Friday, May 29, 2009

साइंस का चमत्कार, सिर्फ सोचिए और आपका काम हो जाएगा

विनय बिहारी सिंह

आस्ट्रियन मेडिकल इंजीनियरिंग कंपनी जी.टेक ने - ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस (बीसीआई) टेक्नालाजी विकसित कर ली है। आप पूछेंगे यह होता क्या है? आइए जानें- वह कंप्यूटर जो आपके सोचने भर से ही आपके घर की बत्ती जला देगा, टीवी आन कर देगा, नल खोल देगा और इसी तरह के हजार काम कर देगा। यह कैसे संभव है? दरअसल शुरू में आपकी खोपड़ी से सटा कर एक इलेक्ट्रोड फिट कर दिया जाता है। उसे इस कंप्यूटर से जोड़ दिया जाता है। जब यह इलेक्ट्रोड आपकी चिंतन पद्धति को समझ लेगा और इसे कंप्यूटर में फीड कर देगा तो उसका काम खत्म हो जाएगा। आपकी खोपड़ी से वह इलेक्ट्रोड हटा दिया जाएगा। बिना उसके भी आपका कंप्यूटर अब आपकी सोच पकड़ लेगा। मान लीजिए आपने सोचा कि आपके कमरे की बत्ती जले। बस, सोचते ही बत्ती जल जाएगी। इस कंप्यूटर में इलेक्ट्रोइंसेफेलोग्राम (ईईजी) उपकरण फिट होता है। वही आपकी सोच पकड़ कर कार्यान्वित करता है। यह उपकरण शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के काम आएगा और वे अब अक्षम होने के दुख से उबर जाएंगे। उनका किसी पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। इस तकनीक का प्रदर्शन, जी.टेक ने मार्च में ही हनोवर में कर दिया था। और सिर्फ विकलांगों के ही नहीं, अत्यंत बूढ़े लोगों के भी काम आएगा यह उपकरण। हमारे ऋषि- मुनियों ने पहले ही यह काम कर दिया था। आखिर ऋषि वशिष्ठ ने ही लव की शक्ल वाले कुश को बना ही दिया था। वह भी सोच कर ही। ऋषियों के ऐसे चमत्कारों से हमारे धर्म ग्रंथ भरे पड़े हैं। हनुमान जी ने सूर्य को फल समझ कर लील लिया। लेकिन इसके पहले उन्होंने सूर्य को खाने की सोचा और उनका काम हो गया। हालांकि जब वे बड़े हुए तो अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के स्वामी हो गए। क्योंकि उन्हें जानकी माता यानी मां सीता ने वरदान दिया था।

Thursday, May 28, 2009

अपने मन की गतिविधियां देखना दिलचस्प

विनय बिहारी सिंह

हमारा मन दिन भर में न जाने कहां- कहां भटकता है। क्या कभी आपने अपने मन के व्यवहार को गहराई से परखा है? सचमुच मन को देखना दिलचस्प है। मन अनावश्यक चीजों पर भी जाता है। इसीलिए ऋषियों ने कहा है कि मन को नियंत्रित न किया जाए तो वह पागल, बिच्छू काटे और अफीम खाए बंदर की तरह व्यवहार करेगा। जैसे गेंद उछलती है, ठीक उसी तरह उछलेगा। कभी इस बात की तरफ तो कभी उस बात की तरफ। आइए हम देखें कि हमारा मन हमेशा सकारात्मक, रचनात्मक विचारों से क्यों नहीं ओतप्रोत रहता। संतों ने कहा है कि जन्म जन्मातर से हमने मन को उसकी मर्जी पर छोड़ दिया है। मन हमारा गुलाम नहीं, बल्कि हम्हीं मन के गुलाम हो गए हैं। यानी हम नौकर के गुलाम हो गए हैं। वह जैसा चाहे, हमें नचा रहा है। लेकिन अभी भी देर नहीं हुई है। स्थिति पलट सकती है। मन हमारा कहा मान सकता है। बस, सिर्फ अभ्यास की जरूरत है। गीता में अर्जुन ने भगवान कृष्ण से कहा है कि मन तो बड़ा चंचल और मथ देने वाला है, उसे वश में करना, वायु को वश में करने जैसा है। तो भगवान कृष्ण ने कहा- हां, मन सचमुच बड़ा चंचल है। लेकिन अभ्यास और वैराग्य से इसे नियंत्रण में किया जा सकता है। आप कहेंगे- हर कोई तो अर्जुन नहीं हो सकता। लेकिन गीता में अर्जुन के बहाने हम सबको यह संदेश दिया जा रहा है कि मन को उसकी मर्जी पर नहीं छोड़ा जा सकता। उस पर नजर रखने की जरूरत है, नहीं तो वह आपका ही अपहरण कर लेगा और जो सोचना चाहेगा, सोचेगा। आप बेबस होकर उसी का कहा मानेंगे। अगर आप ईश्वर का चिंतन करना चाहते हैं तो मन कहीं और भागेगा। स्थिर रहना तो उसकी आदत में है नहीं। लेकिन उसे स्थिर किया जा सकता है। ईश्वर का चिंतन करते हुए मन जितनी बार भी भागे, उसे बार- बार खींच कर ईश्वर पर लगाने से धीरे- धीरे मन वश में होने लगेगा। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। लेकिन भले ही यह प्रारंभ में कठिन लगे, है बहुत फायदेमंद। मन को काबू में करने के लिए उसे ईश्वर पर लगा देना ही कल्याणकारी है। सबसे पहले आप मन को देखिए, उसकी गतिविधियों पर गौर कीजिए। फिर उसे आराम से ईश्वर के पास बैठा दीजिए। आप पाएंगे कि थोड़ी ही देर बाद वह वहां से भाग खड़ा होगा और अल्लम- गल्लम सोचने लगेगा, जो कूड़े जैसा है। बैठे हैं आप ईश्वर का ध्यान करने, तो उसे दूसरी जगहों पर जाना ही क्यों चाहिए? लेकिन वह जाता है। बस धीरे- धीरे उसे नियंत्रण में लाना है। आप इसे कर लेंगे। बहुतों ने किया है।

Tuesday, May 26, 2009

मन से परे बुद्धि और बु्द्धि से परे आत्मा

विनय बिहारी सिंह

इन दिनों नैनो टेक्नालाजी की बात बहुत हो रही है। नैनो टेक्नालाजी वाले कहते हैं कि मनुष्य के एक बाल के हजारवें हिस्से को नैनो कहते हैं। इतनी सूक्ष्म टेक्नालाजी हो गई है। हमारे धर्मग्रंथों में मन, बुद्धि और आत्मा को सूक्ष्म से सूक्ष्मतर कहा गया है। परमहंस योगानंद ने कहा है- यह समूचा ब्रह्मांड ईश्वर के चिंतन मात्र से ही निर्मित हुआ है। गीता में उल्लेख है कि इंद्रियों से परे मन है, मन से परे बुद्धि, बुद्धि से परे आत्मा है। यह आत्मा ही ईश्वर स्वरूप है। वह चिन्मय है और इसका संसार के किसी भी प्रपंच से कोई लेना- देना नहीं है। मन अत्यंत सूक्ष्म है, लेकिन बुद्धि उससे भी ज्यादा सूक्ष्म है। और आत्मा तो उससे भी अधिक सूक्ष्म है। हमारे ऋषियों ने कहा है कि आपका चिंतन जैसा होगा, आप भी वैसे ही हो जाएंगे। अगर आप भय, चिंता और तनाव में लंबे समय तक रहेंगे तो यह आपकी प्रवृत्ति बन जाएगी। तब बिना किसी वजह के भी आप तनाव मे रहने लगेंगे। यानी तनाव में रहना आपका स्वभाव बन जाएगा। इसके ठीक उलट, यदि आप अच्छी बातें सोचेंगे, शुभ बातें सोचते हैं और हमेशा प्रसन्न रहते हैं, डर, चिंता या तनाव कभी कभी ही आपको तंग करते हैं तो आपका जीवन सुखी रहेगा। वे लोग कितने भाग्यशाली हैं जो यह मान कर चलते हैं कि भगवान उनकी रक्षा कर रहे हैं, फिर किस बात की चिंता। बस किसी का बुरा नहीं करना है। बुरा नहीं सोचना है। आप पाएंगे कि ईश्वर का आशीर्वाद आपके ऊपर बरस रहा है।

Saturday, May 23, 2009

ऋषि वाल्मीकि का रूपांतरण

विनय बिहारी सिंह

आइए आज वाल्मीकि का स्मरण करें क्योंकि उनकी कथा विलक्षण और रोचक है। ऋषि वाल्मीकि एक जमाने में खूंखार डकैत थे। एक दिन उन्हें कोई लूटने को नहीं मिला तो उन्होंने एक ऋषि को ही पकड़ लिया। ऋषि ने पूछा कि जो कुछ मेरे पास है, तुम ले लो लेकिन तुम्हें एक प्रश्न का उत्तर देना पड़ेगा- तुम जो पाप कर रहे हो, उसमें क्या तुम्हारे परिवार वाले भी शामिल होंगे? वाल्मीकि ने कहा कि उन्हें नहीं मालूम। तो ऋषि ने कहा कि मुझे तुम एक पेड़ में बांध दो और जाओ परिवार वालों से पूछ आओ। वाल्मीकि घर गए औऱ पहले उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा- मैं जो पाप कर रहा हूं क्या तुम उसमें हिस्सेदार हो? पत्नी ने कहा- मैं क्यों हिस्सेदार होऊंगी? मैं आपकी पत्नी हूं। आपका धर्म है कि मेरी सुरक्षा और पोषण करें। लेकिन इसके लिए आप क्या करते हैं, इससे मेरा क्या लेना- देना। वाल्मीकि ने अपने मां- बाप, बेटे- बेटी सबसे पूछा। सबने कहा- आपके पाप में हम क्यों भागीदार होंगे? आपका पाप आप उसका फल भोगेंगे। हम सब अलग- अलग इस दुनिया में आए हैं, अलग- अलग समयों पर भी इस पृथ्वी से जाएंगे। पाप और पुण्य में तो किसी के साथ कोई भागीदारी नहीं करता। सब अकेले हैं इस मामले में। वाल्मीकि तो चकित हो गए। उन्हें लगा कि जब उनके पाप में कोई भागीदार नही है तो फिर वे डकैती जैसा पाप कर्म क्यों करें। उनके मन में तीव्र वैराग्य पैदा हुआ। वे उन ऋषि के चरणों में गिर गए जिन्हें उन्होंने पेड़ से बांध रखा था। और फिर उनसे कहा- प्रभु, कृपया मुझे अपना शिष्य बना लें। ऋषि ने उन्हें कहा- आप राम- राम कहिए। वाल्मीकि ने कोशिश की लेकिन वे राम जैसा साधारण नाम भी नहीं उच्चारण कर पा रहे थे। तब ऋषि ने कहा कि ठीक है- आप मरा- मरा कहिए। फिर मैं लौट कर आऊंगा तो आगे की साधना बताऊंगा। वाल्मीकि ने यह नहीं पूछा कि आप कब आएंगे? उन्हें तो गुरु मंत्र मिल गया। वे मरा- मरा ही कहने लगे। मरा- मरा कहते हुए उनके मुंह से राम- राम निकलने लगा। यह पवित्र नाम लेते हुए धीरे- धीरे उनका रूपांतरण हो गया। उन्हें ईश्वर प्राप्ति हो गई और वे स्वयं ऋषि हो गए।

Friday, May 22, 2009

अपनी किडनी का ख्याल रखें

विनय बिहारी सिंह

शोधकर्ताओं ने पाया है कि हर आदमी को उसके वजन के हिसाब से प्रोटीन लेनी चाहिए। अगर ज्यादा प्रोटीन हो गई तो वह हमारी किडनी के लिए नुकसानदेह है। इसका हिसाब कैसे रखें? उन्होंने बताया है कि प्रति किलोग्राम वजन पर एक ग्राम प्रोटीन जरूरी है। जैसे- अगर आपका वजन ६० किलो है तो आपको ६ ग्राम प्रोटीन की जरूरत है। इससे ज्यादा प्रोटीन नहीं लेना चाहिए। मान लीजिए कि किसी का वजह ५० किलो ही है तो उसे ५ ग्राम प्रोटीन की जरूरत है। यह अंदाजा बहुत सरल है। बस इसी के हिसाब से प्रोटीन पदार्थ लेने चाहिए। शोध में यह भी पाया गया है कि किडनी के नष्ट होने की प्रक्रिया का शुरू में पता ही नहीं चल पाता। जब ५० प्रतिशत किडनी खराब हो चुकी होती है, तब जाकर रोगी को पता चलता है। ऐसे में किडनी को दुबारा स्वस्थ करना संभव नहीं होता। तब डाक्टर ऐसा उपाय करते हैं कि उस किडनी को भविष्य में कोई क्षति न हो। जितना नुकसान होना था वह तो हो चुका। इसके आगे न हो। लेकिन अब इस बात की कोशिश की जा रही है कि शुरू में ही किडनी की बीमार हालत का पता चल जाए और उसका तुरंत इलाज हो सके। इसके लिए कुछ प्रयोग हो चुके हैं। लेकिन एक शोध यह भी बताता है कि अगर हम साफ पानी नहीं पीते तो भी हमारे स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। मुश्किल यह है कि पीने के पानी के मामले में हमारा देश अभी भी पूरी तरह पिछड़ा हुआ है। जिनके पास क्षमता है वे तो अपने घर में पानी का श्रेष्ठतम फिल्टर लगा लेते हैं और साफ पानी पीते हैं, लेकिन वे लोग जो सक्षम नहीं हैं, जो पानी मिल जाता है, वही पी लेते हैं। हमारे देश में केंद्र और राज्य सरकारें करोड़ो रुपए जनहित में खर्च करने का दावा करती हैं, लेकिन पीने का साफ पानी आज तक किसी सरकार ने नहीं दिया। लोग जो पानी उपलब्ध है, वही पी रहे हैं। कोई जांच करने वाला नहीं है कि वह पानी कैसा है। उसे फिल्टर करना जरूरी है या नहीं।

Thursday, May 21, 2009

उम्र यूं ही तमाम होती है

विनय बिहारी सिंह

एक चिंतक ने कहा है- रोज सुबह होती है, शाम होती है, उम्र यूं ही तमाम होती है। इसका निहितार्थ बहुत व्यापक है। यानी हम रोज ब रोज हमारी उम्र कम होती जा रही है। हम दिन औऱ रात का खाना खाते हैं, चाय पीते हैं और दिन भर का काम निबटा कर सो जाते हैं। फिर सुबह होती है और दुबारा हम उसी चर्या को पूरा करते हैं। इसी बीच हम ऊबते भी हैं। फिर सांसारिक आकर्षण में थोड़ी सी शांति पाने के लिए यहां वहां दौड़ते हैं। लेकिन कहीं शांति नहीं मिलती। हर बार लगता है कि कहीं कुछ छूट गया। क्या करें कि मन एकदम तृप्त हो जाए। वे लोग भाग्यशाली हैं जिन्होंने ईश्वर से नाता जो़ड़ लिया है। उन्हें पूर्ण तृप्ति मिलती है। सभी संतों ने बताया है कि ईश्वर के यहां नियम यह है कि उससे जुड़ते ही मनुष्य सुरक्षा कवच से घिर जाता है औऱ उसे शांति का स्वाद मिलने लगता है। सारा तनाव धीरे- धीरे गायब होने लगता है। ध्यान करने वालों का कहना है कि इससे जीवन पूरी तरह रूपांतरित हो जाता है। हालत यह हो जाती है कि बिना सुबह- शाम ध्यान किए मन नहीं लगता। जब तक ध्यान नहीं करते, लगता है कि कुछ खो गया है। ईश्वर से जुड़ने का सुख ही यही है। तो क्या ध्यान ईश्वर से जुड़ने का माध्यम है? इसका उत्तर है- हां। आप जितना अधिक ध्यान करेंगे, आप उतनी ही गहराई से ईश्वर से जुड़ जाएंगे। रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे- ध्यान कैसा होना चाहिए- जैसे तेल की धार। लगातार बिना टूटे ईश्वर में ध्यान है। आप ध्यान करते समय मन ही मन प्रार्थना भी कर सकते हैं। कई लोग प्रश्न करते हैं कि हमारी प्रार्थना क्या ईश्वर सुनते हैं? सभी संत कहते हैं कि आप ज्योंही प्रार्थना करते हैं, ईश्वर का ध्यान उसकी ओर तुरंत जाता है। आप जितना अधिक ईश्वर से प्यार करेंगे, वे आपके करीब उतना ही ज्यादा आते जाएंगे। ऐसे में आपकी ग्रह दशा चाहे जो हो, ईश्वर उसमें परिवर्तन कर देते हैं। ईश्वर की कृपा के सामने सभी ग्रह- नक्षत्र अप्रभावी हो जाते हैं। बस एक ही उपाय है- ईश्वर से जुड़ जाना है।

Wednesday, May 20, 2009

आखिर दिमाग है क्या चीज?



विनय बिहारी सिंह


यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि आखिर मनुष्य का दिमाग है क्या चीज? आप जो नहीं चाहते वह भी करवा देता है और बाद में आपको अफसोस होता है। आप सुबह सोच कर उठे हैं कि आज क्रोध नहीं करना है और दोपहर तक भूल जाते हैं और किसी को कटु बोल देते हैं या किसी के साथ रूखा व्यवहार कर देते हैं। कई बार आप सोचते हैं कि आज दो ही कप चाय पीना है और किसी ने यह कह कर आपको चाय दी कि यह बहुत ही उम्दा चाय है तो आप झट से पी लेते हैं और आपका प्रण टूट जाता है। या फिर आप चाय बिल्कुल छोड़ देने का संकल्प लेते हैं और चाय है कि छूटती नहीं। चाय के बिना आपको सिरदर्द होने लगता है। चाय ही क्यों कई लोगों को तो सिगरेट और शराब तक की लत नहीं छूटती। वे कहते हैं कि क्या करें कई बार कोशिश की, लेकिन छोड़ नहीं पाता। मनोचिकित्सक कहते हैं कि यह विल पावर या आत्मबल की कमी है। जैसे ही आपका आत्मबल ताकतवर हो जाएगा, आप कोई भी लत छोड़ सकते हैं और खुद को आनंद से भरा महसूस कर सकते हैं। लत क्या है आपका बंधन ही तो है। कभी गहरे किसी लत के नुकसान के बारे में सोचिए और एक बार दृढ़ संकल्प लीजिए कि आज से यह आदत खत्म। बस खत्म तो खत्म। फिर दुबारा उसे पकड़ना नहीं है। लेकिन कई लोगों को देखा जाता है कि सिगरेट छोड़ी और खूब प्रचार किया कि मैंने सिगरेट छोड़ दी। लेकिन महीने भर बाद आप पाते हैं कि जनाब खूब सिगरेट पी रहे हैं। लत छोड़नी है तो प्रचार मत कीजिए। बस चुपचाप वह लत छोड़िए औऱ अपने मन को लगातार मजबूत करते जाइए। तो शुरू में प्रश्न था कि यह दिमाग है क्या चीज? यह दिमाग एक खास तरह की चिंतन शैली का अड्डा है जिसमें वह सब कांशस, कांशस और सुपरकांशस स्तर पर काम करता रहता है। दिमाग की भी कुछ आदतें हैं जिन्हें बदला जा सकता है। अगर किसी के मन में नकारात्मक विचारों का बाहुल्य है तो उसे धीरे- धीरे सकारात्मक विचारों को मजबूत करके दिमाग से नकारात्मक विचार निकाल देने होंगे। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। इसके लिए आपको अपने दिमाग मे सकारात्मक विचार रोपने औऱ पल्लवित- पुष्पित करने होंगे। कैसे? बार- बार आपके दिमाग में नकारात्मक या निगेटिव विचार आएंगे और बार- बार उन्हें खारिज करके आपको अच्छे और स्वस्थ विचार लाने और पुष्ट करने होंगे। शुरू में आपको यह मुश्किल लग सकता है। लेकिन धीरे- धीरे यह आपकी आदत में शामिल हो जाएगा और आप आनंद में रहने लगेंगे। आपका आधा तनाव और आपकी आधी परेशानी तुरंत खत्म हो जाएगी।