Saturday, January 31, 2009

मन को कैसे चमकाएं?

विनय बिहारी सिंह

रामकृष्ण परमहंस ने कहा था- जैसे लोटे को रोज मांजना पड़ता है, चमकाना पड़ता है, उसी तरह अपने मन को भी साफ- सुथरा करना पड़ता है, वरना उस पर गंदा पड़ता जाएगा और उसका आकर्षण खत्म हो जाएगा। उनके कहने का तात्पर्य यह था कि जैसे साफ कपड़े पहन कर हम बेहतर अनुभव करते हैं। अच्छा खाना खा कर हमारा मन आनंदित हो जाता है, ठीक वैसे ही मन की अच्छी सफाई हो तो मनुष्य भीतर से प्रफुल्लित हो जाता है। उसे गहरी शांति मिलती है। किसी ने उनसे पूछा कि मन की सफाई कैसे हो? तो उन्होंने कहा- थोड़ी देर एकांत में चुपचाप बैठिए और मान लीजिए की इस दुनिया- जहान और झंझटों से आपको कोई मतलब नहीं है। आप तो बस ईश्वर के बेटे हैं। आप ईश्वरीय आनंद में डूबे रहिए। पांच मिनट, दस मिनट या तीन मिनट भी अगर आप इसे करते हैं तो आपको भारी राहत मिलेगी। सबसे बड़ी चीज है ईश्वर से प्रेम। घृणा का जवाब घृणा से मिलता है और प्रेम का जवाब प्रेम से मिलता है। इसीलिए तो कबीर दास ने कहा है-प्रेम न खेतो नीपजेप्रेम न हाट बिकाय प्रेम न खेत में पैदा होता है और न बाजार में बिकता है। प्रेम तो आपके भीतर पैदा होता है। वह जबर्दस्ती तो पैदा ही नहीं किया जा सकता। वह अपने आप ही पैदा हो जाता है। तो ईश्वर के प्रति प्रेम कैसे हो? उसे तो आपने देखा नहीं है? इसका जवाब है- पैदा होने के पहले आप कहां थे? और मरने के बाद आप कहां जाएंगे? यह जो बीच के समय में इस पृथ्वी पर रह रहे हैं, यहां भी आपकी सांसें निश्चित हैं। एक निश्चित संख्या में आपने सांस पूरी कर ली, बस आपका बुलावा किसी दूसरे लोक के लिए हो जाएगा। यह चमत्कार किसका है?? निश्चित रूप से ईश्वर का ही है। इसलिए ईश्वर हमसे प्रेम करता ही है। हमारे पैदा होने पर माता की देह में दूध पैदा कर देता है। हम वह पीकर बड़े होते हैं और बड़ा- बड़ा ग्यान बघारते हैं। फिर अंत में हमारी सांस खत्म हो जाती है और हमारा शरीर मुर्दा हो जाता है। तब हमारी सारी हेकड़ी कहां चली जाती है? ईश्वर हमें प्रेम करता है मां- बाप के रूप में, पत्नी के रूप में, प्रेमिका के रूप में, मित्र के रूप में, एक रोगी को सहानुभूति और दवा के रूप में। भूखे के पास वह भोजन के रूप में आता है। करने वाला वही है। हम नाहक घमंड कर बैठते हैं कि हमने यह किया, वह किया।

Thursday, January 29, 2009

जप में बहुत बड़ी शक्ति

विनय बिहारी सिंह

रामकृष्ण परमहंस से एक व्यक्ति ने पूछा था- हम संसारी लोगों का ध्यान ज्यादा देर तक नहीं लगता। आंख बंद करते हैं तो एक मिनट तक तो ध्यान कर पाते हैं लेकिन उसके बाद मन भटकने लगता है। तब क्या हम लोगों को जप करना चाहिए? तब रामकृष्ण परमहंस ने कहा- हां। जप में बहुत शक्ति है। जैसे- कोई नाव रस्सी से बंधी है तो अगर कोई रस्सी पकड़ ले तो नाव ( भगवान) तक पहुंच सकता है। जप वही रस्सी है। एकाग्र होकर जप करना चाहिए। किस देवता पर एकाग्रचित्त हों? इसका जवाब है- जो आपको पसंद हो। कहां ध्यान करें? इसका जवाब रामकृष्ण परमहंस ने दिया था- या तो हृदय में या दोनों भृकुटियों के बीच में। दोनों भृकुटियों के बीच को ही गीता में नासिकाग्र कहा गया है। नासिकाग्र पर ध्यान करना चाहिए। मान लीजिए यह भी संभव नहीं है। तो किसी भी देवता का ध्यान कर जाप कीजिए। कुछ नहीं तो सिर्फ- राम, राम, राम का हीजाप कीजिए। कुछ संतों ने कहा है कि सांस लीजिए तो मन ही मन रा.... कहिए औऱ सांस छोड़ते वक्त म..... कहिए। यह भी अजपा जाप है। इससे आपका मन शांत होगा। रामकृष्ण परमहंस ने कहा था- ईश्वर में भक्ति हो और मनुष्य जाप करता रहे तो उसका काम बन जाएगा। वे कहते थे- जाप आपके भीतर कई क्षमताएं पैदा कर देता है।

Wednesday, January 28, 2009

लोकनाथ ब्रह्मचारी

विनय बिहारी सिंह

लोकनाथ ब्रह्मचारी १८वीं शताब्दी में ढाका (बांग्लादेश) जिले में रहे और विलक्षण संत के रूप में ख्याति प्राप्त की। उस समय ढाका भारत का ही अंग था। उन्होंने वैसे तो कई दुखी लोगों की मदद की। लेकिन एक घटना बांग्लादेश में आज भी याद की जाती है। यह तो कहने की जरूरत नहीं कि सच्चे संत लोक कल्याण के लिए चमत्कार करते रहे हैं। आइए पहले उस विवरण को जानें। उनके बारे में गोपीनाथ कविराज ने लिखा है कि उनके एक सहपाठी ने इस घटना का जिक्र किया था। इस सहपाठी को मलेरिया ने धर दबोचा। वे महीनों खाट पर पड़े रहे। बहुत इलाज हुआ लेकिन बुखार था कि ठीक ही नहीं हो रहा था। वे दिन पर दिन कमजोर होते जा रहे थे। तब किसी ने कहा कि आप लोकनाथ ब्रह्मचारी के पास जाइए। शायद वे कुछ चमत्कार कर दें। मरता क्या न करता। उनके सहपाठी अपने पिता के साथ ब्रह्मचारी के पास पहुंचे। उनके पिता ने कहा- महात्मा जी इस लड़के का बुखार उतर ही नहीं रहा है। लोकनाथ ब्रह्मचारी ने कहा- तो मैं क्या करूं। डाक्टर को दिखाओ। लड़के के पिता ने कहा- बहुत सारे डाक्टरों को दिखाया लेकिन बुखार उतर नहीं रहा है। लेकिन लोकनाथ ब्रह्मचारी चुपचाप बैठे रहे। लड़के की आंखों से आंसू गिरने लगे। देख कर संत को दया आई। उन्होंने कहा- जाओ इस आश्रम के बगल वाले पोखरे में नहा कर आओ। लड़के को बुखार था लेकिन संत का आदेश कैसे टाले। वह गया और पोखरे से नहा कर आ गया। लोकनाथ ब्रह्मचारी ने कहा अब भात और दही खा लो। आश्रम में भात औऱ दही दोनों थे। थाल में परोस कर आया। लड़के ने बुखार के बावजूद खाया। फिर लोकनाथ ब्रह्मचारी ने कहा- अब घर जाओ। घर पहुंचने के बाद लड़के का बुखार उतर गया। फिर जीवन में उसे दुबारा मलेरिया नहीं हुआ। लोग चकित थे। बुखार में नहा कर दही भात खाना तो भयानक है। लेकिन लोकनाथ ब्रह्मचारी ने यह चमत्कार कर दिया।

Friday, January 23, 2009

हां, ढोंगी साधुओं की भरमार है, लेकिन दिव्य संतों को हम क्यों भूलें


विनय बिहारी सिंह

कुछ मित्रों ने रमण महर्षि पर लिखे मेरे लेख पर टिप्पणी की है, कुछ फोन भी आए हैं। सबका कहना है कि आजकल ढोंगी साधु इतने हो गए हैं कि अब साधु- संतों से घिन आने लगी है। हां मित्रों, यह सच है कि नकली या कहें इंद्रिय लोलुप या भेड़िए साधु के रूप में खूब मिल जाएंगे। आजकल जहां देखिए वही वही नजर आ रहे हैं। लेकिन इस वजह से क्या हम उन संतों को भूल जाएं जिन्होंने इस पृथ्वी को पवित्र किया है? हां, रमण महर्षि ऐसे ही संत थे। ऐसे संतों के बारे में दुबारा- तिबारा पढ़ कर कई चीजें दिमाग में कौंधती हैं, जो एक तरह से अच्छी बात कही जाएगी। एक तो साधना करने वाले दिखाते- बताते नहीं हैं कि वे बहुत पहुंचे हुए संत हैं। दूसरे रबड़ी- मलाई के लिए वे लोलुप व्यक्ति की तरह चक्कर नहीं लगाते रहते। वे धन के लिए चंदा या कपड़ा या और कुछ नहीं मांगते। सच्चे संतों के बारे में मैंने जो भी अध्ययन किया है, उससे यही निकला है कि संत तो जन कोलाहल से दूर कहीं किसी गुफा में या एकांत में बैठ कर साधना करते हैं और उन्हें संसार से कुछ भी नहीं चाहिए। कोई भी इच्छा, मैं फिर से दुहरा रहा हूं- कोई भी इच्छा उनके मन में नहीं होती और उन्हें कुछ नहीं चाहिए। कुछ भी नहीं। वे सिर्फ औऱ सिर्फ ईश्वर से प्रेम करते हैं और इस कारण दुखी, पीडि़त और असहायों की करुणा के कारण मदद करते हैं। न उन्हें रहने के लिए मकान चाहिए, न गाड़ी और न कपड़े। रमण महर्षि जीवन भर एक लंगोटी पहन कर रहे। नंगे बदन। जाड़े में भक्त उन्हें गर्म चादर ओढ़ा देते थे। लेकिन वह तब, जब रमणाश्रम बना और लोगों ने उन्हें वहां रहने की प्रर्थना की। उसके पहले वे जाड़ा, गर्मी और बरसात में एक लंगोटी पहने साधना करते रहते थे। उन्होंने कितने लोगों का कल्याण किया, बीमारियां ठीक कीं, भय, तनाव और क्रोध खत्म किया इसका कोई हिसाब नहीं है। और वह भी मुस्कराते हुए। और रमण महर्षि तो आज हैं नहीं। उनके शरीर छोड़े अनेक वर्ष हो गए। हम उन्हें सिर्फ याद ही कर सकते हैं। यहां तो प्रचार वगैरह वाली भी कोई बात नहीं है। पाल ब्रंटन ने उन पर किताब लिख कर जो कर दिया है उसके एक टुकड़े बराबर भी हम नहीं कर सकते। पुरानी बातों को याद करने की वजह सिर्फ यही है कि हम एक बार फिर मूल्यांकन करें कि आज जो साधु वेश में अनेक भ्रष्ट लोग घूमा करते हैं, वे खुद को ही कलंकित कर रहे हैं। लोग इतने बेवकूफ नहीं कि उनकी असलियत थोड़ी देर में न भांप लें। और सच कहें तो ऐसे नकली लोगों ने ही अनेक लोगों को नास्तिक बना दिया है। एक मित्र ने फोन किया है कि कोई क्या करे जब बार- बार नकली और दुष्ट साधुओं से ही पाला पड़े। मेरा कहना है- आप साधुओं से दूर रहिए। उन पर भरोसा मत कीजिए। लेकिन रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, रमण महर्षि, और उनसे पहले आदि शंकराचार्य आदि की लिखी किताबें जरूर पढिए। वे असली संत थे। उनकी किताबें पढ़ कर आपको लगेगा कि ये संत खुद ही बोल रहे हैं। उनकी शिक्षा तो कभी नहीं मर सकती। और वे क्या साधु- संत नहीं थे? और क्या संसार भर के साधु- संत भ्रम हैं। उनमें ईसा मसीह, सेंट फ्रांसिस, सेंट पाल और सेंट जेम्स प्रमुख हैं। ये दिव्य संत मनुष्य जाति का कल्याण कर गए हैं। क्या हम उन्हें याद न करें?

Thursday, January 22, 2009

रमण महर्षि

विनय बिहारी सिंह

तमिलनाडु में मदुरै से ३० मील दूर तिरुचुली में दिसंबर १८७९ में जन्मे रमण महर्षि ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर तिरुवन्नामलई में चले गए और वहीं गहन साथना की। वे तिरुवन्नामलई के पर्वतों को साक्षात भगवान शिव कहते थे। उन्होंने तिरुवन्नामलई की वीरुपाक्ष गुफा में अनेक वर्षों तक साधना की। रमण महर्षि के पास जो पांच मिनट भी बैठ जाता था, उसे गहरी शांति मिलती थी। यूरोप के एक लेखक पाल ब्रंटन ने उनकी ख्याति के बारे में सुना तो उनकी उत्सुकता बढ़ी। वे पहुंच गए रमण महर्षि के पास। वहां उनके साथ जो घटना घटी, उसने उनकी आंखें खोल दी। वे रात को एक मचान पर सोने की तैयारी कर रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि मचान पर एक जहरीला सांप चढ़ रहा है। उन्हें लगा कि आज उनकी मृत्यु निश्चित है। तभी रमण महर्षि का एक सेवक वहां आया औऱ सांप से आदमी की तरह बोला- ठहरो बेटा। यह अद्भुत घटना थी। सांप जहां का तहां रुक गया। सेवक ने सांप को प्यार से समझाया- ये हमारे मेहमान हैं। इनको डंस कर तुम क्या आश्रम की बदनामी करना चाहते हो? क्या बिगाड़ा है इन्होंने तुम्हारा? पुचकार कर सेवक ने कहा- आओ, नीचे उतर जाओ, पाल ब्रंटन साहब को सोने दो। और क्या गजब कि सांप ने आग्याकारी बच्चों की तरह बात मान ली और नीचे उतर गया। फिर सांप पहाड़ों की तरफ गया और गायब हो गया। पाल ब्रंटन के लिए यह चकित करने वाली घटना थी। उन्होंने आश्रम के सेवक से पूछा- आखिर तुमने यह चमत्कार किया कैसे? सेवक ने कहा- यह मैंने नहीं, रमण महर्षि ने चमत्कार किया। उनका कहना है कि जीव- जंतु किसी से भी अगर हम गहरे प्यार से बोलेंगे तो वह जरूर सुनेगा। लेकिन शर्त यह है कि आपका व्यक्तित्व सदा से प्यार की तरंगे फेंकने वाला हो। यह नहीं कि सांप देखा, तब प्यार की तरंग बनाने लगे। आपका समूचा व्यक्तित्व ही प्यार से ओतप्रोत होना चाहिए। तब कोई भी हिंसक जीव या जंतु आपकी बात टाल नहीं सकता। यह सुन कर पाल ब्रंटन, रमण महर्षि के दीवाने हो गए। उन्होंने उनके आश्रम में रह कर व्यापक शोध किया और रमण महर्षि पर जो किताब लिखी, वह विश्व प्रसिद्ध हो गई। उनकी लिखी किताबें- द सेक्रेट पाथ, सर्च इन सेक्रेट इंडिया और अ मैसेज फ्राम अरुणाचला आज भी लोकप्रिय हैं।

Tuesday, January 20, 2009

यही जीवन है

विनय बिहारी सिंह

कल केला बेचने वाले ने कहा- सर, कल रात सामने की बिल्डिंग के दरबान ने हम लोगों से दो घंटे तक बातचीत की। बिल्कुल मजे से बात हुई। आज यहां केला बेचने आया तो पता चला- उस दरबान की मौत हो गई। बताइए, यह कैसे हो गया? मुझे लगा कि भीतर से वह इस घटना से हिल गया है। नौजवान लड़का है। इस तरह का उसका यह पहला अनुभव है। मैंने कहा- यही जीवन है भाई। किसी संत कवि ने कहा है- पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जाति। पानी के बुलबुले जैसा मनुष्य की नियति है। क्या पता पानी का बुलबुला कब फूट जाए। फिर भी बेईमानी करने के लिए कुछ लोग किसी हद तक गिरे जा रहे हैं। किसी का नुकसान कर, किसी को कष्ट देकर भी अपना भला हो रहा है तो वे खुश हो जाते हैं। उन्हें नहीं पता कि एक दिन यह सारा बेईमानी का पैसा धरा रह जाएगा। इसके जवाब में वे कहेंगे- धरा कैसे रह जाएगा? मेरे बाल- बच्चे इसका उपभोग करेंगे। लेकिन भाई, आप तब कहां रहेंगे, सोचा है? कैसे बाल बच्चे? उनके भी बाल- बच्चे होंगे। फिर उन बाल- बच्चों के भी बाल- बच्चे होंगे, फिर उनके बच्चे। औऱ इस तरह आप भुला दिए जाएंगे। क्योंकि सात पीढ़ी या आठ पीढ़ी के पूर्वजों को कौन याद रखता है? हमारा मोल मिट्टी के बराबर है। इसलिए- १०० प्रतिशत अगर अपने प्रति सोचते हैं तो क्यों न कल से अपने लिए ९९ प्रतिशत ही सोचें और एक प्रतिशत दूसरे जरूरतमंद लोगों के लिए सोचें। सिर्फ एक पैसा। तब हमारा विस्तार हो जाएगा। हम सिर्फ अपने में नहीं सिमटे रहेंगे।

जमाना अच्छाई का नहीं है? तो किसका है?

विनय बिहारी सिंह

आप अक्सर सुनते हैं- अरे बहुत दयालु मत बनो, यह जमाना अच्छाई का नहीं है। सुन कर हैरानी होती है। अरे तो जमाना अच्छाई का नहीं है तो क्या हमेशा बुरा काम करें? क्या मतलब है इस जुमले का? मान लीजिए कि सभी यही सोचने लगें कि यह जमाना भलाई करने वालों के लिए नहीं है, तो हर आदमी बुरा काम करने लगेगा। फिर? तब क्या यह धरती कैसी होगी? अगर हम किसी पर भरोसा नहीं करें, सबको शक की निगाह से देखें, भला काम करने से परहेज करें तो कैसा माहौल बनेगा? हालांकि मौजूदा माहौल भी कम जटिल नहीं है। फिर भी इस पृथ्वी पर अच्छे लोग हैं और वे लगातार अच्छा काम कर रहे हैं। उन्हें हम, आप भले ही नहीं जानते या पहचानते, लेकिन वे अनजान रह कर अच्छा काम करने में आनंद पाते हैं। ऐसा कभी हुआ ही नहीं है कि यह पृथ्वी सिर्फ बुरे लोगों से ही भर गई हो। लंका में भी विभीषण जैसा व्यक्ति मौजूद था। विभीषण ने राम- रावण युद्ध में निर्णायक भूमिका अदा की। कैसे कह दें कि यह जमाना सिर्फ चोरों, डकैतों और लुटेरों का है। हां, ऐसे भ्रष्ट, बेईमान और अनैतिक लोग देश, समाज औऱ भावी पीढ़ी के भविष्य की चिंता न कर घनघोर अन्याय कर रहे हैं। यह सच है। लेकिन उनसे भी बड़े वे हैं जो लाचार लोगों के दुख, दर्द और परेशानी में मदद कर संतोष पाते हैं। सुख पाते हैं। और मजा यह कि वे अपना प्रचार नहीं चाहते। बेनाम रह कर सेवा करना चाहते हैं। इसी में उनको मजा आता है। हां, बहुत कम संख्या है ऐसे लोगों की। लेकिन है। ऐसे लोग चुनिंदा होते ही हैं। हम उनको नजरअंदाज नहीं कर सकते क्योंकि समाज उन्हीं की सेवा से बचा हुआ है। हमें ऐसे लोगों से भी सीख लेनी चाहिए। जब डकैत ने बीमार होने का नाटक कर बाबा खड़ग सिंह से कहा कि बाबा, बीमार आदमी को घोड़ा दे देंगे क्या? मैं चल नहीं पा रहा हूं। तो बाबा खड़ग सिंह ने उसे घोड़े पर बैठा दिया। डकैत ने अचानक घोड़े को एड़ लगाई और घोड़े को ले भागा। तब बाबा खड़ग सिंह ने डकैत को बुला कर कहा- देख बेटा, आज जो तुमने किया, भविष्य में कभी मत करना। वरना लोगों के भीतर बीमारों के प्रति हमदर्दी खत्म हो जाएगी। यह कथा- हमें सीख देती है। बाबा खड़ग सिंह ने फिर घोड़ा खरीदा और फिर वे सेवा में जुट गए। आप हर बार धोखा नहीं खा सकते। धोखा आपको सीख देती है। हां, सतर्क अवश्य रहिए। वरना आपके सीधेपन का फायदा उठाने वाले इस दुनिया में कम नहीं हैं। लेकिन दुखियारे, बेसहारा भी कम नहीं हैं भाई।