Monday, November 12, 2012

शुभ दीपावली





हमारे देश में कार्तिक अमावस्या को दीपावली का पर्व मनाया जाता है। मेरे पास कृष्ण प्रिया ने एक ई मेल भेजा है जिसमें दीपावली के महत्व को रेखांकित किया गया है।
१- दीपावली के दिन ही लक्ष्मी जी का जन्म हुआ था।
२- भगवान विष्णु ने इसी दिन वामन अवतार के रूप में राजा बालि के कैद से मां लक्ष्मी को छुड़ाया था।
३- भगवान कृष्ण ने राक्षस राजा नरकासुर का इसी दिन वध कर १६ हजार महिलाओं को कैद से मुक्त किया था।
४- पांडव १२ साल के अज्ञातवास के बाद इसी दिन वापस लौटे थे। वे जुए में हारने के कारण शर्त के मुताबिक अज्ञातवास में गए थे।
५- रावण का वध करने और लंका पर विजय पताका फहराने के बाद भगवान राम इसी दिन अयोध्या लौटे थे।
६- महान हिंदू राजा विक्रमादित्य ने आज ही के दिन दीपावली मनाने की शुरूआत की थी।
७- दीपावली के दिन आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद ने निर्वाण प्राप्त किया था।
८- दीपावली के दिन को सिख धर्म में भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

Thursday, November 8, 2012

श्रद्धा और विश्वास




गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्धधाना मत्परमा भक्तास्तेअतीव में प्रियाः।। (१२वें अध्याय का २०वां श्लोक)।

 गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है-

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न राम।
राम कृपा बिनु सपनेहुं जीव न लह बिश्रामु।।

यानी बिना श्रद्धा और विश्वास के ईश्वर का अनुभव असंभव है।

Tuesday, November 6, 2012

गीता का एक श्लोक


कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति संगं त्यक्त्वात्मशुद्धये।।

योगी ममत्व बुद्धि रहित इंद्रिय, मन व बुद्धि के परे रहते हुए अंतःकरण की शुद्घि के लिए काम करते हैं।

Monday, November 5, 2012

माया महाठगिनी हम जानी


कबीर दास

माया महाठगिनि हम जानी।
निरगुन फांस लिए कर डोले बोलै मधुरी बानी।।
केशव के कमला ह्वै बैठी शिव के भवन भवानी।।
पंडा के मूरति ह्वै बैठी तीरथ में भई पानी।।
जोगी के जोगिन ह्वै बैठी राजा के घर रानी।।
काहू घर हीरा ह्वै बैठी काहू की कानी कौड़ी।।
भगतन के भगतिन ह्वै बैठी ब्रह्मा के ब्रह्मानी।।
कहत कबीर सुनो हो संतों यह सब अकथ कहानी।।

Saturday, November 3, 2012

एक बार फिर सूरदास की एक अन्य रचना पढ़ें



छांड़ि मन हरि विमुखन को संग।
जिनके संग कुबुद्धि उपजति है, परत भजन में भंग।।
कहां होत पय पान कराए, विष नहिं तजत भुजंग।।
कागहि कहा कपूर चुगाए, स्वान नहाए गंग।।
खर को कहा अरगजा लेपन, मरकट भूषण अंग।।
गज को कहा न्हवाये सरिता, बहुरि धरै खहि छंग।।
पाहन पतित बांस नहीं बेधत, रीतो करत निषंग।।
सूरदास खल काली कामरि, चढ़त न दूजो रंग।।

Friday, November 2, 2012

कबीरदास



मित्रों कबीरदास का एक विलक्षण पद प्रस्तुत कर रहा हूं। यह पद मुझे सर्वाधिक पसंद आता है-



रस गगन गुफा में अजर झरै।
बिन बाजा झनकार उठै जहं, समुझि परै जब ध्यान धरै।।
बिना ताल जहं कमल फुलाने, तेहि चढ़ि हंसा केलि करै।।
बिन चंदा उजियारी दरसै, जहं तहं हंसा नजर परै।।
दसवें द्वारे ताली लागी, अलख पुरुष जाको ध्यान धरै।।
काल कराल निकट नहिं आवै, काम क्रोध मद लोभ जरै।।
जुगन जुगन की तृषा बुझाती, करम भरम अघ ब्याधि टरै।।
कहै कबीर सुनो भई साधो, अमर होय कबहूं न मरै।।

Thursday, November 1, 2012

कबीरदास की एक और अद्भुत रचना


आठ पहर चौबीस घड़ी, मो मन यही अंदेश।
या नगरी पीतम बसै, मैं जानौं परदेश।।

पीतम को पतिया लिखूं, जो कहूं होय विदेश।
तन में मन में नैन में, ताको कहा संदेश।।

घर में रहे सूझे नहीं, करसों गहा न जाय।
मिला रहे औ ना मिले तासों कहा बसाय।।