Thursday, December 8, 2011

ब्रह्मांड के मालिक भगवान

विनय बिहारी सिंह



परमहंस योगानंद जी ने कहा है कि इस ब्रह्मांड को भगवान चला रहे हैं। मनुष्य नहीं। फिर तनाव क्यों। नर्वसनेस क्यों? यदि भगवान पर पूरा भरोसा है तो फिर तनाव का कोई कारण नहीं दिखता। यदि मनुष्य किसी शारीरिक या मानसिक कष्ट में है या तनाव में है तो उसे भगवान से सीधे प्रार्थना करनी चाहिए। उसके बस में बस यही है। आप समस्या सुलझाने की कोशिश भर कर सकते हैं। लेकिन समस्या सुलझाना ईश्वर के हाथ में है। क्यों न उन्हीं से प्रार्थना की जाए- प्रभु, मुझ पर कृपा कीजिए। इस समस्या को सुलझाइए। मैंने जितनी कोशिश करनी थी कर ली। अब यह समस्या आपके हवाले। ऋषियों ने कहा है कि ईमानदारी से की गई प्रार्थना सुनी जाती है। बशर्ते कि वह किसी के नुकसान के लिए न हो। प्रार्थना किसी पवित्र कार्य के लिए होनी चाहिए। सबसे बड़ी तो प्रार्थना यह है कि भगवान मुझे तो आपको पाने की ही इच्छा है। कृपया मुझे अपना बनाइए। यह ठीक है कि हम भगवान की ही संतान हैं। लेकिन फिर भी इस तरह की प्रार्थना से भगवान का ध्यान आकर्षित होता है। मां भी बच्चे की तरफ तभी विशेष ध्यान देती है जब वह रोता है। तो भगवान के सामने रोने में दिक्कत क्या है? वे अंतर्यामी हैं, सर्वशक्तिमान हैं और सर्वव्यापी हैं।

Wednesday, December 7, 2011

दरवाजा खटखटाइए, खुलेगा

विनय बिहारी सिंह



ऋषियों ने कहा है- भगवान का दरवाजा चरम भक्तिभाव से खटखटाइए। वह खुलेगा। यदि आपको लगता है कि भगवान आपके करीब नहीं हैं तो उनके लिए गहरी प्रार्थना कीजिए। उन्हें हृदय से पुकारते रहिए- प्रभु, आपको मैं महसूस नहीं कर पा रहा हूं। कृपया मेरी ग्रहणशीलता का विस्तार कीजिए। मुझे अपने होने का अनुभव कराइए। हालांकि मैं जानता हूं आप सदा मेरे साथ हैं। लेकिन यह मैं महसूस भी करना चाहता हूं। एक ईसाई संत थे- ब्रदर लारेंस। उनकी बातों को गीता प्रेस ने हिंदी में छापा है। ब्रदर लारेंस ने कहा है- मैं प्रभु से अलग हो ही नहीं सकता। इसलिए जब भी मुझे लगता था कि मैं प्रभु को महसूस नहीं कर पा रहा हूं, गहरी प्रार्थना करने लगता। यह मेरी आदत सी बन गई जिससे मुझे बहुत लाभ हुआ।
संत कबीरदास ने लिखा है- जिभ्या ते छाला परा, राम पुकारि, पुकारि।।
इस पंक्ति से लगता है कि भगवान सहज ही नहीं आते। वे चाहते हैं कि भक्त उनसे लगातार बातें करे। और अगर वे ऐसा चाहते हैं तो बुरा क्या है। वे हमारे माता हैं, पिता हैं। वे तो चाहेंगे ही कि हम उनसे बातें करें। उन्हें प्रकट होने के लिए कहें। इसीलिए तो वे छुपे रहते हैं। ऋषियों ने कहा है- जब आप इंद्रिय, मन और बुद्धि के परे जाएंगे तो भगवान को महसूस करेंगे। जब हम रात को सोते हैं तो शरीर का होश नहीं रहता। यह भी होश नहीं रहता कि हम कहां सोए हैं। बेसुध हो कर सोते हैं हम। ठीक उसी तरह जब हम अपनी आंखें बंद कर ईश्वर पर ध्यान केंद्रित करेंगे तो एक समय आएगा कि हम उन्हें महसूस करने लगेंगे।

Tuesday, December 6, 2011

केले और बिस्कुट


आखिर शाम के जलपान के लिए केले और दो बिस्कुट का ही विकल्प मिला। रोज केले न खा कर बीच-बीच में सेब, छेना (बिना चीनी वाला) वगैरह खाना ठीक है।
आध्यात्मिक भोजन के बारे में जानकारी चाही तो पता चला केला, सेब और अमरूद बेहतर विकल्प हैं। परमहंस योगानंद जी ने लिखा है कि नींबू पानी में एक चम्मच चीनी मिला कर पीने से हमारा नर्वस सिस्टम ठीक रहता है। एक और विकल्प है। केले कई तरह के होते हैं। जैसे- सिंगापुरी, कंटाली, भुसावल वाला, बर्दवान वाला। इन केलों को बदल बदल कर खाया जा सकता है।

Monday, December 5, 2011

जलपान

विनय बिहारी सिंह




हमारा नया कार्यालय नई जगह पर आ गया है। नेशनल हाईवे- छह पर। कोना एक्सप्रेस वे के पास। यह पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में पड़ता है। शाम को जलपान की जरूरत महसूस हुई। बाहर निकला तो झोपड़ीनुमा दुकानें दिखीं। वहां गया तो पता चला जलपान में समोसा, कचौड़ी, बैगुन भाजा (बैंगन को लंबाई में पतला- पतला काट कर तरल बेसन में डुबा कर तला जाने वाला खाद्य) मिल रहा है। तली- भुनी चीजों के प्रति विरक्ति के कारण कुछ न खा कर लौट रहा था कि एक मिठाई की दुकान दिखी। सोचा छेने की मिठाई ही खा कर भूख पर काबू किया जाए। छेना प्योर होता है, उसमें घी- तेल नहीं होता। वहां गया तो देखा कि बंगाल की प्रसिद्ध मिठाई काचागोला (छेने से बनी) है। इसमें हल्की मिठास होती है, इसलिए उसे खा कर आजमाया। पर्याप्त मिठास थी। यह काचागोला की मिठास नहीं है। काचागोला तो हल्की मिठास वाला होता है। इसलिए सोचा कि घर से ही कोई जलपान लाया करेंगे।
कई बार सोच कर आश्चर्य होता है। क्या अपने भारत में जलपान के नाम पर अब समोसे और अन्य तली- भुनी चीजें ही मिला करेंगी? क्या बिना घी- तेल वाले हल्के- फुल्के, सुपाच्य जलपानों का अभाव ही रहेगा? दफ्तर में चाय और काफी की आटोमेटिक मशीन लगी है। हम सब वहां जाकर मनपसंद पेय ले सकते हैं। लेकिन अभी खाने का या जलपान का कोई इंतजाम नहीं हो पाया है। अब सोच रहा हूं। सुबह कार्यालय के लिए निकलते वक्त शाम के लिए कौन सा जलपान ले कर आऊं? अब तक कोई ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाया। स्लाइस्ड ब्रेड में तो मैदा होता है जो पेट के लिए ठीक नहीं होता। फल काट कर शाम तक रखना ठीक नहीं होगा। तो फिर क्या विकल्प है? शायद जल्दी ही कुछ समझ में आ जाएगा।

Friday, December 2, 2011

इंद्रियां धोखा देती हैं

विनय बिहारी सिंह


श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि मन जिस इंद्रिय के साथ रहता है, वह उसका गुलाम हो जाता है। इंद्रियां जैसा नाच नचाती हैं, मन नाचता है। इंद्रियां कई बार हमारे शत्रु की तरह काम करती हैं। आम तौर पर हम शरीर का बहुत ध्यान रखते हैं। खूब अच्छी तरह नहाना- धोना, भोजन करना, आराम करना। इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन शरीर का जरूरत से ज्यादा ख्याल रखना बीमारी है। स्वामी श्री युक्तेश्वर जी कहते थे- कुत्ते को रोटी दे दो और निश्चिंत हो जाओ। यानी शरीर का पोषण कर दो और फिर ईश्वर की तरफ मुड़ जाओ। हां, यह ठीक है कि हमें ठीक से खाना चाहिए, स्वच्छता का ख्याल रखना चाहिए। रोग-व्याधि न हो इसके लिए तत्पर रहना चाहिए। लेकिन हमेशा शरीर और उसकी आवश्यकताओं पर ही केंद्रित नहीं रहना चाहिए। यह शरीर अनेक लोगों को धोखा दे चुका है। इंद्रियां अपनी मनचाही चीजें चाहती हैं। अगर आप इंद्रियों की सुनते हैं तो वे और मांग करती हैं। आप इंद्रियों को जितना संतुष्ट करेंगे, वे और ज्यादा की मांग करेंगी। अगर आप इंकार कर देंगे तो वे आपको परेशान करेंगी। इस दुष्चक्र से मुक्ति का एक ही उपाय है कि आत्मसंयम बरता जाए। जितनी जरूरत है, शरीर को उतना ही दिया जाए। इंद्रियां जब जिद्दी हो जाती हैं तो हमारी शत्रु हो जाती हैं।
कई लोग घनघोर भोजन प्रेमी होते हैं। वे दिन- रात भोजन के बारे में ही सोचते रहते हैं। उनके लिए संसार में स्वादिष्ट भोजन के अलावा कुछ और आकर्षण की वस्तु है ही नहीं। उनके लिए भोजन ही ईश्वर तुल्य है। एक दिन साधारण भोजन मिला नहीं कि उनका मूड खराब हो जाता है। ऐसे व्यक्ति भोजन की बात करते समय खूब रस लेते हैं। उनसे आप भोजन के बारे में घंटों बातें कर सकते हैं। लेकिन इससे लाभ? कुछ नहीं। यदि वे भोजन के बदले ईश्वर चर्चा करते तो स्थाई सुख पाते। पर नहीं ईश्वर की तरफ उनका मन जाता ही नहीं।

Thursday, December 1, 2011

तनाव और उत्तेजना

विनय बिहारी सिंह



रास्ते में एक अनजान व्यक्ति जोर- जोर से फोन पर किसी से बातें कर रहा था- आप उत्तेजित होकर बात मत कीजिए.....इससे मेरा दिमाग खराब हो जाता है। शांत हो कर बोलिए। आप से जब भी बातें करता हूं, डिस्टर्ब हो जाता हूं...... शांति से बात कीजिए। समस्या उत्तेजना से नहीं सुलझेगी....... वगैरह, वगैरह।
जानते सभी हैं कि उत्तेजना से या क्रोध से या तनाव से कोई काम नहीं बन सकता। बिगड़ेगा ही। लेकिन फिर भी कई लोग उत्तेजित हो जाते हैं, चिड़चिड़े हो जाते हैं या क्रोध में आ कर कुछ भी बोल देते हैं। संतों ने कहा है- जब भी कोई समस्या आए या कोई डिस्टर्बेंस हो आप शांति से उसका विश्लेषण कीजिए और उपाय खोजिए। उपाय पर अमल कीजिए। तब आपका काम भी बन जाएगा और मन मस्तिष्क को कोई क्षति भी नहीं पहुंचेगी। हम जब भी तनाव में आते हैं, हमारे तंत्रिका तंत्र या नर्वस सिस्टम पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है। कई लोग तो तनाव के कारण ब्रेन हेमरेज तक के शिकार हो जाते हैं। तनाव हमें खतरनाक जगह पर ले जाता है। शांति हमें ईश्वर की ओर ले जाती है। इसलिए शांति से क्यों न सारा काम करें। हां, यह ठीक है कि हर आदमी को कभी न कभी क्रोध आता है और इस पर हमेशा काबू नहीं किया जा सकता। ऐसे समय में जहां क्रोध आ रहा हो, वहां से हट जाना चाहिए या लंबी सांस लेकर क्रोध से छुटकारा पाना चाहिए। यदि क्रोध आ ही जाए तो उसके लिए पछतावा न कर अगली बार सुधार कर लेना चाहिए। क्रोध से काम बिगड़ता है, यह सिद्ध हो चुका है। क्रोध या तनाव से हमारा दिल- दिमाग तो प्रभावित होता ही है, हमारा सामाजिक या पारिवारिक संबंध भी बिगड़ जाता है।

तनाव और उत्तेजना

विनय बिहारी सिंह



रास्ते में एक अनजान व्यक्ति जोर- जोर से फोन पर किसी से बातें कर रहा था- आप उत्तेजित होकर बात मत कीजिए.....इससे मेरा दिमाग खराब हो जाता है। शांत हो कर बोलिए। आप से जब भी बातें करता हूं, डिस्टर्ब हो जाता हूं...... शांति से बात कीजिए। समस्या उत्तेजना से नहीं सुलझेगी....... वगैरह, वगैरह।
जानते सभी हैं कि उत्तेजना से या क्रोध से या तनाव से कोई काम नहीं बन सकता। बिगड़ेगा ही। लेकिन फिर भी कई लोग उत्तेजित हो जाते हैं, चिड़चिड़े हो जाते हैं या क्रोध में आ कर कुछ भी बोल देते हैं। संतों ने कहा है- जब भी कोई समस्या आए या कोई डिस्टर्बेंस हो आप शांति से उसका विश्लेषण कीजिए और उपाय खोजिए। उपाय पर अमल कीजिए। तब आपका काम भी बन जाएगा और मन मस्तिष्क को कोई क्षति भी नहीं पहुंचेगी। हम जब भी तनाव में आते हैं, हमारे तंत्रिका तंत्र या नर्वस सिस्टम पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है। कई लोग तो तनाव के कारण ब्रेन हेमरेज तक के शिकार हो जाते हैं। तनाव हमें खतरनाक जगह पर ले जाता है। शांति हमें ईश्वर की ओर ले जाती है। इसलिए शांति से क्यों न सारा काम करें। हां, यह ठीक है कि हर आदमी को कभी न कभी क्रोध आता है और इस पर हमेशा काबू नहीं किया जा सकता। ऐसे समय में जहां क्रोध आ रहा हो, वहां से हट जाना चाहिए या लंबी सांस लेकर क्रोध से छुटकारा पाना चाहिए। यदि क्रोध आ ही जाए तो उसके लिए पछतावा न कर अगली बार सुधार कर लेना चाहिए। क्रोध से काम बिगड़ता है, यह सिद्ध हो चुका है। क्रोध या तनाव से हमारा दिल- दिमाग तो प्रभावित होता ही है, हमारा सामाजिक या पारिवारिक संबंध भी बिगड़ जाता है।