Thursday, April 30, 2009

मौन की भी अपनी ताकत है



विनय बिहारी सिंह


रमण महर्षि कहते थे- बोलने से ज्यादा ताकत मौन की है। एक संत से किसी ने पूछा- मौन रहने से क्या लाभ होता है? संत ने उत्तर दिया- मौन से आत्मनिरीक्षण का मौका मिलता है। मौन से अपने भीतर झांकने की प्रवृत्ति जागती है। तब हम अपनी कमियों और अच्छाइयों पर गौर कर सकते हैं। चुप रहने या मौन रहने से आपकी जो ऊर्जा बचती है, उसे अगर ईश्वर की तरफ मोड़ दें तो उसका अद्भुत परिणाम मिलता है। मौन आपको खुद से साक्षात्कार कराता है। एक बार एक ऋषि अपनी कुटिया में बैठे थे। वहां उस राज्य के राजा आए और ऋषि से पूछा- आप बिना धन के कैसे अपना जीवन चला पाते हैं? ऋषि का उस दिन मौन व्रत था। वे मुस्कराए और चुप हो गए। राजा को लगा- वे उन्हें मुस्करा कर आशीर्वाद दे रहे हैं। उन्होंने ऋषि की कुटिया का कायाकल्प करवा दिया और ऋषि के लिए वहां वे सारी सुविधाएं मुहैया करा दीं जिससे वे और बेहतर ढंग से साधना कर सकें। हालांकि ऋषि ने ऐसी कोई इच्छा नहीं जाहिर की थी। वे तो सद्भाव से मुस्कराए थे। अगर हम अपने रोजमर्रा जीवन का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि कई बार हम अनावश्यक बोलते हैं। वे लोग जो ज्यादातर गप लड़ाते हैं, वे तो और भी अनावश्यक बोलते हैं। आप कह सकते हैं कि बिना बोले तो जीवन में काम नहीं चलेगा। हां, यह सच है। लेकिन अगर हम तौल कर बोलने का अभ्यास करें तो हमारे जीवन में सार्थक मौन का प्रवेश हो जाएगा। सिर्फ हां कहने से या मुस्करा कर सिर हिला देने से जो काम हो सकता है, उस पर देर तक बोलने का बहाना ढूंढ़ना मौन की अवहेलना ही है। कई लोगों को अनावश्यक रूप से देर तक बोलने के अभ्यस्त होते हैं। वे उस सीमा से कम बोलेंगे तो उन्हें बेचैनी हो जाती है। वे बोलने का कोई न कोई बहाना ढूंढ़ ही लेते हैं। कुछ नहीं तो वे मौसम पर ही घंटा भर बोल सकते हैं। इसका कोई अर्थ नहीं है। कई लोग हफ्ते में एक दिन का मौन रखते हैं। लेकिन अगर मौन रख कर दिमाग को शांत न रखा जाए, तो फिर मौन का कोई अर्थ नहीं है। अगर दिमाग मौन रखने पर भी आंधी- तूफान की तरह दौड़ रहा हो तो मौन का क्या लाभ? मौन के साथ दिमाग और चिंताओं को ईश्वर के हवाले कर दिया जाए तो मौन सार्थक है।

Wednesday, April 29, 2009

जरूरी नहीं कि प्रार्थना रटी रटाई हो


विनय बिहारी सिंह

जरूरी नहीं कि प्रार्थना रटे- रटाए शब्दों में हो। आप मुंह से एक शब्द न बोलें और दिल से ईश्वर से लगातार प्रार्थना करते रहें तो वह ज्यादा प्रभावशाली होगी। अनेक लोगों ने कहा है- प्रार्थना शब्दों से परे है। बस आपके दिल से सच्ची पुकार निकलनी चाहिए। वह सीधे भगवान तक पहुंचती है। भगवान दिल की पुकार सुनते हैं। टालस्टाय की एक बहुत सुंदर कहानी है। एक द्वीप पर तीन संत रहते थे। वे एक ही प्रार्थना जानते थे- हे प्रभु हम तीन हैं और तुम भी तीन हो। हम पर कृपा करो। बस यही उनकी सुबह शाम की प्रार्थना थी। एक विशप ने सुना तो उनके मन में आया कि क्यों न इन संतो को अच्छी सी प्रार्थना सिखा दी जाए। वे उस द्वीप में गए और संतों को एक पुरानी प्रार्थना सिखा दी। फिर वे नाव से लौटने लगे। जब विशप बीच नदी में पहुंचे थे तभी उन्होंने देखा- उनकी ओर प्रकाश का एक गोला आ रहा है। यह गोला जब नजदीक आया तो उन्होंने देखा- ये तो वही तीनों संत थे जिन्हें उन्होंने प्रार्थना सिखाई थी। वे पानी पर दौड़ रहे थे। विशप तो चकित हो गए। निश्चय ही इन संतों के पास दिव्य शक्ति थी। पास आकर ये संत बोले- फादर, हम वह प्रार्थना भूल गए जो आप सिखा कर आए। विशप ने कहा- महान संतों, तुम्हें प्रार्थना सिखाने की कोई जरूरत ही नहीं है। तुम अपनी पुरानी प्रार्थना ही जारी रखो।

Tuesday, April 28, 2009

कृष्ण में सराबोर रहती थीं मीराबाई



विनय बिहारी सिंह


मीराबाई भक्ति धारा की प्रमुख साध्वियों में से एक थीं। हालांकि उनका विवाह चित्तौड़ के राणा सांगा के सबसे बड़े बेटे राजकुमार भोजराज से हुआ था, लेकिन वे सांसारिक कामकाज से पूरी तरह अलग थीं। वैसे तो वे अपने पति की सेवा करती थीं । लेकिन सोते, जागते, खाते- पीते, सांस लेते और भजन गाते हुए वे भगवान कृष्ण में ही मग्न रहती थीं। इसके कारण उनकी ससुराल में उनकी निंदा हुई। प्रताड़ना सहनी पड़ी। लेकिन वह प्रसंग थोड़ी देर बाद में। मीराबाई का जीवन काल १४९८ से लेकर १५४७ ईस्वी तक था। उनके गुरु संत रविदास थे। उन्होंने लगभग १३०० भजन तैयार किए थे। राजस्थान के पाली जिले के मेढ़ता के पास कुडकी गांव में मीराबाई जन्मी थीं। पिता रतन सिंह उस इलाके के धाकड़ आदमी थे। कहा जाता है कि उन्होंने ही जोधपुर की स्थापना की थी। वे राव राठौर राजपूत थे। जब मीराबाई ३ साल की थीं तो एक घुमंतू साधु उनके यहां घूमते हुए आया। उसने उनके पिता रतन सिंह को कृष्ण भगवान की एक छोटी सी मूर्ति दी। पिता ने इसे साधु का आशीर्वाद माना। मीराबाई को वह छोटी सी मूर्ति इतनी प्यारी लगी वे उस पर मुग्ध ही हो गईँ। हालत यह हो गई कि उन्होंने तब तक खाना नहीं खाया, जब तक पिता ने उन्हें वह मूर्ति दे नहीं दी। इसके बाद तो मीराबाई की सारी दुनिया उस मूर्ति में ही बस गई। वे कृष्ण भगवान को खिलातीं- पिलातीं, उनके साथ बातें करतीं और खेलतीं- कूदतीं। जरा बड़ी हुईं तो उन्होंने खुद के भजन बनाए और कृष्ण भगवान की भक्ति में डूब कर भजन गातीं। आखिर वह समय आया जिसका वे इंतजार कर रही थीं। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें दर्शन दिया। मीराबाई इससे संतुष्ट होने वाली नहीं थीं। उन्होंने भगवान से वादा कराया- वे जब चाहेंगी, उन्हें दर्शन देना पड़ेगा। भक्त के सामने भगवान झुक जाते हैं। श्रीकृष्ण भगवान ने मीराबाई की यह शर्त मंजूर कर ली। वे जब चाहे उनका दर्शन कर सकती थीं। बस अब क्या था। वे दिन- रात भगवान में मग्न रहने लगीं। उन्हें और किसी की परवाह नहीं थी। एक बार उनकी एक ननद ( पति की बहन) ने झूठा आरोप लगा दिया कि मीराबाई ने एक व्यक्ति को अपने शयन कक्ष में बैठाया है। क्रोधित हो कर उनके पति तुरंत मीराबाई के कमरे में गए। लेकिन ननद की बात झूठ निकली। मीराबाई तो भगवान कृष्ण की मूर्ति के साथ बातचीत कर रही थीं। वे इस बातचीत में इतनी तन्मय थीं कि उन्हें यह भी होश नहीं था कि कमरे में उनके पति आए हुए हैं। पति को अपनी गलती का अहसास हुआ। ऐसे ही कई मौकों पर उनकी ननद ने झूठ बोला और उसका झूठ बार- बार पकड़ में आया। बादशाह अकबर ने मीराबाई की चर्चा सुनी तो इस साध्वी से मिलने की उनकी इच्छा हुई। लेकिन मीराबाई के परिवार और अकबर में खांटी दुश्मनी थी। अकबर ने भेष बदल कर मीराबाई से मुलाकात की और इतने प्रभावित हुए कि उनके पैरों पर हार चढ़ा दिया। जब उनके पति को मालूम हुआ कि उनके कट्टर दुश्मन ने उन्हें उपहार में हार दिया है तो उन्होंने उन्हें कहा कि वे नदी में चली जाएं और अपने जीवन का अंत कर लें। पति की बात मान कर उन्होंने नदी में प्रवेश किया और बीच नदी की तरफ चलने लगीं। जब कमर तक पानी में गईं तभी भगवान कृष्ण ने प्रकट हो कर कहा कि उनकी जगह तो वृंदावन में है। मीराबाई वृंदावन में रहने लगीं औऱ भगवान कृष्ण की भक्ति में दिन रात बिताने लगीं। एक बार एक साधु ने उनसे मिलने से इसलिए इंकार कर दिया कि वे स्त्री हैं। तब मीराबाई ने उस साधु के शिष्य से कहा- जाकर महात्मा जी से कहो कि मीराबाई ने कहा है कि इस ब्रह्मांड में तो एक ही पुरुष है- भगवान कृष्ण। यह दूसरा पुरुष कहां से आ गया। तब साधु को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने क्षमा मांगी और मीराबाई से प्रेम से मिले। उनके पति को अपनी गलती का एहसास हुआ। वे वृंदावन जाकर मीराबाई को फिर घर ले आए। लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद वे एक लड़ाई में मारे गए। इसके बाद ससुराल में मीराबाई को तरह- तरह के कष्ट दिए जाने लगे। लेकिन मीराबाई ने अपने शरीर के कष्ट को कष्ट माना ही नहीं। वे तो दिन- रात भगवान कृष्ण के प्रेम में विभोर रहती थीं। धीरे- धीरे उनकी ख्याति पूरे देश में फैल गई। जब पूरा देश उन्हें साध्वी मानने लगा तो घर वालों को लगा- मीराबाई तो उच्चकोटि की साध्वी हैं।

Monday, April 27, 2009

आदि शंकराचार्य


आदि शंकराचार्य सनातन सांस्कृतिक धारा के प्रमाण पुरुषों में गिने जाते हैं। उन्होंने गुरु वन्दना करते हुए लिखा है-
उस गुरु को नमस्कार है, जो सदा गायत्री रूप में स्थित होते हैं, जिनकी अमृत वाणी संसार रूपी विष को नष्ट कर देती है।
यह बडी सारगर्भित वन्दना है, जिसमें गुरुतत्वके प्रति श्रद्धा के साथ ही उसके स्वरूप एवं प्रभाव को भी बडी सुन्दरता के साथ व्यक्त किया गया है। इस श्लोक में चार चरण हैं-गुरु को नमन, गुरु का गायत्री रूप में स्थित होना, गुरु-वाणी अमृत स्वरूप होना, उससे संसार रूपी निन्दा का शमन होना। क्रमश:प्रत्येक चरण के भावों का समीक्षात्मक अध्ययन करें।
गुरु को नमन-गुरु अपने विषय के विशेषज्ञ होते हैं। उनसे अनुदान पाने के लिए श्रद्धा भाव आवश्यक है। गुरु केवल विधि ही नहीं बतलाते, अपनी शक्ति का, अपने प्राणों का एक अंश भी देने में समर्थ होते हैं। जिस प्रकर पानी का प्रवाह ऊपरी सतह से निचली सतह की ओर होता है, उसी प्रकार चेतना-ज्ञान का प्रवाह श्रद्धास्पद व्यक्तित्व की ओर से नमनशीलव्यक्तित्व की ओर होता है। यह सनातन नियम है। व्यक्ति में पात्रता हो, लेकिन वह नमनशीलन हो, अहंकारी हो, तो उसे कल्याणकारी ज्ञान प्राप्त होना और फलित होना असंभव हो जाता है।
यहां नमस्कार केवल शिष्टाचार वाला हो, तो काम नहीं चलेगा। उसे श्रद्धा से प्रेरित होना चाहिए। किंतु समस्या यह आ जाती है कि श्रद्धा हर जगह नहीं झुकती। गुरु में श्रद्धा को आकर्षित करने की शक्ति होनी चाहिए। यदि पाने वाले में श्रद्धा न हो, तो भी बात नहीं बनती और गुरु में श्रद्धास्पद बनने की क्षमता न हो तो भी नमन की स्थिति नहीं बन पाती। शिष्य को नमनशीलश्रद्धालु होना चाहिए, तो गुरु को भी श्रद्धास्पद होना चाहिए। गुरु कैसे होते हैं, यह बात आगे के चरणों में स्पष्ट की गयी है।
गुरु सदा गायत्री रूप हो-भारतीय संस्कृति के अनुसार गुरु तत्व को व्यक्ति रूप में भी पाया जा सकता है और शक्ति रूप में भी। दोनों ही स्थितियों में उसे गायत्री रूप में प्रतिष्ठित होना चाहिए, ऐसा आचार्य शंकर का मत है। गायत्री का अर्थ है, गय-प्राण,त्री-त्रायते,त्रण-उद्धारकरने वाली शक्ति। प्राण तत्व जब ईश्वरीय अनुशासन में बंधकर व्यक्त होता है, तो सृष्टि के विभिन्न घटक बनते हैं। सृष्टि के उद्भव का, उसे प्रकट करने का यह कार्य ईश्वर का- नियन्ता का है। जो प्राण पदार्थ के साथ संयुक्त होकर प्राणी के रूप में स्थापित हो गए, उन्हें प्राण की मुख्यधारा से जोडे रखना ही प्राणों का त्राण करना है।
जीवन की सारी क्रियाएं प्राण से ही संचालित होती हैं। प्राण में विकार आ जाने से जीवन की सभी क्रियाएं, सारा जीवन विकार ग्रस्त हो जाता है। शारीरिक-मानसिक रोग, तनाव, पाप-वृत्तियां सब इसी प्राण के विकारों की ही उपज हैं। प्राण के प्रकटीकरण का कार्य ईश-तत्व का है और उसके त्राण का कार्य गुरु तत्व का है। इसीलिए गुरु को गायत्री रूप में-प्राणों का त्राण करने वाली साम‌र्थ्य के रूप में सदैव प्रतिष्ठित रहना आवश्यक है। भारतीय संस्कृति में ऋषियों ने इसीलिए यह व्यवस्था बनाई है कि यदि व्यक्ति रूप में गुरु की प्राप्ति न हो सके, तो मन्त्र रूप-शक्ति रूप में गायत्री विद्या को गुरु मानकर आत्म-लाभ किया जा सकता है। इसीलिए अनादि काल से गायत्री मंत्र को गुरु मंत्र के रूप में ऋषियों ने प्रतिष्ठित रखा है।
संसार का विष और गुरु वचनों का अमृत- प्राणी संसार में ही रहता है। यह संसार सत् एवं असत्, अमृत तथा मरणशील तत्वों के संयोग से बना है। जीवन की कलाकारिता इसी में है कि संसार में संव्याप्तविष से बचते हुए व अमृत का उपयोग करते हुए आगे बढा जाए। विष के संसर्ग से प्राण पीडित होते हैं और अमृत के संसर्ग से वे आनंदित होते हैं। प्राणों के विषों की ओर आकर्षित होने से रोक कर उसे अमृत की ओर प्रेरित करने की जीवन कला सिखाने का कार्य गुरु का है। यदि प्राण में विष को नकारने की या अमृत की ओर गतिशील होने की क्षमता नहीं रह गयी है, तो उचित उपचार द्वारा दुर्बल प्राणों को पुन:तेजस्वी बनाना भी गुरु अपने परिष्कृत और प्रखर प्राणों के संयोग से करते हैं।
सही दिशा की प्रेरणा का प्राथमिक प्रवाह वाणी से ही प्रकट होता है। गुरु उस अमृत तत्वयुक्तवाणी को प्रगट करता है और शिष्य उसे धारण करता है। वाणी के साथ समाविष्ट अमृत रूप प्राण शिष्य में स्थित होकर उसकी साधना से परिपक्व होता है। वही परिपक्व प्राण उसे अमृतत्व की दिशा में प्रेरित करता है, गति देकर सद्गति का अधिकारी बनाता है। गायत्री महामंत्र में भी यही चार चरण हैं, भूर्भुव:स्व: में व्याप्त उस महाप्राण को गुरु रूप में नमन्, उसके वरणीय देवत्व युक्त भर्गतेज प्राण को सविता सर्वप्रेरकरूप में स्वीकार करना, उस अमृत प्राण प्रवाह को अपने अंत:करण में धारण करना तथा उस महाप्राण द्वारा जीवन को संचालित किया जाना। आदि शंकाराचार्य द्रष्टा थे, शिव रूप में थे।

Saturday, April 25, 2009

कैसे त्रस्त करता है हमें अनावश्यक तनाव


विनय बिहारी सिंह

एक पुरानी कथा है- एक राजा को योग्य प्रधानमंत्री नहीं मिल रहा था। उसने तमाम तरह की परीक्षाएं लीं। चुनते- चुनते तीन लोग बच गए। इनमें से एक को प्रधानमंत्री चुना जाना था। इनसे कहा गया कि राजा के पास एक रहस्यमय ताला है। जो इस ताले को खोलेगा, वही इस राज्य का प्रधानमंत्री बना दिया जाएगा। इन तीनों में से दो ने रात भर ताले की तकनीक वाली किताबें पढ़ीं। काफी खोजबीन की। लेकिन तीसरा व्यक्ति निश्चिंत था। वह आराम से सो रहा था। सुबह हुई। इन तीनों को एक कमरे में लगे बंद ताले के पास ले जाया गया। फिर कहा गया- जो इस ताले को खोल देगा, उसे प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा अभी कर दी जाएगी। जिन दो ने रात भर ताले की तकनीक पर शोध किया था, वे तुरंत अपनी किताबों में उलझ गए और कहा कि तीन घंटे का उन्हें समय दिया जाए। लेकिन तीसरा व्यक्ति चुपचाप ताले के पास गया औऱ उसे जोर से खींच कर देखा- ताला खुल गया। राजा ने उसे ही प्रधानमंत्री बनाने का एलान कर दिया। फिर राजा ने उन दो लोगों को बुलाया औऱ कहा- सबसे पहले चेक कर लें कि समस्या दरअसल है भी या नहीं। आप लोग तो प्रश्न सुनते ही किताबों के पन्ने पर पन्ने पलटने लगे। ये भी नहीं देखा कि आखिर ताले में कोई समस्या है भी या नहीं। हम मनुष्य भी लगभग इसी तरह के स्वभाव वाले हैं। भविष्य की अनावश्यक चिंताओं में इस तरह घिरे रहते हैं कि सच्चाई की तरफ देखने की फुरसत ही नहीं मिलती। ऐसा अनेक बार होता है कि जिस आशंका से हम मरे जा रहे हैं, वह चीज होती ही नहीं। तब हमें लगता है- मैं तो बेकार ही इस आशंका को सिर पर लादे तनाव में मर रहा था। संतों ने इसीलिए कहा है- वर्तमान में जीओ। जो बीत गया उसे भूल जाओ। पुरानी गलतियां न हों, बस इसी का खयाल रखना चाहिए। वर्तमान अगर सुधर गया तो भविष्य अपने आप सुधर जाएगा। लेकिन मनुष्य ने अपने मन को इतना जटिल बना लिया है कि सहज उपाय भी है, यह सोच नहीं पाता। संतों ने कहा है- सिर्फ ईश्वर की शरण में रहो, वह तुम्हारा ख्याल खुद करेगा। रामकृष्ण परमहंस कहते थे- बिल्ली का बच्चा बनो, बंदर का बच्चा नहीं। बिल्ली अपने बच्चे को मुंह में दबाए रहती है। जहां बच्चे को रखती है, वहां वह मस्ती से म्याऊं, म्याऊं करता रहता है। लेकिन बंदर का बच्चा खुद अपनी मां का पेट पकड़े रहता है कि कहीं गिर न जाए। भगवान जब हमें खुद पकड़ लेंगे तो फिर डर किस बात का? हम क्यों न ऐसा करें कि भगवान खुद हमें पकड़ लें। हम भगवान को न पकड़ें। लेकिन भगवान तभी पकड़ेंगे जब हम उनकी पूर्ण शरणागति में जाएंगे।

Friday, April 24, 2009

शिव की महिमा


शिव की महिमा अनंत है। उनके रूप, रंग और गुण अनन्य हैं। समस्त सृष्टि शिवमयहै। सृष्टि से पूर्व शिव हैं और सृष्टि के विनाश के बाद केवल शिव ही शेष रहते हैं। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, परंतु जब सृष्टि का विस्तार संभव न हुआ तब ब्रह्मा ने शिव का ध्यान किया और घोर तपस्या की। शिव अ‌र्द्धनारीश्वर रूप में प्रकट हुए। उन्होंने अपने शरीर के अ‌र्द्धभागसे शिवा (शक्ति या देवी) को अलग कर दिया। शिवा को प्रकृति, गुणमयीमाया तथा निर्विकार बुद्धि के नाम से भी जाना जाता है। इसे अंबिका, सर्वलोकेश्वरी,त्रिदेव जननी, नित्य तथा मूल प्रकृति भी कहते हैं। इनकी आठ भुजाएं तथा विचित्र मुख हैं। अचिंत्य तेजोयुक्तयह माया संयोग से अनेक रूपों वाली हो जाती है। इस प्रकार सृष्टि की रचना के लिए शिव दो भागों में विभक्त हो गए, क्योंकि दो के बिना सृष्टि की रचना असंभव है। शिव सिर पर गंगा और ललाट पर चंद्रमा धारण किए हैं। उनके पांच मुख पूर्वा, पश्चिमा, उत्तरा,दक्षिणा तथा ऊध्र्वाजो क्रमश:हरित,रक्त,धूम्र,नील और पीत वर्ण के माने जाते हैं। उनकी दस भुजाएं हैं और दसों हाथों में अभय, शूल, बज्र,टंक, पाश, अंकुश, खड्ग, घंटा, नाद और अग्नि आयुध हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वह त्रिशूल धारी, प्रसन्नचित,कर्पूर गौर भस्मासिक्तकालस्वरूपभगवान हैं। उनकी भुजाओं में तमोगुण नाशक सर्प लिपटे हैं। शिव पांच तरह के कार्य करते हैं जो ज्ञानमय हैं। सृष्टि की रचना करना, सृष्टि का भरण-पोषण करना, सृष्टि का विनाश करना, सृष्टि में परिवर्तनशीलतारखना और सृष्टि से मुक्ति प्रदान करना। कहा जाता है कि सृष्टि संचालन के लिए शिव आठ रूप धारण किए हुए हैं। चराचर विश्व को पृथ्वी रूप धारण करते हुए वह शर्वअथवा सर्व हैं। सृष्टि को संजीवन रूप प्रदान करने वाले जलमयरूप में वह भव हैं। सृष्टि के भीतर और बाहर रहकर सृष्टि स्पंदित करने वाला उनका रूप उग्र है। सबको अवकाश देने वाला, नृपोंके समूह का भेदक सर्वव्यापी उनका आकाशात्मकरूप भीम कहलाता है। संपूर्ण आत्माओं का अधिष्ठाता, संपूर्ण क्षेत्रवासी, पशुओं के पाश को काटने वाला शिव का एक रूप पशुपति है। सूर्य रूप से आकाश में व्याप्त समग्र सृष्टि में प्रकाश करने वाले शिव स्वरूप को ईशान कहते हैं। रात्रि में चंद्रमा स्वरूप में अपनी किरणों से सृष्टि पर अमृत वर्षा करता हुआ सृष्टि को प्रकाश और तृप्ति प्रदान करने वाला उनका रूप महादेव है। शिव का जीवात्मा रूप रुद्र कहलाता है। सृष्टि के आरंभ और विनाश के समय रुद्र ही शेष रहते हैं। सृष्टि और प्रलय, प्रलय और सृष्टि के मध्य नृत्य करते हैं। जब सूर्य डूब जाता है, प्रकाश समाप्त हो जाता है, छाया मिट जाती है और जल नीरव हो जाता है उस समय यह नृत्य आरंभ होता है। तब अंधकार समाप्त हो जाता है और ऐसा माना जाता है कि उस नृत्य से जो आनंद उत्पन्न होता है वही ईश्वरीय आनंद है। शिव,महेश्वर, रुद्र, पितामह, विष्णु, संसार वैद्य, सर्वज्ञ और परमात्मा उनके मुख्य आठ नाम हैं। तेईस तत्वों से बाहर प्रकृति,प्रकृति से बाहर पुरुष और पुरुष से बाहर होने से वह महेश्वर हैं। प्रकृति और पुरुष शिव के वशीभूत हैं। दु:ख तथा दु:ख के कारणों को दूर करने के कारण वह रुद्र कहलाते हैं। जगत के मूर्तिमान पितर होने के कारण वह पितामह, सर्वव्यापी होने के कारण विष्णु, मानव के भव रोग दूर करने के कारण संसार वैद्य और संसार के समस्त कार्य जानने के कारण सर्वज्ञ हैं। अपने से अलग किसी अन्य आत्मा के अभाव के कारण वह परमात्मा हैं। कहा जाता है कि सृष्टि के आदि में महाशिवरात्रि को मध्य रात्रि में शिव का ब्रह्म से रुद्र रूप में अवतरण हुआ, इसी दिन प्रलय के समय प्रदोष स्थिति में शिव ने ताण्डव नृत्य करते हुए संपूर्ण ब्रह्माण्ड अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से नष्ट कर दिया।

Thursday, April 23, 2009

कोई मधुर संगीत, कोई सुंदर दृश्य


विनय बिहारी सिंह
आप एक खूबसूरत फूल देखते हैं और आपको बहुत अच्छा लगता है। आप कोई अच्छा सा प्राकृतिक दृश्य देखते हैं, और वह आपके दिल को भा जाता है। आप कोई मधुर संगीत सुनते हैं और वह आपके दिल में उतर जाता है। आप कोई सुंदर सी चिड़िया देखते हैं और वह आपको अच्छी लगती है। कोयल की कूक आपको कई सुंदर चीजों की याद दिला देती है। यह सब क्या ईश्वर की याद नहीं दिलाते? क्या मोहक चीजें ईश्वर की याद नहीं दिलातीं? यह भी कितना दिलचस्प है कि ईश्वर अदृश्य रह कर भी हमेशा हमारे भीतर और बाहर रहता है। जरा सा तमाम चिंताओं और परेशानियों से मुक्त हो कर शांति में ईश्वर की प्रार्थना हमें कितना सुकून देती है। कई लोग तो दिन शुरू होते ही सबसे पहले ईश्वर की प्रार्थना या पूजा- पाठ या ध्यान करते हैं औऱ दिन भर तरोताजा रहते हैं। हमारी एकाग्रचित्त पुकार सुन कर ईश्वर भी हमारे साथ बातचीत करते हैं, लेकिन हमारा दिमाग इतना चंचल होता है कि हम उस परमपिता की आवाज सुन नहीं पाते। एक संत ने कहा है- हे ईश्वर, तुम मुझे जैसे चाहो रखो, लेकिन अपना प्यार देते रहो। बस उसी में आनंद है। तुम मुझे कहां रखते हो, कैसे रखते हो, इससे कोई मतलब नहीं मुझे। बस मुझे तुम्हारा प्यार चाहिए। उसी में मेरा सर्वोच्च सुख है। जो लोग अपनी भारी व्यस्तता के बीच भी ईश्वर को याद करते हैं, ईश्वर को प्यार करते हैं, वे कितने भाग्यशाली हैं।