Saturday, July 23, 2011

पतित पावन सीताराम

विनय बिहारी सिंह



आज घर से आफिस आते हुए आदि शंकराचार्य का भजन- भज गोविंदम, भज गोविंदम, भज गोविंदम मूढ़मते...... और महात्मा गांधी का भजन- रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम।। अचानक याद आने लगे। फिर इन भजनों के अर्थ पर गहराई से सोचने लगा। ये दोनों भजन एक साथ क्यों याद आए, भगवान जाने। लेकिन याद आना बहुत अच्छा लगा। भगवान को पतित पावन कहा गया है। जो पतितों का भी उद्धार कर देते हैं। बशर्ते पतित व्यक्ति शपथ ले ले कि वह फिर कोई अपराध नहीं करेगा। आदि शंकराचार्य ने कहा है- ईश्वर की शरण में जाने पर सारा अंधकार, सारा कष्ट, सारे तनाव दूर हो जाते हैं। ईश्वर दरअसल जीव की प्रतीक्षा करते रहते हैं। कोई भी जीव संपूर्ण नहीं है। उससे गलतियां हो जाती हैं। लेकिन अगर मनुष्य अपनी गलतियां सुधारता रहे और भगवान से प्रार्थना करता रहे तो वे उसका जीवन सुखमय बना देते हैं। बस अपना हृदय उनके चरणों में रख देना होता है। ईश्वर तो सब जानते हैं। लेकिन कष्ट भोगते हुए भी कई लोग ईश्वर की याद नहीं करते। कष्ट मनुष्य के कर्मों का ही फल है। कष्ट ईश्वर के स्मरण के लिए आता है। ईश्वर से क्षमा मांगने के लिए आता है। अगर कष्ट झेल रहा मनुष्य कहे- प्रभु, अब और गलती नहीं करूंगा। मुझे क्षमा कर दें। ईश्वर परम दयालु हैं। वे तुरंत क्षमा कर देते हैं। लेकिन हां, ईश्वर से कहना पड़ता है। मां भी अपने बेटे को तब तक दूध नहीं पिलाती, जब तक वह रोता नहीं है। रोने का अर्थ है बच्चे को भूख लगी है। हम भी भगवान से प्रार्थना करें- प्रभु जो कुछ गलती मुझसे हुई है, क्षमा करें। मुझे सद्विचार प्रदान करें और हमारी रक्षा करें।

(मित्रों मैं आवश्यक काम से उत्तर प्रदेश जा रहा हूं। इसलिए आप सबसे मुलाकात एक हफ्ते बाद होगी)। तब तक कृपया उन पुराने लेखों को पढ़ें जो अत्यंत रोचक हैं)।

Friday, July 22, 2011

क्या खाएं कि हाई फाइबर मिले

विनय बिहारी सिंह



अब हर आदमी पहले की तुलना में स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा जागरूक है। यह सर्वविदित तथ्य है कि हाई फाइबर भोजन से पेट दुरुस्त रहता है। पेट दुरुस्त तो मन- मिजाज प्रसन्नचित्त।
हाई फाइबर वाले खाद्य पदार्थ कौन- कौन से हैं। मैं इसकी खोज करने गया तो पता चला कि इस लिस्ट में सबसे पहले आलूबुखारा है। कोलकाता में तो आलूबुखारा खूब मिलता है। लेकिन हर जगह तो नहीं मिलता। इसके अलावा आलूबुखारा खट्टा होता है। उसका व्यंजन तरीके से बनाया जाए तो अच्छा लगता है। बनाने का तरीका मुझे नहीं मालूम। इसलिए इस पर चर्चा न करें तो अच्छा है। लेकिन अन्य जिन चीजों में फाइबर होता है वे हैं- हरी सब्जियां, अनाज, जौ, मकई, छिलके सहित आलू, लगभग सभी ताजे और सूखे फल आदि। केला भी फाइबर वाला फल है। इसे खाने से पेट साफ होता है। लेकिन सुगर या रक्त शर्करा वाले मरीज इसे नहीं खा सकते। मैं ऐसे अनेक साधुओं को जानता हूं, जो रात को सिर्फ सूप या उबली सब्जी और फल खाते हैं। वे रात को स्टार्च आदि नहीं खाते। रोटी नहीं खाते। उनका कहना है कि इससे पेट स्वस्थ रहता है और अगले दिन आदमी चुस्त रहता है। मैंने एक- दो दिन रात को सिर्फ फल और उबली सब्जी खा कर देखा। सचमुच बहुत अच्छा लगता है। बंगाल में आटा बहुत ही महीन होता है। लगता है उसमें मैंदा मिला हुआ है। इसलिए उसकी रोटी तनिक चीमड़ हो जाती है। जबकि आटे में चोकर होना बहुत जरूरी है। चोकर आंतों को साफ करता है और उन्हें शक्तिशाली बनाता है। इसलिए भोजन में खूब तली- भुनी चीजें न खाकर, कम तेल- घी वाली चीजें खाना चाहिए। हरी सब्जियां, सलाद (जिसमें प्याज, टमाटर, गाजर आदि हो) , फल पर्याप्त मात्रा में खाने से पेट स्वस्थ रहता है और मनुष्य खुशहाल रहता है। सुबह उठ कर आधा नींबू निचोड़ कर पानी पीएं तो और भी अच्छा।

Thursday, July 21, 2011

प्लूटो के एक और चंद्रमा का पता चला

Courtesy- BBC Hindi service


हबल दूरबीन ने प्लूटो के चौथे चंद्रमा की पहचान की

खगोलशास्त्रियों ने हबल अंतरिक्ष दूरबीन की मदद से सौर मंडल के बौने ग्रह प्लूटो के एक और चंद्रमा की पहचान की है.

ये प्लूटो का चक्कर लगाने वाला चौथा प्राकृतिक उपग्रह है.

इससे पहले चेरन, निक्स और हाइड्रा की पहचान हो चुकी है.

वैज्ञानिक इस नए चंद्रमा को फ़िलहाल पी4 कह रहे हैं जिसका व्यास 13 से 34 किलोमीटर का बताया जा रहा है.

प्लूटो को 2006 में ग्रह से बौना ग्रह घोषित कर दिया गया था, लेकिन 2015 में ये एक बड़े अंतरिक्ष मिशन का लक्ष्य होगा.

अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का न्यू होराइज़न नामक खोजी यान इस बर्फ़ीले बौने ग्रह के पास से गुज़रेगा और उसके चंद्रमाओं को भी देखेगा.

न्यू होराइज़न के प्रमुख शोधकर्ता ऐलन स्टर्न ने इसे एक अभूतपूर्व खोज बताया है.

कोलोराडो के साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट के एलन स्टर्न कहते हैं, "अब हमें ये मालूम हो गया है कि प्लूटो का एक और चंद्रमा है तो हम अपनी उड़ान के दौरान उसे भी नज़दीक से देखेंगे".

अंतर

अब हमें ये मालूम हो गया है कि प्लूटो का एक और चंद्रमा है तो हम अपनी उड़ान के दौरान उसे भी नज़दीक से देखेंगे.

ऐलन स्टर्न, न्यू होराइज़न के प्रमुख शोधकर्ता

पी4 निक्स और हाइड्रा की कक्षाओं के बीच में स्थित है. निक्स और हाइड्रा की पहचान हबल दूरबीन ने 2005 में की थी.

जबकि चेरन की पहचान 1978 में अमरीकी नौसैनिक वेधशाला ने की थी.

अगर प्लूटो और उसके चंद्रमा चेरन के आकार की तुलना की जाए, तो दोनों में बड़ा अंतर नहीं है.

प्लूटो का व्यास 2,300 किलोमीटर का है जबकि चेरन का 1,200 किलोमीटर का. लेकिन निक्स और हाइड्रा छोटे हैं. निक्स का व्यास 30 किलोमीटर और हाइड्रा का 115 किलोमीटर है.

हबल दूरबीन ने पी4 को अपने नए वाइड फ़ील्ड कैमरा से पहली बार 28 जून को देखा था. जुलाई में उसके और पर्यवेक्षण होने के बाद उसके अस्तित्व की पुष्टि कर दी गई.

न्यू होराइज़न खोजी यान जुलाई 2015 में प्लूटो के पास से गुज़रेगा. उसके सात उपकरण प्लूटो की सतह की विशेषताओं, उसकी बनावट और वायुमंडल का विस्तृत नक्शा तैयार करेंगे.

ये यान प्लूटो से 10,000 किलोमीटर और चेरन से 27,000 किलोमीटर की दूरी तक जाएगा और उसके बाद आगे बढ़ जाएगा.

अगर नासा के पास और धन हुआ तो ये यान क्यूपर पट्टी में यात्रा करता रहेगा जहां सौर मंडल के निर्माण के बाद के कई अवशेष मौजूद हैं.

Wednesday, July 20, 2011

इस जीवन का अर्थ

विनय बिहारी सिंह




कल एक साधु ने कहा- जहां शरीर सुख प्रधान हो जाएगा, वहां भगवान के लिए जगह नहीं है। क्योंकि उस व्यक्ति के लिए शरीर ही सब कुछ हो जाएगा। शरीर को खाने, पीने और आराम देने में ही सारी जिंदगी बीत जाएगी। और एक दिन मृत्यु आ जाएगी। मन हमेशा शरीर सुख के बारे में ही सोचता रहेगा। ऋषियों ने कहा है- यह संसार द्वैत से बना है- सुख- दुख, रात- दिन और लाभ- हानि आदि। जहां द्वैत होगा, वहां अखंड आनंद हो ही नहीं सकता। मनुष्य ज्यादातर सब कांसश या कांसश स्थिति में रहता है। सुपर कांसश में बहुत कम लोग जाते हैं। जो सुपर कांसश में रहता है, वही सबसे सुखी है। ऋषियों ने कहा है- सुपर कांशस में रहना यानी गहरे ध्यान में डूबना। साथ ही यह मानना कि भगवान ही सब कुछ है। मनुष्य या सारे जीव उसकी कठपुतली हैं। वह जैसे नचाता है, हम नाचते हैं। हमारा इस संसार में किसी चीज पर वश नहीं है। यह मानते हुए ईश्वर की शरण में जाना, सबसे सुरक्षित और आनंददायी काम है। अगर हम खुद को कर्ता मान लेंगे तो फिर प्रपंच हमारा पीछा नहीं छोड़ेंगे। स्वयं को कर्तापन से दूर रख कर, यह सोच कि यह भगवान का काम है, आनंददायी है।

Tuesday, July 19, 2011

दो काम एक साथ नहीं हो सकते

विनय बिहारी सिंह



तुलसीदास ने रामचरित मानस में कहा है कि दो काम एक साथ नहीं हो सकते- ठहाका लगा कर हंसना और गाल फुलाना (हंसबि ठठाइ, फुलाइब गालू)। ऋषि पातंजलि ने कहा है- संसार में आसक्ति और ईश्वर में आसक्ति, एक साथ संभव नहीं है। तो क्या संसार छोड़ दें? नहीं, बिल्कुल नहीं। परमहंस योगानंद जी ने कहा है- संसार में रहिए, लेकिन संसार का होकर मत रहिए। यानी- संसार में आसक्ति से बचिए। ऐसे अनेक लोग हैं जो सुबह से लेकर शाम तक अनावश्यक रूप से दूसरे व्यक्तियों के बारे में सोचते रहते हैं और उन्हीं के बारे में बातें करते रहते हैं। परनिंदा रस यानी दूसरों की निंदा का रस लेते रहते हैं। हालांकि यह कोई रस या आनंद नहीं है। लेकिन उनके लिए यही रस है। सुबह नींद से जगने से लेकर रात सोने तक यही काम। उनके लिए ईश्वर का स्मरण व्यर्थ काम है। वे मानते हैं कि ईश्वर पता नहीं हैं भी कि नहीं। पहले परनिंदा रस ले लें। तो उनके जीवन का लक्ष्य है- खाओ, पीयो और जो जी में आए करो। बूढ़े हो जाओ और मर जाओ। तो जीवन का उद्देश्य क्या है? मनुष्य जीवन तो इसलिए मिला है कि हम अपने असली घर के बारे में जानें। हमारा असली घर कहां है? परमहंस योगानंद जी ने कहा है- हमारा असली घर ईश्वर के पास है। हम जितना ईश्वर से प्यार करेंगे, वे हमसे उतनी ही बातचीत ज्यादा करेंगे। उतनी देर हम संसार से कटे रहते हैं। यह जरूरी भी है। जब हम ईश्वर का ध्यान करें तो ईश्वर में डूबे रहें। जब हम संसार का काम करें तो ईश्वर का काम कर रहे हैं, यह अनुभूति हो। तब जाकर २४ घंटे हम ईश्वर में रह पाएंगे।

Thursday, July 14, 2011

मैत्रेयी

विनय बिहारी सिंह


मैत्रेयी ऋषि याग्यवल्क्य की द्वितीय पत्नी थीं। (यहां पत्नियां प्रतीक हैं। मैत्रेयी- ग्यान और कात्यायनी- भक्ति की प्रतीक। कृपया इसे सांसारिक अर्थ में न लें।)। जब ऋषि हमेशा के लिए घर परिवार छोड़ कर तप करने वन में जाने लगे तो उन्होंने अपनी संपत्ति द्वितीय पत्नी मैत्रेयी और पहली पत्नी कात्यायनी में बांटना चाहा। तब मैत्रेयी ने पति से पूछा- क्या आपकी संपत्ति से मोक्ष प्राप्त हो सकता है? ऋषि ने उत्तर दिया- नहीं। मोक्ष खरीदा नहीं जा सकता। तब मैत्रेयी ने कहा- तो फिर इस धन की कोई औकात नहीं है। आप तो मुझे वह धन दीजिए जिससे मोक्ष प्राप्त हो जाए। ऋषि ने कहा- इसके लिए तप करना होगा। मैत्रेयी ने कहा- स्वीकार है। वे ऋषि के साथ वन में गईं। याग्यवल्क्य के साथ उन्होंने सन्यास की दीक्षा ली और दोनों तप, ध्यान और साधना के लिए अलग- अलग हो गए। कात्यायनी ने भी वही रास्ता अपनाया। इन तीनों विभूतियों को आज भी श्रद्धा से याद किया जाता है। अनेक लोग सुख के दिनों में ईश्वर को भूल जाते हैं। लेकिन जब जीवन में कष्ट आता है तो भगवान याद आते हैं। ऋषियों ने कहा है- जो सुख- दुख, लाभ- हानि यानी हर परिस्थिति में ईश्वर को जोर से पकड़े रखता है, वह सुखी रहता है। क्योंकि यह संसार उनका है। वही इसके मालिक हैं। मनुष्य का इस संसार में है ही क्या? तो क्यों न इस संसार के स्वामी की शरण में जाएं? वहां प्रेम है, आनंद है, सर्वोच्च सुख है और सबसे बढ़ कर सदा के लिए सुरक्षा है। बस अपनी इंद्रिय, मन, बुद्धि और आत्मा उन्हें समर्पित कर देना है।
(मित्रों, मैं गुरु पूर्णिमा (१५ जुलाई) के अवसर पर एक आनंददायी धार्मिक अनुष्ठान में हिस्सा लेने जा रहा हूं। अगली भेंट चार दिन बाद होगी। क्योंकि इस बीच इस ब्लाग पर लिखने का समय नहीं मिलेगा। )

Wednesday, July 13, 2011

मन

विनय बिहारी सिंह



सारे साधु- संतों और धार्मिक ग्रंथों ने मन के नियंत्रण पर बहुत जोर दिया है। कबीरदास ने तो जगह- जगह मन से सावधान किया है। जैसे-१- माया मरी न मन मरा, मर मर गया शरीर......२- मन ना रंगाय, रंगाय जोगी कपड़ा....... आदि। ग्रंथों में लिखा है- मन एव मनुष्याणां, कारणं बंध, मोक्षयो।।.... यानी मनुष्य का मन ही उसके बंधन और मोक्ष का कारण है। भगवत गीता में अर्जुन ने कहा है- यह मन बड़ा चंचल और प्रमथन करने वाला है। इसे रोकना वायु को रोकने जैसा दुष्कर है। यानी सारी खुराफात की जड़ यह मन ही है। मन यह कहता है, वह कहता है और बहुत कुछ चाहता है। और जितना ही हम उसकी बातें सुनते और उसका पालन करते हैं, उसकी चाहत और बढ़ जाती है। मन ऐसा ताकतवर है- जो हमेशा दौड़ता और कामना करता रहता है। इसीलिए प्राचीन काल में हर गुरु अपने शिष्य से कहता था- तुम्हें खुद से सावधान रहना है। मनुष्य अपना मित्र है और अपना ही शत्रु भी है। यदि मन नियंत्रित हो गया तो वह मित्र है और यदि अनियंत्रित ही रहा तो वह शत्रु है। क्योंकि उसकी भूख कभी मिटती नहीं है। इसीलिए पुराने जमाने के साधु-संत सादा जीवन बिताते थे। एक लंगोट पहन ली या एक छोटी सी लुंगी और अधकटी कुर्ता। जाड़े में एक मोटी चादर या कंबल। बस काम चल गया। कुछ मिला तो खा लिया नहीं तो भर पेट पानी पी लिया। लेकिन साधना में, ध्यान में या जप आदि में कोई कमी नहीं। बल्कि और चाव और गहरी श्रद्धा से साधना करते थे। वे अपने शिष्यों को भी यही सलाह देते थे कि यह मनुष्य शरीर बार- बार इसीलिए मिलता है कि हमारी कुछ अधूरी इच्छाएं रह गई हैं। फिर इस जन्म में नई इच्छाएं पैदा होंगी। इसलिए सावधान। मन को नियंत्रित करो। सिर्फ एक ही इच्छा हो- भगवान को कैसे पाएं। भगवान तो सब जगह है लेकिन हमारा मन इतना अस्थिर है कि वह दिखता और महसूस नहीं होता। मन स्थिर करो और भगवान में ही रम जाओ। फिर तो जो ईश्वरीय सुख मिलेगा, वह संसार के किसी भी सुख से अनंत गुना ज्यादा होगा।