Monday, August 20, 2012

संत सूरदास की रचना

अंखियाँ हरि-दरसन की प्यासी।
 देख्यौ चाहति कमलनैन कौ, निसि-दिन रहति उदासी।।
 आए ऊधै फिरि गए आँगन, डारि गए गर फांसी।
 केसरि तिलक मोतिन की माला, वृन्दावन के बासी।।
काहू के मन को कोउ न जानत, लोगन के मन हांसी।
 सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौ, करवत लैहौं कासी।।

Monday, August 13, 2012

तुलसीदास के दोहे

बिना तेज के पुरूष अवशी अवज्ञा होय! आगि बुझे ज्यों रख की आप छुवे सब कोय!! तुलसी साथी विपत्ति के विद्या, विनय, विवेक! साहस सुकृति सुसत्याव्रत राम भरोसे एक!! काम क्रोध मद लोभ की जो लौ मन मैं खान! तौ लौ पंडित मूरखों तुलसी एक समान!! राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार! तुलसी भीतर बहारों जौ चाह्सी उजियार!! नाम राम को अंक है , सब साधन है सून! अंक गए कछु हाथ नही, अंक रहे दस गून!! प्रभु तरु पर, कपि डार पर ते, आपु समान! तुलसी कहूँ न राम से, साहिब सील निदान!! हरे चरहिं, तापाहं बरे, फरें पसारही हाथ! तुलसी स्वारथ मीत सब परमारथ रघुनाथ!!

Thursday, August 9, 2012

रहीम के दोहे

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय। रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अगाय॥ देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन। लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे नैन॥ अब रहीम मुसकिल परी, गाढ़े दोऊ काम। सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलैं न राम॥ गरज आपनी आप सों रहिमन कहीं न जाया। जैसे कुल की कुल वधू पर घर जात लजाया॥ छमा बड़न को चाहिये, छोटन को उत्पात। कह ‘रहीम’ हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥ तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान। कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥ खीरा को मुंह काटि के, मलियत लोन लगाय। रहिमन करुए मुखन को, चहियत इहै सजाय॥

Wednesday, August 8, 2012

रैदास के पद


प्रभु जी तुम संगति सरन तिहारी।जग-जीवन राम मुरारी॥ गली-गली को जल बहि आयो, सुरसरि जाय समायो। संगति के परताप महातम, नाम गंगोदक पायो॥ स्वाति बूँद बरसे फनि ऊपर, सोई विष होइ जाई। ओही बूँद कै मोती निपजै, संगति की अधिकाई॥ तुम चंदन हम रेंड बापुरे, निकट तुम्हारे आसा। संगति के परताप महातम, आवै बास सुबासा॥ जाति भी ओछी, करम भी ओछा, ओछा कसब हमारा। नीचे से प्रभु ऊँच कियो है, कहि 'रैदास चमारा॥

Friday, August 3, 2012

रहीम के दोहे


तन रहीम है कर्म बस, मन राखो ओहि ओर। जल में उल्टी नाव ज्यों, खैंचत गुन के जोर।।2।। अर्थ : कविवर रहीम कहते हैं कि अपना शरीर तो कर्म के फल के नियंत्रण में है पर मन को भगवान की भक्ति में लीन रखा जा सकता है। जैसे जल में उल्टी नाव को रस्सी से खींचा जाता है वैसे ही मन को भी खींचना चाहिए। रहिमन वहां न जाइये, जहां कपट को हेत। हम तन ढारत ढेकुली, संचित अपनी खेत।।3।। अर्थ: कविवर रहीम कहते हैं कि उस स्थान पर बिल्कुल न जायें जहां कपट होने की संभावना हो। कपटी आदमी हमारे शरीर के खून को पानी की तरह चूस कर अपना खेत जोतता है/अपना स्वार्थ सिद्ध करता है।

Wednesday, August 1, 2012

कबीर के पद


रहना नहीं देस बिराना है। यह संसार कागद की पुडि़या, बूँद पड़े घुल जाना है। यह संसार कॉंट की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है। यह संसार झाड़ और झॉंखर, आग लगे बरि जाना है। कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरू नाम ठिकाना है।

Tuesday, July 3, 2012


गुरु पूर्णिमा पर आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं। ईश्वर आप सबके जीवन में खुशियां लाएं।