Wednesday, June 8, 2011

क्या शिवजी वैसे ही हैं जैसे कैलेंडर में दिखते हैं?

विनय बिहारी सिंह




एक भक्त ने पूछा- क्या शिवजी ठीक वैसे ही हैं जैसा फोटो में दिखते हैं? इस पर एक साधु ने उत्तर दिया- शायद। भक्त ने पूछा- क्यों। आप तो ध्यान लगाते हैं। क्या आपको शिवजी ने दर्शन नहीं दिए? साधु ने कहा- जैसा कैलेंडर में दिखते हैं, वैसे तो नहीं दिखे। मुझे तो प्रकाश का अनुभव होता है। भक्त ने पूछा- तब कैलेंडर में जैसा शिवजी का चित्र है, वह कैसे प्रचलित हुआ? साधु ने कहा- किसी उच्च कोटि के संत ने शिवजी के साक्षात दर्शन किए। उसे लगा कि शिव भक्तों को एक आभास देना चाहिए कि शिवजी कैसे हैं। उसने एक कलाकार को पकड़ा। उसे शिवजी का रूप समझाया। इस उच्च कोटि के संत ने उसमें करेक्शन किया। फिर सामने आया शिवजी का चित्र। भक्त ने पूछा- क्या शिवजी के गले में सचमुच सांप है? साधु ने कहा- शिवजी के गले में सांप, कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है। हमारे सभी देवताओं के चित्रों में प्रतीक के इस्तेमाल किए गए हैं। जैसे भगवान विष्णु- शेषनाग को शैय्या बना कर आराम कर रहे हैं। यानी भगवान सर्वोपरि हैं। भक्त ने कहा- आज पता चला कि कैलेंडरों में देवताओं के चित्रों का क्या अर्थ है।

Tuesday, June 7, 2011

मेरा मेरुदंड

(कृपया नीचे दिया गया अंग्रेजी अनुवाद भी पढ़ें)

विनय बिहारी सिंह



हे मेरे कृष्ण
मेरे प्राण


मेरा मेरुदंड है
तुम्हारी बांसुरी


तुम्हारे होठ जब
छूते हैं इस बांसुरी को


तो बहती है धारा
आनंद, परमानंद की


हे मेरे कृष्ण
बजाते रहो
यह बांसुरी


भले ही छूट जाए
मेरी नश्वर देह।।


the English translation by me


My spine


Vinay Bihari Singh


O my Krishna
my life force


my spine
is your flute


when your sweet lips
touches this Flute


I feel always
joy, ever new joy


O my Krishna
play this flute for ever


keep it on and on
Though I die
after all, this body is perishable.

Monday, June 6, 2011

भगवान कृष्ण जब गोप और उनकी गाएं बन गए

विनय बिहारी सिंह




भगवान कृष्ण की कथा इतनी बहुआयामी है कि उसे जितनी बार सुनें, नए- नए अर्थ समझ में आते हैं। उनमें प्रतीक बहुत हैं। उपमाएं बहुत हैं। यह इसलिए ताकि पढ़े लिखे लोग तो समझें ही, अनपढ़ भी कथा सुन कर उसका गूढ़ार्थ समझ ले। श्रीमदभागवत में एक कथा है कि एक बार ब्रह्मा जी को शक हो गया कि वृंदावन के कृष्ण भगवान के अवतार हैं। देखिए, भ्रम हो ही गया ब्रह्मा जी को। क्यों? क्योंकि ब्रह्मा जी का उत्पत्ति स्थान तो विष्णु भगवान की नाभि है। यानी ब्रह्मा जी विष्णु भगवान की नाभि से पैदा हुए हैं। और कृष्ण भगवान, विष्णु के ही अवतार हैं। जिसने उन्हें पैदा किया है, उस सर्वशक्तिमान भगवान को कोई कैसे समझ सकता है? वे तो बस अनन्य और गहरी भक्ति से ही एक हद तक समझे जा सकते हैं। पूरा तो उन्हें कोई नहीं समझ सकता। हां, उनके भक्त उनके एक अंश को समझ पाते हैं। तो ब्रह्मा जी को शक हो गया। उन्होंने अपनी माया से सारे गोपों और उनकी गायों और बछड़ों को अपहृत कर लिया और उन्हें अपने ब्रह्म लोक लेकर चले गए। वहां उन्हें योग निद्रा में सुला दिया। इधर भगवान को पता चल गया कि ब्रह्मा जी ने उनके साथ क्या किया है। भगवान तो अंतर्यामी हैं। शाम हुई तो भगवान ने सोचा कि इन गोपों की माताएं तो उन्हीं से पूछेंगी कि कहां गए उनके बेटे और गाय बछड़े इत्यादि। तब भगवान कृष्ण ने स्वयं ही गोपों, गायों और बछड़ों का रूप धर लिया। कैसे? यहीं पर रहस्य छुपा है। भगवान ही तो सब हुए हैं। स्वयं भगवान, गोप और गोपिकाएं। गाय औऱ बछड़े। सारे सजीव और निर्जीव तत्व। पेड़, पौधे, आसमान, जमीन, पहाड़, समुद्र.......... सब कुछ तो भगवान ने ही बनाया है। वही तो सारी सृष्टि में हैं। यह रहस्य साधुओं के मुंह से सुन कर बड़ा अच्छा लगता है। सर्वं खल्विदं ब्रह्म। सब ब्रह्म ही है। कुछ दिनों बाद ब्रह्मा जी जब वृंदावन में कृष्ण का हाल चाल लेने आए तो उन्होंने पाया कि जिन गोपों और गायों आदि का उन्होंने अपहरण किया है, वे तो यहां दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने एक क्षण में अपने लोक में उन्हें देखा। वे वहां सो रहे थे। यहां पृथ्वी पर देखा तो खेल रहे हैं। गाएं चर रही हैं। बछड़े उछल कूद कर रहे हैं। तब ब्रह्मा जी की आंखें खुलीं। तब उन्हें लगा कि वृंदावन के कृष्ण सचमुच भगवान के अवतार ही हैं।

Saturday, June 4, 2011

भगवान शिव के बारे में एक प्रश्न का उत्तर


विनय बिहारी सिंह




भाई अनुकेष पांडे जी,

आपने लिखा है- आपका लेख पढ़ा तो कुछ प्रश्न मन में उभरे | शिव का श्मशान वह नहीं जिसे हम आम तौर पर समझते हैं, यानी की वह श्मशान जहाँ शवो का दाह संस्कार होता हैं | लेकिन ग्रंथो में तो शिव को औघड़ बताया गया जो कपाल (नर-मुंड का भाग) धारण किये रहते हैं | उसी तरह तंत्र शास्त्र में भी उन्हें महाकाल, भैरव की संज्ञा दी गयी हैं और श्मशान को शिव का क्रीड़ा-स्थल बताया हैं | श्मशान वह जगह हैं जहाँ आत्मा का उसके निर्जीव शरीर (माया) से बंधन टूट जाता हैं | एक तरह से श्रृष्टि के छोटे से भाग का संहार हो जाता हैं | शिव की विनाश-लीला, जो की एक सकारात्मक प्राकृतिक नियम हैं, नवीन सृजन का मार्ग प्रशस्त करता हैं, यह सब उन लोगों को स्मरण दिलाने के लिए हैं जो शव के साथ श्मशान आते हैं | इसीलिए अघोरी भी श्मशान में रह कर अपनी साधना करते हैं | उसी प्रकार , मणिकर्णिका घाट, जिसे महाश्मशान माना जाता हैं, वह भी विश्वनाथ की नगरी काशी (वाराणसी) में स्थित हैं | अगर शिव का शमशान स्थूल शमशान नहीं हैं, तो काशी एवं अन्य श्मशानो को शिव का निवास स्थान क्यों माना जाता हैं | भूत पिशाच, चुड़ैल, राक्षस इत्यादि उनके गण माने जाते हैं | उपरोक्त का यह मतलब कतई नहीं हैं हैं की आपकी शिव के श्मशान की व्याख्या अनुचित हैं | तात्पर्य केवल यह हैं की जिस तरह की व्याख्या आपने की हैं उस तरह शिव का श्मशान से सम्बन्ध की व्याख्या ग्रंथो में कहाँ हैं?


इस प्रश्न के लिए मैं आपका बहुत आभारी हूं। अच्छा प्रश्न किया है आपने। आपका प्रश्न है- श्मशान संबंधी मेरी व्याख्या ग्रंथों में कहां है? भगवद गीता को आप सीधे- सीधे पढ़ेंगे तो लगेगा यह किसी युद्ध भूमि में खड़े अर्जुन और भगवान कृष्ण का संवाद है। लेकिन जब आप गीता का यह श्लोक पढ़ेंगे-

स्थितप्रग्यस्य का भाषा, समाधिस्थ केशव।
स्थितधिः किम प्रभाषेत, किम आसीत ब्रजेत किम।।

( अर्जुन भगवान से पूछते हैं- स्थितप्रग्य की भाषा कैसी होती है, और समाधि प्राप्त व्यक्ति की भाषा कैसी होती है? स्थिर मन बुद्धि वाला व्यक्ति कैसे बोलता है? कैसे बैठता है और कैसे चलता है?)

अब आप देखिए कि युद्ध भूमि में दोनों सेनाओं के बीच खड़े होकर अर्जुन पूछते हैं कि समाधि प्राप्त मनुष्य की कैसी स्थिति होती है? कैसे बोलता- चलता है? इसकी व्याख्या महान संन्यासियों ने की है। उन्होंने कहा है कि यह मन को जीतने और जीवन को ईश्वरोन्मुखी बनाने की शिक्षा है। जिन कौरवों और पांडवों की बात की गई है वे हमारे शरीर के भीतर ही हैं। हमारा इंद्रियमुखी मन कौरव है और ईश्वरोन्मुखी मन पांडव। ठीक इसी तरह श्मशान की जो व्याख्या मैंने लिखी है वह एक संन्यासी के मुंह से ही सुन कर लिखी है। उन्होंने कहा कि भगवान शंकर हमारे भीतर तभी आसन जमाएंगे जब हम अपने अंतःकरण को श्मशाननुमा बनाएंगे। ऋषि पातंजलि ने कहा है- योग्श्चित्तवृत्ति निरोधः।। चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। जब हम चित्त की वृत्तियों को समाप्त कर देंगे तो वह श्मशाननुमा हो जाएगा।
अब आइए एक और पक्ष पर बात करें। लोगों के जीवन पर जब खतरा मंडराने लगता है तो वे महामृत्युंजय का जाप करते या करवाते हैं। यह महामृत्युंजय का जाप क्या है? यह भगवान शिव की ही स्तुति है। यानी भगवान शिव जिन्हें आमतौर पर संहार का देवता माना जाता है, उन्हें प्रसन्न किया जाता है ताकि व्यक्ति की मृत्यु न हो। हालांकि भगवान शिव को मैं व्यक्तिगत रूप से संहार का देवता नहीं मानता। मैं मानता हूं कि भगवान शिव हमारे भीतर की कुवृत्तियों का संहार करते हैं और वे अत्यंत शुभ देवता हैं। स्वयं उनके पुत्र गजानन यानी गणेश जी की किसी भी शुभ कार्य में सबसे पहले पूजा होती है। भगवान शिव की पत्नी मां पार्वती (या काली या दुर्गा) विघ्न विनाशिनी मानी जाती हैं।
आपने प्रश्न किया है कि भूत, पिशाच आदि को शंकर जी का गण बताया गया है। मैं एक बार फिर संतों से सुनी हुई ही बात आपके सामने रखना चाहता हूं। हमारे धर्म ग्रंथों में प्रतीकों का बहुत इस्तेमाल हुआ है। भूत, पिशाच भगवान शिव के गण हैं, यानी भगवान शिव के भक्तों को भूत- पिशाचों से डरने की जरूरत नहीं है। वे भक्तों का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। उनके भक्त निर्भय रहें। अभी इसी ब्लाग पर कुछ दिन पहले मैंने संत वामाखेपा के बारे में लिखा है। वे श्मशान में ही रहते थे। वे भगवान शिव और मां काली के अनन्य भक्त थे। लेकिन वे जिसको आशीर्वाद देते थे, वह निहाल हो जाता था। उन्होंने न जाने कितने लोगों के रोग ठीक किए, न जाने कितनों को चिंतामुक्त किया। उनके संपर्क में जो आता था, वह आध्यात्मिक रूप से अत्यधिक संपन्न हो जाता था। प्रतीक के रूप में हमारे भीतर अगर श्मशान रूपी शांति आ जाए तो बस ईश्वरोप्लब्धि जैसे अनुभव हो सकते हैं। संतों ने ऐसा ही कहा है।

Friday, June 3, 2011

इस्कान के युवा सन्यासी से मुलाकात


विनय बिहारी सिंह




आज मेट्रो ट्रेन (भूगर्भ रेल) में इस्कान के एक युवा सन्यासी से मुलाकात हुई। मैं सीट पर बैठा था। इस युवा सन्यासी को देखा तो उन्हें अपनी सीट देनी चाही। लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। मैं अपनी सीट से खड़ा हो गया और उनसे बैठने का आग्रह किया। उन्होंने फिर शालीनता के साथ इंकार कर दिया और खड़े ही रहे। आमतौर पर ऐसा होता नहीं है। वे विदेशी थे। एकदम से गौरांग।अभी युवा अवस्था में उन्होंने प्रवेश ही किया था। अपने स्टेशन पर उतरने के पहले मैंने उनसे अंग्रेजी में पूछा- क्या इस्कान के सन्यासी हैं? वे बोले- हां। मायापुर में रहता हूं। मायापुर पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में है। वहां इस्कान का बहुत ही भव्य मंदिर है। मंदिर की भव्यता के कारण ही वह पर्यटन स्थलों में से एक है। मैंने पूछा- आपका नाम क्या है? वे बोले- केशव। मेरे दिमाग में तुरंत आया- भगवान कृष्ण का नाम। मैंने पूछा- आप पूरे दिन भगवान कृष्ण का नाम जप और कीर्तन और सेवा करते हैं? वे बोले- कोशिश करता हूं। मैंने पूछा- आप कितनी देर ध्यान करते हैं? उनका जवाब था- कोशिश तो करता हूं कि पूरे दिन ध्यान हो। कोशिश करता हूं कि ध्यान करते वक्त तो ईश्वर में लय हो ही, काम करते हुए भी ईश्वर की उपस्थिति का अहसास हो। वे यह नहीं कहते थे कि करता हूं। वे कहते थे- कोशिश करता हूं। उन्होंने सफेद धोती पहन रखी थी। कंधे पर एक छोटा सा बैग था। शरीर का ऊपरी भाग लगभग नंगा था। एक गमछानुमा सफेद वस्त्र भर था कंधे पर। पैर में खड़ाऊं था। खड़ाऊं पहन कर चलना आसान नहीं है। इसके लिए अभ्यास जरूरी है। उन्हें अभ्यास हो गया था। क्योंकि वे खड़ाऊं पहन कर तेजी से चल रहे थे। पैर की उंगलियां खड़ाऊं पर पकड़ बनाने के लिए सिकुड़ी हुई थीं। उनसे जितनी भी बातचीत हुई उससे जाहिर था कि वे अत्यंत शालीन व्यक्ति हैं और मुझसे बातचीत कर उन्हें अच्छा लग रहा है। मैंने उन्हें बताया- हम सब साधु- संतों का आदर करते हैं। इसलिए मैं आपको अपनी सीट दे रहा था। साधु इसलिए आदरणीय हैं कि वे लोकहित में अपना सारा जीवन ईश्वर को समर्पित कर देते हैं। वे मुस्कराए और सहमति में सिर हिलाया। फिर संकेत दिया कि वे सुविधाओं के उपभोग के लिए साधु नहीं बने हैं। बीस मिनट में वे अपने स्टेशन पहुंच जाएंगे। इतनी देर के लिए सीट का लोभ क्यों? मुझे लगा- मेट्रो ट्रेन में दस मिनट की यात्रा के लिए भी सीट को लेकर झगड़े होते हैं। और यह साधु शांत होकर खड़े हैं। सीट की उपेक्षा करते हुए। साधु अपने व्यवहार से ही सबको सिखाते हैं।

Thursday, June 2, 2011

क्या है ई-कोलाई संक्रमण?

जर्मनी में खीरे और कुछ अन्य सब्ज़ियों के ज़रिए ई-कोलाई बैक्टीरिया का संक्रमण लोगों तक पहुँच रहा है, अब तक इस संक्रमण की वजह से 14 लोगों की मौत हो गई है और सैकड़ों लोग बीमार हो गए हैं.

इस संक्रमण के बारे में कुछ ज़रूरी जानकारियाँ.

ई-कोलाई क्या है?

ई-कोलाई इशचेरिचिया कोलाई का संक्षिप्त रूप है. यह एक तरह का बैक्टीरिया है जो मनुष्यों और पशुओं के पेट में हमेशा रहता है, इस बैक्टीरिया के ज्यादातर रूप हानिरहित हैं, लेकिन कुछ ऐसे हैं जो पेट में मरोड़ और दस्त जैसे लक्षण पैदा करते हैं, कई बार इनकी वजह से लोगों का गुर्दा काम करना बंद कर देता है और संक्रमित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है.

मौजूदा संक्रमण के बारे में क्या जानकारी है?

इस बार जर्मनी से शुरू हुए संक्रमण में लोगों के गुर्दे और स्नायुतंत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं. इस अवस्था को हिमोलिटिक यूरेमिक सिंड्रोम कहते हैं.

इस बार के संक्रमण में खूनी दस्त, गुर्दे की नाकामी और मिर्गी के दौरे जैसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं.

ज्यादातर लोगों में ई-कोलाई बैक्टीरिया का जो रूप पाया गया है उसका नाम ई-कोलाई 0104 है, जो आम नहीं है.

अब तक ई-कोलाई के ज्यादातर मामलों की असली वजह 0157 रहा था, बैक्टीरिया के उस रूप से संक्रमित लोगों के लक्षण भी इसी तरह के होते हैं.

संक्रमण लोगों तक पहुँचा कैसे?

यह संक्रमण आम तौर पर माँस के ज़रिए लोगों तक पहुँचता है लेकिन इस बार इसका माध्यम सब्ज़ियाँ हैं. जर्मन अधिकारियों का कहना है कि स्पेन से आयात किए गए खीरे में ई-कोलाई बैक्टीरिया पाया गया है.

अच्छी तरह पकाए गए खाने में ई-कोलाई बैक्टीरिया के बचने की संभावना समाप्त हो जाती है, फल और कई सब्जियाँ अक्सर कच्ची खाई जाती हैं इसलिए संक्रमण फैल रहा है.

ई-कोलाई बैक्टीरिया पशुओं के मल के ज़रिए खीरे में किसी तरह पहुँचा जहाँ से वह लोगों के पेट में जा रहा है, अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि ऐसा गायों के गोबर के खाद के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की वजह से हुआ होगा.

संक्रमण से बचने के लिए क्या करना चाहिए?

जर्मन अधिकारियों ने लोगों को हिदायत दी है कि वे खीरा, टमाटर और गाजर जैसी चीज़ें कच्चा न खाएँ.

इस संक्रमण के जर्मनी से बाहर फैलने की ख़बर अब तक नहीं आई है.

जानकारों का कहना है कि अगर फलों और सब्ज़ियों को अच्छी तरह धोकर या छीलकर खाया जाए तो ख़तरा नहीं है, डॉक्टरों का कहना है कि ई-कोलाई बैक्टीरिया फल-सब्ज़ियों के ऊपर है, न कि उनके भीतर.(Courtesy- BBC Hindi)

Wednesday, June 1, 2011

अच्छा कोलेस्टेरॉल बढ़ाने वाली दवा फिसड्डी


विनय बिहारी सिंह



नेशनल इंस्टीट्यूट्स आफ हेल्थ (एनआईएच) ने घोषणा की है कि अच्छा कोलेस्टेराल बढ़ाने की दवा नियास्पैन हृदय रोग को रोकने में कारगर नहीं है। अच्छा कोलेस्टेराल यानी एचडीएल। आप जानते ही हैं कि हमारे शरीर में दो तरह के कोलेस्टेराल होते हैं। अच्छे वाले कोलेस्टेराल को एचडीएल और बुरे वाले कोलेस्टेराल को एलडीएल कहते हैं। एलडीएल यानी बुरा कोलेस्टेराल अगर ज्यादा हो जाता है तो हमारी रक्त धमनियों में कचरे की परतें जम जाती हैं और हमारे हृदय पर भारी दबाव पड़ने लगता है। नतीजा यह होता है कि हमारा हृदय बीमार हो जाता है। या हर्ट अटैक होता है। दिमाग की नसों में यही कोलेस्टेराल हो जाने पर ब्रेन हेमरेज आदि होता है। लेकिन यह सब तब होता है जब बुरे कोलेस्टेराल की मात्रा हद से ज्यादा होती है। दवा नियासिन कई नाम है। इसके अन्य नाम हैं- निकोटिनिक एसिड, विटामिन बी-३ और निकोटिनामाइड। ये बाजार में नियालिप, निसिनाल और नियासिन नाम से बिकती है। हालांकि नियास्पैन मुश्किल से ५ से १० प्रतिशत मरीजों को ही दिया जाता है। लेकिन अब यह सिद्ध हो गया है कि हृदय रोग को रोकने में यह दवा नाकाम है। माना जाता है कि शरीर में अच्छा कोलेस्टेराल या एचडीएल पर्याप्त मात्रा में रहने पर आयु अपेक्षाकृत लंबी होती है। इस दवा के साइड एफेक्ट्स के बारे में रिपोर्ट आई है कि इसके लगातार सेवन से सिरदर्द हो सकता है या दृष्टि में धुंधलापन हो सकता है। हम भारतीय लोगों में गुड कोलेस्टेराल की मात्रा औसतन कम पाई जाती है। खासतौर से महिलाओं में।
कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन बढ़ाः फ्रांस के वैग्यानिकों ने शोध कर पता लगाया है कि पूरी दुनिया में कार्बन डाई आक्साइड या सीओ२ का उत्सर्जन दो प्रतिशत बढ़ गया है। यह खतरे की घंटी है। इससे तापमान दो डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। वैग्यानिकों ने कहा है कि विश्व की आर्थिक मंदी २०१० में खत्म हो गई। लेकिन कार्बन उत्सर्जन की मात्रा १.६ जिगा टन बढ़ गई है। यह इसलिए भी खतरनाक है कि इससे पर्यावरण में परिवर्तन होगा। अनेक जंतु लुप्त होने लगेंगे। अनेक वनस्पतियां लुप्त होने लगेंगी। इसका नुकसान मनुष्य को ही उठाना पड़ेगा। पिछले साल कार्बन उत्सर्जन की मात्रा ३०.६ जिगा टन थी। इस साल यह उत्सर्जन १.६ जिगा टन और ज्यादा बढ़ गया है। वैग्यानिकों ने कहा है कि नाइटिंगल या बुलबुल नाम की पक्षी लुप्त होने के कगार पर है। अगले ३० सालों में इसका नामों निशान मिट जाएगा। क्योंकि एक भी बुलबुल जीवित नहीं रहेगा। आने वाली पीढ़ी को अगर बताया जाएगा कि बुलबुल नाम की एक पक्षी था और अगर उसका फोटो दिखाया जाएगा तो वह अचरज में पड़ जाएगी। क्या ऐसा भी पक्षी था? उसके मुंह से निकलेगा।