मित्रों, मेरे एक प्रिय फेसबुक साथी विश्वजीत रोहिल ने अमीर खुसरो की यह रचना प्रस्तुत की है। मैं उनका आभारी हूं। परमहंस योगानंद जी ने खुसरो की रचनाओं की आध्यात्मिक व्याख्या की है। अमीर खुसरो गहरे आध्यात्मिक व्यक्ति थे। वे ईश्वर में ही सराबोर रहते थे। आइए उनकी रचना पढ़ें---
रैनी चढ़ी रसूल की सो रंग मौला के हाथ।
जिसके कपरे रंग दिए सो धन धन वाके भाग।।
खुसरो बाजी प्रेम की मैं खेलूँ पी के संग।
जीत गयी तो पिया मोरे हारी पी के संग।।
चकवा चकवी दो जने इन मत मारो कोय।
ये मारे करतार के रैन बिछोया होय।।
खुसरो ऐसी पीत कर जैसे हिन्दू जोय।
पूत पराए कारने जल जल कोयला होय।।
खुसरवा दर इश्क बाजी कम जि हिन्दू जन माबाश।
कज़ बराए मुर्दा मा सोज़द जान-ए-खेस रा।।
उज्जवल बरन अधीन तन एक चित्त दो ध्यान।
देखत में तो साधु है पर निपट पाप की खान।।
श्याम सेत गोरी लिए जनमत भई अनीत।
एक पल में फिर जात है जोगी काके मीत।।
पंखा होकर मैं डुली, साती तेरा चाव।
मुझ जलती का जनम गयो तेरे लेखन भाव।।
नदी किनारे मैं खड़ी सो पानी झिलमिल होय।
पी गोरी मैं साँवरी अब किस विध मिलना होय।।
साजन ये मत जानियो तोहे बिछड़त मोहे को चैन।
दिया जलत है रात में और जिया जलत बिन रैन।।
रैन बिना जग दुखी और दुखी चन्द्र बिन रैन।
तुम बिन साजन मैं दुखी और दुखी दरस बिन नैंन।।
अंगना तो परबत भयो, देहरी भई विदेस।
जा बाबुल घर आपने, मैं चली पिया के देस।।
आ साजन मोरे नयनन में, सो पलक ढाप तोहे दूँ।
न मैं देखूँ और न को, न तोहे देखन दूँ।
अपनी छवि बनाई के मैं तो पी के पास गई।
जब छवि देखी पीहू की सो अपनी भूल गई।।
खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय।
वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय।।
संतों की निंदा करे, रखे पर नारी से हेत।
वे नर ऐसे जाऐंगे, जैसे रणरेही का खेत।।
खुसरो सरीर सराय है क्यों सोवे सुख चैन।
कूच नगारा सांस का, बाजत है दिन रैन।।
Monday, October 31, 2011
Saturday, October 29, 2011
फलों के विभिन्न रंग और कब्ज
विनय बिहारी सिंह
घर से दफ्तर आते वक्त रास्ते में एक फल की दुकान पड़ती है जिसमें विदेशी फल बिकते हैं। वहां से गुजरते हुए तरह-तरह के सेब, नाशपाती, अंगूर, आलूबुखारा, ईरानी अंगूर, आस्ट्रेलिया का किवी देख कर अच्छा लगता है। कई बार सोच कर निकलता हूं कि आज कोई न कोई फल अवश्य लूंगा। लेकिन इतनी गहन व्यस्तता होती है कि कुछ भी खरीदने या किसी परिचित को फोन करने की सुधि नहीं रहती। आज एक खूबसूरत नाशपाती देखी। उस पर लाल आभा आ गई थी। यह सब लिखने का क्या अर्थ है? दरअसल आज एक जगह पढ़ा कि फल और सब्जियों का बहुतायत में सेवन से हमारा पेट स्वस्थ रहता है और मन शांत। आज पेट के रोगों पर काफी कुछ पढ़ने को मिला। सोचा आपको भी बताऊं क्या पढ़ा। लेकिन जब फलों की चर्चा चल पड़ी है तो सेब के स्वाद की भी चर्चा हो। मैंने जो अनुभव किया है, पहले उसे बताएं। सेब कई रंगों वाले होते हैं- लाल, गुलाबी, पीले, हरे, हरे-लाल मिक्स, पीले- हरे मिक्स और सफेद। इनके स्वाद में थोड़ा सा फर्क होता है लेकिन सेब का जो टिपिकल स्वाद होता है, वह तो सबमें ही रहता है। नाशपाती भी तरह तरह के होते हैं। लेकिन कुछ नाशपाती चबाने में चीमड़ होते हैं और कुछ चबाने में सुखद और स्वादिष्ट। आलूबुखारा आमतौर पर खट्टे ही होते हैं। कुछ लोग उसमें मधु मिला कर खाते हैं। क्योंकि यह कब्ज तोड़ता है। कब्ज के विशेषग्य बताते हैं कि कब्ज तोड़ने वाली सब्जी में लौकी का कोई जवाब नहीं। खासतौर से एकदम ताजा लौकी। लेकिन इसके साथ ईसबगोल की भूसी का सेवन जरूरी है। आयुर्वेद के डाक्टर कहते हैं- मुनक्का भिंगो कर दिन में रख दीजिए और रात को भोजन के पहले एक कप दूध के साथ उसका सेवन कीजिए। सुबह पेट साफ। इसके अलावा त्रिफला को पानी में मिला कर उसमें गाय का घी डाल कर पीने से भी फायदा होता है। इसके अलावा खजूर को एक चम्मच गाय के घी के साथ खाने पर भी कब्ज में काफी फायदा होता है। लेकिन खजूर का फल सूखा न हो। यदि सूखा है तो इसे भिंगो देना चाहिए। कब्ज से परेशान लोगों को सूखे फल नहीं खाने चाहिए। मिठाई और शर्बत से परहेज करना चाहिए।
Friday, October 28, 2011
काला राम का मंदिर
विनय बिहारी सिंह
नासिक के पंचवटी इलाके में घूमते हुए मुझे काला राम का मंदिर दिखा। पहले तो लगा किसी काला राम ने इसे बनवाया होगा। लेकिन मंदिर में गया तो पाया कि भगवान राम, लक्ष्मण और सीता जी की मूर्ति काले पत्थर से बनी है, इसीलिए इस मंदिर को काला राम का मंदिर कहा गया है। भगवान राम की मूर्ति का दर्शन कर नीचे उतरा तो सामने ही एक और मंदिर दिखा- हनुमान जी का। उसी कैंपस में। नजदीक गया तो पाया कि वह हनुमान जी का मंदिर है और हनुमान जी की मूर्ति भी काले पत्थर से ही बनी है। अच्छा लगा। जिस रंग में राम जी उसी रंग में हनुमान जी। मूर्ति सुंदर और जाग्रत लगी। भगवान राम के मंदिर में क्षण भर बैठ कर अच्छा लगा।
तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा किसी प्रसंग में लिखा है-
दीनदयाल विरद संभारी। हरहुं नाथ मम संकट भारी।।
अर्थात- हे राम, आप दीनदयाल हैं। दीनों की रक्षा करने वाले। मेरे ऊपर भारी संकट आया है। कृपया मुझे इस संकट से बचा लीजिए। इस संकट को हर लीजिए।
भगवान के भक्त इसीलिए तो कहते हैं- हरे राम, हरे राम, राम राम हरे हरे। हे भगवान राम, आप सारे दुखों, पाप-ताप का हरण करने वाले हैं। अब मैं आपकी शरण में आया हूं। फिर कोई गलती नहीं करूंगा। मेरे दुखों और संतापों का हरण कर लीजिए। आप तो शरणागत की रक्षा करते हैं। मैं आपकी शरण में हूं। रक्षा कीजिए भगवान, रक्षा कीजिए।
Thursday, October 27, 2011
दीपावली
विनय बिहारी सिंह
उम्मीद है आप सबकी दीपावली अच्छी बीती होगी। आप सबके जीवन में सुख और समृद्धि लगातार बढ़ती जाए। मां लक्ष्मी आपके ऊपर सदा कृपालु बनी रहें।
आज आफिस आ रहा था तो एक व्यक्ति की बात मेरे कानों में पड़ी। उसकी पीड़ा थी कि दीपावली प्रकाश का त्यौहार न हो कर अब शोरगुल का त्यौहार बन गया है। पश्चिम बंगाल में दीपावली को कालीपूजा के रूप में मनाते हैं। सार्वजनिक रूप से भी और व्यक्तिगत रूप से भी लोग मां काली की मूर्ति अस्थाई रूप से स्थापित करते हैं और विधिवत पूजा- अर्चना करते हैं। पूजा के समय ढाक बजता है। ढाक कैसा होता है, यह पश्चिम बंगाल के बाहर रहने वाले लोग शायद न समझ पाएं। इसलिए संक्षेप में इसकी चर्चा जरूरी है। एक बहुत बड़े ड्रम (वाद्य यंत्र) जैसा होता है ढाक। बीच में ढोलक जैसा कर्व। लेकिन ढोलक में एक तरफ का हिस्सा कुछ कम गोलाई लिए होता है। ढाक में दोनों तरफ के गोल हिस्से एक जैसे होते हैं। लेकिन चूंकि यह भारी होता है इसलिए इसे एक तरफ से ही बजाया जाता है। दोनों हाथों में दो लकड़ियों को पकड़ कर- ढम ढमा ढम बजाया जाता है। ढाक बजाने वाला एक नियत फीस लेकर दो या तीन दिन तक आपके पंडाल में ढाक बजाता है।
मेरे कैंपस में भी काली पूजा हो रही है। आधी रात के बाद भी ढाक बजता रहा और असंख्य पटाखे बजते रहे। कितना पैसा खर्च हुआ होगा? सोच कर चकित होता हूं। सारा कैंपस धुआं से भर गया था। प्रदूषण की हद टूट गई थी। लेकिन काफी तेज आवाज वाले पटाखे बजाने वालों का मन नहीं भर रहा था। बम जैसी आवाज वाले पटाखे लगातार ध्वनि और वायु प्रदूषण बढ़ाते जा रहे थे। हम सब कब इसके प्रति सचेत होंगे, भगवान जाने। सभी तो पढ़े- लिखे हैं। किसे क्या कहें? ऊपर से मां काली की मूर्ति के पास लाउडस्पीकर पर फिल्मी गाने बजाए जा रहे थे। बाद में किसी का ध्यान गया तो वहां मां काली की अराधना वाले गीत बजने लगे। मुझे उस व्यक्ति की पीड़ा का अहसास हुआ जो दीपावली को प्रकाश का नहीं ध्वनि प्रदूषण का पर्व बनता देख कर दुखी था।
यदि यह मां काली की पूजा है तो इसमें शोर का स्थान तो कहीं दिखता नहीं। मां काली की पूजा रात्रि के अंधकार में शांति में होती है। मां काली का रंग प्रतीकात्मक रूप से इसलिए काला दिखाया जाता है क्योंकि वे अंधेरे में प्रकाश स्वरूप हैं। तब फिर काली क्यों हैं? क्योंकि वे भक्तों को सहज नहीं दिखतीं। गहरे ध्यान के बाद प्रकट होती हैं। वे काली हैं यानी काल की स्वामिनी। ऐसी मां काली को असंख्य बार नमन। हे मां काली- सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया।।
Tuesday, October 25, 2011
विपश्यना केंद्र
विनय बिहारी सिंह
इगतपुरी में ही ६४ एकड़ में फैला विपासना केंद्र है। हम घूमते हुए वहां भी गए थे। वहीं एक बोर्ड पर लिखा था- सयाजी ऊ बा खिन- ने विपश्यना विद्या भारत भेजी थी। इगतपुरी का विपश्यना केंद्र बहुत ही आकर्षक और भव्य है। वहां एक पर्यटक ने बताया- इसे सत्यनारायण गोयनका जी संचालित करते हैं। यहां का पगोडा (ध्यान केंद्र) भी हम देखना चाहते थे। लेकिन हमें बताया गया कि वहां बाहरी लोगों को नहीं जाने दिया जाता। वहां लोग ध्यान कर रहे हैं। वहां के रिसेप्शन में बैठे व्यक्ति ने हमें पगोडा और विपश्यना संबंधी एक वीडियो दिखाया। इससे एक अंदाजा मिल गया कि यहां होता क्या है। अगले दिन हम गोदावरी नदी के किनारे बने नारोशंकर मंदिर में गए। वहां सुनहरे रंग का ७५० किलो का विशाल घंटा देख कर अच्छा लगा। यह साल में एक बार ही बजता है- शिवरात्रि के दिन। यह मंदिर भगवान शिव का है। इसके बाद हम श्री सीताराम गुफा में गए। कृत्रिम गुफा में किसी तरह घुसने की जगह है। अंदर भगवान राम, सीता और लक्ष्मण जी की सुंदर मूर्ति है। गर्भ स्थान में ही भगवान शिव का सुंदर सा शिवलिंग है।
देश का सबसे बड़ा शनि मंदिर है- शनिशिंगणापुर में। इसे श्री शनैश्वर देवस्थान कहते हैं। यहां लगभग सात फुट का एक काला पत्थर रखा हुआ है। यहां तेल और एक विशेष पौधे का पत्ता चढ़ाया जाता है। भक्त तेल को एक बेसिननुमा जगह पर चढ़ा देते हैं। वहां से मोटर के जरिए यह तेल शनिदेव को चढ़ा दिया जाता है। शनिदेव तक जाने की इजाजत किसी को भी नहीं है। वहां ध्यान और शनिमहिमा के पाठ के लिए अलग अलग स्थान हैं। इसके अलावा चढ़ावे के लिए पेड़ों का पैकेट भी एक काउंटर पर मिलता है। वहां शनिदेव पर केंद्रित साहित्य के लिए बुकस्टाल है। वहीं शनिदेव का फोटो और सीडी आदि मिलती है। हम सबने वहां पर्यटक के तौर पर सारी चीजें देखीं। किसी ग्रह का इतना बड़ा मंदिर मैंने अपने जीवन में पहली बार देखा। हम सब शनिदेव को प्रणाम कर आगे बढ़ गए। इसके पहले हम त्र्यंबकेश्वर और शिरडी के साईंबाबा का दर्शन कर चुके थे।
Monday, October 24, 2011
मैं देह नहीं, बुद्धि नहीं.......

विनय बिहारी सिंह
निश्चय ही मनुष्य शरीर नहीं है। वह मन, बुद्धि, अहं या चित्त भी नहीं है। सोचने की इसी प्रक्रिया को नेति- नेति कहते हैं। मैं शरीर नहीं हूं। मैं इंद्रियां नहीं हूं। मैं बुद्धि नहीं हूं। नेति- नेति। तो मैं क्या हूं? यानी मनुष्य क्या है? वह है शुद्ध आत्मा। ध्यान में इसी विचार को केंद्र में रख कर हम अपनी आत्मा को परमात्मा में मिला देते हैं। ध्यान की गहराई धीरे- धीरे आती है। एकदम से कोई चाहे कि गहरा ध्यान लग जाए तो यह संभव नहीं है। इसका पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ अभ्यास करना होता है। ईश्वर की कृपा से मैंने पिछले दिनों एक आध्यात्मिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया और खूब आनंद मिला। इस दौरान द्वादस शिवलिंगों में से एक त्र्यंबकेश्वर का दर्शन किया। फिर संयोग जुटा तो शिरडी के साईंबाबा के दिव्य मंदिर में भी गया और सोने के सिंहासन पर सोने के मुकुट से सुशोभित साईंबाबा की सुंदर मूर्ति देखी। साईंबाबा के मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर उनका भोजनालय है। आप फ्री में वहां से कूपन लीजिए और बैठ कर शुद्ध सात्विक भोजन कीजिए। साईंबाबा के भोजनालय के बाहर साईंबाबा की एक विशाल मूर्ति है जो एक बड़े हंडे से भोजन निकाल रही है। यानी इस भोजनालय में आप साईंबाबा का दिया भोजन कर रहे हैं। हमें सबसे पहले जलेबी दी गई। फिर पूड़ी। इसके बाद चावल, दाल और दो किस्म की सब्जी। जब हम भोजन कर रहे थे तो शाम के साढ़े पांच बज रहे थे। लेकिन चूंकि हमने दिन में भोजन नहीं किया था इसलिए शाम का यह भोजन बहुत स्वादिष्ट लग रहा था। भोजनालय में एक साथ ३००० (तीन हजार) लोग एक साथ भोजन कर सकते हैं। दोनों तरफ मेजें लगी हुई हैं और बीच में ट्राली में रखे व्यंजन लिए परोसने वाले सेवक आते हैं और आपको देते जाते हैं। शिरडी के साईंबाबा के दरबार में तृप्त होकर हमें फिर रात को भोजन करने की जरूरत नहीं महसूस हुई। रात को हम यूं ही फल फूल खा कर रह गए। त्र्यंबकेश्वर भगवान (भगवान शिव) का दर्शन अत्यंत सुखद था। मंदिर पुराना हो गया है। इसका जीर्णोद्धार अत्यंत आवश्यक है। नंदी वाला मंदिर की खिड़कियां टूट चुकी हैं। इस पर न तो पुरातत्व विभाग के लोग ध्यान दे रहे हैं और न ही मंदिर का प्रबंधन। एक अत्यंत बहुमूल्य धरोहर हमारे सामने जीर्ण- शीर्ण पड़ा हुआ है।
नासिक (महाराष्ट्र) के पास इगतपुरी नामक स्थान सुरम्य है। चारो तरफ से पहाड़ियों से घिरे योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया (संक्षेप में वाईएसएस) के इगतपुरी आश्रम में छह दिन तक आध्यात्मिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर सुख मिला। इस कार्यक्रम का नाम था- शरद संगम। इसमें परमहंस योगानंद जी के देश- विदेश के शिष्य एक जगह इकट्ठा होते हैं और विशेष रूप से आयोजित आध्यात्मिक कार्यक्रमों में सामूहिक रूप से हिस्सा लेते हैं। सभी एक साथ बैठ कर शांति और आनंद के साथ नाश्ता और भोजन करते हैं। कार्यक्रम यूं होता था- सुबह उठ कर शक्ति संचार व्यायाम और गहरा ध्यान। फिर आठ बजे जलपान। उसके बाद परमहंस योगानंद जी की शिक्षाओं को केंद्र में रख कर किसी आध्यात्मिक विषय पर अत्यंत ग्यानवर्द्धक प्रवचन। दिन के १२ बजे भोजन। फिर किसी विषय पर गहरी जानकारी देने वाला प्रवचन। शाम को चार बजे चाय। इसके बाद शक्ति संचार व्यायाम और गहरा ध्यान। रात के आठ बजे भोजन। फिर या तो भजन या वीडियो फिल्म जो आध्यात्मिक भूख को एक हद तक मिटाती है। इसी दौरान १७ अक्तूबर को क्रिया दीक्षा का कार्यक्रम था। स्वामी कृष्णानंद जी के माध्यम से अनेक लोगों को दीक्षा मिली।
शरद संगम में स्वामी कृष्णानंद, स्वामी ओंकारानंद और ब्रह्मचारी सदानंद जी के साथ बिताए सुखद दिन कभी नहीं भूलेंगे।
Tuesday, October 11, 2011
भगवान विष्णु के दस अवतार
विनय बिहारी सिंह
भगवान विष्णु ने दस रूपों में अवतार लिया था। इनमें से भगवान राम और कृष्ण के बारे में तो सभी जानते हैं। उनके दसों अवतारों के नाम इस प्रकार हैं- १-मत्स्य, २- कूर्म, ३- वराह, ४- वामन, ५- नृसिंह, ६- परशुराम, ७-राम,८-बुद्ध ९- कृष्ण, १०- कल्की। हर कथा अत्यंत रोचक है। आइए आज मत्स्य अवतार के बारे में चर्चा करें।
कथा है- एक बार द्रविड़ वंश के राजा सत्यव्रत जिन्हें बाद में मनु की पदवी मिली, नदी में स्नान कर रहे थे। अचानक उनकी अंजुरी में एक छोटी सी मछली आ गई। सत्यव्रत उसे फिर जल में रखने ही वाले थे कि मछली ने उनसे प्रार्थना की कि वे उसके जीवन की रक्षा करें और उसे किसी सुरक्षित स्थान पर ले चलें। सत्यव्रत या मनु ने मछली को एक कमंडलु में रख दिया और स्ना कर घर पहुंचे। घर पहुंच कर उन्होंने देखा कि मछली कमंडलु से बड़ी हो गई है। तब मछली ने आग्रह किया कि उसे किसी तालाब में रख दिया जाए। राजा ने उसे तालाब में रखवा दिया। लेकिन आश्चर्य, वह मछली तालाब से भी बड़ी हो गई। तब मछली ने आग्रह किया कि उसे नदी में रख दिया जाए। जब उसे नदी में रखा गया तो वह नदी से भी बड़ी हो गई। तब मछली ने आग्रह किया कि उसे समुद्र में रख दिया जाए। लेकिन आश्चर्य- जब उसे समुद्र में रखा गया तो वह समुद्र से भी बड़ी हो गई। तब मनु को समझ में आ गया कि यह मछली कोई सामान्य जीव नहीं है। उन्होंने आदर के साथ उसे प्रणाम किया और पूछा कि वे कौन हैं। तब भगवान विष्णु ने उन्हें अपना असली रूप दिखाया। मनु या सत्यव्रत ने पूछा कि इस अवतार का कारण क्या है भगवन। मछली रूप में भगवान ने कहा- आज से सात दिनों बाद प्रलय आएगा। तुम महत्वपूर्ण वनस्पतियों के बीज, औषधियां आदि इकट्ठा कर रखो। इस प्रलय में तुम्हारा बाल भी बांका नहीं होगा। तुम इसी समुद्र के किनारे आ जाना। तुम्हें एक नाव मिलेगी। उस पर सप्तऋषि बैठे होंगे। उन्हीं के साथ तुम भी अपने साथ लाए बीजों और औषधियों के साथ उस नाव पर बैठ जाना। तुम्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाया जाएगा। ठीक सात दिनों बाद प्रलय आया। सत्यव्रत या मनु भगवान द्वारा निर्देशित सामान के साथ समुद्र के किनारे खड़े हो गए। जहां वे खड़े हुए वहीं एक बड़ी सी नाव प्रकट हुई। उस पर सप्तऋषि बैठे हुए थे। सत्यव्रत अपने सामान के साथ उस पर बैठ गए और भगवान के लोक को चले गए। यह है मत्स्य अवतार की संक्षिप्त कथा।
(मित्रों, मैं कल यानी १२ अक्तूबर से २३ अक्तूबर तक योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया के महाराष्ट्र स्थित इगतपुरी में हो रहे शरद संगम में हिस्सा लेने जा रहा हूं। इस आनंददायी आयोजन से लौट कर आप से २४ अक्तूबर को भेंट होगी। तब तक आप पुराने पोस्ट पढ़ कर आनंद उठाएं।)
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