Wednesday, June 30, 2010

एक रोचक घटना

विनय बिहारी सिंह

कल शाम को अपने दफ्तर से घर जाने के लिए ज्योंही निकला, पांच मिनट बाद खूब जोर की हवा चली और घनघोर बारिश हुई। मुझे एक फुटपाथ की दुकान के पास रुकना पड़ा जिसकी छत पालीथीन से बनी थी। पालीथीन की छत पुरानी थी, इसलिए मैं बीच बीच में थोड़ा भींग भी जाता था। मेरे साथ एक और आदमी खड़ा था। वह थोड़ी देर तक तक मेरे साथ खड़ा रहा, लेकिन जब बारिश और हवा ज्यादा तेज हो गई तो उसने मुझसे पूछा- यहां तो कई पेड़ हैं। कहीं कोई डाल टूट कर गिरेगी तो नहीं? मैंने हंसते हुए कहा- क्या पता, इस तूफानी बारिश में कुछ भी कहना मुश्किल है। वह भाग कर सड़क पार स्थित बहुमंजिली इमारत के छज्जे के नीचे छुप गया। एक बार मेरी भी इच्छा हुई कि वहीं चला जाऊं। थोड़ा सा ही तो भींगना पड़ेगा। लेकिन फिर मन ने कहा- यहीं ठीक है। मैं खड़ा रहा। दुकानदार ने देखा कि मेरे पैंट का निचला हिस्सा भींग रहा है तो उसने मुझे दीवार से लगे ऊंचे स्थान पर खड़ा रहने का सुझाव दिया। यह स्थान उसकी दुकान से सटा हुआ था, इसलिए मैं वहां नहीं खड़ा हो रहा था। लेकिन जब उसने खुद कहा तो मैं वहां खड़ा हो गया। वहां की पालीथीन वाली छत ठीक थी। मैं अब आराम से खड़ा हो गया। तभी दुकानदार ने कहा- आग लगी है, वह देखिए। मैंने देखा मेरे साथ खड़ा आदमी जहां खड़ा था, वहां से दो कदम पर ऊपर लगे बोर्ड में भयानक आग लगी है। मैंने कहा- इतनी तेज बारिश में आग कैसे लगी? उसने कहा- शार्ट सर्किट है। यह आग बारिश से नहीं बुझेगी। वहां खड़े सारे लोग जहां- तहां भागे। मैं जहां सुरक्षित खड़ा था, खड़ा रहा। मन में सोचा- अभी मेरे मन में आया था कि मैं भी आग लगने वाली जगह ही क्यों न छुप जाऊं। लेकिन मेरे भीतर से ही कहीं से आवाज आई- वहां मत जाओ, यहीं ठीक है। आग से कोई हताहत नहीं हुआ। जब फायर ब्रिगेड की गाड़ी आई, आग बुझ चुकी थी। यह अद्भुत घटना थी मेरे लिए। मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। वे तो मेरे भीतर थे और बाहर भी। मेरे चारो ओर भी। सर्वं खल्विदं ब्रह्म

Tuesday, June 29, 2010

देहात्मिका बुद्धि ठीक नहीं

विनय बिहारी सिंह


रविवार को योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया के संन्यासी स्वामी शुद्धानंद जी ने सत्संग के दौरान कहा कि जो मनुष्य देहात्मिका बुद्धि वाला है, उसे शंका होती है कि ईश्वर है या नहीं। देहात्मिका बुद्धि यानी मैं शरीर हूं। बस वह अपने शरीर और इंद्रियों में ही रमा रहता है। अच्छा भोजन, अच्छा वस्त्र यानी इंद्रियों की मांग पूरी करता रहता है और इसी में परेशान रहता है। उसे लगता है यह देह या यह शरीर ही सब कुछ है। ऐसा व्यक्ति सूक्ष्म स्तर पर कुछ भी महसूस नहीं कर सकता। वह हर सूक्ष्म और सर्वव्यापी वस्तु को नकार देगा। शंका की दृष्टि से देखेगा। लेकिन जो समझता है कि हम शरीर नहीं हैं, मन नहीं हैं, बुद्धि नहीं है। हम हैं- सिर्फ शुद्ध आत्मा। यह जीव ईश्वर का अंश है। (तुलसीदास ने भी लिखा है- ईश्वर अंश जीव अविनासी) आत्मा देह तक ही सीमित नहीं है। जब जीव इंद्रियों से शरीर से ऊपर उठ कर देखता है तो पाता है कि यह देह तो तुच्छ है। इसके लिए क्या परेशान होना है। हमें तो अपनी आध्यात्मिक खुराक चाहिए। वही हमें सुख देगा। वही हमारे साथ शास्वत रूप से रहेगा, स्थायी रूप से रहेगा। परमहंस योगानंद जी ने कहा है- आप ईश्वर के साथ एकाउंट (खाता) खोल लीजिए, सुखी रहेंगे। जो व्यक्ति सूक्ष्म स्तर पर महसूस करेगा, वह समझेगा ही नहीं, महसूस भी करेगा कि ईश्वर है। इस सृष्टि के कण- कण में ईश्वर है। ईश्वर सर्वव्यापी हैं। उन्हें हर क्षण हम महसूस कर सकते हैं। लेकिन वे तभी महसूस होंगे जब हमारा दिमाग शांत होगा। वे शांति में निवास करते हैं। कैसी शांति? सकारात्मक शांति। शुद्ध शांति। एक शांति नकारात्मक भी होती है। कोई शांत है और दिमाग में तमाम नकारात्मक सोच चल रहे हैं। वह शांति व्यर्थ है। ईश्वर तो ऐसी शांति में निवास करते हैं जहां श्रद्धा हो, भक्ति हो और जीव उनके लिए तड़प रहा हो। बस ऐसी शांति में ईश्वर आपके साथ आनंद मनाएंगे। आप स्वयं आनंद बन जाएंगे।

Monday, June 28, 2010

जीन थिरैपी का कमाल

विनय बिहारी सिंह


अमेरिकी वैग्यानिकों ने रोगी के फैट सेल्स और मांसपेशियों के सेल से हड्डी बनाने में सफलता पा ली। ऐसा जीन थिरैपी के कारण हुआ। उन्होंने यह प्रयोग पहले चूहों पर किया। चूहों के फैट सेल की जीन थिरैपी की। नतीजा यह हुआ कि पहले कार्टिलेज बना। फिर वही कार्टिलेज हड्डी में तब्दील हुआ। इस प्रयोग की सफलता के बाद वैग्यानिकों ने कहा है कि जिन मरीजों की हड्डी टूट जाती है, उनकी टूटी हड्डी निकाल कर स्टील इत्यादि फिट कर दिया जाता था। इससे मरीज चलने- फिरने लायक हो जाता है। लेकिन मरीज को पूरी तरह स्वस्थ होने में तीन चार महीने लग जाते हैं। कृत्रिम हड्डी लगाने के १५ दिन बाद ही मरीज चलने फिरने लगता है। इसकी वजह यह है कि वह हड्डी उसी के सेल से बनी होती है। शरीर ऐसी हड्डी तुरंत स्वीकार कर लेता है। डाक्टरों का कहना है कि अगर यह प्रयोग आगे बढ़ा तो चिकित्सा के क्षेत्र में कई क्रांतिकारी परिवर्तन होंगे। लोगों का जीवन औऱ राहत भरा होगा। भारत में भी ऐसे प्रयोगों की आवश्यकता है।

Saturday, June 26, 2010

(courtesy- BBC Hindi service)

चाय और कॉफी

दिल के लिए फायदेमंद

कॉफी, चाय

छह कप से अधिक चाय पीने से दिल की बीमारी होने का खतरा एक तिहाई कम

नीदरलैंड्स के शोधकर्ताओं ने पाया है कि दिन में कई कप कॉफी या चाय पीने से दिल की सेहत अच्छी बनी रहती है.

शोधकर्ताओं ने 13 साल तक चले अध्ययन के बाद इस नतीजे को प्रकाशित किया है. अध्ययन का प्रकाशन अमरीकन हार्ट एसोसिएशन के जर्नल में किया गया है.

अध्ययन में 40,000 लोगों को शामिल किया गया. शोध के मुताबिक जो लोग एक दिन में छह कप से अधिक चाय पीते हैं, उनके लिए दिल की बीमारी होने का खतरा एक तिहाई कम हो जाता है.

शोध में यह बात भी सामने आई कि दिन में दो से चार कप काफी पीने से भी दिल की बीमारी होने के खतरे कम हो जाते हैं.

हालांकि इस बात पर अलग-अलग रिपोर्ट मिली कि चाय में दूध मिला देने से पॉलिफिनॉल के प्रभाव कम हो जाते हैं. पॉलिफिनॉल चाय में पाया जाने वाला पदार्थ है जो काफी फायदेमंद होता है.

कॉफी का सीमित सेवन फायदेमंद

कॉफी में ऐसे गुण होते हैं जो एक साथ जोखिम बढ़ाते भी हैं और घटाते भी. इसके सेवन से जहां एक तरफ कोलेस्ट्राल बढ़ता है, वहीं दूसरी तरफ यह दिल की बीमारियों से लड़ता है.

लेकिन अध्ययन में यह भी कहा गया है कि अगर आप दिन में दो से चार कप कॉफी पीते हैं तो इससे बीमारी होने का खतरा 20 फ़ीसदी कम हो जाता है.

इस अध्ययन से उन प्रमाणों को बल मिलता है कि हल्की मात्रा में चाय या काफी का सेवन अधिकतर लोगों के लिए नुकसानदेह नहीं है. हालांकि अगर आप कॉफी के साथ सिगरेट पीते हैं तो ये सभी फायदे समाप्त हो जाते हैं- -एलेन मैसन, ब्रिटिश हर्ट फाउंडेशन

अध्ययन की अगुवाई करने वाले प्रोफेसर वोनी वांडर शा ने कहा, "चाय या कॉफी पसंद करने वाले लोगों के लिए यह एक अच्छी खबर है. इनके सेवन से मौत का जोखिम पैदा किए बिना ही दिल की सेहत अच्छी बनी रहती है."

ब्रिटिश हर्ट फाउंडेशन की एलेन मैसन ने कहा, "इस अध्ययन से उन प्रमाणों को बल मिलता है कि हल्की मात्रा में चाय या काफी का सेवन अधिकतर लोगों के लिए नुकसानदेह नहीं है. हालांकि अगर आप कॉफी के साथ सिगरेट पीते हैं तो ये सभी फायदे समाप्त हो जाते हैं."

उन्होंने यह भी कहा कि हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि अगर आप अपने हृदय को सेहतमंद रखना चाहते हैं तो कुल मिलाकर एक सेहतमंद जीवन शैली अपनानी होगी.

Friday, June 25, 2010

छोटे बच्चे सी व्याकुलता और प्रेम

विनय बिहारी सिंह


स्वामी वल्लभाचार्य कहते थे कि भक्त को छोटे बच्चे से सीख लेनी चाहिए। जैसे छोटा बच्चा क्षण भर के लिए भी मां को नहीं छोड़ता, ठीक उसी तरह भक्त को भगवान से एक क्षण भी अलग नहीं रहना चाहिए। मां कहीं चली जाती है तो वह जोर- जोर से रोने लगता है और तब तक चुप नहीं होता, जब तक उसकी मां उसे गोद में नहीं ले लेती। मां की गोद में जाते ही बच्चे को मानो स्वर्ग मिल जाता है। ठीक उसी तरह भक्त को भगवान में इतना सुख मिलता है कि स्वर्ग भी तुच्छ लगता है। रमण महर्षि ने कहा कहा है कि सच्चे भक्त का दिमाग फोटो खींचने वाली फिल्म की तरह होता है। जैसे फिल्म एक बार प्रकाश में एक्सपोज होती है तो उससे फोटो खींचना असंभव हो जाता है, ठीक उसी तरह एक बार भक्त का दिमाग भगवान में एक्सपोज हो जाता है तो उस पर कोई दूसरी छवि उभर ही नहीं पाती। सांसारिक प्रपंच उसके मन में नहीं आता। बस सिर्फ भगवान और भगवान। सोते- जागते, उठते- बैठते, खाते- पीते, घूमते- फिरते और सोचते या काम करते हुए मन ही मन दुहराते रहना चाहिए- हे भगवान, आप ही मेरे सहारा हैं। मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलिए। मुझे अग्यान से ग्यान की ओर ले चलिए, मुझे चंचलता से स्थिरता की ओर ले चलिए। मुझ पर कृपा कीजिए

Thursday, June 24, 2010

हम तो हैं समुद्र की एक बूंद

विनय बिहारी सिंह

एक भक्त हैं जो- श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव, गाते हुए रोने लगते हैं। आंसू लगातार गिर रहे हैं और वे गाए जा रहे हैं। एक दिन मैंने उनसे कहा- आप अगर नहीं रोते तो आपका भजन और सुंदर होता। रोते वक्त आपका गला भर जाता है, लय में बाधा पड़ती है। वे बोले- जब मैं यह गीत गाता हूं तो मेरी आंखों से अपने आप आंसू गिरने लगते हैं। इसमें मेरा कोई वश नहीं है। मैं क्या करूं? मैंने कहा- कोई दूसरा भजन गाया कीजिए। आपका स्वर मधुर है। आपके भजन सुनना सबको अच्छा लगता है। कोई दूसरा भजन क्यों नहीं गाते? वे बोले- आप खुद गाकर देखिए- श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे..... आप ईश्वर रस में डूब जाएंगे। इसे छोड़ कर कोई औऱ भजन गाने की इच्छा ही नहीं होती। इस भजन के एक एक शब्द में ईश्वर का वास है। लगता है जैसे भगवान सामने खड़े हों और हम उन्हें पुकार रहे हों। रो रहे हों और कह रहे हों- अब कब तक इंतजार कराओगे प्रभु..... तुम्ही तो मेरे प्राण हो। यह कहते हुए उनका गला भर आया और वे फिर रोने लगे। मैं हालांकि पहले से जानता था कि वे भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त हैं और उनकी एक एक सांस भगवान के प्रति समर्पित है। लेकिन उन्हीं के मुंह से सुनने के लिए कोई अन्य भजन गाने का प्रस्ताव रखा। आखिर में उन्होंने कहा- भगवान दिन रात हमारे साथ रहते हैं लेकिन हम उनके होने का अनुभव न करें तो इसमें भगवान का क्या दोष? दोष तो हमारा है। वही हमारे रक्षक हैं, पोषक हैं और हमारे उद्धारक हैं। उनके सिवा और कौन हमारा है। फिर भी लीला देखिए कि अपना कोई क्रेडिट नहीं लेते हैं भगवान। चुपचाप अदृश्य रह कर पूरे ब्रह्मांड को चलाते हैं। जो लोग उनको भला- बुरा कहते हैं, उस पर भी ध्यान नहीं देते। एक हम हैं कि छोटा मोटा काम करके भी अपना क्रेडिट लेना चाहते हैं। कोई हमारी प्रशंसा करे, कोई हमारा क्रेडिट स्वीकार करे.... यही तो चाहते हैं हम। हम अपनी तारीफ, अपना गुणगान सुनना चाहते हैं। जबकि करने वाला भगवान है। हम तो समुद्र की एक बूंद भर हैं।

Wednesday, June 23, 2010

संगीत में डूबा एक इंजीनियर

विनय बिहारी सिंह


हमारे संस्थान में एक आईटी इंजीनियर हैं प्रियव्रत मजूमदार। वे रवींद्र संगीत के गहरे प्रेमी हैं। वाद्य यंत्रों में सिंथेसाइजर और हारमोनियम पर खुद को साध चुके हैं। हर रोज दो घंटे शास्त्रीय संगीत का रियाज करते हैं। एक दिन उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर के लिखे भक्ति गीत की दो पंक्तिंयां सुनाईं तो मुझे सुख मिला।
ये पंक्तियां हैं- चिर सखा हे, छेड़ो ना मोरे। संसार गहने, निर्भय, निर्भर निर्जन स्वजने.....
यह ईश्वर से प्रार्थना है कि वे अकेले न छोड़ें। यह संसार भरोसे लायक नहीं है। प्रियव्रत के स्वर में जो दर्द था, जो आकुलता थी, वह दिल को छूने वाली थी। वे ईश्वर के गहरे भक्त नहीं हैं। लेकिन रवींद्रनाथ टैगोर के ब्रह्म संगीत के भक्त जरूर हैं। मैंने पूछा- आपके गुरु कौन हैं? उन्होंने कहा- श्रीमती स्वागतलक्ष्मी दासगुप्ता।
मैंने पूछा- कंप्यूटर के हार्डवेयर और साफ्टवेयर में रमें रहने वाला आदमी संगीत को इतना समय कैसे दे पाता है? वे हंसे और कहा- मुझे बचपन से इसका शौक है। आठ साल का था तो मेरे शौक को देखते हुए घर वालों ने मुझे संगीत के स्कूल में दाखिल करा दिया। इस शौक के लिए समय कैसे निकालते हैं? प्रियव्रत ने कहा- समय? जो चीज आपके दिल में बसी हो उसके लिए समय निकालना नहीं है, वह हर समय आपके ऊपर हावी रहती है। संगीत और मैं एक हैं। कंप्यूटर भी मैं संगीत की लय में ही देखता हूं। साफ्टवेयर भी। संगीत मेरे जीवन का केंद्र है। मुझे इस इंजीनियर से बातें कर अच्छा लगा। मैंने कहा- ईश्वर भक्तों के लिए भी तो यही बात लागू होती है। वे बोले- बिल्कुल। अगर आप ईश्वर भक्ति में रमे हैं तो उसके अलावा आपको कुछ दिखाई नहीं देना चाहिए। आप तो उसी में मस्त रहेंगे। और कुछ दिखाई ही नहीं देगा। देखिए दो चीज होती ही नहीं। एक ही चीज है। वह एक चीज पकड़िए, काम बन जाएगा।
ईश्वर से प्रेम है तो फिर अन्य कोई चीज कैसे दिखाई देगी? प्रियव्रत संगीत में ही जीते हैं, संगीत में ही सांस लेते हैं। वे अपना काम करते हुए अत्यंत धीरे- धीरे गुनगुनाते रहते हैं। एक लय उनके भीतर चलती रहती है। कुछ लोग कहते हैं कि कंप्यूटर के कुछ काम अत्यंत उबाऊ हैं, लेकिन प्रियव्रत को इससे फर्क नहीं पड़ता। भीतर तो संगीत की अजस्र धारा बह रही है, क्या बोर होना है। भीतर मीठा स्रोत बह रहा है। बाहर कोई भी काम हो आसान हो जाता है। ठीक उसी तरह जैसे भीतर ईश्वर की धारा बह रही हो और आप संसार का काम उसी चेतना में किए जा रहे हैं। आपके ऊपर क्या फर्क पड़ेगा?
बस अपनी चेतना ईश्वर से जोड़ दीजिए। कनेक्ट कर दीजिए। ईश्वर ही तो सारी शक्तियों के स्रोत हैं। एको ब्रह्म दीतीयो नास्ति।