Saturday, February 26, 2011

शरीर से पार जाना


विनय बिहारी सिंह


परमहंस योगानंद जी ने कहा है कि आप शरीर नहीं हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है- जिस तरह वस्त्र पुराना होने पर मनुष्य नया वस्त्र पहनता है। ठीक उसी तरह यह शरीर पुराना हो जाने पर आत्मा इसे छोड़ देती है और नया शरीर (नया जन्म) धारण करती है। आदि शंकराचार्य ने कहा है- पुनरपि जन्मम पुनरपि मरणम, जननी जठरे पुनरपि शयनम।। बार- बार जन्म लेना और बार- बार मरना। सांसारिक प्रपंचों और दुखों में पड़ना। भगवान ने अर्जुन से कहा है- इस संसार रूपी दुख के समुद्र से बाहर निकलो। भगवान की शरण में जाओ, उन्हीं के बारे में सोचो, उन्हें ही जीवन का ध्रुवतारा बना लो। इसीलिए साधक को शरीर के पार जाना चाहिए। कैसे? यह मानना चाहिए कि वह शरीर नहीं है। आखिरकार उसे इस शरीर को इसी दुनिया में छोड़ देना पड़ेगा। परिवार के लोग इसे जला कर राख कर देंगे। हम तो आत्मा हैं। तुलसीदास ने लिखा है- ईश्वर अंश जीव अविनाशी। मनुष्य ईश्वर का ही अंश है। लेकिन अपनी भोगेच्छा के कारण इस संसार में बार- बार आता है और यहां की गंदगी में फिर कराहता है। जिस दिन उसे यह महसूस हो जाता है कि यह संसार मिथ्या है। यहां उसे प्यार करने वाला कोई नहीं। सब किसी न किसी स्वार्थ के कारण उससे जुड़े हुए हैं। वह भी किसी न किसी स्वार्थ के कारण अन्य लोगों से जुड़ा हुआ है। तब उसे भगवान की याद आती है। वह समझ जाता है कि उसके असली प्रेमी तो भगवान ही हैं। असली माता, पिता, मित्र और हितैषी तो भगवान ही हैं। तब वह भगवान की तरफ मुड़ता है। भगवान से नाता जोड़ लेने के बाद फिर उसे इस संसार के दुख नहीं व्यापते।

Wednesday, February 23, 2011

कर्ता आप नहीं हैं



विनय बिहारी सिंह


परमहंस योगानंद जी ने कहा है- यह सोचना कि आप कर्ता हैं, भ्रम है। असली कर्ता तो भगवान हैं। वे ही आपके माध्यम से काम करा रहे हैं। बांग्ला भाषा में एक भक्ति गीत है- तुमार काज तुमी करो, लोके बोले करी आमी (तुम्हारा काम तुम करती है और लोग कहते हैं कि मैं करता हूं)। यह गीत मां काली के लिए गाया जाता है। पश्चिम बंगाल में यह गीत बहुत ही लोकप्रिय है। कर्ता हम नहीं हैं। जिनका यह संसार है, वही इसके कर्ता हैं। दिन और रात वही कराते हैं। इस संसार में मनुष्य को इसलिए भेजा गया है कि वह ईश्वर में लीन हो। लेकिन हम तो माया के प्रपंच में ऐसे पड़े रहते हैं कि अपने भीतर झांकने का मौका नहीं मिलता। भीतर कितनी गंदगी या कचरा है, इसे देखना भी रोचक अनुभव है। आप ईश्वर की अराधना करते हैं तो अचानक आपके दिमाग में कोई और बात आ जाती है या कोई काम याद आने लगता है। आप हैरान रह जाते हैं कि यह क्या मैं पूजा कर रहा हूं या ध्यान कर रहा हूं और अचानक कोई अन्य बात कैसे दिमाग में आ गई। इसका अर्थ है आपका दिमाग आपके वश में नहीं है। वह आपके ऊपर हावी हो गया है। आप परतंत्र हो गए हैं। दिमाग को वश में कैसे करें? इसका एक मात्र उपाय है अभ्यास। बार- बार अभ्यास करने से आपका दिमाग उधर ही जाएगा, जिधर आप चाहेंगे। नियंत्रित मन ही ईश्वर में लीन होता है। अनियंत्रित मन तो जहां- तहां भागता रहता है। ऋषियों ने कहा है- यदि ईश्वर से नाता जोड़ा जाए तो- सर्व दुख निवृत्ति और परमानंद प्राप्ति हो जाती है। ईश्वर से संपर्क कैसे होगा? ऋषियों ने कहा है - परम भक्ति से। अपना दिल और दिमाग भगवान को समर्पित कर दीजिए। बस आपका काम हो जाएगा।

Monday, February 21, 2011

संत वामा खेपा




विनय बिहारी सिंह


पश्चिम बंगाल में संत वामा खेपा का नाम घर- घर में जाना जाता है। वे तारापीठ के सिद्ध संत थे। लेकिन शुरू में मंदिर के पुजारी उनका महत्व नहीं जानते थे। वे मां तारा (मां काली का ही एक रूप) के अनन्य भक्त थे। एक बार वे उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में जाना चाहते थे। लेकिन मां तारा ने उन्हें अनुमति नहीं दी। उन्होंने मां तारा की मूर्ति के सामने खड़े हो कर कहा- मां, मैं वाराणसी जा रहा हूं। मां तारा का मौन उत्तर नहीं आया। तब भी उन्होंने कहा- मां, एक बार जा रहा हूं वाराणसी। मां की ओर से कोई उत्तर न मिलने के बावजूद वे वाराणसी चले गए। वहां उन्हें भोजन नहीं मिला। मंदिरों में दर्शन के बाद वे तारापीठ वापस चले आए। वहां मंदिर में भोग की सामग्री रखी थी। मां तारा को भोग लगने वाला था। तभी वाराणसी से लौट कर संत वामा खेपा वहां गए। देखा कि स्वादिष्ट भोग व मिठाइयां रखी हुई हैं। वे वहां बैठ गए और बोले- मां, तुम्हारी बात नहीं मानी, शायद इसीलिए मुझे वाराणसी में भोजन नहीं मिला। अब मैं वहां नहीं जाऊंगा। मुझे भूख लगी है। ये भोग मैं खाता हूं मां। वे भोग खाने लगे। तभी पुजारी आए और उन्हें मारा- पीटा। वे वहां से हट गए और कहा- मां, मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी, इसीलिए तुमने मुझे इन लोगों के माध्यम से पीट दिया। अब गलती नहीं करूंगा मां। लेकिन धीरे- धीरे इस संत की ख्याति बढ़ने लगी। सभी जान गए कि वे उच्चकोटि के संत हैं। वे दिन- रात मां तारा की शरण में पड़े रहते थे। एक स्थिति यह आ गई कि संत वामा खेपा का जूठन खाने के लिए लोग तरसने लगे। मां तारा को चढ़ाई गई उच्चकोटि की मिठाइयां उन्हें खाने को दी जातीं। वे कुछ खाते तो कुछ छोड़ देते थे। छोड़ी हुई चीज लोगों के लिए प्रसाद बन जाती थी। उसे पाने की होड़ लग जाती थी। लेकिन ऐसा मौका बहुत कम आता था। आमतौर पर वामाखेपा लोगों से दूर रहते थे। वे कभी- कभी ही लोगों को उपलब्ध होते थे। देश के विभिन्न हिस्सों से जो संत उनसे मिलने आते थे, उनका कहना था कि वामाखेपा दिन- रात निर्विकल्प समाधि में रहते हैं।

Saturday, February 19, 2011

सोच नकारात्मक तो दवा का असर नहीं

वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क उस हिस्से की जानकारी भी हासिल की जो इस असर को नियंत्रित करता है.

वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन के मुताबिक मरीज़ अगर यह मान लें कि दवा असर नहीं करेगी तो दर्द निवारक दवाओं का असर वाकई कम हो जाता है.

'साइंस ट्रांज़िशनल मेडिसिन' में छपे इस अध्ययन के मुताबिक वैज्ञानिकों ने इसके लिए ज़िम्मेदार मस्तिष्क के एक खास हिस्से की पहचान भी की है.

वैज्ञानिकों के दल का मानना है कि यह अध्ययन उन प्रयोगों को बेमानी साबित करता है जो पूरी तरह प्रयोगशाला पर आधारित होते हैं और इंसान के मनोविज्ञान को ध्यान में नहीं रखते.

वैज्ञानिकों के मुताबिक इस अध्ययन का असर मरीज़ों की चिकित्सीय देखरेख और नई दवाओं की खोज पर पड़ सकता है.

अध्ययन के तहत लंबे समय से दर्द से पीड़ित मरीज़ों को बताकर और उनकी जानकारी के बिना दर्द निवारक दवाएं दी गईं. कई मरीज़ों ने अपने मनोवैज्ञानिक अनुभव के आधार पर दवाएं न दिए जाने की स्थिति में भी दर्द कम होने और दवाएं दिए जाने की स्थिति में भी दर्द की शिकायत की.

वैज्ञानिकों के अनुसार यह दिखाता है कि जिन लोगों पर बहुत समय से दवाएं बेअसर रही हैं उनके नकारात्मक अनुभव दवाओं के प्रभाव पर असर डालते हैं.

मस्तिष्क की स्कैन के ज़रिए वैज्ञानिकों ने उस हिस्से की जानकारी भी हासिल की जो इस असर को नियंत्रित करता है.

अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों के दल का मानना है कि यह अध्ययन उन प्रयोगों को बेमानी साबित करता है जो पूरी तरह प्रयोगशाला पर आधारित होते हैं और इंसान के मनोविज्ञान को ध्यान में नहीं रखते.

(Courtesy- BBC Hindi service.)

Friday, February 18, 2011

जप कैसे करें- भाग २


विनय बिहारी सिंह


विद्वानों का कहना है कि जप करते समय एक- एक मनका को यह समझ कर फेरना चाहिए कि मैं अपने इष्ट के और करीब पहुंच रहा हूं। उनकी कृपा और ज्यादा बरस रही है। उनके प्रकाश में मैं सराबोर हो रहा हूं। इसके अलावा हृदय में गहरी पुकार होनी चाहिए। जैसे- मान लीजिए कि आप राम, राम का जप कर रहे हैं। तो हर बार राम कहते हुए आप कल्पना में खुद को राम के चरणों में बैठा महसूस करें। भगवान राम के स्पर्श का काल्पनिक अनुभव करें। धीरे- धीरे आप उनमें डूब जाएंगे। मैंने मां दुर्गा के एक भक्त को देखा है। वे जप करते हैं- जय मां, जय मां, जय मां। जप करते हुए एक समय ऐसा आता है कि वे रोने लगते हैं। जप बंद हो जाता है। बस मां दुर्गा की मूर्ति की तरफ देख रहे हैं और रो रहे हैं। फिर थोड़ी देर बाद उनकी आंखें बंद हो जाती हैं। रोना भी बंद हो जाता है। वे अचल बैठ जाते हैं। मानो उनका शरीर काठ हो गया हो। वे जैसे समाधि में चले जाते हैं। बहुत देर बाद आंखें खोलते हैं तो जैसे वे नशे में डूबे हों उस तरह दिखते हैं। यह नशा होता है दिव्य आनंद का। जगन्माता के प्रेम का।
कई भक्त माला का जप नहीं करते। वे लोग मन ही मन जप करते हैं। मन हृदय स्थान पर रहता है। ऐसे भी अनेक लोग हैं जो दिन में पांच- छह बार पांच- पांच मिनट का ही सही ध्यान या जप नहीं करते तो उनको चैन नहीं मिलता। जैसे- जप या ध्यान उन्हें खींच रहा हो। वे ठीक समय पर पांच मिनट के लिए ही सही, बैठ जाते हैं। जो ध्यान नहीं करते, वे आंखें बंद कर मन ही मन जप करते हैं। ऐसे लोग एकांत खोजते रहते हैं ताकि जप में कोई बाधा न पहुंचे। या कोई इस पर अनावश्यक टीका- टिप्पणी न करे। और ऐसा होना भी चाहिए। रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि भगवान के प्रति अपनी भक्ति को सबके सामने प्रकट न करो। गुप्त रूप से मन ही मन उनकी अराधना करते रहो। वे तो सर्वव्यापी हैं। तुम्हारे हृदय में ही मौजूद हैं। वे जानते हैं कि तुम्हारे मन में क्या है।

Thursday, February 17, 2011

जप करने का तरीका



विनय बिहारी सिंह

विद्वानों ने कहा है कि जप करने का सही तरीका जानना बहुत आवश्यक है। हालांकि भगवान का नाम आप चाहे जैसे जपें, वे प्रसन्न होते हैं। भोजन आप खड़े होकर करें तो भी पेट ही में जाएगा और बैठ कर आराम से खाएं तो भी पेट ही में जाएगा। लेकिन बैठ कर भोजन का आनंद ही कुछ और है। ठीक इसी तरह मंत्र का एक खास तरीका अच्छा माना जाता है। इसी तरह मालाएं भी कैसी हों, यह जानकारी हो तो अच्छा है। जानकार बताते हैं कि भगवान शिव के नाम जप के लिए रुद्राक्ष की माला उत्कृष्ट मानी जाती है। भगवान विष्णु (राम, कृष्ण) के नाम जप के लिए तुलसी की माला से जप उत्तम माना जाता है। एक आदमी दिन भर में २१, ६०० बार श्वांस लेता है। यदि इसमें से आधी श्वांस यानी १०, ८०० श्वांस सांसारिक कामों में खर्च हो जाती है तो कम से कम आधी श्वांस यानी बाकी १०, ८०० श्वांस को ईश्वर के नाम जप में खर्च करनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि १०८ मनकों वाली माला से १०० बार नाम जप किया जाए तो अपने साथ न्याय होगा। आधी श्वांस मात्रा संसार के लिए और आधी श्वांस मात्रा भगवान के लिए। आखिर भगवान ने ही तो हमें जीने का मौका दिया है। भगवान ने यह भी मौका दिया है कि हम उनसे जप, ध्यान और पूजा- पाठ के माध्यम से संपर्क कर सकें और इस संपर्क से उपजे आनंद में सराबोर हो सकें।

Tuesday, February 15, 2011

भगवान की सर्वत्रता


विनय बिहारी सिंह

एक भक्त ने सन्यासी से पूछा- भगवान की सर्वत्रता कैसे महसूस की जा सकती है? सन्यासी ने उत्तर दिया- जैसे आकाश सर्वत्र है, हवा सर्वत्र है, उसी तरह ईश्वर सर्वत्र हैं। भक्त ने कहा- इसे महसूस कैसे करें? सन्यासी ने कहा- जब भी आप सांस लें, महसूस करें कि यह भगवान ही हैं जो मेरे फेफड़ों में जा रहे हैं और हमारा प्राण बचा रहे हैं। लेकिन एक स्थिति होती है जब आप श्वांस नहीं लेते, फिर भी जीवित रहते हैं। ऐसा योगी करते हैं। उनकी प्राण रक्षा भी भगवान ही करते हैं। यानी श्वांस में भी तुम्हीं हो और बिना श्वांस के भी तुम्हीं हो। तुम बिन और न कोई। सिर्फ एक भगवान से ही समूची सृष्टि पैदा हुई है और उन्हीं में लय होती है। मनुष्य तो कुछ नहीं है। भगवान जब तक इच्छा होती है, मनुष्य के फेफड़ों में श्वांस रखते हैं और जब समय पूरा हो जाता है तो उसे वापस बुला लेते हैं। जिसने जन्म लिया है, उसका मरना तय है। लेकिन कई लोग समझते हैं कि यह जीवन उन्हें सदा के लिए मिल गया है। वे तमाम तरह के तनाव लेकर जीते हैं। सिर धुनते रहते हैं। अंत में अपनी देह छोड़ कर चले जाते हैं, फिर दूसरा जन्म लेने। दूसरे शरीर, नाम, कुल आदि धारण करने। फिर नई समस्याएं, नए तनाव। संतों ने कहा है- आप ईश्वर की शरण में रहिए। तब आप शांति और सुख का अनुभव करेंगे। हरि शरणम, हरि शरणम। वही सत्य हैं। वही हमारे अपने हैं। लेकिन हम भगवान को छोड़ कर न जाने किस- किस चीज के पीछे भागते हैं। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है- हे अर्जुन, इस संसार रूपी दुख के समुद्र से निकलो। यानी संसार दुखों की खान है। जो लोग संसार में सुख ढूंढ़ते हैं, उन्हें इसलिए निराशा होती है कि यहां तो सुख है ही नहीं तो मिलेगा कहां से? सुख तो भगवान में है।