Thursday, June 16, 2011

मनुष्य का जन्म और ईश्वर प्राप्ति की इच्छा

विनय बिहारी सिंह




आदि शंकराचार्य ने कहा है कि सबसे बड़ा आशीर्वाद है- मनुष्य के रूप में जन्म लेना। उससे भी बड़ा आशीर्वाद ईश्वर को प्राप्त करने की इच्छा है। उससे भी बड़ा आशीर्वाद है सद् गुरु का मिलना। अगर मनुष्य में ईश्वर को प्राप्त कर लेने की कभी न खत्म होने वाली लगन है, गहरी भक्ति है, ईश्वर से अनन्य प्रेम है तो उसका जीवन धन्य है। क्योंकि मनुष्य का जन्म ही इसलिए हुआ है कि वह ईश्वर से मिले। लेकिन यदि वह अपना समय व्यर्थ में गंवाता है और ईश्वर को दूर की चीज मानता है, तो वह इस दुर्लभ जन्म का मोल नहीं समझता। उसे बार- बार जन्म लेना पड़ेगा और तमाम तरह के रोग- शोक का सामना करना पड़ेगा। माया जाल को शैतान भी कहते हैं। एक साधु से उसके नए- नए शिष्य ने कहा- मैं गंगा नहाने जा रहा हूं। साधु ने कहा- यह तो अच्छी बात है। लेकिन देखना जब तक गंगा नहाओगे, तुम्हारी कामनाएं किसी पेड़ पर बैठ कर तुम्हारे बाहर निकलने का इंतजार करेंगी। ज्योंही तुम बाहर निकलोगे, वे तुम्हारे भीतर घुस जाएंगी। कहने का अर्थ है- हम अपनी हजार- हजार कामनाओं के बदले चुनी हुई कामनाएं लेकर चलें और उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत करने के साथ- साथ ईश्वर से प्रार्थना भी करें कि हे प्रभु, मेरे ऊपर कृपा कीजिए और आशीर्वाद दीजिए कि मैं आपको कभी न भूलूं। ये कामनाएं चाहे पूरी हों या नहीं, लेकिन आपको पाने की कामना जरूर पूरी है। मैं इस पृथ्वी पर सिर्फ आपको पाने के लिए आया हूं। इस नजरिए से हमारा जीवन पूरी तरह सकारात्मक हो जाएगा। हम चाहे महल में रहें, आलीशान कार में घूमें, हमारे पास अनंत अरब रुपए हों तो भी एक दिन सब कुछ छोड़- छाड़ कर मरना ही है। अगर हम धन और भोग विलास में ही मस्त रहे और भगवान को भूल गए तो देह छोड़ने के बाद हमारी क्या गति होगी? कौन सहारा देगा। निश्चय ही भगवान सहारा देंगे लेकिन वे फिर वापस पृथ्वी पर भेज देंगे। फिर वही प्रपंच, वही झमेले। तो क्यों न अभी से ईश्वर की शरण में रहें और उन्हीं की भक्ति में रहते हुए प्राण जाएं। फिर तो वे वापस पृथ्वी पर नहीं भेजेंगे। अपने पास ही रख लेंगे। अच्छी आत्माओं को वे अपने पास ही रखना चाहते हैं। पृथ्वी पर तो उन्हीं को भेजते हैं जो इंद्रिय सुख के लिए छटपटाते रहते हैं।

Wednesday, June 15, 2011

आज कबीर जयंती

विनय बिहारी सिंह



आज कबीर जयंती है। कुछ दिन पहले ही आप सभी ने इस ब्लाग पर संत कबीर के दोहे पढ़े। आज एक बार फिर उन पर चर्चा की जाए तो अच्छा ही लगेगा। संत कबीर सबके थे। उन्होंने लिखा है-

कर का मनका छाड़ि के, मन का मनका फेर।।

यानी हाथ में माला फेरने से तब तक कोई लाभ नहीं है जब तक कि मन भगवान पर स्थिर न हो। मन की माला यदि भगवान का स्मरण करती है तो वह महत्वपूर्ण है। उन्होंने कुरीतियों और धार्मिक पाखंडों पर लगातार प्रहार किया। उन्होंने लिखा-

पार ब्रह्म के तेज का कैसा है उनमान।
कहिबे को सोभा नहीं, देखिबे को परमान।।

ब्रह्म या ईश्वर कैसे हैं, इसका अनुमान लगाना बहुत कठिन है। इसकी व्याख्या उचित नहीं जान पड़ती। प्रत्यक्ष अनुभव जरूरी है। जिसने प्रत्यक्ष अनुभव किया वही बता सकता है कि ईश्वर कैसे हैं। इस पर व्यर्थ की बहस शोभनीय नहीं है।

उनकी एक और रचना देखें-

काहे रे नलिनी तू कुम्हलानी।
जल में जनम, जल में वास।
जल में नलिनी तोर निवास।
काहे रे नलिनी तू कुम्हलानी।।

वे मनुष्य को कहते हैं- तू क्यों दुखी रहता है। तुम हमेशा ईश्वर में ही हो। ईश्वर में तुम्हारा जन्म हुआ है। उसी रहते हो। वही तुम्हारा स्थायी निवास है। लेकिन फिर भी माया के प्रपंच के कारण तुम्हें लगता है कि तुम ईश्वर से दूर हो और कुम्हलाए रहते हो।

कबीर दास पृथ्वी पर विलक्षण संत के रूप में आए। उनका एक मात्र जोर इसी पर था कि ईश्वर ही एक मात्र सच्चाई है। बाकी सब भ्रम है। लेकिन मनुष्य ईश्वर के अलावा सब कुछ चाहता और खोजता है। बस ईश्वर को नहीं चाहता। उनका कहना था- पहले ईश्वर को खोजो। वे तुम्हारे भीतर ही हैं। उन्हें पा कर तुम सब कुछ पा लोगे।

Tuesday, June 14, 2011

पांच साल की बच्ची की पवित्र गतिविधियां


विनय बिहारी सिंह




आज एक बुजुर्ग आदमी एक बच्ची को लेकर मेट्रो ट्रेन में चढ़ा। वह मेरे सामने ही बैठ गया क्योंकि एक आदमी ने उसके लिए अपनी सीट छोड़ दी। आमतौर पर कोलकाता में लोग छोटे बच्चों को लिए हुए स्त्री या पुरुषों के लिए सीट छोड़ देते हैं। लेकिन कुछ लोग नहीं भी छोड़ते। वह आदमी बच्ची को लेकर खूब मस्त था। उससे बांग्ला में पूछ रहा था- कहां जा रही हो? हवा नहीं लग रही है क्या? लेकिन वह बच्ची उसकी बातें न सुन कर शून्य में कहीं देख रही थी और सहज ढंग से आंखें इधर- उधर घुमा लेती थी। छोटे बच्चे प्यारे लगते ही हैं। मैं उसकी ओर लगातार देख रहा था तो आकर्षण के नियम के मुताबिक बच्ची ने भी मेरी ओर देखा। जब आप किसी की ओर लगातार देखेंगे तो चाहे वह बच्चा हो बड़ा, बरबस आपकी तरफ उसकी निगाह चली जाएगी। यह आकर्षण का नियम है। उस बच्ची की निरपेक्ष आंखों को देख कर अच्छा लगा। मैंने बच्ची के अभिभावक से पूछा- बच्ची की उम्र कितनी है? वे अपनी पांचों उंगलियां दिखा कर बोले- पांच महीने। वे बच्ची को बार- बार चूम रहे थे। लेकिन बच्ची पर इसका कोई असर नहीं था। कौन उसे चूम रहा है या कौन उसके साथ खेलना चाहता है, इससे लगता था वह पूरी तरह अनजान है। उसकी निस्पृह निगाहें मानों शून्य में देख रही थीं। मैंने सोचा कि पांच महीने पहले यह बच्ची मां के गर्भ में थी और १४ महीने पहले कहां थी? शून्य लोक में या सूक्ष्म लोक में। इस बच्ची को शायद अब भी मां के गर्भ की या उस सूक्ष्म लोक की यादें आ रही हैं। वह अपने को चूमे जाने से अनजान है। शरीर में आई है, फिर भी शरीर से थोड़ी अनजान। पेशाब आने पर अपने आप हो जाएगा। वह बिस्तर पर बैठी है या ट्रेन में किसी सीट पर इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। पाखाना महसूस होने पर वह भी हो जाएगा। चाहे बिस्तर पर या कहीं और। सब कुछ सहज ढंग से। अब यह अभिभावक जाने कि शौच कैसे साफ किया जाएगा। बच्ची हंसती रहेगी, आ... बा.... बोलती रहेगी। बिल्कुल पवित्रता के साथ। आप उसे डांट नहीं सकते कि क्यों तुमने बिस्तर पर शौच किया। बल्कि आप सावधानी के लिए रबर आदि की चादर बिछा देते हैं ताकि बिस्तर गंदा न हो। यही मनुष्य का जीवन है। यही ईश्वरीय लीला है।

Monday, June 13, 2011

एक संत के अनुभव

विनय बिहारी सिंह




घटना उस समय की है जब मैं कक्षा ९ की परीक्षा दे कर छुट्टियां मना रहा था। मैं अपने पिता जी के कमरे में रहता था। उस कमरे में एक बिना दरवाजे की आलमारी थी। उस आलमारी के ऊपरी तख्ते पर अनेक धार्मिक पुस्तकें हुआ करती थीं। छुट्टियों में कुछ पढ़ने को था नहीं और उस समय रेडियो के अलावा मनोरंजन का कोई साधन नहीं था। रेडियो भी आप हरदम नहीं सुन सकते। इसलिए मेरी उत्सुकता उन धार्मिक किताबों में बढ़ने लगी। उस किताब का नाम मैं भूल चुका हूं। लेकिन इतना याद है कि उसमें कुछ महत्वपूर्ण संतों के विशेष अनुभव दिए गए थे। इस पुस्तक का उद्दे्श्य था कि लोग ध्यान, जप आदि करने में हतोत्साहित न हों। अनेक लोग कुछ दिन ईश्वर की भक्ति करते हैं और जब कोई चमत्कार नहीं होता तो सारी भक्ति खत्म हो जाती है। उस पुस्तक में बताया गया था कि चमत्कारों की उम्मीद न करें। चुपचाप धैर्य के साथ ईश्वर के प्रति भक्ति और प्रेम को बढ़ाते रहें। उसमें एक संत का अनुभव दिया गया था। वे रात को सोते नहीं थे। पूरी रात ध्यान और जप किया करते थे। जब लोग सुबह जागते थे तो वे नित्य क्रिया से निवृत्त हो कर, स्नान, पूजा आदि करते थे। फिर हल्का सा नाश्ता कर सो जाते थे सो जाते थे। शाम को वे उठते थे और फिर सूर्यास्त के पहले- पहले दो या तीन रोटी खा लेते थे। बस। फिर पूरी रात ध्यान, जप। यही उनका क्रम था। एक दिन उनके पास उनका कोई प्रशंसक आया। रात को वहीं ठहरा। साधु रात को तो सोते नहीं थे। उन्होंने रात दस बजे से अपनी साधना शुरू की। रात के एक बजे होंगे कि उस कमरे में अचानक आंखों को चौंधियाने वाला प्रकाश उत्पन्न हुआ। साधु उस प्रकाश का आनंद उठा रहे थे। अचानक उनका प्रशंसक उठा और बोल पड़ा- बाबा, यह प्रकाश क्या है? उसका यह कहना था कि प्रकाश गायब हो गया। साधु को बड़ा दुख हुआ। उस समय उन्होंने अपने प्रशंसक को बस इतना ही कहा- कुछ नहीं , कुछ नहीं, तुम सो जाओ। वह सो गया। सुबह उसके उठने पर साधु ने कहा- भाई। मेरी साधना के दौरान तुम अगर कुछ असाधारण चीजें देखो तो बोलो मत। चुपचाप पड़े रहो। ये दर्शन दुर्लभ होते हैं। तुम्हारे बोल पड़ने से आनंद भंग हो जाएगा।
यह प्रसंग मेरे मानस पटल पर इस तरह अंकित हो गया है कि कभी भूलता ही नहीं। बार- बार चाहता हूं कि वह पुस्तक मिले। लेकिन न वह कमरा है और न वे किताबें। बस स्मृति का ही सहारा है। ऐसी पुस्तक मिलना, ईश्वर की कृपा ही है। लेकिन ऐसा अनुभव जिसे मिलता है वह परम भाग्यशाली है।

Saturday, June 11, 2011

जब एक साहसी महिला खो गई

विनय बिहारी सिंह




जापान की एक महिला मकीको इवाफूची (४९ साल) नेपाल के पर्वतीय इलाके में गईं और अपने साथियों से बिछड़ गईं। वे इतनी दूर निकल गईं कि पहाड़ में ही खो गईं। उनके साथियों ने उन्हें ढूंढा। लेकिन उनकी कोई खोज खबर नहीं मिली। इवाफूची भी अपने साथियों को उसी बेचैनी से खोज रही थीं। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। दो दिन बीत गए। इवाफूची अकेले- अकेले चिल्लाती रहीं- हेल्प मी, हेल्प मी। कोई मेरी मदद करो, मदद करो। लेकिन उस एकांत पहाड़ में पत्थरों से टकरा कर उनकी आवाज लौट आती। दो दिन तक वे घास और बांस के पत्ते खा कर जीवित रहीं। प्यास लगती थी तो तलहटी में बह रही नदी का पानी पीती थीं। जब उन्हें खोज लिया गया तो उन्होंने कहा- मैं सोचती थी कि अगर मैं बच जाऊंगी तो मेरा मन पूरी तरह बदल जाएगा। मैं लोगों से अधिक दयालुता और उदारता से पेश आऊंगी। लेकिन कभी- कभी डर भी लगता था कि मैं बच भी पाऊंगी या नहीं। लेकिन मैं लगातार प्रार्थना कर रही थी- हे प्रभु, मेरे जीवन की रक्षा कीजिए। मेरे ऊपर दया कीजिए....। और आखिरकार मैं बच गई। सचमुच गहरी, दिल से निकली प्रार्थना में बहुत ताकत है।
प्रार्थना के बारे में इस महिला का विश्वास और पक्का हो गया है। वे सर्वशक्तिमान को और गहराई से मानने लगी हैं।

Friday, June 10, 2011

कबीरदास के दोहे


मित्रों आइए आज कबीरदास के दोहे पढ़ें।



माया मरी ना मन मरा, मर मर गये शरीर,
आशा तृष्णा ना मरी, कह गये दास कबीर.

दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे ना कोये,
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होये.

ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोये,
अपना तन शीतल करे, औरन को सुख होये.

धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होये,
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फ़ल होये.

जाति ना पूछो साधु की, पूछ लीजिये ग्यान,
मोल करो तलवार की पड़ी रेहेन जो मयान.

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय,
राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ ले जाय.

जिन ढूंढा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठ.

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

Thursday, June 9, 2011

हमारे दिमाग की क्षमता

विनय बिहारी सिंह




हाल ही में एक अध्ययन से पता चला है कि हमारे दिमाग की क्षमता ज्यादा से ज्यादा १५० मित्रों तक ही संवाद करने की है। अब आप कहेंगे कि ऋषियों ने तो कहा है कि हमारे दिमाग की क्षमता अनंत है। यह अध्ययन तो हमारे दिमाग की क्षमता को कम बता रहा है। तो इसके बारे में विशेषग्यों का कहना है कि दिमाग की क्षमता को जिन लोगों ने बढाया है, उनकी बात अलग है। यह क्षमता ध्यान, दिमागी कसरत (पहेलियां सुलझाना, गणित के प्रश्नों का हल आदि) से बढ़ती है। लेकिन सामान्य आदमी का दिमाग कम इस्तेमाल के कारण सीमित ही रह जाता है। वह सिर्फ १५० मित्रों को ही याद रख पाता है। कोई आदमी फेस बुक पर १५० से ज्यादा मित्रों के साथ संवाद नहीं कर सकता।
इस अध्ययन के बाद एक बात और समझ में आती है। हमारा दिमाग कई बार भ्रम में आ जाता है। जैसे सिनेमा हाल में एक फिल्म की रील प्रोजेक्टर पर तेजी से चलती है तो पर्दे पर कलाकार नाचते- कूदते और तरह- तरह के भाव प्रदर्शित करते नजर आते हैं। दरअसल सिनेमा की रील इतनी तेजी से चलती है कि इसके बीच का गैप हमारा दिमाग पकड़ नहीं पाता। नतीजा यह है कि परदे पर चलने वाले सिनेमा से हम पूरी तरह जुड़ जाते हैं। (हालांकि मुझे सिनेमा देखे कई वर्ष बीत गए हैं।) इस तरह सिनेमा प्रकाश और सिनेमा के रील का खेल है। एक कलाकार फिल्म के जितने शो होते हैं, उतनी बार मरता या प्रकट होता है।
ऋषियों ने कहा है- जब दिमाग ईश्वर से जुड़ता है तो अनंत हो जाता है। ध्यान ही एकमात्र साधन है जिसके जरिए, मनुष्य ईश्वर से जुड़ सकता है। ध्यान, प्रार्थना या ईश्वर में गहरी आसक्ति।