Tuesday, March 31, 2009

शनि ग्रह



विनय बिहारी सिंह


शनि ग्रह का नाम सुनते ही कई लोग भयभीत हो जाते हैं। लेकिन यह डर बेकार ही है। सूर्य से १४०००००००० किलोमीटर दूर यह ग्रह सौर मंडल का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। इस ग्रह हाइड्रोजन और हीलियम से भरा हुआ है। इसमें भी हाइड्रोजन ज्यादा है। सूर्य की एक बार परिक्रमा करने में शनि को करीब २९ साल ६ महीने लगते हैं। यह एक मात्र ऐसा ग्रह है जो सूर्य से सबसे दूर है और पानी से कम घनत्व वाला भी है। सन १९८० में वोएगर- १ उपग्रह ने इसकी जो तस्वीरें भेजीं उससे इसके बारें में जानकारी मिलनी शुरू हुई। उसके अगले साल यानी १९८१ में वोएगर-२ उपग्रह भेजा गया था जिसने शनि के सतह की व्यापक जानकारी दी थी। उसके बाद कैसीनी उपग्रह ने इस ग्रह की सतह और वलयों की जानकारी और फोटो भेजे। तब काफी कुछ इस ग्रह के बारे में पता चला। मजे की बात तो यह है कि शनि ग्रह पर हाइड्रोजन और हीलियम का राज है तो उसके चारो तरफ वाले वलय यानी रिंग में आक्सीजन है। यानी शनि ग्रह और उसके वलय का वातावरण अलग- अलग है। वृहस्पति, यूरेनस और नेप्चून के साथ इसे भी अंग्रेजी में गैस जियांट कहते हैं। शनि ग्रह के नाम से कई लोग डर जाते हैं। जहां सुना कि शनि की साढ़े साती या ढैया है तो बस डर गए। अभी शनि वक्री है (यह लेख ३१ मार्च २००९ को लिखा जा रहा है) और मई २००९ के आखिर तक वक्री रहेगा। लेकिन आपको बता दें, शनि की साढ़े साती में ही मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने थे। इसलिए साढ़े साती में आदमी का जीवन नष्ट नहीं हो जाता। जब साढ़े साती या ढैया नहीं भी रहती है तो भी तो आदमी को परेशानी होती ही है। लेकिन हां कुछ सावधानियां बरतनी होती हैं जिससे राहत मिलती है। इसमें शनिवार को नमक न खाना जैसे उपाय काम करते हैं। जिनके ऊपर शनि का प्रभाव है वे हैं- सिंह औऱ कन्या। चूंकि शनि वक्री है और अभी सिंह राशि में है तो कुछ ज्योतिषियों का मत है कि इसका प्रभाव कर्क राशि पर भी पड़ रहा है। लेकिन मैं विनम्रता के साथ कहना चाहता हूं कि कर्क क्या, सिंह राशि पर भी इसका प्रभाव न के बराबर है और ऐसी स्थिति मई के अंत तक रहेगी।

Monday, March 30, 2009

शुक्र ग्रह



विनय बिहारी सिंह


आइए आज शुक्र की बात करें। जब टेलीस्कोप का अविष्कार नहीं हुआ था तभी पाइथागोरस ने इसका पता लगा लिया था। यह छठवीं शताब्दी की बात है। फिर १७वीं शताब्दी में गैलीलियो ने इसकी सतह पर क्या है, इस पर विस्तार से शोध किया। शुक्र या वीनस रोमन गाडेस यानी देवी है। यह आकाश में चमकने वाले ग्रहों में चंद्रमा के बाद दूसरा सबसे चमकीला ग्रह है। यह बुध के बाद दूसरा ग्रह है जो सूर्य के सबसे करीब है। १९८० में पायनियर वीनस आर्बिटर ने जाकर यह जानकारी भेजी कि शुक्र का मैग्नेटिक फील्ड या चुंबकीय ताकत पृथ्वी की तुलना में कमजोर है। सूर्य से १०८ किलोमीटर दूर यह ग्रह मनुष्य के सौंदर्य और प्यार को प्रभावित करने वाला माना जाता है। लेकिन यह तो ज्योतिषीय व्याख्या हुई। वैग्यानिक दृष्टि से तो शुक्र ग्रह पर सल्फ्यूरिक एसिड और सल्फर डाई आक्साइड के बादल छाए रहते हैं। जापान के संगठन जाक्सा ने अगले साल शुक्र पर एक उपग्रह भेजने की योजना बनाई है। शुक्र ग्रह पर किस गैस का प्राधान्य है? आप सुन कर चौंकेंगे। यहां कार्बन डाई आक्साइड का बोलबाला है। यानी आक्सीजन का प्रचुर भंडार लेकर शुक्र ग्रह पर जाना होता है। आइए अब ज्योतिषीय व्याख्या पर एक नजर डालें। पहले ही कहा जा चुका है कि शुक्र सौंदर्य और प्रेम का प्रतीक है। अलग अलग कुंडलियों में शुक्र का अलग अलग प्रभाव होता है। अगर शुक्र और मंगल का समीकरण गड़बड़ होगा तो मनुष्य के चरित्र पर इसका गहरा असर होगा। पुरुष हो या नारी शुक्र का उस पर प्रभाव पड़ता ही है। शुक्र ग्रह अगर बलवान और लाभकारी हो तो मनुष्य के जीवन में सुख समृद्धि भी लाता है, लेकिन साथ ही विलासी भी बना देता है।

Saturday, March 28, 2009

एक और अंतर



विनय बिहारी सिंह


अब आइए उस प्रसंग को देखें जब हनुमान जी अशोक वाटिका में सीता जी को देखते हैं। इसे वाल्मीकि और तुलसी रामायण में अलग- अलग ढंगों से किस तरह लिखा गया है। वाल्मीकि का जीवन काल १०० ईस्वी पूर्व से ४०० ईस्वी पूर्व के बीच माना जाता है। जबकि तुलसी दास का जन्म सन १५३२ और देहांत १६२३ ईस्वी में हुआ था। यानी दोनों रामायणों के लेखन काल में १६०० वर्षों का अंतर है। स्वाभाविक है- काल खंड के कारण भी कुछ अंतर आ ही जाएगा।

पहले वाल्मीकि रामायण का अंश-

सीता के निराशा भरे वचनों को सुन कर पवनपुत्र हनुमान अपने मन में विचार करने लगे कि अब इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि यह ही जनकनन्दिनी जानकी हैं जो अपने पति के वियोग में व्यकुल हो रही हैं। यही वह समय है, जब इन्हें धैर्य की सबसे अधिक आवश्यकता है। इस प्रकार निश्चय करके हनुमान मन्द-मन्द मृदु स्वर में आर्य भाषा में, जो राक्षस समुदाय के लिये एक अपरिचित भ瓥ाषा थी, बोलने लगे - "इक्ष्वाकुओं के कुल में परमप्रतापी, तेजस्वी, यशस्वी एवं धन-धान्य समृद्ध विशाल पृथ्वी के स्वामी चक्रवर्ती महाराज दशरथ हुये हैं। उनके ज्येष्ठ पुत्र उनसे भी अधिक तेजस्वी, परमपराक्रमी, धर्मपरायण, सर्वगुणसम्पन्न, अतीव दयानिधि श्री रामचन्द्र जी अपने पिता द्वारा की गई प्रतिज्ञा का पालन करने के लिये अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ जो उतने ही वीर, पराक्रमी और भ्रातृभक्त हैं, चौदह वर्ष की वनवास की अवधि समाप्त करने के लिये अनेक वनों में भ्रमण करते हुये चित्रकूट में आकर निवास करने लगे। उनके साथ उनकी परमप्रिय पत्नी महाराज जनक की लाड़ली सीता जी भी थीं। वनों में ऋषि-मुनì瓥;यों को सताने वाले राक्षसों का उन्होंने सँहार किया। लक्ष्मण ने जब दुराचारिणी शूर्पणखा के नाक-कान काट लिये तो उसका प्रतिशोध लेने के लिये उसके भाई खर-दूषण उनसे युद्ध करने के लिये आये जिनको रामचन्द्र जी ने मार गिराया और उस जनस्थान को राक्षसविहीन कर दिया। जब लंकापति रावण को खर-दूषण की मृत्यु का समाचार मिला तो वह अपने मित्र मारीच को ले कर छल से जानकी का हरण करने के लिये पहुँचा। मायावी मारीच ने एक स्वर्ण मृग का रूप धारण किया, जिसे देख कर जानकी जी मुग्ध हो गईं। उन्होंने राघवेन्द्र को प्रेरित कर के उस माया मृग को पकड़ कर या मार कर लाने के लिये भेजा। दुष्ट मारीच ने मरते-मरते राम के स्वर में 'हा सीते! हा लक्ष्मण!' कहा था। जानकी जी भ्रम में पड़ गईं और लक्ष्मण को राम की सुधि लेने के लिये भेजा। लक्ष्मण के जाते ही रावण ने छल &#瓥3े सीता का अपहरण कर लिया। लौट कर राम ने जब सीता को न पाया तो वे वन-वन घूम कर सीता की खोज करने लगे। मार्ग में वानरराज सुग्रीव से उनकी मित्रता हुई। मुग्रीव ने अपने लाखों वानरों को दसों दिशाओं में जानकी जी को खोजने के लिये भेजा. मुझे भी आपको खोजने का काम सौंपा गया। मैं चार सौ कोस चौड़े सागर को पार कर के यहाँ पहुँचा हूँ। श्री रामचन्द्र जी ने जानकी जी के रूप-रंग, आकृति, गुणों आदि का जैसे वर्णन किया था, उस शुभ गुणों वाली देवी को आज मैंने देख लिया है।" यह कर कर हनुमान चुप हो गये। राम के वियोग में तड़पती हुई सीता के कानों में जब हनुमान द्वारा सुनाई गई यह अमृत कथा पहुँची तो वे विस्मय से चौंक उठीं। इस राक्षस पुरी में राम की पावन कथा सुनाने वाला कौन आ गया? उन्होंने अप&#瓥344;े मुखमण्डाल पर छाई हुई केश-राशि को हटा कर चारों ओर देखा, परन्तु उस कथा को सुनाने वाले व्यक्ति को वे नहीं देख सकीं। उन्हें यह तो आभास हो रहा था कि यह स्वर उन्होंने उसी वृक्ष पर से सुना है जिसके नीचे वे खड़ी थीं। उन्होंने फिर ध्यान से ऊपर की ओर देखा। बड़े ध्यान से देखने पर उन्हें वृक्ष की घनी पत्तियों में छिपी हनुमान की तेजस्वी आकृति दिखाई दी। उन्होंने कहा, "भाई! तुम कौन हो? नीचे उतर कर मेरे सम्मुख क्यों नहीं आते?"सीता का निर्देश पाकर हनुमान वृक्ष से धीरे-धीरे नीचे उतरे और उनके सामने आ हाथ जोड़ कर बोले, "हे देवि! आप कौन हैं जो मुझसे वार्तालाप करना चाहती हैं? आपका कोमल शरीर सुन्दर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होने योग्य होते हुये भी आप इस प्रकार का नीरस जीवन व्यतीत कर रही हैं। आपके अश्रु भरे नेत्रों से ज्ञात होता है -आप अत्यन्त दुःखी हैं। आपको देख कर ऐसा प्रतीत होता है किस आप आकाशमण्डल से गिरी हुई रोहिणी हैं। आपके शोक का क्या कारण है?

अब यही प्रसंग तुलसी रामायण (ramcharitmanas) में देखें-

विभीषणजी ने (माता के दर्शन की) सब युक्तियाँ (उपाय) कह सुनाईं। तब हनुमान्‌जी विदा लेकर चले। फिर वही (पहले का मसक सरीखा) रूप धरकर वहाँ गए, जहाँ अशोक वन में (वन के जिस भाग में) सीताजी रहती थीं॥3॥

* देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि

तनु सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥4॥

भावार्थ:-सीताजी को देखकर हनुमान्‌जी ने उन्हें मन ही में प्रणाम किया। उन्हें बैठे ही बैठे रात्रि के चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला हो गया है, सिर पर जटाओं की एक वेणी (लट) है। हृदय में श्री रघुनाथजी के गुण समूहों का जाप (स्मरण) करती रहती हैं॥4॥ दोहा :

* निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल दुखी भा पवनसुत देखि जानकी

:-श्री जानकीजी नेत्रों को अपने चरणों में लगाए हुए हैं (नीचे की ओर देख रही हैं) और मन श्री रामजी के चरण कमलों में लीन है। जानकीजी को दीन (दुःखी) देखकर पवनपुत्र हनुमान्‌जी बहुत ही दुःखी हुए॥8॥

सोरठा :* कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि

असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥12॥

भावार्थ:-तब हनुमान्‌जी ने हदय में विचार कर (सीताजी के सामने) अँगूठी डाल दी, मानो अशोक ने अंगारा दे दिया। (यह समझकर) सीताजी ने हर्षित होकर उठकर उसे हाथ में ले लिया॥12॥

चौपाई :* तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति

चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥1॥

भावार्थ:-तब उन्होंने राम-नाम से अंकित अत्यंत सुंदर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगूठी को पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषाद से हृदय में अकुला उठीं॥1॥

* जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं

मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥2॥

भावार्थ:-(वे सोचने लगीं-) श्री रघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी (माया के उपादान से सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनाई नहीं जा सकती। सीताजी मन में अनेक प्रकार के विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमान्‌जी मधुर वचन बोले-॥2॥

* रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख

सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥३

भावार्थ:-वे श्री रामचंद्रजी के गुणों का वर्णन करने लगे, (जिनके) सुनते ही सीताजी का दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं। हनुमान्‌जी ने आदि से लेकर अब तक की सारी कथा कह सुनाई॥3॥

* श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन

हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ॥4॥

भावार्थ:-(सीताजी बोलीं-) जिसने कानों के लिए अमृत रूप यह सुंदर कथा कही, वह हे भाई! प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमान्‌जी पास चले गए। उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख फेरकर) बैठ गईं? उनके मन में आश्चर्य हुआ॥4॥

* राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान

मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥५

भावार्थ:-(हनुमान्‌जी ने कहा-) हे माता जानकी मैं श्री रामजी का दूत हूँ। करुणानिधान की सच्ची शपथ करता हूँ, हे माता! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। श्री रामजी ने मुझे आपके लिए यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है॥5॥

* नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥6॥

भावार्थ:-(सीताजी ने पूछा-) नर और वानर का संग कहो कैसे हुआ? तब हनुमानजी ने जैसे संग हुआ था, वह सब कथा कही॥6॥

दोहा :* कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वासजाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥१३

भावार्थ:-हनुमान्‌जी के प्रेमयक्त वचन सुनकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न हो गया, उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन और कर्म से कृपासागर श्री रघुनाथजी का दास है॥13॥

Friday, March 27, 2009

वाल्मीकि और तुलसी रामायण में क्या अंतर है?


विनय बिहारी सिंह

वाल्मीकि और तुलसी रामायण क्या कोई अंतर है? आप कहेंगे नहीं। दोनों में ही भगवान के दिव्य गुणों और पराक्रम का वर्णन है। लेकिन दोनों ऋषियों के वर्णन का अंतर भी देखना सुखद है। आइए इस सुख में हम भी शामिल हों। सुंदरकांड को ही लें। वाल्मीकि रामायण में लिखा है-
समुद्र के तटवर्ती शैल पर चढ़ कर हनुमान अपने साथी वानरों से बोले, "मित्रों! अब तुम मेरी ओर से निश्चिन्त हो कर श्री रामचन्द्र जी का स्मरण करो। मैं अब अपने अन्दर ऐसी शक्ति का अनुभव कर रहा हूँ जिसके बल पर मैं आकाश मार्ग से उड़ता हुआ सामने फैले हुये सागर से भी दस गुना बड़े सागर को पार कर सकता हूँ" इतना कह कर हनुमान जी पूर्वाभ्यास के रूप में उस विशाल पर्वत की चोटियों पर इधर-उधर कूदने लगे। इसके पश्चात् उन्होंने अपने शरीर को झटका दे कर एक विशाल वृक्ष को अपनी भुजाओं में भर कर इस प्रकार झकझोरा कि उसके सभी फूल पत्ते झड़ कर पृथ्वी पर फैल गये। फिर वर्षाकालीन घनघोर बादल की भाँति गरजते हुये उन्होंने अपनी दोनों भुजाओं और पैरों को सिकोड़ कर, प्राण वायु को रोक उछलने की तैयारी करते हुये पुनः वानरों को सम्बोधित किया, "हे भाइयों! जिस तीव्र गति से रामचन्द्र जी का बाण चलता है, उसी तीव्र गति से उनके आशीर्वाद से मैं लंका में जाउँगा और वहाँ पहुँच कर सीता जी की खोज करूँगा। यदि वहाँ भी उनका पता न चला तो रावण को पकड़ कर रामचन्द्र जी के चरणों लाकर पटक दूँगा। आप विश्वास रखें कि मैं निष्फल हो कर कदापि नहीं लौटूँगा।"
तुलसी रामायण (रामचरितमानस) में लिखा है-हनुमान्‌जी का लंका को प्रस्थान, सुरसा से भेंट, छाया पकड़ने वाली राक्षसी का वध
चौपाई :* जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥

तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥1॥

भावार्थ:-जाम्बवान्‌ के सुंदर वचन सुनकर हनुमान्‌जी के हृदय को बहुत ही भाए। (वे बोले-) हे भाई! तुम लोग दुःख सहकर, कन्द-मूल-फल खाकर तब तक मेरी राह देखना॥1॥

* जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥2॥

भावार्थ:-जब तक मैं सीताजी को देखकर (लौट) न आऊँ। काम अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदय में श्री रघुनाथजी को धारण करके हनुमान्‌जी हर्षित होकर चले॥2॥

* सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥

बार-बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥3॥

भावार्थ:-समुद्र के तीर पर एक सुंदर पर्वत था। हनुमान्‌जी खेल से ही (अनायास ही) कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े और बार-बार श्री रघुवीर का स्मरण करके अत्यंत बलवान्‌ हनुमान्‌जी उस पर से बड़े वेग से उछले॥3॥

* जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥

जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥4॥

भावार्थ:-जिस पर्वत पर हनुमान्‌जी पैर रखकर चले (जिस पर से वे उछले), वह तुरंत ही पाताल में धँस गया। जैसे श्री रघुनाथजी का अमोघ बाण चलता है, उसी तरह हनुमान्‌जी

चले॥4॥

* जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥5॥

भावार्थ:-समुद्र ने उन्हें श्री रघुनाथजी का दूत समझकर मैनाक पर्वत से कहा कि हे मैनाक! तू इनकी थकावट दूर करने वाला हो (अर्थात्‌ अपने ऊपर इन्हें विश्राम दे)॥5॥

दोहा :* हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥1॥

भावार्थ:-हनुमान्‌जी ने उसे हाथ से छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा- भाई! श्री रामचंद्रजी का काम किए बिना मुझे विश्राम कहाँ?॥1॥

चौपाई :* जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥

सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥1॥

भावार्थ:-देवताओं ने पवनपुत्र हनुमान्‌जी को जाते हुए देखा। उनकी विशेष बल-बुद्धि को जानने के लिए (परीक्षार्थ) उन्होंने सुरसा नामक सर्पों की माता को भेजा.

Thursday, March 26, 2009

नारद भक्ति सूत्र



विनय बिहारी सिंह


आइए आज नारद भक्ति सूत्र की बात करें। नारद मुनि योग, ग्यान और भक्ति के मिश्रण थे। उन्हें विष्णु का अवतार कहा जाता है। दो ग्रंथ अत्यंत प्रामाणिक माने जाते हैं- नारद जी का लिखा नारद सूत्र और शांडिल्य ऋषि का लिखा- भक्ति मीमांसा। नारद भक्ति सूत्र इसलिए भी प्रामाणिक है क्योंकि वह पूरी तरह अनुभव पर आधारित है। यह बात विख्यात है कि नारद जी किसी भी लोक या देवता से मिल सकते हैं। उन्हें कहीं भी जाने में क्षण भर लगता है। आइए नारद भक्ति सूत्र के कुछ अंश देखें-

वह तो (भक्त) ईश्वर में परम प्रेम रूपा है और अमृत स्वरूप है। उसे पाकर मनुष्य सिद्ध हो जाता है, अमर हो जाता है, तृप्त हो जाता है। न शोक करता है, द्वेष करता है, न विषयों में रमण करता है। जिसको जान कर (भक्त) उन्मत्त हो जाता है, स्तब्ध हो जाता है और आत्म संतुष्ट रहता है। भक्तिमान मनुष्य के मन में कामनाएं नहीं रहतीं। ईश्वर में ही अनन्यता और ईश्वर के विरुद्ध विषयों में उदासीनता रहती है। आवश्यक सांसारिकता आदि को निभाते रहना चाहिए, जैसे- स्नान, भोजन आदि कर्म शरीर के निर्वाह के लिए जरूरी है। पूजा आदि के प्रति अनुराग भी भक्ति है। गर्ग मुनि के मुताबिक भागवत आदि कथाओं में रुचि होना भी भक्त के लक्षण हैं। भगवान पर अपना सब कुछ छोड़ कर, उन्हें भूल जाने पर व्याकुल हो जाना अनन्य भक्त के लक्षण हैं। भगवान के महात्म्य को जाने बिना उनसे प्रेम, साधारण प्रेम कहा जाता है। भक्ति योग, ग्यान योग और कर्म योग से भी बड़ा है। क्योंकि ग्यान औऱ कर्म योग से भक्ति मिलती है। जैसे राजा भोजन और वस्त्र सिर्फ देख कर ही संतुष्ट नहीं होता, उसका भोग भी आवश्यक है, उसी तरह भक्त के लिए भक्ति की बात पढ़ना या सुनना संतुष्टिदायक नहीं होता। भक्त तो खुद भगवान को महसूस करना चाहता है। बिना रुके भगवान को याद करना, लोगों से घिरे हो कर भी, भगवान में मन लगे रहना और निरंतर उनका स्मरण, सिद्ध महात्माओं का संग मिलना व्यर्थ नहीं जाता। लेकिन ऐसे महात्माओं का मिलना ईश्वर की कृपा से ही संभव है। भगवान में और सत में कोई अंतर नहीं है। भगवत प्राप्ति के लिए गहरी साधना जरूरी है। बुरी संगत सदा के लिए त्याग देनी चाहिए। काम और क्रोध बुद्धि को नष्ट कर देते हैं और ये साधना में बाधा हैं। सच्चा भक्त लाभ और रक्षा के लिए चिंता नहीं करता। वह तो भगवान में हमेशा ही डूबा रहता है। यह था नारद भक्ति सूत्र का एक छोटा सा अंश। इसे पढ़ कर सचमुच मन पवित्र होता है।

Wednesday, March 25, 2009

स्टेम सेल से बन सकता है सिंथेटिक खून


विनय बिहारी सिंह

आखिर इंग्लैंड के वैग्यानिकों ने भ्रूण के स्टेम सेल से सिंथेटिक खून बनाने का कमाल कर ही दिया। हमारे ऋषि- मुनियों ने न जाने कितने लोगों को नया जीवन दिया है। किसी बीमार व्यक्ति को वे तत्काल स्वस्थ कर देते थे। किसी कष्ट से मर रहे व्यक्ति को राहत देते थे और उसका जीवन बचा लेते थे। आज वही काम वैग्यानिक कर रहे हैं। इससे हमारे ऋषियों के चमत्कार प्रमाणित ही होते हैं। स्टेम सेल बना खून एकदम स्वस्थ होगा। उसमें कोई त्रुटि नहीं होगी और किसी को भी वह खून दिया जा सकता है। इस तरह अब खून की कमी की समस्या हल हो गई। ये वैग्यानिक ओ- निगेटिव खून बनाने में सफल हो गए हैं। ओ- निगेटिव खून यूनिवर्सल डोनर है यानी यह खून किसी भी ग्रुप के खून वाले को दिया जा सकता है। उसका शरीर ओ- निगेटिव खून स्वीकार कर लेगा। मान लीजिए कि आपका ब्लड ग्रुप ए- पाजिटिव है। और आपके शरीर में बी- पाजिटिव खून डाल दिया गया तो आपका जीवन खतरे में पड़ जाएगा। लेकिन अगर आपको ओ- निगेटिव ब्लड दिया गया तो आपका शरीर मजे से इसे स्वीकार कर लेगा। ओ- निगेटिव बहुत कम लोगों का खून होता है। पूरी आबादी का सिर्फ ७ प्रतिशत खून ही ओ- निगेटिव होता है। लेकिन अच्छी बात यह है कि यह खून हर ग्रुप के व्यक्ति को दिया जा सकता है। इंग्लैंड के वैग्यानिकों को जितना धन्यवाद दिया जाए, कम है।

Tuesday, March 24, 2009

क्या हमें ईश्वर सर्वाधिक प्रिय हैं?



विनय बिहारी सिंह


हममें से कितने लोग हैं जो ईश्वर से जी भर कर प्यार करते हैं? हमारे जीवन में मां का स्थान सबसे ऊंचा है। मां के प्यार का कोई विकल्प नहीं है (हालांकि मेरी मां मेरे बचपन में ही गुजर गई थीं, तबसे जगन्माता ही मुझे प्यार दे रही हैं) । क्या हम ईश्वर से मां से भी बढ़ कर प्यार कर पाते हैं। ईश्वर से प्यार करने की बात इसलिए क्योंकि उसी ने हमें जीवन दिया है। हम जो सांसें लेते हैं, उसी की कृपा के कारण। हम सबकी सांसें गिनी हुई हैं। जब सांस पूरी हो जाएगी तो हमें अंतिम सांस ले कर इस संसार से विदा लेनी पड़ेगी? क्या आपने कभी सोचा है कि जन्म लेने के पहले आप कहां थे? या मृत्यु के बाद कहां जाएंगे? आपका जीवन जीवन और मृत्यु के बीच वाला हिस्सा भर है। क्या आप जानते हैं कि दूसरों को नुकसान पहुंचाने का विचार आपको भी कभी न कभी नुकसान पहुंचा कर दम लेता है? जी हां, यह सच है। तो सवाल था कि हममें से कितने लोग ईश्वर को दिलो जान से चाहते हैं? क्या हम ईश्वर के लिए कभी भी रोते हैं? नहीं। हम पत्नी के लिए, प्रेमी या प्रेमिका के लिए, मां- पिता के लिए तो रोते हैं। व्यवसाय में नुकसान होने पर तो रोते हैं। लेकिन ईश्वर को दर्शन देने के लिए नहीं रोते। कोई चीज हम नहीं पा सके तो उसका दुख हमें खूब होता है। कोई मौका खो देते हैं तो उसका दुख भी खूब होता है। किसी ने गहरा दुख पहुंचा दिया तो कई अकेले में रोते हैं। लेकिन ईश्वर के लिए बहुत कम लोग रोते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें दिन रात ईश्वर के लिए रोना ही चाहिए। उससे प्रार्थना करनी चाहिए, ध्यान करना चाहिए। उसे हमेशा दिल में रखना चाहिए। लेकिन जब लगे कि उसने आपकी बात का मूक जवाब नहीं दिया, कोई संकेत भी नहीं दिया तो हम शिकायत क्यों न करें। आखिर बचपन में मां से अपनी बात मनवाने के लिए रोते थे या नहीं?