्त ने बताया कि किस सेमल के वृक्ष के नीचे बैठ कर परमहंस जी ध्यान करते थे। उसने अब तक मौजूद उस पेड़ को भी दिखाया। संयोग यह कि सन १९३५ में परमहंस योगानंद जब अपने गुरु से मिलने अमेरिका से भारत आए तो डिहिका आए और उसी पेड़ के नीचे बैठ कर गहन ध्यान किया। योगदा सत्संग सोसाइटी (वाईएसएस) और सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप (एसआरएफ) की संघमाता और अध्यक्ष दयामाता भी जब भारत आईं तो उन्होंने इस पवित्र स्थल पर आईं। मूल आश्रम की दो तिहाई जमीन लेकर विभिन्न लोगों ने अपना घर बना लिया है। मार्च १९९७ में सिर्फ एक तिहाई जमीन यानी ६५००० स्क्वायर फीट जमीन आश्रम खरीद सका। डिहिका में यहीं पर है योगदा सत्संग ध्यान केंद्र। तालाब के घाट पर एक तरफ प्राचीन पत्थर की सीढ़ियां हैं। इन पत्थरों पर परमहंस जी ने अपने पैर रखे होंगे, यह सोच कर मैंने उन्हें छू कर अपने माथे पर लगाया। वहां एक सुखद गेस्ट हाउस, ध्यान केंद्र बन गया है। आश्रम के चारो तरफ चारदीवारी बना दी गई है। इस आश्रम के कायाकल्प की तैयारियां चल रही हैं। अभी बहुत काम बाकी है। उस पवित्र सेमल का पेड़ जहां परमहंस जी बैठते थे, को बिजली विभाग बार- बार काट रहा है। उसका कहना है कि इस पेड़ के ऊपर से बिजली के जा रहे तारों को यह पेड़ डिस्टर्ब कर रहा है। आश्रम के कर्मचारी आग्रह करते हैं कि इन तारों और खंभों को हटाने की जगह तो है, हटा क्यों नहीं देते। तो बिजली विभाग कह रहा है- आश्रम रुपए देगा तब हम खंभा और तार हटाएंगे। बिजली विभाग यानी वेस्ट बेंगाल इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड। जिस परमहंस योगानंद जी की स्मृति में भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया था, जिन्होंने अमेरिका और समूचे विश्व में क्रिया योग का प्रचार प्रसार किया ऐसे महान योगी की स्मृति चिन्ह भी बनाए रखने की शालीनता वेस्ट बेंगाल इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड नहीं कर पा रहा है। क्या विडंबना है। बिजली विभाग को समझाने की कोशिशें जारी हैं। ईश्वर करें इस पवित्र पेड़ का महत्व उनकी समझ में आए।
परमहंस योगानंद के इस ब्रह्मचर्य स्कूल में भोर से ही गतिविधियां शुरू हो जाती थीं। बच्चे अपने अध्यापकों के साथ वेदों और पुराणों के श्लोक गाते थे। इसकी गूंज पूरे माहौल को पवित्र बना देती थी। फिर ध्यान। इसके बाद जलपान। स्कूल इसके बाद ही शुरू हो जाता था। विभिन्न विषयों का गहन अध्ययन। एक से एक विद्वान अध्यापक। स्कूल की सफाई, बर्तनों की सफाई खाना इत्यादि सब छात्र करते थे। वे समय पर ध्यान करते थे। योगानंद जी चाहते थे कि स्कूलों में नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा भी दी जाए ताकि स्कूल से पास हो कर निकले बच्चे देश और दुनिया के लिए कुछ करें। एक स्वस्थ राष्ट्र और समाज का निरंतर विकास हो। शनिवार की शाम को योगानंद जी का प्रवचन होता था। पास ही दामोदर रेलवे स्टेशन है। वहां के कुछ कर्मचारी आ जाते थे। आसपास के गांवों के लोग भी आते थे। कभी- कभी आसपास के जंगल और पहाड़ों पर योगानंद जी के साथ अध्यापक और छात्र घूमने जाते थे। वहां उन्हें प्रकृति के असली रूपों का दर्शन होता था। नदी और पहाड़ बच्चों से मौन संवाद करते जान पड़ते थे। परमहंस योगानंद जी तब स्वामी योगानंद जी थे। वे कभी- कभी खुद खाना बनाते थे। देर होने पर कहते- यह देर क्षमा करने योग्य है क्योंकि भोजन पकाना एक कला है। देर हो ही सकती है। वे भोजन बनाने के नए तरीकों पर प्रयोग करते रहते थे। लेकिन बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। योगानंद जी ने कासिम बाजार के महाराजा से कहा कि वे इस स्कूल में और कमरे बनवा दें। लेकिन महाराजा नंदी ने कहा- इससे ज्यादा स्थान रांची में है। कृपया वह जगह आप ले लें। स्कूल के अध्यापक यह मनोरम स्थल छोड़ना नहीं चाहते थे। लेकिन कोई उपाय नहीं था। साल भर बाद उन्हें स्कूल को रांची स्थानांतरित करना पड़ा। कई उत्सुक लोग पूछते हैं कि इस स्कूल की स्थापना का संयोग कैसे बैठा। उनके लिए यह जानकारी जरूरी है कि जब योगानंद जी के मन में एक आदर्श स्कूल की कल्पना चल रही थी तो अपना संक्षिप्त ब्लू प्रिंट लेकर वे कासिम बाजार के महाराजा मणिंद्र चंद्र नंदी से मिले। महाराजा नंदी तो ब्लू प्रिंट देखते ही खुशी से उछल पड़े और कहा- स्वामी जी, क्या अद्भुत संयोग है। मैं भी एक ऐसा ही स्कूल खोलना चाहता था। कृपा कर इस योजना की विस्तृत रूपरेखा बनाएं। योगानंद जी ने वहीं बैठ कर विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत कर दी। महाराजा इस स्कूल को खोलने के लिए तत्पर हो गए। स्कूल खुला और खूब लोकप्रिय हुआ। वेस्ट बेंगाल इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के उच्चाधिकारी इन सारे तथ्यों से शायद परिचित नहीं हैं।

Wednesday, December 29, 2010

जीवन संरचना में नए तत्व की खोज



पारुल अग्रवाल
बीबीसी संवाददाता

अब तक यह माना जाता था कि धरती पर जीवन के छह प्रमुख तत्त्व हैं-कॉर्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सल्फ़र और फ़ॉस्फ़ोरस.

इस साल अनुसंधानकर्ताओं ने कैलिफ़ॉर्निया की झील में एक ऐसा जीवाणु पाया जिसने फ़ॉस्फ़ोरस के बदले ज़हरीले रसायन आर्सेनिक को अपनी संरचना में शामिल कर लिया है.

इस खोज से यह धारणा पुष्ट हुई कि दूसरे ग्रहों पर अलग-अलग रसायनों से मिलकर बने जीवाणु और जीवन संरचनाएं भी मौजूद हो सकती हैं.

इस साल विश्व में पहली बार इस साल वैज्ञानिकों ने एंटी मैटर या प्रतिपदार्थ के अणुओं को कुछ क्षणों के लिए पकड़ने में भी सफलता पाई.

पदार्थ उसे कहते हैं जिससे कि पूरी दुनिया का निर्माण हुआ है. जब पदार्थ और प्रतिपदार्थ एक साथ जुड़ते हैं तो एक दूसरे का अस्तित्व समाप्त कर देते हैं और शेष कुछ नहीं बचता. इससे दुनिया की उत्पत्ति के बारे में काफ़ी जानकारी मिल सकती है.

उधर अमरीका में मंदी की मार का असर साल 2010 में नासा के अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर पड़ा.

अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वित्तीय तंगी के चलते 2020 में एक मानव दल के चांद पर जाने के कार्यक्रम को रद्द कर दिया. माना जा रहा है कि ये कार्यक्रम अब निजी हाथों में सौंपा जाएगा.

भारत के लिए एक दुखद घटना-- श्रीहरिकोटा से जीएसएलवी-एफ़06 यान के ज़रिए किया गया उपग्रह प्रक्षेपण विफल हो गया. प्रक्षेपण के कुछ ही समय बाद इसमें विस्फोट हो गया.

वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि नए संचार उपग्रह से टीवी, टेलीमेडीसन, टेलीशिक्षा और टेलीफ़ोन सेवाओं को बेहतर करने में मदद मिलेगी.

अगर ये मिशन सफल होता तो भारत अमरीका और रुस जैसे उन पाँच देशों की श्रेणी में शामिल हो जाता जिनके पास इस तरह की तकनीक है.
मैक्सिको की खाड़ी में हुआ तेल का रिसाव अमरीका के इतिहास में अब तक की सबसे भीषण पर्यावरण संबंधी दुर्घटना है.

साल 2010 को संयुक्त राष्ट्र की ओर से अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष घोषित किया गया. ये मौका था दुनिया को आगाह करने का कि जैव विविधता को नुकसान पहुंचा कर इंसान मुफ़्त में मिल रही प्राकृतिक सुविधाओं को किस तरह खत्म करता जा रहा है.
इस साल के इतिहास में अब तक की सबसे भीषण पर्यावरण संबंधित दुर्घटना भी दर्ज हुई. 20 अप्रैल 2010 को दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी के तेल के कुएं में विस्फोट हुआ.
मैक्सिको की खाड़ी में हुई इस दुर्घटना में 11 लोगों की मौत हो गई और समुद्र में 40 लाख बैरल से भी ज़्यादा तेल का रिसाव हुआ. समुद्री जीवन को भारी नुकसान के बाद तेल का यह रिसाव जुलाई में बंद हुआ.
अप्रैल के महीने में आइसलैंड में फटे एक ज्वालामुखी की राख ने यूरोप के कई देशों में हवाई सेवा को ठप कर दिया. एयर लाइंस की चिंता थी कि ज्वालामुखी की राख विमानों के इंजनों को जाम कर सकती है. छह दिनों तक हज़ारों उड़ानें बाधित रहीं और लाखों यात्री प्रभावित हुए.
25 साल की लगातार खोज के बाद मैडास्कर की एलाओट्रा झील में पाई जाने वाली चिड़िया एलाओट्रा ग्रेब को 2010 में विलुप्त घोषित कर दिया गया.
पीली चोंच वाले इस पक्षी का आकार इतना छोटा था कि यह ज़्यादा लंबी उड़ान नहीं भर सकता था. यही वजह है कि झील में मानवीय गतिविधियां बढ़ने के साथ यह पक्षी विलुप्त हो गया.
भारतीय पत्रकार पल्लव बागला को साल 2010 के लिए ‘अमेरिकन जियोफ़िसिकल यूनियन’ की ओर से विज्ञान क्षेत्र का प्रतिष्ठित ‘डेविड पर्लमेन अवार्ड’ मिला.
अपनी रिपोर्ट के ज़रिए पल्लव ने अमरीकी संस्थान आईपीसीसी द्वारा 2035 तक हिमालय के ग्लेशियर पिघलने के दावों की कलई खोली.
आईपीसीसी ने इस संबंध में अपनी गलती को स्वीकार किया और आंतरिक जांच के आदेश दिए.


ब्रिटेन के वैज्ञानिकों का कहना है कि अंडे और मुर्गी में से पहले मुर्गी आई.

बढ़ती उम्र इंसान को कभी रास नहीं आई. शायद यही वजह है कि हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोधकर्ताओं ने वृद्ध चूहों को जवान बनाने का प्रयोग शुरु किया.
वृद्ध चूहों के शिथिल अंगों में सुधार ने उनकी उम्र की रफ़्तार को उलट दिया गया और ये चूहे वृद्धावस्था से जवानी की ओर चल पड़े.
शोध कहता है कि ये प्रयोग इंसान पर सफल रहे तो वह दिन भी दूर नहीं जब उम्र नहीं ढलेगी और लोग सदा जवान रहेंगे.
सदियों से ये सवाल हमें उलझाता रहा है कि पहले कौन आया अंडा या मुर्गी, लेकिन इस साल ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने इस उलझन को भी सुलझा लिया.
वैज्ञानिकों ने पाया कि मुर्गी के अंडे ‘ओवोक्लेडिडिन-17’ नामक एक प्रोटीन से बनते हैं जो अंडे का खोल बनाने के लिए बेहद ज़रूरी है और मुर्गी के गर्भाशय में ही पाया जाता है.
यानी अंडा तभी बन सकता है जब मुर्गी का अस्तित्व हो!
इस साल अमरीका के वैज्ञानिकों ने दृष्टिहीनों के लिए कार बनाने का बीड़ा भी उठाया. इस गाड़ी में ऐसी तकनीक लगाई जाएगी कि दृष्टिहीन स्वतंत्र तौर पर गाड़ी चला सकेंगे.
गाड़ी में लगे सेंसर बीच रास्ते में आए मोड़ का अंदाजा लगाएंगे और ऑडियो संकेतों के ज़रिए नेत्रहीन चालक गाड़ी को नियंत्रित कर सकेंगे.
संगीत-प्रेमियों के हमजोली बन चुके ‘वॉकमैन’ को इस साल सोनी कंपनी ने अलविदा कह दिया.
1979 में सोनी ने एक ऐसा कैसेट प्लेयर बाज़ार में उतारा जिसे लोग अपने साथ कहीं भी ले जा सकते थे. ये एक क्रांतिकारी उपकरण था और युवा पीढ़ी के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ.
फिर तकनीक ने प्रगति की और बाज़ार में सीडी की धूम मच गई. ऐसे में कंपनी ने अब वॉकमैन को भी अलविदा कर दिया.
(courtesy- BBC Hindi service)

Tuesday, December 28, 2010

आखिरी सांस कब?



विनय बिहारी सिंह


एक साधु से युवक ने पूछा- अच्छा बाबा, आप कोई एक उदाहरण दीजिए जिससे समझ में आए कि भगवान हैं। साधु ने कहा- बेटा, तुम्हें याद है कि तुमने कब सांस लेना शुरू किया? युवक बोला- नहीं। साधु ने पूछा- तुम्हें मालूम है कि तुम्हारी सांस कब तक चलेगी? युवक ने कहा- नहीं बाबा। यह मैं कैसे बता सकता हूं। यह तो निश्चित नहीं है। मेरी सांस अभी भी बंद हो सकती है और बाद में किसी दिन भी। साधु ने कहा- बेटा, यह तुम्हारी सांस या मेरी सांस ईश्वर की दी हुई है। हमारा अधिकार जब अपनी सांस पर नहीं है तो जीवन पर कैसे रहेगा? इसे भगवान नियंत्रित करते हैं। लेकिन हम मान बैठे हैं कि सांस तो चलती ही रहती है। इस पर क्या ध्यान देना। इसीलिए तुम भी पूछ रहे हो कि भगवान के होने का प्रमाण क्या है। इस दुनिया में रात- दिन का होना, चांद- सितारों और ग्रहों का निश्चित समय पर ही तय है। ये ग्रह आपस में टकराते नहीं। रात और दिन ठीक समय पर होते हैं। यह सब कौन नियंत्रित करता है? यह भगवान ही हैं जो पूरी सृष्टि को चला रहे हैं।
सुन कर युवक शांत हो गया। वह गहरे सोच में डूब गया। उसे लगा कि जिन घटनाओं को वह सामान्य समझ रहा है, वे दरअसल सामान्य नहीं हैं।

Monday, December 27, 2010

भगवान की अद्भुत लीला का प्रसंग




विनय बिहारी सिंह


कल ब्रह्मचारी गोकुलानंद जी ने दिल को छू लेने वाली एक कथा सुनाई। एक बार एक भक्त ने भगवान को प्रकट होकर वर देने के लिए मजबूर कर दिया। कैसे? वह भाव विह्वल होकर करुणा के साथ कहता रहता था- हे मेरे नाथ, क्या दर्शन नहीं दोगे? आखिर मैंने क्या गलती की है? मैं अपने मन से तो जन्मा नहीं। आपकी मर्जी से ही जन्म लिया। अब आप दर्शन दीजिए। उसकी पुकार में इतनी गहराई और करुणा थी कि भगवान को उसके सामने प्रकट होना पड़ा। भगवान ने कहा- वर मांगो। भक्त ने कहा- मेरी एक ही इच्छा है। मैं अपने घर पर अपने हाथों से आपको भोजन कराऊं। बस। भगवान ने कहा- ठीक है। कल मैं दिन का भोजन तुम्हारे ही घर करूंगा। तुम मुझे अपने हाथों से खिलाना। भक्त तो खुशी से उछल पड़ा। वह घर गया और अपने घर की खूब सफाई की। घर चमकने लगा। अगले दिन उसने तरह- तरह के पकवान बनवाए और भगवान का इंतजार करने लगा। दोपहरी बीतने लगी। तभी भक्त को बैठे- बैठे नींद आ गई। अचानक उसने शोर गुल सुना। देखा- एक कुत्ता रसोई में घुस कर मालपुए खा रहा है। भक्त ने उसे जोर से डंडा मारा। वह कुत्ता चिल्लाते हुए भागा।
भक्त इंतजार करता रहा। भगवान नहीं आए। अगले दिन फिर वह मंदिर में बैठा और करुण पुकार कर भगवान से दर्शन देने की प्रार्थना करने लगा। उस दिन भगवान रात को उसके स्वप्न में आए। भक्त ने उनसे पूछा- भगवान आप मेरे घर क्यों नहीं आए? भगवान ने कहा- मैं तो आया था, लेकिन तुमने मुझे डंडे से इतनी जोर से मारा कि मैं रोता हुआ चला गया। भक्त ने कहा- तो आपको मैं कैसे पहचानता? भगवान बोले। मैं तो कुत्ते के रूप में ही तुम्हारे दरवाजे पर बहुत देर तक खड़ा रहा। तुम्हारे दरवाजे की तरफ देखता रहा। कोई भी मुझे उस रूप में देख कर समझ सकता था कि मैं कुछ चाहता हूं। लेकिन तुम तो अपने घर के भीतर बैठे थे। अगर बाहर रहते तो तुम्हें साफ पता चलता कि मैं उस रूप में क्या चाहता हूं। अपनी आंखें खोल कर रहो।
बाद में उसके पड़ोस के लोगो ने बताया कि यह कुत्ता विलक्षण था। वह तो भों- भों की आवाज में घर मालिक को देर से बुला रहा था। हम लोगों ने ऐसा कुत्ता आज तक नहीं देखा है। साफ पता चल रहा था कि वह कुछ खाने को मांग रहा है। तुम अगर आधी रोटी भी दे देते तो वह खा कर चला जाता। घंटे भर बाद ही वह तुम्हारे घर में गया। तभी तुमने उसे मार भगाया। भक्त को इस बात पर बहुत अफसोस हुआ।
भक्त को संतों की यह वाणी याद आई - ना जाने किस भेष में मिल जाएं भगवान।


Saturday, December 25, 2010

GITA

My dear friends

Please read some verses of holy book GITA - chapter 6)


श्रीभगवानुवाच

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥६- १॥


कर्म के फल का आश्रय न लेकर जो कर्म करता है, वह संन्यासी भी है और
योगी भी। वह नहीं जो अग्निहीन है, न वह जो अक्रिय है।

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन॥६- २॥

जिसे सन्यास कहा जाता है उसे ही तुम योग भी जानो हे पाण्डव।
क्योंकि सन्यास अर्थात त्याग के संकल्प के बिना कोई योगी नहीं बनता।

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥६- ३॥

एक मुनि के लिये योग में स्थित होने के लिये कर्म साधन कहा जाता है।
योग मे स्थित हो जाने पर शान्ति उस के लिये साधन कही जाती है।

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥६- ४॥


जब वह न इन्द्रियों के विषयों की ओर और न कर्मों की ओर आकर्षित होता है,
सभी संकल्पों का त्यागी, तब उसे योग में स्थित कहा जाता है।

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥६- ५॥


स्वयं से अपना उद्धार करो, स्वयं ही अपना पतन नहीं। मनुष्य स्वयं
ही अपना मित्र होता है और स्वयं ही अपना शत्रु

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥६- ६॥


जिसने अपने आप पर जीत पा ली है उसके लिये उसका आत्म उसका मित्र है।
लेकिन स्वयं पर जीत नही प्राप्त की है उसके लिये उसका आत्म ही शत्रु की तरह वर्तता है।


Friday, December 24, 2010

ईश्वर के सच्चे पुत्र थे जीसस क्राइस्ट



विनय बिहारी सिंह

जीसस क्राइस्ट यानी ईसा मसीह ईश्वर को पिता के रूप में देखते और महसूस करते थे। वे कहते थे- माई फादर एंड आई आर वन ( मेरे पिता और मैं एक हैं), लेकिन उन्होंने आगे कहा- बट व्हाट माई फादर नो, आई नो नाट ( लेकिन जो ग्यान मेरे पिता के पास है, वह मेरे पास नहीं है)। निश्चय ही जीसस ईश्वर के अवतार थे। अपने जीवन के १८ वर्ष उन्होंने भारत के उच्च कोटि के ऋषियों के साथ बिताया था। उनके जीवन के इन १८ वर्षों का उल्लेख कहीं नहीं मिलता (१४ वर्ष की उम्र के बाद के वर्ष)। उन्होंने असंख्य लोगों के रोग ठीक किए, मरे हुए कुछ लोगों को जीवित किया। उनका उद्देश्य चमत्कार दिखाना नहीं था। वे लोगों को यह विश्वास दिलाना चाहते थे कि ईश्वर आपके सबसे करीब हैं। सबसे प्रियतम हैं और वे सभी मनुष्यों को बहुत प्यार करते हैं। मनुष्य अपने कर्मों के कारण दुखों और परेशानियों में फंसा हुआ है। इसीलिए उन्होंने कहा- सीक ये द किंगडम आफ गॉड, रेस्ट थिंग्स विल बी एडेड अन टू यू ( पहले भगवान को पाओ, बाकी चीजें तुम्हें अपने आप मिल जाएंगी)। लेकिन मनुष्य को पहले सांसारिक वस्तुएं चाहिए। भगवान नहीं। लेकिन विडंबना यह है कि सांसारिक वस्तुएं आपको सुख नहीं दे सकतीं। और ये वस्तुएं आती कहां से हैं? भगवान के ही पास से तो आती हैं। उनकी इच्छा के बिना क्या कुछ भी संभव है? लेकिन फिर भी मनुष्य भगवान को भूल कर वस्तुओं के पीछे पागल की तरह दौड़ता रहता है। जीसस क्राइस्ट करुणा के अवतार थे। मनुष्य को कोई कुछ कटु बोल देता है तो वह उसका जवाब और कटु ढंग से देता है। लेकिन जीसस क्राइस्ट को जो लोग सूली पर चढ़ा रहे थे, उनके लिए उन्होंने कहा- गॉड फारगिव देम, फार दे नो नॉट, व्हाट दे डू। ( हे भगवान इन्हें माफ कर दें, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं)। अपनी जान लेने वालों पर इस तरह की करुणा बहुत कम देखने को मिलती है। जीसस क्राइस्ट के बारे में मैंने परमहंस योगानंद जी के माध्यम से ही जाना। उन्होंने कहा है- जीसस क्राइस्ट ने मनुष्य को ईश्वर से जुड़ना सिखाया। लेकिन उनकी लोकप्रियता से दुखी शासन ने उन्हें सूली पर चढ़ा दिया। शासन चाहता था कि लोग अंधविश्वासों में डूबे रहें। ईश्वर से भयानक रूप से डरते रहें। लेकिन जीसस क्राइस्ट ने भगवान से प्रेम करना सिखाया। उन्होंने कहा कि भगवान तो सभी जीवों को प्रेम करते हैं। उनसे भय क्यों? वे हमारे करुणामय पिता हैं। ऐसे पिता के पास जाना तो आनंद में डूबना है। लोगों महसूस किया कि उनकी बातें सच हैं। उनका सदियों से चला आ रहा भय खत्म हुआ। जीसस ने बताया कि तुम्हें अगर कोई सबसे अधिक सुरक्षा दे सकता है तो वह है- ईश्वर। तुम उन्हीं के लिए मतवाला होओ। और लोग जीसस के दीवाने हो गए।

Thursday, December 23, 2010

यह है भगवान की कृपा


विनय बिहारी सिंह


लंदन की खबर है। छियालीस साल की महिला डेलिया नाक्स २३ साल तक व्हील चेयर पर अपंग का जीवन बिताने के बाद अचानक उठ खड़ी हुई हैं और आराम से चल फिर रही हैं। कैसे? वे कहती हैं- जब एक दु्र्घटना में मेरी कमर के नीचे का हिस्सा अपंग हो गया तो डाक्टरों ने बहुत कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। डाक्टरों ने कहा- अब आपको पूरा जीवन व्हील चेयर पर बिताना होगा, लेकिन हिम्मत रखिए, बहुत से लोग व्हील चेयर पर रहते हैं। डेलिया ने इसे अपनी किस्मत मान ली और व्हील चेयर पर बिठा दी गईँ। जैसे- तैसे जीवन बीत रहा था। तभी एक मित्र ने एक आध्यात्मिक व्यक्ति का पता बताया। मुझे बताया गया कि ईश्वर कृपालु हैं और वे हमें सजा नहीं देते, बल्कि हम खुद ही अपने कर्मों की सजा भुगतते हैं। कार्य और परिणाम के सिद्धांत के मुताबिक। मुझसे कहा गया कि मैं उस आध्यात्मिक व्यक्ति के पास चलूं। लेकिन मैं खुद को तमाशा नहीं बनाना चाहती थी। इसलिए मैंने वहां जाने से इंकार कर दिया। तब मेरे पति वहां जाने लगे। वे उस आध्यात्मिक व्यक्ति के साथ मिल कर भगवान से प्रार्थना करते। कभी- कभी तो मेरे पति मेरे स्वास्थ्य के लिए कई- कई घंटे तक प्रार्थना करते। इस तरह कई साल बीत गए। एक दिन अचानक ईश्वर ने मेरे कानों में कहा- उठो, उठ कर चलो। तुम स्वस्थ हो गई हो। और मैं सचमुच उठ खड़ी हुई। मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। अब मैं सामान्य आदमी की तरह चल फिर सकती हूं। हां, इतना जरूर कह सकती हूं कि भगवान में मेरा विश्वास था। मैं मानती रही हूं कि ईश्वर की कृपा मनुष्य के ऊपर बरसती है। बस मनुष्य को ईश्वर के साथ खुद के दिमाग को ट्यून करना पड़ता है। आज तो मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि ईश्वर है और उसकी मर्जी के बिना कुछ नहीं हो सकता। न रात होगी, न दिन होगा और न जीवों की सांस चलेगी।
ईश्वर हम सबका कल्याण करें।
(मित्रों, क्रिसमस का त्यौहार आ गया। इस ब्लाग पर आप जल्दी ही जीसस क्राइस्ट के संबंध में एक छोटा सा भक्तिपूर्ण लेख पढेंगे)

Wednesday, December 22, 2010

शबरी ने ३५ वर्ष इंतजार किया राम का



विनय बिहारी सिंह


शबरी की प्रबल इच्छा थी कि वह भगवान राम को अपने हाथों से खिलाए। वह दिन रात राम का आह्वान करती रहती थी। हमेशा उसके मन में एक ही बात उच्चारित होती थी- राम, राम, राम। जब वह बहुत अधिक व्याकुल होती थी तो गहरे ध्यान में बैठ जाती थी और राम को मौन संदेश भेजती थी- हे मेरे प्रियतम भगवान, आपको अपने हाथों से खिलाने की मेरी इच्छा क्या पूरी नहीं होगी? कहां छुपे हो भगवान। आओ नाथ। ऋषियों का कहना था कि ऐसे करुण संदेश पाकर भगवान राम सूक्ष्म शरीर में शबरी के पास खिंचे चले आते थे। उस समय शबरी भले ही भगवान को नहीं देखती थी, लेकिन वे उसके साथ होते थे। उस समय शबरी दिव्य आनंद में डूब जाती थी। उसे लगता था यह भगवान को प्रेम करने के कारण है। यह सच भी था। क्यंकि जब तक भगवान का स्पर्श नहीं होता, भक्त को दिव्य आनंद का अनुभव नहीं होता। लेकिन शबरी तो भगवान राम को सशरीर चाहती थी। आखिर ३५ वर्षों बाद बनवास के दौरान भगवान ने शबरी की इच्छा पूरी की। शबरी के घर में कुछ ऐसा खाने को नहीं था कि वह भगवान को दे सके। तब उसकी निगाह अपने आंगन के बेर के पेड़ पर गई। बेर पके हुए फलों से लदा था। शबरी ने तुरंत चुने हुए फल तोड़े और एक टोकरी में रखा। फिर राम को पास बिठा कर बेर चख चख कर उन्हें देती। भगवान राम वही जूठे बेर खाते। लेकिन शबरी को इसका होश नहीं था कि वह जूठे बेर खिला रही है। वह तो भगवान के प्रेम में सराबोर थी। और भगवान राम भी बेर खाते रहे। यह वह क्षण था जब भगवान और भक्त एक हो गए थे। प्रेम की धारा बह रही थी। आनंद का उत्कर्ष था। किसको खबर कि बेर जूठे थे या नहीं। भक्त और भगवान का संबंध अनूठा ही है। भक्त के बिना भगवान को अच्छा नहीं लगता और भगवान के बिना भक्त छटपटाता रहता है। कुछ लोग भगवान को पिता के रूप में तो कुछ लोग मां के रूप में देखते हैं। कुछ तो भगवान को वात्सल्य भाव में देखते हैं।कुछ महिलाएं बाल गोपाल को पूजती हैं- पुत्र भाव में। चाहे किसी भाव में पूजें बस अपने हृदय को भक्ति में गहरे डुबो दें तो भगवान से रहा नहीं जाएगा। वे भक्त के वश में आ जाते हैं।

Tuesday, December 21, 2010

मां काली के एक भक्त से भेंट


विनय बिहारी सिंह


कल मां काली के एक भक्त से भेंट हुई। मैंने कहा- ठंड थोड़ी सी बढ़ी है। वे बोले- मां जैसे रखें, वही ठीक है। मैंने पूछा- आजकल आप रात में जाग कर जप इत्यादि कर रहे हैं कि नहीं? वे हंसे और बोले- मैं कहां कुछ करता हूं। करने वाली तो वही हैं। ऐसा आकर्षण है उनमें कि अपने आप मनुष्य जप करने बैठ जाता है। जैसे जैसे आप जप में आगे बढ़ते जाते हैं आपको दिव्य आनंद की अनुभूति होती जाती है। जप जीभ भले कर रही हो लेकिन मेरा हृदय मां के चरणों में अर्पित रहता है। अब मां जाएंगी कहां? मैं कहता हूं कि मां मैं वह सब कुछ सौंप रहा हूं जो मेरे पास है। अपना हृदय, अपना मन और बुद्धि। सारी संपत्ति। लेकिन तुम दर्शन दो। मुझे प्रेम करो। क्योंकि मैं तुम्हारा बेटा हूं। तुम बेटे की पुकार को अनसुना नहीं कर सकती। मैंने पूछा- तो क्या मां आपका जवाब देती हैं? वे बोले- हमेशा नहीं देतीं। लेकिन तो भी मैं जानता हूं कि वे मेरी भक्ति को चुपचाप महसूस कर रही हैं। भले ही छुपी हुई हैं। मैंने पूछा- वे छुप क्यों जाती हैं? उन्हें तो दिखता है कि उनके भक्त उनके लिए तड़प रहे हैं? वे बोले- मां, लीलामयी हैं। सभी लोग अपने बच्चों के साथ खेलते हैं। तो जगन्माता नहीं खेलेंगी। वे इसलिए छुपती हैं कि हम उन्हें खोजें। हमारी आंखों में उनके लिए आंसू आएं। तब वे दौड़ कर हमें अपनी गोद में उठा लेती हैं और हम आनंद में हो जाते हैं। बस तभी अचानक वे गायब हो जाती हैं। लेकिन उनकी नजर हमारे ऊपर हमेशा रहती है। कौन मां होगी जो अपने बच्चे का ख्याल नहीं करेगी? जगन्माता का छुपना भी भक्त के कल्याण के लिए ही है।
उनसे बातें करके बहुत अच्छा लगा।

Saturday, December 11, 2010

वैष्णव देवी की यात्रा में एक चमत्कार


विनय बिहारी सिंह

यह घटना मेरे कार्यालय के एक सहकर्मी ने सुनाई। उनके एक मित्र अपनी पत्नी और मां के साथ वैष्णव देवी के दर्शन करने गए। वहां पहाड़ी रास्ते की चढ़ाई थी। मित्र की मां के घुटने में अचानक तकलीफ बढ़ गई। लेकिन उनके मन में प्रबल इच्छा थी कि माता के पिंड का दर्शन करूं। बेटे ने हालांकि मना किया था कि तुम्हारे घुटने में तकलीफ है। मत जाओ। हम माता का प्रसाद यहीं ला देंगे। लेकिन उनकी मां ने कहा- बचपन से मेरी साध है कि मैं मां वैष्णव देवी के पिंड का दर्शन करूं। चाहे जो हो जाए, मैं जाऊंगी जरूर। लेकिन कुछ दूर चढ़ने के बाद उनका शरीर साथ नहीं दे पा रहा था। वे थक कर बैठ गईं और मन ही मन माता की गुहार लगाने लगीं। तभी उन्होंने देखा कि नीचे थोड़ी दूरी पर कोई महिला बुर्का पहने खड़ी है। उनके मन में डर बैठ गया। पता नहीं कौन है। कोई महिला के वेश में गुंडा- बदमाश तो नहीं । इस डर से वे उठ खड़ी हुईं और मंदिर की तरफ चढ़ने लगीं। बुर्काधारी महिला भी चलने लगी। जब वे लोग रुकते तो वह भी रुक जाती। जब वे लोग चलने लगते तो वह भी चलने लगती। उन लोगों के मन में और शंका और भय गाढ़ा होने लगा। मित्र की मां थोड़ी देर बैठ- बैठ कर चलती रहीं। लेकिन एक समय ऐसा आया कि उन्हें लगा अब वे और नहीं चल सकतीं। उन्होंने कहा- अब और नहीं। माता को अगर यही मंजूर है कि मैं बीच रास्ते से घऱ लौट जाऊं तो यही सही। तभी भीड़ का कोलाहल सुनाई पड़ा। बेटे ने कहा- मां, देखो मंदिर आ गया। यह शोर- गुल मंदिर से ही आ रहा है। थोड़ी सी हिम्मत और कर दो, तुम्हें माता के दर्शन मिल जाएंगे। सचमुच मंदिर पास आ गया था। मित्र की मां के चेहरे पर खुशी छलक आई। वे बोलीं- क्या? माता का मंदिर आ गया? वे झटके से उठीं और चल पड़ीं। आखिर उन्होंने माता वैष्णव देवी का दर्शन किया और प्रसाद पाया। उनके जीवन की साध पूरी हुई। बाहर आकर उन्होंने बुर्काधारी महिला की बहुत खोज की। वह कहीं दिखाई नहीं पड़ी। तभी बेटे ने कहा- मां, वह बुर्काधारी महिला कोई गुंडा- बदमाश नहीं था। मुझे तो लगता है, वह स्वयं माता वैष्णव देवी थीं। तुम्हें मंदिर तक पहुंचा गईं।
उनकी मां ने कहा- ठीक कहते हो बेटा। वह माता ही थीं। मेरी साध पूरी कर गायब हो गईं। उनका मैं सदा ऋणी रहूंगी। वही संसार चला रही हैं। मेरी साध कैसे नहीं पूरी करतीं.।

Friday, December 10, 2010

राम और ओउम


विनय बिहारी सिंह

विभिन्न संतों ने कहा है कि राम में ओउम छिपा हुआ है। ओउम या ओम ही इस सृष्टि का आदि शब्द है। उसी से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। वही ब्रह्मांड का पोषण कर रहा है। और सारे जीवों का लय उसी में होगा। उच्च कोटि के संतों ने कहा है- अ, उ और म का अर्थ है- ब्रह्मा, विष्णु और महेश। तो ओउम क्या है? इसका उत्तर है- ओउम ब्रह्म है। ईश्वर है। भगवान है। मंदिरों में घंटे की आवाज भी ओउम का ही द्योतक है। हर शब्द में ओउम छुपा हुआ है। एक संत हैं जो दिन रात ओम नमः शिवाय का जप करते रहते हैं। कभी मुंह से तो कभी मन ही मन। वे कहते हैं- ओम नमः शिवाय के जाप से मुझे असीम आनंद मिलता है। मैं पहले कई आशंकाओं से डरा रहता था। मैं घूमने वाला साधु हूं। किसी ने कुर्ता दे दिया तो पहन लिया। खाना दे दिया तो खा लिया। मैं सोचता था कि मैंने घर क्यों छोड़ा। यह ठीक है कि मैंने शादी नहीं की। मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं थी। मेरे मां- बाप का देहांत हो गया था। मेरे भाई- बहन अपने अपने संसार में रम गए थे। मुझे घर पर खाना, चाय और जलपान मिल जाता था। लेकिन मैं खुद को बंधन में पड़ा हुआ महसूस करता था। लेकिन जब से मैने ओम नमः शिवाय का जाप करना शुरू किया, मुझे असीम शांति मिली। मेरे मन के भीतर का डर खत्म हो गया। मैं निर्भय हो गया। अब मुझे इसकी चिंता नहीं कि मेरा क्या होगा। जैसे रामजी रखेंगे, रहूंगा। जब तक जीवित रखेंगे, रहूंगा। फिर उन्हीं में लीन हो जाऊंगा। जब वे हैं तो मुझे चिंता किस बात की। मेरा काम है- उनकी अराधना करना। मुझे दान में जो पैसे मिलते हैं, उन्हीं से कभी वृंदावन तो कभी मथुरा तो कभी बद्रीनाथ- केदारनाथ का दर्शन करता रहता हूं। ओम नमः शिवाय मेरे जीवन का आधार है। उनकी बातें सुन कर अच्छा लगा।

Wednesday, December 8, 2010

आदि शंकराचार्य



विनय बिहारी सिंह


आदि शंकराचार्य अवतार थे। बत्तीस साल की कम उम्र में उन्होंने देह त्याग कर दिया और अपने परम प्रिय भगवान में जा मिले। लेकिन इसके पहले ही उन्होंने- भज गोविन्दम्, विवेक चूडामणि, भवान्यष्टकम्
और अन्य अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। इसी अवधि में उन्होंने अपने देश भारत के चारों कोनों पर चार आश्रम स्थापित किए। सन्यासियों की दशनामी परंपरा उन्हीं की दी हुई है। सिर्फ सात साल की उम्र में उन्होंने भगत्प्राप्ति के लिए घर छोड़ दिया। वे केरल के एक छोटे से गांव कालड़ी के रहने वाले थे। सन्यास की दीक्षा लेने के बाद जब वे धार्मिक कामों में अत्यंत व्यस्त थे तभी उनकी मां का देहांत हो गया। उन्होंने उनका अपने हाथों से अंतिम संस्कार किया। आदि शंकराचार्य के एक शिष्य थे कमलपाद। उनका नाम कमलपाद कैसे पड़ा, इसके पीछे एक अत्यंत रोचक कथा है। शंकराचार्य किसी नदी के किनारे अस्थाई रूप से रह रहे थे। कमलपाद (उनका पूर्व नाम स्मरण नहीं है) किसी काम से उस पार गए। लेकिन उनका मन गुरु में ही लगा रहा। इधर शंकराचार्य ने किसी काम से कमलपाद को पुकारा। कमलपाद तो नदी के उस पार थे। उन्हें गुरु की पुकार वहां भी सुनाई पड़ गई। वजह यह थी कि वे तो गुरु में ही खोए हुए थे। वे दौड़ कर नदी किनारे आए। वहां उन्होंने देखा- कोई भी नाव नहीं है। उनसे और इंतजार नहीं हो पाया। वे पानी पर ही चलने लगे। लेकिन आश्चर्य- वे जहां भी पानी में पांव रखते एक कमल के फूल पर उनका पांव पड़ता। इस तरह अनेक कमल के फूलों पर पांव रखते हुए उन्होंने नदी पार की और गुरु के पास पहुंचे। गुरु ने पूछा- कहां थे? कमलपाद ने सारा किस्सा सुनाया। गुरु हंसे। वे बोले- आज से तुम्हारा नाम कमलपाद होगा। तुम जहां पांव रखते हो कमल के फूल तुम्हारे चरण छूते हैं। कमलपाद गुरु के चरणों में गिर पड़े। वे जानते थे- यह सब गुरु शंकराचार्य की ही कृपा थी। शंकराचार्य जी को शिष्य के साथ कौतुक करने की नहीं सूझी थी। वे तो शिष्य को यह बताना चाहते थे कि जो ईश्वर पर पूर्ण विश्वास करता है और अपने समूचे हृदय से हमेशा उनकी अराधना करता रहता है, उसके लिए वे कोई भी चमत्कार कर सकते हैं। शंकराचार्य का एक शिष्य जरा सुस्त था। उनके सारे शिष्य पढ़ने के लिए आ चुके थे। बस सुस्त शिष्य नहीं आ पाया था। कक्षा में बैठे शिष्यों ने कहा- गुरुवर, आप उसकी प्रतीक्षा न करें। पढ़ाना शुरू करें। शंकराचार्य जी पढ़ाना शुरू कर दिया। विषय था-यजुर्वेद। तभी सुस्त शिष्य आया। शंकराचार्य ने उससे कहा- तुम्हें यजुर्वेद के पहले दस श्लोक याद हैं? सुस्त शिष्य ने हां में सिर हिलाया। वहां बैठे सारे शिष्य चकित हो गए। शंकराचार्य ने कहा- सुनाओ। सुस्त शिष्य ने धाराप्रवाह, स्पष्ट उच्चारण और अर्थ के साथ श्लोक सुना दिए। सभी शिष्यों का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया। तब शंकराचार्य ने कहा- देखो, किसी की उपेक्षा कभी मत करो। वह आज से सुस्त नहीं रहेगा। फिर सबने साथ गुरु के उपदेशों को सुना। यह चमत्कार आदि शंकराचार्य ही कर सकते थे। कहा जाता है- आदि शंकराचार्य, भगवान शंकर के ही अवतार थे।

Monday, December 6, 2010

एक अद्भुत घटना


विनय बिहारी सिंह


यह घटना मेरे कार्यालय में काम करने वाले एक व्यक्ति के साथ घटी। उनकी पत्नी अपनी एक महिला रिश्तेदार के साथ पुरी मंदिर में गई हुई थीं। यह रथयात्रा के चार- पांच दिन पहले की बात है। जो पुरी के जगन्नाथ मंदिर की प्रथाओं को जानते हैं उन्हें मालूम है कि वहां भगवान के दर्शन उन दिनों नहीं होते क्योंकि मंदिर के कपाट रथयात्रा के सात दिन पहले बंद रखे जाते हैं। बोलचाल की भाषा में कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ को बुखार हुआ है। लेकिन विद्वानों का है कि उस समय भगवान अपने भक्तों के कष्टों, दुखों और तनावों को विशेष रूप से अपने ऊपर लेते हैं और कष्टों का नाश करते हैं। वैसे तो भगवान हर समय अपने भक्तों का दुख हरते हैं। लेकिन रथयात्रा के पूर्व वे यह काम विशेष रूप से करते हैं। चूंकि इस काम के लिए एकांत चाहिए इसलिए वहां के भक्त कपाट बंद कर देते हैं। यह मंदिर प्रबंधन के आदेश पर होता है। तो मेरे सहकर्मी की पत्नी अपनी महिला रिश्तेदार के साथ मंदिर में गईं। मुख्य मंदिर के कपाट बंद देख कर उन्होंने पूछा- मंदिर बंद क्यों है? वहां के पंडितों ने जवाब दिया- भगवान जगन्नाथ को बुखार है। तब ये दोनों महिलाएं ठहाका लगा कर हंस पड़ीं। वे इस बात का मजाक उड़ाने लगीं कि भगवान को भी बुखार होता है। चूंकि ये महिलाएं बुखार के अंदर छिपे तत्व को नहीं जानती थीं, इसलिए वे हंसती रहीं। पंडितों इसका बुरा माना और कहा कि आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए। ये महिलाएं कुछ देर तक मंदिर परिसर में घूमती रहीं। तभी उन्हें लगा कि उनका शरीर ठीक नहीं है। वे अपने होटल लौट आईं। होटल में लौटते ही उन्हें जोर का बुखार आया। दोनों ही महिलाएं बुखार से तप रही थीं। होटल वालों ने डाक्टर का प्रबंध किया। दवा शुरू हुई। वे लोग जब तक पुरी में रहे, बुखार से पीड़ित रहे। घर लौटे तो स्वस्थ हुए। चूंकि उस महिला के पति मरे कार्यालय में काम करते हैं, इसलिए उन्होंने पूरी गंभीरता से यह घटना सुनाई। इस पर एक व्यक्ति ने कहा- भगवान तो कृपालु हैं। वे प्रेम और दया के सागर हैं। इन महिलाओं को जो बुखार आया तो निश्चित रूप से इस बुखार के बहाने उनका भी कोई कष्ट, पाप या बुरा कर्म कट गया। इससे इन महिलाओं का लाभ ही हुआ। इस घटना को कुछ लोग अंध विश्वास भी कह सकते हैं। लेकिन मैंने इसमें अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा है। उन्होंने मुझसे जो कुछ कहा, वही मैंने यहां लिख दिया है। यह उनकी आप बीती है। आप इस घटना को जो कुछ भी कहें लेकिन यह सच है।
ईश्वर की लीला कौन जानता है। हो सकता है उन महिलाओं के लाभ के लिए ही ज्वर हुआ हो..

Thursday, December 2, 2010

वे सचमुच दया की मूर्ति थीं



योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया (वाईएसएस) और सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप (एसआरएफ) की संघमाता और अध्यक्ष दया माता ने पिछले एक दिसंबर ( अमेरिकी तिथि के अनुसार ३० नवंबर) को अपनी देह का त्याग कर दिया और महासमाधि ले ली। महासमाधि के समय उनके शरीर की उम्र करीब ९६ वर्ष थी। एक शिष्य ने बताया- एक सप्ताह से वे गहन ध्यान, जप और समाधि में रह रही थीं। वे जब सत्रह वर्ष की थीं तो उन्होंने आश्रम में प्रवेश किया था। ईश्वर प्राप्ति की कामना लेकर। गुरुदेव परमहंस योगानंद जी ने पहचान लिया था कि वे उच्च कोटि की आत्मा हैं। उन्होंने उन्हें सन्यास की दीक्षा दी और जीवन भर योग शिक्षा के जरिए परोपकार का पाठ पढ़ाया। दया मां इन बातों का जीवन भर पालन करती रहीं और पूरे विश्व में फैले गुरुदेव के शिष्यों को प्रेरणा देती रहीं। सेवा भाव और ईश्वर प्रेम की वे सजीव उदाहरण थीं। सभी उन्हें मां कहते थे। मां का अर्थ ही था- दया माता।
आश्रम में आने के कुछ ही वर्षों बाद मां गंभीर रूप से बीमार पड़ी थीं। गुरुदेव को पता था- यह उनकी देह छोड़ने का समय आ गया है। लेकिन तभी एक चमत्कार हो गया। गुरुदेव ने कहा- जगन्माता चाहती हैं कि तुम उनके लिए शरीर में रहो। दया मां कहती थीं कि वे अस्पताल के बिस्तर पर लेटी हुई ध्यान करने लगीं। तभी उनका आध्यात्मिक नेत्र तीव्र और मनोहारी प्रकाश से भर गया। वह बड़ा होता गया और मानों उसने समूचे ब्रह्मांड को अपनी गिरफ्त में ले लिया। वे उस दिव्य प्रकाश में काफी देर तक रहीं। उन्हें संदेश मिल गया था कि जगन्माता ने उन्हें जीवन दान दिया है। लोगों को ईश्वर प्रेम सिखाने के लिए। इसके लिए उन्हें ईश्वर तुल्य गुरु मिले थे- परमहंस योगानंद जी। गुरुदेव ने उन्हें सन्यास की दीक्षा दी थी।
दया मां गुरुदेव से अपनी भेंट का रोचक वर्णन करती थीं। वे कहती थीं कि उनकी मां ने उनसे कहा कि एक अद्भुत सन्यासी आए हैं। उनके प्रवचन मोहक हैं। दया मां अपनी मां के साथ प्रवचन के विशाल कक्ष में पहुंचीं। लेकिन उन्हें देर हो चुकी थी। सारी सीटें भर चुकी थीं। वे दरवाजे पर खड़ी परमहंस योगानंद के प्रवचन सुनने लगीं। मां कहती थीं- मैंने पाया कि प्रवचन सुनते हुए मेरी सांस रुक गई थी। मुझे परमहंस जी के चेहरे के बदले गेरुए वस्त्र पहने एक दिव्य प्रकाश दिख रहा था। मुझे प्रवचन सुन कर अनुभव हुआ कि यह व्यक्ति (गुरुदेव) ईश्वर को जानता है। मैं इसी का अनुसरण करूंगी। इन्हें ही गुरुदेव बनाऊंगी। और तबसे वे आश्रमवासी हो गईं। दया मां की माता जी भी आश्रम में सन्यासिनी बन गईं। उनके भाई और बहन भी। समूचा परिवार सन्यासी हो गया। वे गुरुदेव का संदेश बार- बार दुहराती रहती थीं- इस धरती पर हम मनुष्य के रूप में इसलिए आए हैं कि ईश्वर की तरफ फिर से मुड़ें। लेकिन लोग लोग तरह- तरह के प्रपंचों में फंस जाते हैं। जबकि मूल रूप से हम ईश्वर प्राप्ति के लिए धरती पर भेजे गए हैं। यह पृथ्वी हमारे लिए स्कूल है। हमें अपना सच्चा सबके सीखना चाहिए और अपने मूल स्रोत ईश्वर से मिल जाना चाहिए।
दया माता के बारे में एक बात बहुत प्रसिद्ध है। एक बार वे आश्रम की किसी बैठक को संबोधित करने वाली थीं। बैठक के पहले प्रार्थना का नियम है। दया मां ने ज्योंही प्रार्थना प्रारंभ किया वे गहरी समाधि में चली गईं। बैठक अगले दिन के लिए टाल दी गई। दया मां भोर में उठती थीं और सुबह नौ बजे तक ध्यान में रहती थीं। रात का समय भी वे गहन ध्यान में बिताती थीं। वे हम सभी भक्तों के लिए आदर्श थीं। गुरुदेव जानते थे वे उनकी शिक्षाओं का प्रचार- प्रसार करने में आनंद पाती हैं। दया मां के भीतर बस एक ही तत्व था- ईश्वर, ईश्वर प्रेम और ईश्वरीय आनंद। वे इसे विश्व भर में बांट देना चाहती थीं। देश- विदेश में लगातार फैल रहे वाईएसएस और एसआरएफ के आश्रमों में बढ़ते भक्त इस बात के प्रमाण हैं।
दया माता ३१ जनवरी १९१४ को इस पृथ्वी पर आईं और सन्यास जीवन के ७९ वर्ष उन्होंने पूरी सक्रियता से बिताए। वे कहती थीं- ईश्वर के ध्यान का आनंद इतना अद्भुत है कि कई बार वे रात को उठ जाती हैं और गहरे ध्यान में उतर जाती हैं। उनका कहना था- मैं समझ नहीं पाती कि लोग ईश्वर प्रेम के बिना कैसे रह पाते हैं? मैं तो ईश्वर के साथ नित नया आनंद का अनुभव करती हूं। दया माता कब अचानक समाधि में चली जाएं, यह कोई नहीं जानता था। लेकिन जब आश्रम की योजनाओं पर बातचीत करने की बारी आती थी तो वे पूरी तरह चुस्त और सतर्क फैसले करती थीं। उनकी यह विशेषता देख कर सभी आश्चर्य करते थे। वे कहती थीं- जब लोगों से बात करो तो पूरी तरह तन्मय होकर और जब ध्यान करो तो दुनिया को बिल्कुल भूल जाओ। तुम्हारा हर काम हंड्रेड परसेंट परफेक्ट हो। शत- प्रतिशत ठीक।
दया माता के बारे में एक सच्चा किस्सा बहुत प्रचलित है। एक बार एक बहुत बड़े अखबार के पत्रकार दया माता से इंटरव्यू करने वाले थे। दयामाता से उनकी मुलाकात करवाने के लिए एक ब्रह्मचारी तैनात थे। ब्रह्मचारी परेशान थे कि दयामाता का ड्रेस मुड़ा हुआ था। जूते बहुत साफ सुथरे नहीं थे और बाल भी लगभग बेतरतीब हो चले थे। ब्रह्मचारी बहुत परेशान थे कि दया मां ठीक कपड़े क्यों नहीं पहन लेतीं। वे दया मां से यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाए तो उन्होंने बस इतना ही कहा- मां, मेरे दिमाग में चल रही हलचल आप समझें। दया मां मुस्कराईं और काम में व्यस्त हो गईं। ठीक एक मिनट बाद ही पत्रकार इंटरव्यू लेने आ पहुंचे। उन्होंने मां को इसकी सूचना दी। वे बाहर निकलीं और आश्चर्य- मां के कपड़े बहुत अच्छी तरह इस्तरी किए हुए, बाल ढंग से संवारे हुए और जूते चमकदार थे। ब्रह्मचारी हैरान थे। यह चमत्कार हो कैसे गया? अभी- अभी तो वे मां को देख कर आए हैं। उन्हें तो कपड़े बदलने तक का समय नहीं मिला। वे अवाक थे।
ऐसी थीं हमारी दया मां।

Monday, November 29, 2010

courtesy- BBC Hindi service

ख़ून से पता चल जाएगी उम्र

जमा हुआ ख़ून

इस तकनीक के अंतर्गत ख़ून में बहने वाली टी-कोशिका के लक्षणों का अध्ययन किया जाता है.

वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक का विकास किया है जिससे किसी भी अपराध की जगह से मिले संदिग्ध के ख़ून से उसके उम्र के बारे में अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक को फ़ोरेंसिक वैज्ञानिक इस्तेमाल कर सकते है जिससे जांच को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

इस तकनीक के अंतर्गत ख़ून में बहने वाली टी-कोशिका के लक्षणों का अध्ययन किया जाता है.

टी-कोशिका किसी भी बाहरी हमले जैसे बैक्टीरिया, वायरस या ट्यूमर कोशिकाओं को पहचानने में अहम भुमिका निभाती है. इस दौरान छोटे गोलाकार डीएनए अणु बनते हैं लेकिन इनकी संख्या उम्र के साथ-साथ एक नियमित दर से कम होती जाती है.

ये काम नीदरलौंड्स मे शोधकर्ताओं की टीम ने किया है और इस शोध का प्रकाशन पत्रिकार करंट बॉयलॉजी में किया गया है.

'करंट बॉयलॉजी' में वैज्ञानिकों ने लिखा है कि अपने इस विकास के जरिए उन्होंने जीव-विज्ञान के उस तथ्य को बताया है जिससे किसी भी व्यक्ति की सही और सटीक उम्र का अंदाजा लगाया जा सकता है.

इसमें हर व्यक्ति को एक अलग-अलग उम्र की श्रेणी में डाला गया है और इसमें उम्र का दायरा बीस साल का रखा गया है. नई तकनीक के ज़रिए किसी भी व्यक्ति की उम्र का अंदाज़ा लगाया जा सकता है लेकिन असली उम्र और अनुमानित उम्र में नौ साल तक का फ़र्क हो सकता है.

अनजान की पहचान

डीएनए जानकारी के ज़रिए किसी भी व्यक्ति के बालों या आंखो के रंग का अंदाज़ा लगाना फ़ोरेंसिक क्षेत्र में नया है.

इरेस्मस युनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर रॉट्टडेम में मुख्य शोधकर्ता मेनफ्रेड केयसर का कहना है, "जांच से डीएनए जानकारी के ज़रिए मनुष्य के बारे में सबसे सटीक जानकारी मिल सकती है. फ़ोरेंसिक क्षेत्र में पंरपरागत डीएनए की जांच से जांचकर्ताओं को उन्हीं लोगो की पहचान की जा सकती है जिनके बारे में पहले से जानकारी होती है."

ऐसे में सभी फ़ोरेंसिक प्रयोगशालाओं के सामने वो मामले आते हैं जिनके बारे में घटनास्थल से मिले सबूतों के आधार पर जो डीएनए जानकारी मिलती है वो संदिग्ध व्यक्ति पर हुई जांच से मेल नहीं खाती और न ही अपराधियों के इकठ्ठा किए गए आंकड़ों से.

ऐसे में किसी भी व्यक्ति के बारे में मिले सबूतों से रुप-रंग का अंदाजा लगाया जा सकता है और किसी अनजान व्यक्ति को ढूँढने में मदद मिल सकती है.

Saturday, November 27, 2010

ईश्वर को पुकारते रहने की सीख

विनय बिहारी सिंह

योगदा आश्रम रांची में अनेक लोगों ने करीब- करीब एक ही प्रश्न पूछे- ईश्वर की कृपा कैसे मिले। पूज्य सन्यासियों ने कहा- परमहंस योगानंद जी ने कहा है- सदा ईश्वर को पुकारते रहिए। काम करते हुए, आराम करते हुए, चलते- फिरते, सोते- जागते..... हर क्षण। यह पुकार मुंह से नहीं हृदय की गहराई से आनी चाहिए। भाषा चाहे जैसी हो, लेकिन आकुलता होनी चाहिए। संसार की हर चीज से आपका मोहभंग हो जाएगा, लेकिन ईश्वर से आपका मोहभंग हो ही नहीं सकता क्योंकि वे नित नवीन आनंद हैं। उनको पा लेने के बाद सब कुछ मिल जाता है। तब सारी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। क्योंकि एक केवल ईश्वर ही संपूर्ण हैं। परमहंस योगानंद जी ने कहा है- हमेशा कहते रहिए- मेरे प्रभु, मेरे प्रभु। भगवान आपके प्रेम से खिंचे चले आते हैं। वे तो आपके भीतर ही हैं। लेकिन हमें इसलिए महसूस नहीं होता क्योंकि हम प्रपंचों में फंसे रहते हैं। बाहरी दुनिया हमारे भीतर भी हलचल मचाए रहती है। इससे मुक्त होते ही भगवान आते हैं यानी अपनी उपस्थिति महसूस कराते हैं। कबीरदास ने कहा ही है-
पोथी पढ़ि- पढ़ि जग मुआ
पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का
पढ़े सो पंडित होय।।

उन्होंने ईश्वर को प्रेम करने का संदेश दिया है। आप चाहे जो कर लें, लेकिन जब तक ईश्वर से प्रेम नहीं करेंगे, आप उनकी उपस्थिति महसूस नहीं कर सकेंगे।
योगदा आश्रम में इन्हीं बातों को आत्मसात करते हुए भक्त आनंद मग्न थे।

Thursday, November 25, 2010

अमृत हैं शरद संगम के प्रवचन


विनय बिहारी सिंह


यदि कहें कि शरद संगम में अमृत बरस रहा था तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। जीवन के प्रत्येक पक्ष को छूने वाली संतों की वाणी चाहे जितनी बार भी पढ़ी या सुनी जाए, मन तृप्त नहीं होता। आइए पढ़े कुछ प्रवचनों के अंश।
स्वामी शांतानंद जी ने कहा- हमें भगवान के न्याय, उनकी योजना, उनकी इच्छा और समय पर गहरा विश्वास करना चाहिए। एक भक्त का प्राथमिक गुण है- प्रेम, साहस, सेवा और निष्ठा। जीवन में जो कुछ करें, आनंद के साथ करें। दूसरों की मदद करें। छोटी- छोटी बातों का भी महत्व होता है। अपनी व्यस्तता के बीच एक क्षण को रुकें और ईश्वर से कहें- भगवान मैं आपसे प्रेम करता हूं। बस, फिर काम में लग जाएं। यदि आप ईश्वर से प्रेम करते हैं तो सबसे प्रेम करेंगे। हममें से प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर ने विशिष्ट बनाया है। ईश्वर के साथ हमें सर्वाधिक आत्मीयतापूर्ण संबंध बनाना चाहिए।
विषय था- भगवान- जीवन के ध्रुवतारा।
स्वामी शुद्धानंद जी ने कहा- सृष्टि के साथ तालमेल को प्रेरित करने वाली शक्ति है तो यह तालमेल नष्ट करने वाली शक्ति भी साथ- साथ काम कर रही है। हमें सजग रहना है। जीवन में रोग, हताशा और विपत्ति आती है। तो इसे दूर करने का एकमात्र सूत्र है- ईश्वर के साथ समस्वरता। ईश्वर से संपर्क साधिए। गुरुजी (परमहंस योगानंद जी) ने कहा है हमें अपने शरीर और मन को दिव्य ऊर्जा से चार्ज करते रहना चाहिए। यह मेंटल इंजीनियरिंग है। शरीर और मन को तनाव रहित और शांत रखें। एक अन्य तरीका भी गुरुजी ने सिखाया है- असफलता के दौरान सफलता के बीज बोना। हम अपने दुर्बलतम क्षणों में सर्वोच्च शक्तिशाली बन सकते हैं। परमहंस योगानंद जी ने कहा है- अपने हृदय में ईश्वर को लेकर, मुस्कराते हुए सत्य के लिए काम करें। आप अपने जीवन में खुशियां ही खुशियां पाएंगे। विषय था- गुरुदेव की शिक्षाओं का दैनिक जीवन में उपयोग। स्वामी जी ने कहा- जब भी भय हो, ओम का उच्चारण करें।
साधना का मुख्य उद्देश्य- शुद्धिकरण, विषय पर स्वामी कृष्णानंद ने कहा- शुद्धि दो तरह की होती है- वाह्य और आंतरिक। हम बाहर की शुद्धि स्वच्छता, अगरबत्ती, आरती, पूजा इत्यादि से करते हैं। लेकिन आंतरिक शुद्धि अत्यंत आवश्यक है। आपका भोगाभोग भी शुद्धिकरण ही है। ईश्वर में लय के लिए माया की परतों को हटाना जरूरी है। प्राणायाम के अभ्यास से सारे भोग भस्म होते हैं और पवित्रता आती है। स्वामी जी ने गीता और पातंजलि योगसूत्र के कई उद्धरण पेश किए। अनुशासनहीन व्यक्ति ईश्वर की अनुभूति नहीं कर सकता। जीवन में खुद को अनुशासित करना चाहिए। ईश्वर के प्रति प्रेम को बढ़ाते रहना चाहिए। इससे भी शुद्धि होती है।
संतुलित जीवन का महत्व विषय पर स्वामी स्मरणानंद जी ने कहा- खुशी को लेकर हमारा चिंतन एकतरफा नहीं होना चाहिए। कोई सोचता है कि वह धन कमा लेने से ही सुखी हो जाएगा। या कोई सोचता है कि अमुक चीज मिल जाने से वह सुखी हो जाएगा। ईश्वर में ही समग्र खुशी निहित है। हर व्यक्ति के पास अनेक जिम्मेदारियां हैं- परिवार की, आफिस की, सामाजिक जीवन की और आत्मा की। अगर पहले तीन में असंतुलन हो जाए तो कोई न कोई आपको याद दिला देगा। लेकिन यदि आपने आत्मा की जरूरतों की अवहेलना की तो आपको कोई नहीं याद दिलाएगा। इसलिए हमें अतिरिक्त रूप से सावधान रहना चाहिए। गुरुजी ने कहा है- हमें ईश्वर की तरफ ध्यान देना चाहिए, बाकी सभी जरूरतें अपने आप पूरी हो जाएंगी। ध्यान और सही कार्य से जीवन में संतुलन आता है। हेनरी फोर्ड पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सप्ताह में पांच दिन काम करने का नियम बनाया। छठा दिन परिवार के लिए और सातवां दिन ध्यान और प्रार्थना के लिए। महात्मा गांधी सप्ताह में एक दिन मौन रखते थे। अगर हम रविवार को दावतों और अन्य वाह्य गतिविधियों में ज्यादा व्यस्त रहेंगे तो सोमवार को थका- थका महसूस करेंगे। लेकिन यदि इसे ध्यान और सकारात्मक गतिविधियों में लगाते हैं तो सोमवार को नई ताजगी महसूस होगी। उन्होंने कहा- जब भगवान हमें सुख देते हैं तो हम नहीं कहते कि भगवान यह मेरे साथ ही क्यों। लेकिन जब दुख मिलता है तो कहते हैं- मैं ही क्यों भगवान? इसके बदले हमें पूछना चाहिए- मैं ही क्यों नहीं और फिर अपने जीवन के अच्छी घटनाओं को याद कीजिए। ईश्वर का आशीर्वाद आपको मिला है।
गुरु के प्रति गहरी और अटूट आस्था विषय पर स्वामी ईश्वरानंद ने कहा- हमारे गुरु ने हमें वचन दिया है कि वे हमारे भीतर ईश्वर की उपस्थिति को महसूस कराएंगे। लेकिन यह न तो आसान है और न ही तुरंत होता है। गुरु- शिष्य का संबंध पवित्र रिश्ता है। एक बार यह स्थापित हो गया तो टूट नहीं सकता। यही ईश्वर प्राप्ति की चाभी है। शत- प्रतिशत समस्वरता यानी ईश्वर में पूरी तरह डूब जाना। विश्वास धीरे- धीरे प्रगाढ़ होता है। प्रारंभ में आत्मा और परमात्मा अनजाने से लगते हैं। समय के साथ यह संबंध मजबूत होता जाता है। गुरुजी ने वादा किया है- जब तुम्हें मेरी जरूरत होगी, मैं तुम्हारे पास पहुंच जाऊंगा। इसे कई सन्यासियों ने शारीरिक पीड़ा के समय महसूस किया है।
पूरी तरह वर्तमान क्षण में जीना विषय पर स्वामी ललितानंद जी ने कहा- हम एक ही समय में वर्तमान, अतीत और भविष्य में नहीं रह सकते। अतीत की गलतियों पर पछताने और भविष्य से डरने की बजाय ईश्वर पर भरोसा रख कर वर्तमान में जीना सीखिए। वर्तमान क्षण, भविष्य की कल्पना के कारण ओझल सा हो जाता है। वे ही लोग खुश रहते हैं जो वर्तमान में जीने के दर्शन पर चलते हैं। भविष्य के बारे में हम कैसे सोचने लगते हैं? इसकी वजह है- तनाव, दुख, भय और परेशानी। क्या होगा? यही प्रश्न मन में उठता है। चिंता हमारे लिए ब्रेक की तरह है। वह हमारी प्रगति रोक देती है। चिंता मेंटल ब्रेक है। और ब्रेक लगा कर गाड़ी चलाएंगे तो वह खराब हो जाएगी। हमें इस प्रवृत्ति को तोड़ने की कला सीखनी चाहिए।
बुधवार को स्वामी निर्वाणानंद जी ने तीन घंटे का ध्यान कराया। इस दौरान उन्होंने बताया कि ध्यान कैसे करें। उनके निर्देशों पर ध्यान करते हुए भक्त आनंद में डूबे हुए थे। तीन घंटे कैसे बीते, पता ही नहीं चला।
वृहस्पतिवार का दिन क्रिया दीक्षा की दिन था। इस दिन २०० से ज्यादा लोगों ने दीक्षा ली। दीक्षा लेने वालों के लिए अंग्रेजी और हिंदी भाषाओं में तथ्य समझने के लिए अलग- अलग पंडाल थे। दोनों पंडालों में पहले से क्रिया ले चुके करीब १००० भक्त मौजूद थे। नए दीक्षा लेने वालों को स्वामी जी लोगों ने भोजन परोसा। दीक्षा एक अद्भुत और आह्लादकारी अनुभव है, जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
स्वामी शुद्धानंद जी ने मुक्ति पर गीता के वचनों पर केंद्रित प्रवचन दिया। परमहंस योगानंद जी की पुस्तक योगी कथामृत का उद्धरण देते हुए उन्होंने कहा- भादुड़ी महाशय ने कहा है कि सांसारिक लोग ईश्वर के साथ संपर्क की संपत्ति की बजाय भौतिक खिलौनों के पीछे भागते रहते हैं। वैराग्य से सांसारिक वस्तुओं का मोह छूटता है और ईश्वर से प्रेम बढ़ता है। सांसारिक सुख के सिक्के की दूसरी तरफ दुख है। गीता मे कहा है फल की चिंता मत करें। सिर्फ कर्तव्य करते जाएं। उन्होंने याद दिलाया कि सन १८६१ में लाहिड़ी महाशय की क्रिया दीक्षा के समय हिमालय में कैसे महावतार बाबाजी ने सोने का महल प्रकट कर दिया। ईश्वर के साथ संपर्क होने के बाद वे आपकी सारी जरूरतें पूरी कर देते हैं।
उसी दिन शुद्धानंद जी ने भयरहित जीवन जीने वर केंद्रित प्रवचन दिया। उन्होंने कहा- जब भी भय हो, ओम का उच्चारण करें। ईश्वर में गहरी आस्था रखें। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है- योगी को ध्यान में निर्भय हो कर बैठना चाहिए। अभय पर गीता के १६वें अध्याय में महत्वपूर्ण बात कही गई है। आत्मा के २६ गुणों में एक भय रहित होना भी है। मुख्य बात है ईश्वर में गहरा विश्वास। ईश्वर को पाने की लगातार कोशिश करते रहें।
अंतिम दिन था प्रश्नोत्तर का। स्वामी स्मरणानंद जी ने तेलुगु में और स्वामी ईश्वरानंद ने हिंदी में भक्तों के प्रश्नों के उत्तर दिए। स्वामी ईश्वरानंद जी से एक भक्त ने पूछा- मन क्यों भटकता है? स्वामी जी ने उत्तर दिया- क्योंकि मन का यह स्वभाव है। पानी क्यों फैलता है? क्योंकि फैलना उसका स्वभाव है। मन को नियंत्रित करने का एकमात्र उपाय है- ध्यान। मेडिटेशन। शुरू में यदि आपको मन मार कर भी ध्यान करना पड़े तो करें। धीरे- धीरे जब ध्यान का अभ्यास हो जाएगा तो इसमें आनंद आने लगेगा। ईश्वर से संपर्क करने का यही एक मात्र उपाय है। कई अन्य प्रश्न भी पूछे गए। जिसका संतोषजनक उत्तर मिला।

Wednesday, November 24, 2010

अपने भीतर प्रेम, आनंद और शांति बनाए रखने का संदेश

विनय बिहारी सिंह

चौदह नवंबर २०१० को ठीक साढ़े नौ बजे शरद संगम का उद्घाटन हुआ। छह गुरुओं के चित्र के सामने मोहक ढंग से सुसज्जित मंच पर ११ स्वामी जी लोग बैठे। स्वामी का अर्थ है- स्वयं का स्वामी। मन, इंद्रिय बुद्धि और प्राण पर नियंत्रण करने वाले साधक। आत्मोद्धार के प्रतीक। इस अवसर पर दयामाता का संदेश अत्यंत प्रेरक था। वे योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया व सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप की संघमाता और अध्यक्ष हैं। आमतौर पर उन्हें मां कहा जाता है। मां ने कहा- शरद संगम में आपको जो प्रेम, आनंद और शांति मिलने वाली है, उसे खोएं नहीं। इसे अपने साथ घर ले जाएं और उसे बनाए रखें। यह प्रतिदिन ध्यान करने से संभव होगा। कुछ अद्भुत बातों का जिक्र करना आवश्यक है। आश्रम में कोई अखबार, या दुनियादारी वाली कोई पत्रिका नहीं थी। संगम में भाग लेने वाले लोगों अखबार वगैरह की जरूरत ही नहीं महसूस होती थी। जो लोग मीडिया से जुड़े थे और योगदा आश्रम के भक्त थे, वे भी अखबार के प्रति उदासीन हो गए थे। जो लोग खबरों में जीते हैं, वे कैसे एक आध्यात्मिक माहौल में रम सकते हैं। यह इसका उदाहरण है। कुछ डाक्टर भी आए थे। वे सात दिनों तक स्वयं को भूल कर भजन, ध्यान और शक्ति संचार व्यायाम को सुखद मान रहे थे। भारी संख्या में मौजूद भक्त किसी व्यक्तिगत काम से आश्रम से बाहर नहीं जाते थे। उन्हें हमेशा लगता था कि कोई महत्वपूर्ण कार्यक्रम छूट न जाए। संगम आए लोगों के पास आध्यात्मिक कामों से बिल्कुल फुरसत नहीं थी। सुबह सात बजे से कार्यक्रम शुरू हो जाता था। सुबह- शाम शक्ति संचार व्यायाम, सामूहिक ध्यान, महत्वपूर्ण विषयों पर प्रवचन, सत्संग। जलपान और भोजन। जिन यात्रियों को धर्मशालाओं में ठहराया गया था, उनके लिए बसों, कारों इत्यादि की व्यवस्था की गई थी। निर्देश पुस्तिका में लिखा था- यदि आपकी तबियत खराब हो जाए या कहीं चोट इत्यादि लग जाए तो कृपया स्वागत कक्ष में आकर सूचित करें ताकि हम आपके उपचार की व्यवस्था कर सकें। सब कुछ व्यवस्थित, शांत और प्रशंसनीय। हजारों लोग कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं। जलपान, चाय और भोजन बन रहा है। लेकिन कहीं कोई गंदगी आपको नहीं मिलेगी। कहीं कोई अव्यवस्था नहीं। प्रवेशार्थियों, ब्रह्मचारियों और सन्यासियों के चेहरों पर व्यस्तता तो दिख रही थी, लेकिन उसके पीछे शांति और आनंद को साफ- साफ महसूस किया जा सकता था। एक भक्त ने कहा- आश्रम में जो उत्कृष्ट व्यवस्था दिख रही है, क्या वह समाज में संभव नहीं है। जैसे यहां हर चीज करीने से रखी जा रही है, एक शांत और कारगर व्यवस्था लगातार काम कर रही है, वैसा ही पूरे देश संभव हो जाए तो क्या हमारे देश का चेहरा नहीं बदल जाएगा? अगर आपके मन में कोई प्रश्न है तो वहां आसपास व्यस्त किसी भी सन्यासी से पूछ सकते हैं। सन्यासी मुस्करा कर क्षण भर रुकेंगे और आपके प्रश्न का उत्तर देकर फिर काम में व्यस्त हो जाएंगे। हम सब समझते हैं कि हमारे सांसारिक जीवन में ही काम होता है, आश्रम में सन्यासी आराम से होंगे। लेकिन यहां तो उल्टा दिखा। भक्तों के लिए यहां दो लाख फाइलें हैं। सबके प्रश्नों, सबकी शंकाओं का समाधान तो होता ही है, किस भक्त ने क्या प्रगति की, उसे आगे क्या करना है, यह भी बताया जाता है। योगदा के स्कूल, दवाखाना और अन्य राहत कार्यों के लिए फाइलें। देश भर की गतिविधियों की फाइलें, योगदा पाठों की फाइलें। हां, सब कुछ कंप्यूटर में हैं। लेकिन इन पर रोज पैनी नजर रखनी पड़ती है। लेकिन इस कठिन परिश्रम से मुक्त होकर सन्यासी गहरा ध्यान करने बैठ जाते हैं। हम परिवारी जन खाली समय में कहीं घूम आते हैं, अखबार पढ़ लेते हैं, या कुछ और कर लेते हैं। लेकिन ये सन्यासी कठिन श्रम करते हुए भी लंबा और गहरा ध्यान करते हैं। फिर हम किस मुंह से पूछें कि आफिस से घर आते आते देर हो जाती है। ध्यान का समय कैसे निकालें? सन्यासी तो लंबे और कठोर श्रम के बाद ध्यान को मधुर आहार मानते हैं। उनसे समय की कमी की बात कहते हुए कोई भी संवेदनशील व्यक्ति हिचक जाता है। हां, अनुशासित जीवन को प्रत्यक्ष देखना एक अलग अनुभव है। परमहंस योगानंद का यह संदेश बार- बार याद आता रहा- हम दिव्य ऊर्जा के अनंत समुद्र में रह रहे हैं। उसे अपने भीतर लाइए। कैसे? उसके तरीके उन्होंने बताए हैं। क्या यही ऊर्जा यहां के संन्यासियों, ब्रह्मचारियों और प्रवेशार्थियों को कठोर परिश्रम करने के योग्य बनाती है? इतनी शांति, धैर्य और गहराई से भक्तों के प्रश्नों का उत्तर देना सहज ही संभव नहीं है। निश्चय ही इसके लिए तप करना पड़ा होगा। हम सांसारिक लोग सब कुछ तो व्यवस्थित रखते हैं लेकिन व्यवहार में ही संतुलित नहीं रह पाते। कई बार झुंझला जाते हैं, झगड़ा कर बैठते हैं, तनाव में आ जाते हैं। संन्यासियों के व्यवहार से लगा- इसे कहते हैं आदर्श व्यवहार। सचमुच सबकुछ हमारे भीतर ही है, लेकिन हम उस पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते।

Tuesday, November 23, 2010

सात दिनों तक चला यह विलक्षण समारोह

विनय बिहारी सिंह

रांची में लगातार सात दिनों तक एक गहरा आध्यात्मिक संगम हुआ। देश- विदेश के करीब तीन हजार लोगों ने इसका आनंद उठाया, लेकिन किसी को पता भी नहीं चला। न कोई शोर- गुल, न कोई असुविधा। सब कुछ अत्यंत व्यवस्थित, शांत, अनुशासित और आनंदपूर्ण। इसीलिए यह विलक्षण था। इक्कीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में झारखंड की राजधानी में यह आयोजन कई अर्थों में विशिष्ट था। योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया के आश्रम में यह समारोह पूरी तल्लीनता से चल रहा था। लेकिन आश्रम के सामने से गुजर रहे लोगों को पता नहीं चलता था कि आश्रम में भक्त भजन में, ध्यान में, सन्यासियों से बातचीत में और जलपान या भोजन में व्यस्त हैं। आश्रम का प्रत्येक कण आनंद से ओतप्रोत था। आइए इसे तनिक विस्तार से जानते हैं। समारोह था- शरद संगम। हर साल नवंबर में यह अद्भुत कार्यक्रम होता है और आध्यात्मिक रुचि वाले लोग इसमें आकर ईश्वरीय रसायनों से ओतप्रोत होते हैं।
हम सब १४ नवंबर को कोलकाता से रांची, ट्रेन से पहुंचे। हम स्टेशन से बाहर आएं, इसके पहले ही देखा- वालंटियर या स्वयंसेवी भक्त छोटी- छोटी तख्तियों पर वाईएसएस (योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया) लिख कर खड़े थे। वे हमसे कह रहे थे- आपके लिए बस इंतजार कर रही है। स्टेशन के बाहर निकले तो आगे बढ़ कर हमारा सामान हाथ बढ़ा कर ले लिया। उसे एक ट्रक में करीने से रख दिया और कहा- अब सामान की जिम्मेदारी हमारी। आप आराम से बस में बैठें। बस खड़ी थी। हम सब उसमें सवार हो गए। जल्दी ही हम सब आश्रम में थे।
हमारा सामान पहुंच चुका था। हमने अपना रजिस्ट्रेशन कराया। हमें एक खूबसूरत पुस्तिका दी गई ताकि हम विभिन्न प्रवचनों, अपने विचारों या और कुछ भी नोट कर सकें। उसी में था कार्यक्रमों का ब्यौरा और समय। हमें बताया गया कि हमें कहां ठहरना है और एक बैज दे दिया गया जिस पर हमारा नाम और उस स्थान का नाम लिखा था जहां से हम आए थे। हमें पहुंचाने के लिए वालंटियर खड़े थे। उन्होंने हमारा सामान उठा लिया और हमारे कमरे तक पहुंचा दिया। हम लाख कहते रहे- कृपया अपना सामान हमें उठाने दें। पर वे हंस कर आत्मीयता से कहते- हमें सेवा का मौका दीजिए। जहां हम ठहरे- २४ घंटे बिजली औऱ पानी की व्यवस्था। हम तैयार हो कर कार्यक्रमों में पहुंचे। आश्रम में लगातार लोग आते जा रहे थे। रजिस्ट्रेशन हो रहा था। लोगों के लिए वाहन की व्यवस्था की जा रही थी। लेकिन सब कुछ शांति से, प्रेम से संपन्न हो रहा था। इस आश्रम को महान योगी परमहंस योगानंद जी ने १९१७ में स्थापित किया था। उद्देश्य था- लोगों को योग की शिक्षा देना। लेकिन एक मिनट रुकिए। कई लोग योग का अर्थ सिर्फ योगासन समझते हैं। लेकिन यहां योग का अर्थ है- आत्मा का परमात्मा में लय या योग। आत्मा का ईश्वर से वियोग हो गया है। उसे फिर स्वाभाविक स्थिति में लाने के लिए योग करना है। परमहंस जी ने भारत में योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया की स्थापना की और विदेशों में सेल्फ रियलाइजेशन नामक संस्था की। इन दोनों संस्थाओं के नाम अलग- अलग हैं। पर हैं ये एक ही। पूरे विश्व के केंद्रों या आश्रमों की अध्यक्ष हैं- दया माता। करुणा, प्रेम और दया की साक्षात मूर्ति।
किन- किन प्रदेशों से कितने लोग आए थे शरद संगम में। आइए संक्षेप में जानें। हर जगह के भक्तों की सूची तो नहीं मिल पाई लेकिन महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक से १००- १०० लोग और आंध्र प्रदेश से सबसे ज्यादा ३०० लोग आए थे। जरा ठहरें। यह बताना तो मैं भूल ही गया कि जम्मू के अमर सिंह और उनके साथी आए थे तो कैलाश- मानसरोवर की परिक्रमा कर लौटे केरल के राजप्पन भी थे। गले मिलने को तैयार। चंडीगढ़, लुधियाना से लेकर महाराष्ट्र, गुजरात और अन्य प्रदेशों के लोग। सिर्फ पश्चिम बंगाल से ही करीब १०० लोग थे। इसके अलावा ओडीशा से भी। यानी कश्मीर से कन्याकुमारी तक के भक्त। देश के कोने- कोने से। विदेशों से भी अनेक लोग थे। इनमें अमेरिका और आस्ट्रेलिया से आए भक्तों से तो मैं खुद परिचित था। दक्षिण अफ्रीका का एक भक्त मेरे सामने भोजन कर रहा था। रंग- गहरा श्यामल, बाल अत्यधिक घुंघराले, होठ- मोटे। चेहरा- फूल की तरह खिला हुआ। इस बार घोषणा हुई- योगदा पाठमाला जो अब तक अंग्रेजी में ही उपलब्ध थी, अब हिंदी में भी पढ़ी जा सकेगी। कुल १६०० भक्तों ने रजिस्ट्रेशन कराया था। लेकिन ध्यान के समय करीब १३०० लोग और जुड़ जाते थे। इनमें से कई तो स्थानीय होटलों में ठहरे थे और अनेक स्थानीय यानी रांची के भक्त थे।
आइए जलपान औऱ भोजन के इंतजामों के बारे में जानें।
आश्रम में कुल ७० वालंटियर भक्तों की सेवा के लिए हमेशा तैयार रहते थे। रजिस्ट्रेशन वाले ही दिन हमें भोजन के कूपन दे दिए गए थे। नाश्ते के कूपन जलपान वाली जगहों पर उपलब्ध थे। भक्त कतार से खड़े हो कर अपना जलपान ले लेते थे। फिर चाय या कॉफी। चमकते हुए स्टेनलेस स्टील के बर्तनों में प्रतिदिन नए किस्म का अत्यंत स्वादिष्ट जलपान। आश्रम के लॉन में बिछी कुर्सी- मेजों पर बैठ कर जलपान करना एक अलग ही सुख था। जगह- जगह कूड़ेदान रख दिए गए थे। जलपान हमें प्लास्टिक में नहीं, पेड़ के सुंदर से पत्तों पर मिलता था। यानी पर्यावरण का पूरा ख्याल रखा गया था। एक भक्त ने कहा- अगर कहीं स्वर्ग है तो यहीं पर है। गुरुदेव परमहंस योगानंद के आश्रम में। जगह- जगह पीने के पानी का इंतजाम। जहां इतने लोगों का समूह था, कहीं जमीन पर कागज का एक टुकड़ा भी नहीं दिखता था। कहीं कुछ भी तनिक भी गंदा नहीं। सब कुछ चमकदार, आकर्षक और पवित्र। भोजन के समय १६०० लोग आनंद से खड़े होते औऱ देखते ही देखते उनकी बारी आ जाती। वहां भी स्वयंसेवक या वालंटियर आपकी थाली मेज पर रखने के लिए तैयार खड़े थे। सभी हाथ जो़ड़ कर एक दूसरे को जय गुरु कह कर प्रणाम कर रहे थे। चाहे एक दूसरे से परिचय हो या नहीं। सभी गुरुभाई और बहन थे। सभी एक परिवार के सदस्य थे। एक दूसरे के सुख- दुख में एक होने को तैयार। कपड़े गंदे हो गए तो आश्रम में ही धोबी था। आप उसे दे दीजिए। एक दिन बाद आपको धुले और इस्तरी किए कपड़े मिल जाएंगे। आश्रम में ही था जरूरत के सामान का स्टाल। झोला, आसन, पके फल, सूखे फल, साबुन, तेल, टूथपेस्ट और आवश्यकता की अनेक चीजें वहां उपलब्ध थीं। उसी से सटे एक शिविर में डाक्टर भी थे। अगर आपको कोई असुविधा हो तो बिना किसी फीस के आप डाक्टर से परामर्श ले लीजिए। दवा भी उपलब्ध थी। यह समारोह १४ से २१ नवंबर तक चला। भक्तों को महसूस हुआ कि उनके परमगुरु भगवान कृष्ण, जीसस क्राइस्ट, महावतार बाबाजी, लाहिड़ी महाशय, स्वामी श्री युक्तेश्वर जी और गुरु परमहंस योगानंद हर क्षण उनके साथ हैं।

Friday, November 12, 2010

हे भगवान, हे भगवान

विनय बिहारी सिंह


यह भजन मुग्धकारी है। भजन की पंक्तियां हैं- हे भगवान, हे भगवान। इसे ही देर तक गाया जाता है, साथ में होता है हारमोनियम। गाने वाले संत भक्ति से ओतप्रोत हो जाते हैं। उनका साथ देने वाले भक्त भी उसी रस में डूब जाते हैं। मेरा अपना अनुभव है कि यह भजन दिल में गहरे उतर जाता है और भजन बंद होने के बाद भी दिलो- दिमाग में बजता रहता है। एक और भजन है अंग्रेजी में। इसे परम पूज्य परमहंस योगानंद जी ने लिखा है। इसकी पंक्तियां हैं- लाइफ इज स्वीट, डेथ अ ड्रीम, व्हेन दाई सांग फ्लोज थ्रू मी। चार मुखड़ों वाला यह भजन रस विभोर कर देता है। एक बार मैंने इसी भजन को सुनने और इसमें अपना स्वर मिलाने के लिए एक बस छोड़ दी। अगली बस से घर गया। इसे स्वामी शुद्धानंद जी जब गाते हैं तो बात ही कुछ और होती है। योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया के स्वामी शुद्धानंद जी सिद्ध संत हैं। उनके मुंह से यह भजन ईश्वरीय स्पंदन से ओतप्रोत हो जाता है। कुछ लोगों की आंखों से आंसू बहने लगते हैं। इस भजन का हाल ही में हिंदी अनुवाद हुआ है- जीवन है मधुर, मृत्यु सपना। जब मुझमें बहे, तव संगीत। लगे आनंद मधुर, दुख सपना, जब मुझमें बहे, तव संगीत।
ईश्वर को संबोधित यह गीत गहरे उतरता जाता है।
( मित्रों आठ दिनों के लिए मैं रांची के एक आध्यात्मिक अनुष्ठान में जा रहा हूं। वहां ईश्वरीय आनंद की हाट लगी हुई है। वहां से लौटने के बाद आपसे मुलाकात होगी।)

Tuesday, November 9, 2010

भगवान शिव ने मोक्ष प्रदान किया

विनय बिहारी सिंह


एक साधु बहुत दिनों से तपस्या कर रहे थे। तप से तपस्या। यानी इंद्रियों से मन को खींच कर ईश्वर में लगाना। यही तप है। इसके अलावा खान- पान, आचार- विचार और व्यवहार में संतुलन। तो साधु तपस्या कर रहे थे। अचानक एक रात उनके सामने शुभ्र ज्योति प्रकट हुई। यह ज्योति लगातार फैलती गई। जिस जगह वे तपस्या कर रहे थे, वहां से फैलते- फैलते प्रकाश मानो संपूर्ण ब्रह्मांड तक फैल गया। वहां से प्रकट हुए शुद्ध स्फटिक के समान भगवान शिव। साधु ने आंखें खोलीं। सामने साक्षात भगवान शिव को देख कर वे आनंद से विभोर हो गए। वे बोले- भगवन, मैं तो आप ही को इतने दिनों से पुकार रहा था। कभी ऊं नमः शिवाय का जाप करता था तो कभी कातर हो कर पुकारता था- हे भगवान शिव, आप कहां है। दर्शन दीजिए प्रभु। अब आप आ गए तो अब मत जाइए। हमेशा मेरे ही साथ रहिए। भगवान शिव ने कहा- मेरी इच्छा है कि तुम मुझसे कुछ मांगो। साधु ने कहा- भगवन, आशीर्वाद दीजिए कि मैं सदा शिव आनंद में डूबा रहूं। बस। भगवान शिव ने कहा- ऐसा ही हो। साधु खुशी से नाचने लगे। वे बोले- भगवन, जब आपके आनंद में डूबा रहूंगा तो उस समय आप मेरे साथ रहेंगे न? भगवान बोले- अवश्य। साधु के जीवन का यह सर्वोत्तम क्षण था। भगवान शिव बोले- एक वर और मांगो। साधु ने कहा- प्रभु, मुझे और कुछ नहीं चाहिए। मैं तो बस आपको ही चाहता हूं। आप मेरे साथ हैं तो मुझे कुछ नहीं चाहिए। जहां आप रहते हैं- वहां रोग, शोक, कष्ट और परेशानियां नष्ट हो जाती हैं। आपका भक्त सुखी, निरोग, और आनंद से ओतप्रोत रहता है। उसे और क्या चाहिए? मैं तो साधु हूं। मैं तो आपके लिए ही तपस्या कर रहा था। संसार के लोग माया जाल से मुक्त होकर आपकी शरण में आएं, यही मेरी इच्छा है। भगवान शिव मुस्कराए और बोले- जो मुझे याद करता है, उसके पास मैं तुरंत पहुंचता हूं। लेकिन अगर कोई मेरी उपस्थिति महसूस ही न कर पाए, तो मैं क्या कर सकता हूं।

Monday, November 8, 2010

भगवान से कैसे करें प्यार?

विनय बिहारी सिंह


एक आत्मीय ने पूछा कि ईश्वर से हम कैसे प्रेम करें, जबकि हमने उन्हें देखा नहीं है। न उनका कोई रूप जानते हैं और न वे कुछ आभास कराते हैं?
इसका उत्तर वहां मौजूद एक सन्यासी ने दिया- आप का अस्तित्व है? उत्तर मिला- हां। सन्यासी ने कहा- जब आपका अस्तित्व है तो आप पृथ्वी पर आए कहां से? जवाब मिला- माता के गर्भ से। सन्यासी ने पूछा- क्या माता ने आपके भीतर प्राण डाला? जवाब मिला- पता नहीं। फिर सन्यासी ने पूछा- मां के गर्भ में आने के पहले आप कहां थे? जवाब मिला- पता नहीं। तब सन्यासी ने कहा- यहीं पर गौर कीजिए। आपका जीवन कोई और चला रहा है। उन्हीं का नाम भगवान है। भगवान ही सारे ब्रह्मांड को चला रहे हैं। वरना चांद- सितारे आपस में टकरा जाते। कोई तो उन्हें संतुलित ढंग से रखे हुए है। सब भगवान के नियंत्रण में है। बस, वे लीलामय हैं। खुद नहीं दिखते। उनका दर्शन दुर्लभ है। वे उन्हीं को दिखते हैं जो दृढ़ और गहरी भक्ति के साथ उन्हें पुकारते रहते हैं। वरना अदृश्य रहते हैं। जिन्होंने हमारा निर्माण किया, क्या उनको हम प्रेम नहीं कर सकते? अपने जन्म स्थान के प्रति हमारा गहरा मोह होता है। अपनी संतान से गहरा मोह होता है। अपने शरीर से गहरा मोह होता है। लेकिन जो हमारा परमपिता या माता या दोस्त है, उसे हम प्रेम नहीं कर सकते? क्या विडंबना है। ऐरी- गैरी चीजों, भौतिक वस्तुओं से तो हम प्रेम करते हैं। कई लोग तो ऐसी वस्तुओं के प्रेम में पागल हो जाते हैं। लेकिन भगवान के प्रति उनके मन में प्रबल प्रेम नहीं जागता। इसका मतलब है वे शैतान के शिकंजे में हैं।

Saturday, November 6, 2010

रात भर हुई कालीपूजा

विनय बिहारी सिंह

मैं कोलकाता के जिस कांप्लेक्स में रहता हूं वहां रात भर कालीपूजा चलती रही। यहां पूजा के समय ढाक बजता है। ढाक ड्रम का ही एक रूप है लेकिन उसे पश्चिम बंगाल में पूजा के अवसर पर एक खास लय- ताल में बजाया जाता है। ढाक काफी तेज बज रहा था और इस तरह मैं रात को सो नहीं पाया। तो लगा कि भगवान ने यह स्थिति शायद मेरे लाभ के लिए ही बनाई है। मैंने परमहंस योगानंद जी की गीता की व्याख्या- गॉड टाक्स विद अर्जुन को चाव से पढ़ा। हालांकि यह पुस्तक मैंने क बार पढ़ी है। लेकिन जितनी बार पढ़ता हूं, नए अर्थ खुलते जाते हैं । इसी तरह परमहंस जी की पुस्तक योगी कथामृत भी है। हाल ही में उनकी एक पुस्तक मैन्स इटरनल क्वेस्ट का हिंदी अनुवाद मानव की निरंतर खोज नाम से आई है। जिसे योगदा सत्संग सोसाइटी ने प्रकाशित किया है। ईश्वर, ध्यान और अध्यात्म के बारे में मनुष्य के मन में कई सारे सवाल उठते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर परमहंस योगानंद जी ने स्पष्ट ढंग से दिया है। । पता है- , योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया, परमहंस योगानंद पथ, रांची- ८३४००१। परमहंस योगानंद जी ने अमेरिका और यूरोपीय देशों में क्रिया योग का प्रसार प्रसार किया और यह सिद्ध किया कि योग एक वैग्यानिक पद्धति है। उन्होंने १९१७ में भारत में योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया और विदेशों में सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप की स्थापना की।उन्होंने बताया कि ईश्वर कल्पना की वस्तु नहीं हैं। उनसे संपर्क किया जा सकता है। इसके लिए दृढ़ विश्वास और अत्यंत गहरी आस्था तो होनी ही चाहिए कुछ वैग्यानिक प्रविधियों का अभ्यास भी जरूरी है। इन प्रविधियों की जानकारी यह संस्था देती है।

Thursday, November 4, 2010

नरकासुर का वध

विनय बिहारी सिंह


भगवान श्रीकृष्ण ने महादुष्ट और पापी नरकासुर का वध किया था। इसी के उपलक्ष्य में दीपावली के पहले नरक चतुर्दशी मनाई जाती है। संतों ने इसकी एक और व्याख्या की है। दीपावली के पहले अपने भीतर के नरकासुर का वध करना चाहिए। यानी अपने भीतर के दोषों या बुरी आदतों को खत्म करना चाहिए। तब दीपावली के दिन अपने भीतर का उजाला प्रकट होगा। तब हमारे भीतर ज्योति जलेगी। भगवान कृष्ण को महायोगी कहा जाता है। गीता में उन्हें योगेश्वर कहा गया है। गीता के अंतिम श्लोक में संजय ने धृतराष्ट्र से कहा है- राजन, जहां योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हों वहां विजयश्री निश्चित है। अर्जुन भक्त के प्रतीक हैं और श्रीकृष्ण तो भगवान हैं ही। जो अर्जुन पहले अध्याय में युद्ध नहीं करना चाहते। उनका मुंह सूख गया है। हाथ कांप रहे हैं और धनुष ठीक से पकड़ा नहीं जा रहा है। वही, अठारवें अध्याय में कहते हैं- हां, भगवन मेरी स्मृति लौट आई है। मैं युद्ध करूंगा। गीता जैसा ग्रंथ हमारे पास है, यह हमारा सौभाग्य है।

Wednesday, November 3, 2010

मन स्थिर ऱखने के फायदे

विनय बिहारी सिंह


योग वशिष्ठ में एक बहुत अच्छा श्लोक हैः

मनो स्थैर्ये स्थिरो वायुः
ततो बिंदुः स्थिरो भवेत्
बिंदु स्थैर्ये सदा सत्वं
पिंड स्थैर्ये प्रजायते।।

यानी मन स्थिर होता है तो प्राण स्थिर हो जाता है। तब प्रकाश बिंदु स्थिर होता है। आंख बंद करें और प्रकाश बिंदु दिखेगा। यह स्थिति आते ही आप तमाम विकारों, बंधनों और कष्टों से मुक्त हो जाएंगे। आप जानते ही हैं कि मुनि वशिष्ठ भगवान राम के गुरु थे। योग वशिष्ठ की प्रत्येक पंक्ति गहरे आध्यात्मिक संदेश देने वाली है। आप पूछ सकते हैं कि मन कैसे स्थिर हो? तो इसका उपाय यही है कि यह महसूस कीजिए कि आप न अपनी मर्जी से यहां आए हैं और अपनी मर्जी से इस पृथ्वी से जाएंगे। जैसे आपके इस पृथ्वी पर आने का समय तय था, ठीक उसी तरह जाने का समय भी तय है। बीच के समय में आप पृथ्वी पर बिता रहे हैं। सभी संतों ने कहा है कि जब तक जीएं, ईश्वर का स्मरण करते रहें। उनका आभार जताते रहें कि उन्होंने मनुष्य योनि में जन्म दिया है जिसके कारण आप पूजा, पाठ या जप करने में सक्षम हैं। अपने मोक्ष के बारे में सोच रहे हैं। परोपकार के बारे में सोच रहे हैं। ईश्वर से प्रेम कर रहे हैं। ईश्वर से प्रेम क्यों करें? क्योंकि ईश्वर से ही हम आए हैं और ईश्वर में ही हमें मिल जाना है। हम जितने तरह के भी आनंद ढूंढ़ लें, लेकिन उससे हमें पूर्ण तृत्प्ति नहीं मिलेगी। तृप्ति मिलेगी तो बस ईश्वर से संपर्क करने से। संपर्क कैसे होगा? उनको हृदय से पुकारने से, हृदय से प्रार्थना करने से, संभव हो तो उनके लिए रोने से। वे हमें हमसे ज्यादा जानते हैं। क्योंकि वे ही हमारे मालिक हैं। यह ब्रह्मांड भी उनका है और हम भी उनके हैं।

Tuesday, November 2, 2010

काल को नियंत्रित करने वाली महाशक्ति

विनय बिहारी सिंह

पश्चिम बंगाल में दीपावली के दिन कालीपूजा होती है। इसीलिए यहां दीपावली को कालीपूजा कहा जाता है। मां काली यानी काल को नियंत्रित करने वाली महाशक्ति। जो काल को नियंत्रित करे, वह काली। मां काली भगवान शिव की पत्नी कही जाती हैं। यानी पार्वती जी का ही एक रूप। लेकिन कई विद्वान कहते हैं कि काली यानी अंधकार को दूर करने वाली। कैसे? मां काली का रंग काला होता है लेकिन इस कालेपन से नीला रंग झांकता रहता है। जब हम आंखें बंद करते हैं तो अंधकार दिखता है। लेकिन इस अंधकार के पीछे ईश्वर का प्रकाश छुपा है। ठीक इसी तरह अमावस्या को घुप्प अंधरी रात होती है। मां काली प्रकाश हैं। अब आप प्रश्न पूछ सकते हैं कि जब मां काली काले रंग की हैं तो वे प्रकाश कैसे हुईं? तो इसका उत्तर है- सभी चित्रों में मां काली की लाल जीभ बाहर निकली होती है। मूर्तियां भी इसी तरह गढ़ी जाती हैं। सभी मंदिरों में मां काली की जीभ बाहर निकली हुई प्रतिमा ही पूजी जाती है। वह जीभ है प्रकाश। यानी अंधेरे से डरें नहीं, वहां मां काली हैं। ऐसा कुछ विद्वानों का मत है। लेकिन आमतौर पर जो धारणा है, उसके अनुसार मां काली काल पर विजय करने वाली हैं। इसलिए उन्हें काली कहा जाता है। उनका रंग काला नहीं है। परमहंस योगानंद जी ने लिखा भी है-

कौन कहता तू है काली हे मां जगदंबे।
लाखों रवि, चंद्र तेरी काया से हैं चमकते।।

इस दीपावली पर मां काली की अराधना करने वाले लोग आधी रात तक पूजा करते हैं। फिर प्रसाद वितरण होता है। लेकिन ऐसे भी भक्त हैं जो पूरी रात ध्यान, जप और पाठ करते हैं। वे भोर में प्रसाद वितरण करते हैं। रात भर वही जाग सकता है जो मां काली से अनन्य प्रेम करता हो। उनके दोनों बाएं हाथों में तलवार और नरमुंड है। और दोनों दाएं हाथों में एक आशीर्वाद के लिए उठा हुआ है तो दूसरा अभय का वरदान दे रहा है। मां काली भगवान शिव की छापी पर पैर रख कर जीभ बाहर निकाल कर अपनी गलती महसूस कर रही हैं। दरअसल यह उनकी लीला है। भगवान शिव अनंतता के प्रतीक हैं। इनफिनिटी के प्रतीक। मां काली बता रही हैं कि भगवान शिव अनंत हैं। उन पर पैर रखना यानी भारी गलती। वे पूज्य हैं। अनंत भगवान का सम्मान करना चाहिए। पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी आत्मा अनंत का अंश है।

Monday, November 1, 2010

भगवत गीता यानी भगवान का गीत

विनय बिहारी सिंह


भगवत गीता, भगवान का गीत है। रामकृष्ण परमहंस कहते थे- दस बार लगातार गीता, गीता कहने से त्यागी, त्यागी हो जाता है। गीता का सार है- त्याग। किसका त्याग- लोभ, मोह, अहंकार, क्रोध, काम, मद, ईर्ष्या और आलस्य इत्यादि का त्याग। उच्च कोटि के संत परमहंस योगानंद जी ने गीता का जो भाष्य लिखा है, वह अद्भुत है। उन्होंने कहा है- कौरव हमारे भीतर की वासनाएं, कामनाएं हैं और पांडव हमारे भीतर का सात्विक भाव। कौरवों व पांडवों के बीच युद्ध यानी हमारे भीतर की कामनाओं, वासनाओं यानी माया और सात्विकता के बीच युद्ध। सांसारिक बंधन एक तरफ खींचता है और वैराग्य एक तरफ। मनुष्य इन्हीं दोनों से लड़ता है। लेकिन अगर हमारे भीतर सात्विकता का प्राधान्य हो गया तो हमारे भीतर का पांडव जीत जाता है। इस दीपावली पर हमें अपने अंदर के बचे- खुचे अंधकार को खत्म कर देना है। वहां ज्योंही ईश्वर का प्रकाश जाएगा, हमारा अंतःकरण दिव्य ज्योति से जगमगा जाएगा। हम अपने घरों को जगमगाने के साथ अपने अंतःकरण को भी आलोकित करें और इस दीपावली को और ज्यादा आनंदमय बनाएं।

Thursday, October 28, 2010

सर्वव्यापी मां दुर्गा


मित्रों, आज एक अद्भुत चीज मुझे एसएमएस से मिली है। मां दुर्गा के ये ए टू जेड तक के नाम आनंदित करने वाले हैं। कृपया आप भी पढ़ें और आनंद लें।

a- ambe
b- bhawani
c- chamunda
d- durga
e- ekrupi
f- farsadharini
g- gaitri
h- hinglaaj
i- indrani
j- jagadamba
k- kaali
l- laxmi
m- mahamaya
n- narayani
o- omkarini
p- padma
q- qatyayani
r- ratnapriya
s- shitala
t- tripur sundari
u- uma
v- vaishnavi
w- warahi
y- yati
z- zyana

Wednesday, October 27, 2010

वे रात १२ बजे तक पूजा करते हैं

विनय बिहारी सिंह


एक दुर्गा मां के अनन्य भक्त हैं। वे अपने बारे में कोई भी प्रचार नहीं चाहते, इसलिए उनका नाम यहां नहीं दे रहा हूं। उनकी एक बात मुग्धकारी है। वे शाम को अपने आफिस से आते हैं। हल्का- फुल्का कुछ खाते हैं। कभी दो बिस्कुट या कभी दो पेठे। इसके बाद अगरबत्ती, धूप, इत्यादि से मां दुर्गा की पूजा करते हैं। और फिर बैठ जाते हैं पाठ करने। पाठ खत्म करने के बाद वे ध्यान में बैठ जाते हैं। उनके एक मित्र ने कहा- दुर्गापूजा तो बीत गई। आप अब पाठ किए जा रहे हैं? उन्होंने जवाब दिया- दुर्गापूजा कभी खत्म नहीं होती। इस सृष्टि के पहले भी मां थीं और बाद में भी रहेंगी। उनकी पूजा में जो आनंद है, वह संसार के किसी काम में नहीं मिलेगा। मैं तो मां की गोद में बैठ जाता हूं और आनंद मनाता हूं। यही मेरा ध्यान है। अगर आप उनसे पूछेंगे- मां भी आपसे कुछ कहती हैं या आप एकतरफा ही बोलते हैं या प्रार्थना करते हैं? वे जवाब देंगे- मां से एकतरफा संबंध हो ही नहीं सकता। मां बच्चे के बिना नहीं रह सकती और बच्चा मां के बिना। तो एकतरफा संबंध कहां हुआ। आपके भीतर यह गहरा और पक्का विश्वास होना चाहिए कि मां ही इस सृष्टि की स्वामिनी हैं। तब शुरू होता है- साधना का पथ। अगर गहरा और पक्का विश्वास नहीं है तो फिर अगर मां आपका उत्तर भी देंगी तो आपको सुनाई नहीं देगा, महसूस नहीं होगा।
वे आधी रात तक ध्यान करते हैं। फिर हल्का सा भोजन लेकर धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं। तब सोते हैं। सोते- सोते रात के एक बज जाते हैं। अगले दिन सुबह छह बजे उठ जाते हैं और फिर वही कार्यक्रम। लेकिन सुबह उनका पूजा- पाठ और ध्यान इत्यादि नौ बजे ही खत्म हो जाता है क्योंकि उन्हें अपने आफिस भी जाना होता है। उन्हें देख कर लगता है कि वे दिन- रात मां दुर्गा की भक्ति में डूबे रहते हैं। रह- रह कर मां, मां कहते रहते हैं। मानो वे हमेशा मां की ही गोद में रहते हों।

Monday, October 25, 2010

संसार का अर्थ है द्वंद्व

विनय बिहारी सिंह


ऋषियों ने कहा है कि संसार का अर्थ है द्वंद्व। द्वंद्व कहते हैं द्वैत को। यानी दो विपरीत वस्तुएं या स्थितियां। जैसे- दिन- रात, सुख- दुख, आराम- कष्ट, शांति- अशांति या प्रेम- घृणा, पसंद- नापसंद इत्यादि। जहां दो विपरीत वस्तुएं रहेंगी वहां तो एक रस आनंद नहीं रह सकता। वहां हमेशा द्वंद्व रहेगा, संघर्ष रहेगा, तनाव रहेगा। लेकिन ज्योंही आप द्वैत से अद्वैत में चले जाएंगे- शांति और आनंद के साम्राज्य में पहुंच जाएंगे। अद्वैत क्या है? एक सिर्फ भगवान ही हैं। बाकी सब भगवान के ही रूप हैं। भगवान के अलावा कहीं कुछ नहीं है। वही जन्मदाता हैं, वही कर्ता हैं, वही पोषक हैं और वही संहार भी करते हैं। ऋषियों ने कहा है- यह संसार माया जाल है। यह शरीर भी आपका साथ नहीं देता है। जब इसका समय पूरा हो जाता है तो वह आपका साथ छोड़ देता है। वह कहता है- अब मैं आपका साथ नहीं दे सकता। मेरा काम पूरा हो गया। अब आप इसे अपना शरीर नहीं कह सकते। ठीक ही तो है। यह शरीर हमें कुछ वर्षों के लिए मिला हुआ है। हम इसका इस्तेमाल चाहे जिस तरह करें। ईश्वर कुछ नहीं कहते। उन्होंने हमें स्वतंत्र इच्छा शक्ति दी है, इसलिए वे हस्तक्षेप बिल्कुल पसंद नहीं करते। लेकिन हमने अगर खुद को शरीर मान लिया तो हम मुश्किल में पड़ जाएंगे। क्योंकि यह सत्य नहीं है। हम शरीर नहीं आत्मा हैं। भगवत गीता में भगवान कृष्ण ने यह बात साफ- साफ कही है। हम शरीर नहीं हैं। हम हैं आत्मा। शुद्ध सच्चिदानंद के अंश हैं हम। लेकिन चूंकि जन्म जन्मांतर से हम खुद को शरीर मानते आए हैं, इसलिए खुद को आत्मा मानने में समय लगता है। जब तक हम स्वयं को शरीर मानते रहेंगे, इस दुनिया के प्रपंचों में फंसे रहेंगे। जिस दिन हमें महसूस होगा कि हम आत्मा हैं, उस दिन यह भी समझ में आ जाएगा कि यह दुनिया तो कुछ दिनों का बसेरा है। यहां हमें सबक सीखने के लिए भेजा जाता है। असली घर तो भगवान ही हैं। भगवान और भगवान का धाम। इसलिए क्यों न हम हमेशा उनमें रमे रहें। परमहंस योगानंदजी ने एक भजन लिखा है- प्रभु, क्या इस नींद से मुझे उठाओगे। इस स्वप्न से मुझे जगाओगे। तुमही में जीऊं, तुमही में मरूं, रहूं निरंतर तुमही में।....... कितना मधुर है यह भजन।

Saturday, October 23, 2010

हमारे कर्म हमारे साथ जाते हैं

विनय बिहारी सिंह


हम जो कुछ करते हैं उसका प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता रहता है। हमारी इच्छाएं, कामनाएं और चिंतन मृत्यु के बाद हमारे साथ जाते हैं। हमारा सूक्ष्म शरीर इसे आत्मा के साथ लिए जाता है और ठीक उसी वातावरण और परिवार में जन्म होता है जो हमारी कामनाओं और चिंतन से मेल खाता होता है। कहावत है कि हम जो कुछ कर रहे हैं वह ईश्वर नोट करते जा रहे हैं। हमारा भविष्य उसी कर्म पर निर्भर है। ठीक ही तो है। हमारे कर्म किसी बही- खाते में नोट नहीं होते लेकिन हमारे ही सूक्ष्म मस्तिष्क में संचित होते जाते हैं। जब हम शरीर छोड़ते हैं तो यह सब संचित कर्म हमारे साथ चिपक जाते हैं। मृत्यु के बाद सूक्ष्म लोक में यही संचित कर्म हमारी पहचान होते हैं। जो वाइब्रेशन हम लेकर जाते हैं, उसी के अनुसार हमें सूक्ष्म लोक में जगह मिलती है। फिर जन्म होता है। आदि शंकराचार्य ने कहा है- पुनरपि जन्मम, पुनरपि मरणम, जननी जठरे पुनरपि शयनम।। बार- बार जन्म, बार- बार मृत्यु। फिर वही वही दुख, पीड़ा, कष्ट चिंताएं और परेशानियां। मनुष्य योनि ही ऐसी है। या इससे अच्छा यह कहना होगा कि जीव योनि ही ऐसी है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है- अर्जुन, इस दुख रूपी संसार समुद्र से बाहर निकलो। ऋषियों ने भी कहा है- संसार में रहो, लेकिन संसार का हो कर मत रहो। तुम्हारा यह असली घर नहीं है। असली घर है- ईश्वर। वहां से स्ट्रांग कनेक्शन बना कर रहिए। फिर आप संसार में रहेंगे लेकिन बस अपने कर्तव्य करने भर के लिए। मन ईश्वर में रहेगा और शरीर संसार के कर्तव्यों को पूरा करता रहेगा। सब कुछ ईश्वर को सौंपते हुए आनंद से जीवनयापन करना इसी को तो कहते हैं। तेरा तुझको अर्पण, मेरा क्या लागे? हे ईश्वर यह शरीर, यह मन और यह आत्मा तुम्हारी ही है। मैं इसे तुझे ही सौंपता हूं। इस संसार का प्रपंच मेरी समझ से बाहर है। मैं संसार में अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाऊंगा, लेकिन मुझे असली चाहत तुम्हारी है। तुम, तुम, केवल तुम्ही मेरे परमप्रिय भगवान। प्रभु। मुझे स्वीकार करो। बस, इसी प्रार्थना को हृदय की गहराई से दुहराते रहने से काम बन जाएगा। फिर तो आनंद ही आनंद का साम्राज्य है।

Friday, October 22, 2010

लक्ष्मी पूजा

विनय बिहारी सिंह


आज कोलकाता में चारो तरफ लक्ष्मी पूजा का माहौल है। लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी हैं। भगवान क्षीर सागर में शेषनाग की शैय्या पर लेटे हुए हैं। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं। नाभि से कमल की नाल निकली है और नाल के सिरे पर कमल का फूल जिसमें ब्रह्मा जी बैठे हुए हैं। भगवान विष्णु के पांवों को मां लक्ष्मी दबा रही है। विष्णु भगवान के इस मनोहारी चित्र से हम सभी परिचित हैं। इसके अलावा- प्रार्थना करते समय हम सब कहते हैं- त्वमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव बंधुश्चसखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव। त्वमेव सर्वं ममदेव देव।।
इस श्लोक में द्रविणं त्वमेव। यानी हम भगवान से कह रहे हैं कि प्रभु, आप ही धन हैं। विष्णु भगवान के भक्तों का कहना है कि विष्णु जी की पूजा करने से ही लक्ष्मी की पूजा हो गई। उनका कहना है कि विष्णु के अवतारों- राम या कृष्ण की भी पूजा से यही फल मिलता है। आप भगवान कृष्ण की पूजा करेंगे तो वह लक्ष्मी जी को भी चला जाएगा। आखिरकार वे भगवान विष्णु की अर्धांगिनी हैं।
आज इसी लक्ष्मी जी की पूजा है। जिनके बिना मनुष्य खुद को लाचार पाता है। लक्मी जी ताकत हैं। शक्ति हैं। धन की देवी अगर प्रसन्न न हों तो क्या हालत होती है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। पाठ करते समय मां काली से कहा जाता है- यशम् देहि, धनं देहि।। इत्यादि। पश्चिम बंगाल में मां काली अनेक लोगों के लिए सर्वोच्च शक्ति हैं। अनंत ब्रह्मांडों की स्वामिनी हैं। क्योंकि वे भगवान शिव की पत्नी हैं। मां लक्ष्मी हम सभी को धन धान्य से पूर्ण करें।

Thursday, October 21, 2010

त्याग किसका करें

विनय बिहारी सिंह

गीता में अर्जुन ने भगवान कृष्ण से पूछा है कि त्याग क्या है? संन्यास क्या है? इसके उत्तर में भगवान ने कहा है- कर्तव्यों का त्याग उचित नहीं है। यग्य और दान का त्याग नहीं करना चाहिए। त्याग करना चाहिए अपनी बुरी प्रवृत्तियों का। यानी भय का त्याग, लोभ का त्याग, हिंसा का त्याग और अनावश्यक कामनाओं का त्याग। ऋषियों ने कहा है- यदि मनुष्य तामस और राजस गुणों को छोड़ सिर्फ सत्व गुण का सहारा ले तो उसे ईश्वर प्राप्ति हो जाएगी। ऐसे अनेक लोग हैं जो पूजा- पाठ और ध्यान का समय किसी व्यर्थ के काम में खर्च कर देते हैं। ध्यान या पूजा- पाठ का समय हो गया है, लेकिन यदि टेलीविजन पर कोई सीरियल आ रहा है तो वे ध्यान- पूजा छोड़ देंगे। कोई अच्छी चीज खाने को आ गई तो जल्दी से पूजा या ध्यान करके उठ जाते हैं। कई लोगों को ध्यान करना उबाऊ लगता है और वे यह समय गप हांकने में लगाते हैं। तो इन सब आदतों का त्याग करना चाहिए। कहा ही गया है कि किसी भी चीज की अति बुरी है। ठीक है कि आप दिन- रात पूजा- पाठ या ध्यान में नहीं बिता सकते। लेकिन जो समय आपने तय किया हुआ है, उसका पालन करना चाहिए। यदि आठ से नौ बजे रात तक आपने ध्यान या पूजा- पाठ करना तय किया है तो उसका ईमानदारी से पालन करना चाहिए। जिस समय चाहे जो करने का अभ्यास सुस्ती और लापरवाही का द्योतक है। आखिर आदमी को सिस्टमेटिक होना ही चाहिए। समयानुसार जब आप काम करने लगेंगे तो उसी में आपको आनंद आएगा। समय का पालन करना कई लोगों के लिए बोझ बन जाता है क्योंकि समय के अनुसार अपनी दिनचर्या ढालना उन्हें खराब लगता है। और ग्रहण क्या करें। ग्रहण करें प्रेम, ईश्वर का आशीर्वाद और धार्मिक ग्रंथ, अच्छा पौष्टक और स्वास्थ्यकर भोजन, स्वच्छ पानी, शुभेच्छाएं और शुभकामनाएं। आप मौन रह कर प्रेम की तरंगें जाने-अनजाने लोगों को भेज सकते हैं। क्योंकि जो वाइब्रेशन आप देते हैं, वही पाते हैं। जो बोएंगे, वही काटेंगे। मन में बस प्रेम भरिए और उसे संसार में छोडिए। यानी कल्पना कीजिए कि आपका प्रेम संसार के सभी लोगों के पास जा रहा है। बस वह प्रेम आपके पास लौट कर और ज्यादा मधुरता के साथ आएगा।