Monday, August 2, 2010

मित्रों

यह सुखद टिप्पणी मुझे स्वामी कृष्णानंद जी से मिली है। उनके इस स्नेह ने मुझे आनंद से भर दिया है। इसे आप भी पढ़ें-

Why do we light a lamp?


In almost every Indian home a lamp is lit daily before the altar of the Lord. In some houses it is lit at dawn, in some, twice a day – at dawn and dusk – and in a few it is maintained continuously (akhanda deepa). All auspicious functions commence with the lighting of the lamp, which is often maintained right through the occasion.

Light symbolizes knowledge, and darkness, ignorance. The Lord is the "Knowledge Principle" (chaitanya) who is the source, the enlivener and the illuminator of all knowledge. Hence light is worshiped as the Lord himself.

Knowledge removes ignorance just as light removes darkness. Also knowledge is a lasting inner wealth by which all outer achievement can be accomplished. Hence we light the lamp to bow down to knowledge as the greatest of all forms of wealth

Why not light a bulb or tube light? That too would remove darkness. But the traditional oil lamp has a further spiritual significance. The oil or ghee in the lamp symbolizes our vaasanas or negative tendencies and the wick, the ego. When lit by spiritual knowledge, the vaasanas get slowly exhausted and the ego too finally perishes. The flame of a lamp always burns upwards. Similarly we should acquire such knowledge as to take us towards higher ideals.

Whilst lighting the lamp we thus pray:


Deepajyothi parabrahma

Deepa sarva tamopahaha

Deepena saadhyate saram

Sandhyaa deepo namostute


I prostrate to the dawn/dusk lamp; whose light is the Knowledge Principle (the Supreme Lord), which removes the darkness of ignorance and by which all can be achieved in life.

Saturday, July 31, 2010

भगवान शिव ने जब भक्त को दीक्षा दी

विनय बिहारी सिंह


भगवान का एक अनन्य भक्त दिन रात प्रार्थना करता रहता था- हे भगवान दर्शन दीजिए। अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकता। आपके दर्शन बिना एक- एक क्षण कष्टकारी लगता है। दर्शन दीजिए भगवान, कृपा करके दर्शन दीजिए। उस भक्त का दिल और दिमाग भगवान शिव की भक्ति से ओतप्रोत था। उसके बाल भगवान शिव की जटा की तरह हो गए थे। सोने से पहले वह कहता था- भगवान, अगर नींद आ जाएगी तो यह मत समझिए कि मैं आपसे दूर हूं। मेरी नींद भी आप ही हैं। इसलिए मैं आपकी गोद में ही सो रहा हूं। क्या गजब की भक्ति थी। एक बार वह केदारनाथ और बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा पर गया। उस जमाने में साधनों की कमी थी। दुर्गम पहाड़ी रास्ता। वह चलता जा रहा था और ओम नमः शिवाय का जाप करता जा रहा था। केदारनाथ, बद्रीनाथ के दर्शन करने के बाद वह लौट रहा था। अचानक उसे एक अन्य पहाड़ी की तरफ जाने की इच्छा हुई। आगे रास्ता सुनसान था। आगे बढ़ कर उसने देखा कि एक शिला पर एक दिव्य साधु बैठे हुए हैं। जटा मोहक है। चेहरा देदीप्यमान है और वे चुपचाप बैठे हुए हैं। भक्त को न जाने क्यों इस साधु में एक आकर्षण महसूस हुआ। उसने दिव्य साधु के पैर छुए और उनके पैरों के पास बैठ गया। साधु ने उसका नाम और पता- ठिकाना पूछा। भक्त ने बताया कि वह केदारनाथ- बद्रीनाथ की यात्रा पर आया था। फिर भक्त ने साधु से पूछा- बाबा, भगवान शिव के दर्शन कैसे होंगे। क्या वे मुझ साधारण व्यक्ति को दर्शन देंगे। मुझे तो भगवान शिव के दर्शन के बिना अपना जीवन बेकार लगता है। साधु बोले- भगवान शिव का दर्शन कर क्या करोगे? वे तो हर जगह हैं। सर्वत्र व्याप्त हैं। भक्त बोला- नहीं बाबा, पता नहीं क्यों भगवान शिव के दर्शन के बिना प्राण छटपटा रहे हैं। मैं उनका भक्त हूं। अगर आप उनका दर्शन करा दें तो बड़ी कृपा होगी। साधु हंसे औऱ बोले- ऐसे तो शिव जी के दर्शन नहीं होंगे। तुम्हें किसी गुरु से दीक्षा लेनी पड़ेगी। साधना करनी पड़ेगी। यह ठीक है कि तुम्हारे अंदर गहरी श्रद्धा है। लेकिन किसी सिद्ध पुरुष से दीक्षा ले लो। फिर अवश्य शिव जी तुम्हें दर्शन देंगे। भक्त बोला- बाबा, अब गुरु कहां से ढूंढूं। आप ही मेरे गुरु बन जाइए। साधु बोले- तो ठीक है। सामने एक झरना बह रहा है। वहां नहा कर आओ। भक्त झरने के पानी में प्रेम से नहा आया। दिव्य साधु ने उसे दीक्षा दी। पूरे तीन घंटे बीत गए। फिर वे वहां से चले गए। भक्त ध्यान कर रहा था। उसे सुनाई पड़ा- तुमने साक्षात शिव जी के दर्शन कर लिए। उनसे दीक्षा भी ले ली। जब उसने आंखें खोलीं तो साधु गायब थे। भक्त ने रात उसी चट्टान पर बिताई। वह तो शिव जी में ही जीता था, सांस लेता था। अगले दिन सुबह उठ कर यह कह कर रोने लगा- भगवन, दर्शन तो दे दिया। लेकिन मैं समझ नहीं पाया कि आप ही शिव जी हैं। ठीक से प्रणाम भी नहीं कर पाया। मन- प्राण से आपको निहार भी नहीं सका। बातें भी नहीं कर सका। एक बार और दर्शन दीजिए। तभी उसने देखा उसके ठीक सामने एक स्थान पर वही साधु हवा में खड़े हैं और उसकी तरफ देख कर हाथ हिला कर उसे प्रस्थान करने के लिए कह रहे हैं। यानी बस इसी तरह दर्शन होते रहेंगे। भक्त बोला- ठीक है भगवन। आपकी लीला। आप जैसा चाहें, वैसे ही सही। लेकिन मेरे दिल से आप नहीं निकल सकते। मेरी रुद्राक्ष की माला में भी आप ही हैं। मेरे हृदय में भी आप ही हैं। मैं आपके बिना रह ही नहीं सकता

Friday, July 30, 2010

जब राधा को अहंकार हो गया

विनय बिहारी सिंह

बहुत ही पुरानी कथा है। राधा, भगवान कृष्ण की सबसे प्रिय शिष्या थीं। राधा की एक एक सांस भगवान कृष्ण के लिए थी। लेकिन एक बार उन्हें अहंकार हो गया कि भगवान उन्हें सबसे ज्यादा चाहते हैं। यह बात भगवान को मालूम हो गई। हम जिस क्षण कोई संकल्प लेते हैं या कुछ सोचते हैं भगवान जान जाते हैं। आखिर वे सर्वव्यापी हैं, सर्वशक्तिमान हैं और सर्वग्याता हैं। तो राधा का अहंकार चूर करने के लिए भगवान उनके पास आए और कहा- राधा, चलो हम और तुम वन में सैर करें। राधा तो खुशी से झूम उठीं। भगवान का यह प्रस्ताव किसी को भी आनंद से सराबोर कर देगा। भगवान और राधा वन में चलते गए, चलते गए, चलते गए। राधा थक गईं। एक सुंदर सी जगह देख कर राधा ने कहा- भगवन, क्यों न यहीं बैठ कर बातें करें। भगवान बोले- नहीं। चलो इससे भी अच्छी जगह ढूंढ़े। वहीं बैठेंगे। फिर भगवान चलते गए, चलते गए, चलते गए। वे बातें नहीं करते थे, बस चलते जा रहे थे। राधा चलते चलते बोलीं- अब मुझसे चला नहीं जाता। भगवान ने कहा- तो तुम मेरे कंधे पर बैठ जाओ। किसी के लिए भी इससे बड़ा सम्मान और क्या हो सकता है कि भगवान खुद उसे अपने कंधे पर बिठाएं। राधा भगवान के कंधे पर बैठ कर अहंकार से और फूल गईँ। भगवान समझ गए। अचानक भगवान गायब हो गए। राधा धड़ाम से जमीन पर आ गईँ। अब उन्हें समझ में आया- भगवान उनके अहंकार के कारण ही अदृश्य हो गए। वे एकदम से रोने लगीं। धाराधार आंसू बहे जा रहे थे। वे भगवान से प्रार्थना करने लगीं- भगवन, अब मेरे मन में अहंकार का स्थान नहीं है। कृपया दर्शन दीजिए। काफी प्रार्थना के बाद भगवान कृष्ण प्रकट हुए और राधा से प्रेम से बातें की। राधा या अन्य गोपियां पू्र्व जन्म में ऋषि थीं। ऋषि के रूप में उन लोगों ने भगवान से प्रार्थना की थी कि वे लोग उनके साथ अगले जन्म में मित्र के रूप में रहना चाहते हैं। इससे लाभ यह होगा कि भगवान के साक्षात दर्शन होंगे और उनकी प्रिय बातें सुनने को मिलेंगी। साधना के उच्च स्तर पर रहने वाले इन ऋषियों की बातें भगवान कैसे नहीं मानते। सो इस जन्म में उनका जन्म गोपिकाओं के रूप में हुआ। ये गोपिकाएं जन्म से ही उच्च कोटि की अवस्था में थीं।

Thursday, July 29, 2010

मनुष्य का शरीर किन तत्वों से बना

विनय बिहारी सिंह


महात्मा गांधी ने सात अप्रैल १९४६ के हरिजन सेवक में लिखा है-
मनुष्य का भौतिक शरीर पृथ्वी, पानी, आकाश, तेज और वायु नाम के पांच तत्वों से बना है, जो पंचमहाभूत कहलाते हैं। इनमें से तेज तत्व शरीर को शक्ति पहुंचाता है। आत्मा उसको चैतन्य प्रदान करती है। इन सबमें सबसे जरूरी चीज हवा है। आदमी बिना खाए कई हफ्तों तक जीवित रह सकता है, पानी के बिना भी वह कुछ घंटे बिता सकता है। लेकिन हवा के बिना तो कुछ ही मिनटों में उसकी देह का अंत हो सकता है। इसलिए ईश्वर ने हवा को सबके लिए सुलभ बनाया है। अन्न और पानी की तंगी कभी- कभी पैदा हो सकती है, हवा की कभी नहीं। ऐसा होते हुए भी हम बेवकूफों की तरह अपने घरों के अंदर खिड़की और दरवाजे बंद करके सोते हैं और ईश्वर की प्रत्यक्ष प्रसादी सी ताजी और साफ हवा से फायदा नहीं उठाते। अगर चोरों से डर लगता है तो रात में अपने घरों के दरवाजे और खिड़कियां बंद रखिए, लेकिन खुद अपने को उनमें बंद रखने की क्या जरूरत है?
साफ और ताजी हवा पाने के लिए आदमी को खुले में सोना चाहिए। लेकिन खुले में सोकर धूल और गंदगी से भरी हवा लेने का कोई मतलब नहीं। इसलिए आप जिस जगह सोएं, वहां धूल और गंदगी नहीं होनी चाहिए। धूल और सरदी से बचने के लिए कुछ लोग सिर से पैर तक ओढ़ लेने के आदी होते हैं। यह तो बीमारी से भी बदतर इलाज हुआ। दूसरी बुरी आदत मुंह से सांस लेने की है। नथनों की राह फेफड़ों में पहुंचने वाली हवा छन कर साफ हो जाती है और उसे जितना गरम होना चाहिए उतनी गरम भी वह हो लेती है।
जो आदमी जहां चाहे वहां और जिस तरह चाहे उस तरह थूक कर, कूड़ा- करकट डाल कर या गंदगी फैला कर या दूसरे तरीकों से हवा गंदी करता है, वह कुदरत का गुनाहगार है। मनुष्य का शरीर ईश्वर का मंदिर है। उस मंदिर में जाने वाली हवा को जो गंदी करता है वह मंदिर को बिगाड़ता है। उसका रामनाम लेना फजूल है।
- हरिजन सेवक में गांधी जी के विचा

Wednesday, July 28, 2010

सब्जियों में जहरीला रसायन

विनय बिहारी सिंह

सब्जियों को तरोताजा रखने और पैदावार बढ़ाने के लिए आक्सीटोसिन नाम के रसायन का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह सूचना केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट बताती है। आक्सीटोसिन गर्भवती महिलाओं को कुछ खास स्थिति में दी जाने वाली दवा है। लेकिन इसका इस्तेमाल सब्जियों की पैदावार बढ़ाने और उन्हें तरोताजा रखने में किया जा रहा है। खासतौर से महानगरों में इसका इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आक्सीटोसिन से युक्त सब्जियां खाने से स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है। संभव है इससे कैंसर या अल्सर हो जाए। यही नहीं इससे शरीर में विभिन्न तरह की गड़बड़ियां भी पैदा होती हैं। आमतौर पर हम सभी स्वास्थ्य की दृष्टि से हरी सब्जियां ज्यादा खाते हैं। लेकिन इस रिपोर्ट के बाद अनेक लोगों ने प्रश्न पूछना शुरू कर दिया है कि आखिर अब क्या खाएं। अगर हर फायदे वाली चीज में नुकसान का तत्व भरा जा रहा है तो मनुष्य क्या करे? एक विशेषग्य ने कहा है कि यह समाज का विकास नहीं विनाश है। कई जगहों पर लोगों ने प्रतिरोध दर्ज कराया है लेकिन अभी कहीं से ऐसे रसायनों पर रोक की खबर नहीं मिली है।
नए दांत उगाने में मदद करने वाली जेल- इस्राइल के वैग्यानिकों ने ऐसी जेल बनाई है जिसे कीड़ा खाए दांतों पर लगाने से खराब दांत झड़ जाएंगे और नए चमकीले दांत निकल आएंगे। इससे दांतों को किसी रसायन से भरने की परंपरा का अंत हो जाएगा। देखना है भारत में यह जेल कब तक आता है।

Tuesday, July 27, 2010

मैं ही संपूर्ण संसार का मूल
कारण हूं- भगवान श्रीकृष्ण


गीता के सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- मैं संपूर्ण संसार का मूल कारण हूं। क्योंकि संसार मुझसे ही उत्पन्न होता है और मुझमें ही लीन होता है। हे धनंजय (अर्जुन) मेरे सिवाय इस इस संसार का दूसरा कोई कारण नहीं है। जैसे सूत की बनाई हुई मणियां सूत के धागे में ही पिरोई जाती हैं तो उस माला में सूत ही सूत है, ऐसे ही संपूर्ण संसार में मैं ही मैं हूं। हे कुंतीनंदन, जल में मैं रस हूं, सूर्य और चंद्रमा में प्रकाश मैं हूं, संपूर्ण वेदों में प्रणव (ओंकार) मैं हूं, आकाश में शब्द मैं हूं, मनुष्यों में पुरुषार्थ मैं हूं, पृथ्वी में पवित्र गंध मैं हूं, अग्नि में तेज मैं हूं, संपूर्ण प्राणियों की जीवनी शक्ति मैं हूं और तपस्वियों का तप मैं हूं। हे पार्थ, संपूर्ण प्राणियों का अनादि बीज मुझे ही जान। बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वी पुरुषों का तेज (प्रभाव) मैं हूं। हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन , बलवानों में कामना और आसक्ति रहित (सात्विक) बल मैं हूं और तो क्या कहूं, जितने भी सात्विक, राजस और तामस भाव हैं, वे सब मुझसे ही होते हैं, ऐसा समझ। परंतु मैं उनसे सर्वथा अतीत, निर्लिप्त हूं।

Monday, July 26, 2010

राम नाम से निश्चित सहायता

विनय बिहारी सिंह


आज महात्मा गांधी के लिखे एक महत्वपूर्ण लेख का छोटा सा अंश पढ़ने को मिला। इस आनंददायक लेख को आप भी पढ़ें।
महात्मा गांधी ने लिखा है- इसमें कोई शक नहीं कि रामनाम सबसे ज्या और निश्चित सहायता करता है। अगर दिल से उसका जप किया जाए तो वह हर एक बुरे ख्याल को तुरंत दूर कर सकता है। और जब बुरा ख्याल मिट गया, तो उसका बुरा असर होना संभव नहीं है। अगर मन कमजोर है, तो बाहर की सारी सहायता बेकार है, और अगर मन पवित्र है, तो भय क्यों? इसका यह मतलब हरगिज नहीं समझना चाहिए कि एक पवित्र मन वाला आदमी सब तरह की छूट लेते हुए भी बेदाग बचा रह सकता है। ऐसा आदमी खुद ही अपने साथ कोई छूट न लेगा। उसका सारा जीवन ही उसकी भीतरी पवित्रता का सच्चा सबूत होगा। गीता में ठीक ही कहा है कि आदमी का मन ही उसे बनाता है और वही उसे बिगाड़ता भी है। मिल्टन कहता है- मनुष्य का मन ही सब कुछ है, वही स्वर्ग को नरक और नरक को स्वर्ग बना देता है।
एक अन्य जगह पर गांधी जी कहते हैं- प्रार्थना केवल शब्दों की या कानों की कसरत नहीं है। वह किसी निरर्थक मंत्र या सूत्र का जप नहीं है। अगर राम नाम आत्मा को जाग्रत न कर सके, तो आप उसका कितना भी जप क्यों न करें, सब व्यर्थ जाएगा। यदि आप शब्दों के बिना भी हृदय से भगवान की प्रार्थना करें तो वह उस प्रार्थना से कहीं अच्छी है जिसमें शब्द तो बहुत हैं, परंतु हृदय नहीं है। प्रार्थना उस आत्मा की मांग के स्पष्ट उत्तर में होनी चाहिए, जो हमेशा उसकी भूखी रहती है।..... मैं अपने और अपने साथियों के अनुभव से यह कहता हूं कि जिसने प्रार्थना के चमत्कार का अनुभव किया है, वह भोजन के बिना तो कई दिनों तक रह सकता है, लेकिन प्रार्थना के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता क्योंकि प्रार्थना के बिना आंतरिक शांति नहीं मिलती।