Saturday, January 1, 2011

आप सबके लिए नया साल मंगलमय हो


विनय बिहारी सिंह

आप सबको नया साल मंगलमय हो। इस साल आपकी ढेर सारी अच्छी कामनाएं पूरी हों। खुशियों के मौके बार- बार आएं और ईश्वर की कृपा बरसे। कल की रात मैंने अपने गुरु परमहंस योगानंद जी के आश्रम में बिताई। यानी नया साल वहीं मनाया। हम लोगों ने ३१ दिसंबर की रात १० बजे से ध्यान शुरू किया और एक जनवरी २०११ के प्रारंभ में खत्म किया। या रात बारह बजे के बाद तक ध्यान चला। फिर हम सोने चले गए। सुबह उठ कर ध्यान और सुस्वादु और पौष्टिक जलपान। आज पूरे दिन लग रहा है कि यह ईश्वर की ही कृपा है कि नए साल का पहला दिन उन्हें याद करते हुए बीत रहा है। यह भी महसूस हो रहा है कि ईश्वर के बिना जीवन कितना सूना रहता। कितना उबाऊ रहता। अगर हम अपने जीवन में ईश्वर की उपस्थिति और उनकी कृपा महसूस करते हैं तो अत्यंत भाग्यशाली हैं। क्योंकि सारा आनंद, सारा सुख ईश्वर में ही है। शारीरिक सुख, ईश्वरीय सुख के सामने फीके जान पड़ते हैं। हमें लगता है कि अच्छा वस्त्र पहन कर, मनपसंद स्वादिष्ट भोजन कर और अलग- अलग जगहों पर घूम कर आनंद मना सकते हैं। यह बुरा नहीं है। लेकिन अगर अच्छा वस्त्र पहन कर, स्वादिष्ठ भोजन कर, ईश्वरीय रस में डूबें तो यह आनंद अनंत गुना बढ़ जाता है। साधु इसे राम रस कहते हैं। वे सारा आनंद ईश्वर को समर्पित करते हुए कहते हैं- आनंद की यह धारा तो आप ही के यहां से आ रही है। तो इस आनंद में मैं कुछ और आनंद जोड़ कर, हे भगवन, मैं आपको दे रहा हूं। तब भगवान कहते हैं- ठीक है, तो यह लो इससे भी दस गुना आनंद। तब भक्त कहता है- इसे भी मैं आपको सौंपता हूं। भक्त उसमें अपना आनंद जोड़ कर भगवान को दे देता है। भगवान फिर उसका दस गुना आनंद दे देते हैं। भक्त और भगवान का यह आनंद रस का खेल चलता रहता है। इसमें दोनों को आनंद रहता है। भगवान को भी और भक्त को भी। और जब आप नींद में होते हैं या गहरे ध्यान में होते हैं तो यह पता नहीं चलता कि आप नए साल में हैं या पुराने साल में। वहां समय की सीमा रेखा खत्म हो जाती है। यह भी भगवान की लीला ही तो है।

Thursday, December 30, 2010

हां, इस सृष्टि में चमत्कार होते हैं


विनय बिहारी सिंह


क्या इस साल डिहिका आश्रम में आपने परमहंस योगानंद जी को साक्षात शरीर में देखा? मैंने इकसठ साल के तारापद चट्टराज से चकित होकर पूछा।चट्टराज पास के नगर बर्नपुर के रहने वाले हैं और आश्रम में सेवा कार्य करते रहते हैं। उन्होंने कहा- हां, बिल्कुल शरीर में देखा। आश्चर्य इसलिए कि परमहंस जी ने सन १९५२ में अपनी देह का त्याग कर महासमाधि ले ली थी। जिन्हें मालूम नहीं है उन्हें बता दें- महान योगी परमहंस योगानंद जी की आत्मकथा - आटोबायोग्राफी आफ अ योगी, दुनिया की अनेक भाषाओं में अनूदित हो चुकी है। उर्दू में भी। हिंदी में योगी कथामृत नाम से यह अपार लोकप्रिय है। योगी कथामृत के २७ वें अध्याय में डिहिका के ब्रह्मचर्य विद्यालय का उल्लेख है। चट्टराज जी कह रहे थे कि उन्होंने १३ मई २०१० को उन्हें सशरीर देखा। मैंने उनसे पूछा- किस समय उन्होंने इस देव तुल्य परम योगी को देखा?
उन्होंने कहा- शाम का समय था। मैं योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया के डिहिका स्थित आश्रम में बैठा हुआ था। आश्रम में मुझे छोड़ कर कोई नहीं था। लेकिन जरा ठहरिए। यह अत्यंत रोचक घटना बताने से पहले मैं आपको बता दूं कि अपने गुरु स्वामी श्री युक्तेश्वर जी की प्रेरणा से परमहंस जी ने २२ मार्च १९१७ को डिहिका में अपने पहले आश्रम स्कूल की स्थापना की। डिहिका बर्दवान जिले के आसनसोल से १० किलोमीटर दूर दामोदर नदी के पास है। बाद में छात्रों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। डिहिका में जगह कम थी। इसलिए यह स्कूल यह रांची स्थानांतरित हो गया। वहीं यानी रांची में उसी स्थान पर आज पवित्र योगदा आश्रम है। डिहिका और रांची की जमीन कासिम बाजार के महाराजा मणिंद्र चंद्र नंदी ने दी थी। इसकी चर्चा इसी लेख में बाद में आएगी।
आइए अब रोमांचकारी घटना की तरफ मुड़ें। चट्टराज जी ने कहा- शाम का समय था। मैं अकेल आश्रम में मुख्य गेट के बगल में एक पेड़ के पास बैठा था। तभी देखा- एक लंबे बालों वाले बलिष्ट सन्यासी तेजी से आश्रम में घुसे और आज जहां ध्यान मंदिर बन रहा है, उसमें थोड़ी देर के लिए रुके। फिर आश्रम में स्थित तालाब के भीतर गए। तब तालाब में पानी नहीं था। वहां तालाब के बीचोबीच गए और वहां चारो तरफ घूम कर देखा। मैं तो खड़ा होकर अवाक् उन्हें देख रहा था। फिर वे वापस आए। जब वे नजदीक आए तब मैंने पहचान लिया- अरे, यह तो साक्षात परमहंस योगानंद जी हैं। वही चेहरा, वही जादुई आंखें और वही बलिष्ट शरीर। गेट से बाहर जाने के पहले उन्होंने तीन बार कहा- माई गॉड इज लव, माई गॉड इज लव, माई गॉड इज लव। ( मेरे ईश्वर प्रेम हैं यानी प्रेम ही ईश्वर हैं ) और वे तेजी से चले गए। तब मैं उनके पीछे भागा। गेट के बाहर गया। लेकिन आश्चर्य। उनका कहीं पता नहीं था। गेट के बाहर लोग आ जा रहे थे। लेकिन गुरु जी नहीं दिखे। यहां गुरु जी परमहंस जी के लिए कहा गया है।
मैंने उनसे पूछा- परमहंस जी ने क्या पहना था? चट्टराज जी ने कहा- उन्होंने भूरे रंग का सन्यासियों का गाउन पहन रखा था। मैंने पूछा- गेरुए रंग का नहीं। उन्होंने कहा- नहीं। उनका वस्त्र भूरा था। वे जिस तेजी से आए आश्रम में घूमे और गए, वह चकित करने वाला था। अब मैं सोचता हूं कि उनके पैर छू लेता तो मेरा जीवन सार्थक हो जाता। लेकिन वे तो मानो हवा की तरह चल रहे थे। मैं उन्हें छू ही कैसे सकता था।
जीवन में पहली बार मैं किसी व्यक्ति से मिला, जिसने एक दिव्य योगी का शरीर छोड़ने के बाद दर्शन किया है। मैंने चट्टराज जी से कई प्रश्न किए। पर वे तो उसी क्षण के बारे में बार- बार बता रहे थे। मानो वह उनके जीवन का केंद्रीय अनुभव बन गया हो। मैं उनके सौभाग्य को महसूस कर सकता हूं।
जब यह आश्रम स्कूल रांची स्थानांतरित हो गया तो यह डिहिका की यह जमीन कई लोगों के हाथों में बिकी। तभी सन १९९२ में योगदा आश्रम के एक भक्त ने अचानक उस जगह की पहचान की। उसने कहा- यही वह जगह है जहां गुरुदेव ने अपना पहला आश्रम स्कूल खोला था। यहीं पर परमहंस जी के संस्कृत अध्यापक स्वामी केवलानंद जी ने बच्चों को पढ़ाया और अपनी साधना भी जारी रखी। यहीं पर स्वामी केवलानंद जी ने सन्यास लेकर गेरुआ वस्त्र धारण किया। वे स्कूल के धर्माचार्य थे। इसी वयोवृद्ध भक्त ने बताया कि किस सेमल के वृक्ष के नीचे बैठ कर परमहंस जी ध्यान करते थे। उसने अब तक मौजूद उस पेड़ को भी दिखाया। संयोग यह कि सन १९३५ में परमहंस योगानंद जब अपने गुरु से मिलने अमेरिका से भारत आए तो डिहिका आए और उसी पेड़ के नीचे बैठ कर गहन ध्यान किया। योगदा सत्संग सोसाइटी (वाईएसएस) और सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप (एसआरएफ) की संघमाता और अध्यक्ष दयामाता भी जब भारत आईं तो उन्होंने इस पवित्र स्थल पर आईं। मूल आश्रम की दो तिहाई जमीन लेकर विभिन्न लोगों ने अपना घर बना लिया है। मार्च १९९७ में सिर्फ एक तिहाई जमीन यानी ६५००० स्क्वायर फीट जमीन आश्रम खरीद सका। डिहिका में यहीं पर है योगदा सत्संग ध्यान केंद्र। तालाब के घाट पर एक तरफ प्राचीन पत्थर की सीढ़ियां हैं। इन पत्थरों पर परमहंस जी ने अपने पैर रखे होंगे, यह सोच कर मैंने उन्हें छू कर अपने माथे पर लगाया। वहां एक सुखद गेस्ट हाउस, ध्यान केंद्र बन गया है। आश्रम के चारो तरफ चारदीवारी बना दी गई है। इस आश्रम के कायाकल्प की तैयारियां चल रही हैं। अभी बहुत काम बाकी है। उस पवित्र सेमल के पेड़ को जहां परमहंस जी बैठते थे, वेस्ट बेंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बार- बार काट रहा है। उसका कहना है कि ऊपर से बिजली के जा रहे तारों को यह पेड़ डिस्टर्ब कर रहा है। आश्रम के कर्मचारी आग्रह करते हैं कि इन तारों और खंभों को हटाने की जगह तो है, हटा क्यों नहीं देते। तो वेस्ट बेंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड कह रहा है- आश्रम रुपए देगा तब हम खंभा और तार हटाएंगे। वेस्ट बेंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड की यह बात सुन कर ईश्वर परायण लोग चकित हैं. जिस परमहंस योगानंद जी की स्मृति में भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया था, जिन्होंने अमेरिका और समूचे विश्व में क्रिया योग का प्रचार प्रसार किया ऐसे महान योगी का स्मृति चिन्ह भी बनाए रखने की शालीनता वेस्ट वेस्ट बेंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड नहीं कर पा रहा है। क्या विडंबना है। ईश्वर करें इस पवित्र पेड़ का महत्व उनकी समझ में आए।
परमहंस योगानंद के इस ब्रह्मचर्य स्कूल में भोर से ही गतिविधियां शुरू हो जाती थीं। बच्चे अपने अध्यापकों के साथ वेदों और पुराणों के श्लोक गाते थे। इसकी गूंज पूरे माहौल को पवित्र बना देती थी। फिर ध्यान। इसके बाद जलपान। स्कूल इसके बाद ही शुरू हो जाता था। विभिन्न विषयों का गहन अध्ययन। एक से एक विद्वान अध्यापक। स्कूल की सफाई, बर्तनों की सफाई खाना इत्यादि सब छात्र करते थे। वे समय पर ध्यान करते थे। योगानंद जी चाहते थे कि स्कूलों में नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा भी दी जाए ताकि स्कूल से पास हो कर निकले बच्चे देश और दुनिया के लिए कुछ करें। एक स्वस्थ राष्ट्र और समाज का निरंतर विकास हो। शनिवार की शाम को योगानंद जी का प्रवचन होता था। पास ही दामोदर रेलवे स्टेशन है। वहां के कुछ कर्मचारी आ जाते थे। आसपास के गांवों के लोग भी आते थे। कभी- कभी आसपास के जंगल और पहाड़ों पर योगानंद जी के साथ अध्यापक और छात्र घूमने जाते थे। वहां उन्हें प्रकृति के असली रूपों का दर्शन होता था। नदी और पहाड़ बच्चों से मौन संवाद करते जान पड़ते थे। परमहंस योगानंद जी तब स्वामी योगानंद जी थे। वे कभी- कभी खुद खाना बनाते थे। देर होने पर कहते- यह देर क्षमा करने योग्य है क्योंकि भोजन पकाना एक कला है। देर हो ही सकती है। वे भोजन बनाने के नए तरीकों पर प्रयोग करते रहते थे। लेकिन बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। योगानंद जी ने कासिम बाजार के महाराजा से कहा कि वे इस स्कूल में और कमरे बनवा दें। लेकिन महाराजा नंदी ने कहा- इससे ज्यादा स्थान रांची में है। कृपया वह जगह आप ले लें। स्कूल के अध्यापक यह मनोरम स्थल छोड़ना नहीं चाहते थे। लेकिन कोई उपाय नहीं था। साल भर बाद उन्हें स्कूल को रांची स्थानांतरित करना पड़ा। कई उत्सुक लोग पूछते हैं कि इस स्कूल की स्थापना का संयोग कैसे बैठा। उनके लिए यह जानकारी जरूरी है कि जब योगानंद जी के मन में एक आदर्श स्कूल की कल्पना चल रही थी तो अपना संक्षिप्त ब्लू प्रिंट लेकर वे कासिम बाजार के महाराजा मणिंद्र चंद्र नंदी से मिले। महाराजा नंदी तो ब्लू प्रिंट देखते ही खुशी से उछल पड़े और कहा- स्वामी जी, क्या अद्भुत संयोग है। मैं भी एक ऐसा ही स्कूल खोलना चाहता था। कृपा कर इस योजना की विस्तृत रूपरेखा बनाएं। योगानंद जी ने वहीं बैठ कर विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत कर दी। महाराजा इस स्कूल को खोलने के लिए तत्पर हो गए। स्कूल खुला और खूब लोकप्रिय हुआ। वेस्ट बेंगाल इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के उच्चाधिकारी इन सारे तथ्यों से शायद परिचित नहीं हैं। उन्होंने कहा- हां, बिल्कुल शरीर में देखा। आश्चर्य इसलिए कि परमहंस जी ने सन १९५२ में अपनी देह का त्याग कर महासमाधि ले ली थी। जिन्हें मालूम नहीं है उन्हें बता दें- महान योगी परमहंस योगानंद जी की आत्मकथा - आटोबायोग्राफी आफ अ योगी, दुनिया की अनेक भाषाओं में अनूदित हो चुकी है। उर्दू में भी। हिंदी में योगी कथामृत नाम से यह अपार लोकप्रिय है। योगी कथामृत के २७ वें अध्याय में डिहिका के ब्रह्मचर्य विद्यालय का उल्लेख है। चट्टराज जी कह रहे थे कि उन्होंने १३ मई २०१० को उन्हें सशरीर देखा। मैंने उनसे पूछा- किस समय उन्होंने इस देव तुल्य परम योगी को देखा। उन्होंने कहा- शाम का समय था। मैं योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया के डिहिका स्थित आश्रम में बैठा हुआ था। आश्रम में मुझे छोड़ कर कोई नहीं था। लेकिन जरा ठहरिए। यह अत्यंत रोचक घटना बताने से पहले मैं आपको बता दूं कि अपने गुरु स्वामी श्री युक्तेश्वर जी की प्रेरणा से परमहंस जी ने २२ मार्च १९१७ को डिहिका में अपने पहले आश्रम स्कूल की स्थापना की। डिहिका बर्दवान जिले के आसनसोल से १० किलोमीटर दूर दामोदर नदी के पास है। बाद में छात्रों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। डिहिका में जगह कम थी। इसलिए यह स्कूल यह रांची स्थानांतरित हो गया। वहीं यानी रांची में उसी स्थान पर आज पवित्र योगदा आश्रम है। डिहिका और रांची की जमीन कासिम बाजार के महाराजा मणिंद्र चंद्र नंदी ने दी थी। इसकी चर्चा इसी लेख में बाद में आएगी।
आइए अब रोमांचकारी घटना की तरफ मुड़ें। चट्टराज जी ने कहा- शाम का समय था। मैं अकेल आश्रम में मुख्य गेट के बगल में एक पेड़ के पास बैठा था। तभी देखा- एक लंबे बालों वाले बलिष्ट सन्यासी तेजी से आश्रम में घुसे और आज जहां ध्यान मंदिर बन रहा है, उसमें थोड़ी देर के लिए रुके। फिर आश्रम में स्थित तालाब के भीतर गए। तब तालाब में पानी नहीं था। वहां तालाब के बीचोबीच गए और वहां चारो तरफ घूम कर देखा। मैं तो खड़ा होकर अवाक् उन्हें देख रहा था। फिर वे वापस आए। जब वे नजदीक आए तब मैंने पहचान लिया- अरे, यह तो साक्षात परमहंस योगानंद जी हैं। वही चेहरा, वही जादुई आंखें और वही बलिष्ट शरीर। गेट से बाहर जाने के पहले उन्होंने तीन बार कहा- माई गॉड इज लव, माई गॉड इज लव, माई गॉड इज लव। और वे तेजी से चले गए। तब मैं उनके पीछे भागा। गेट के बाहर गया। लेकिन आश्चर्य। उनका कहीं पता नहीं था। गेट के बाहर लोग आ जा रहे थे। लेकिन गुरु जी नहीं दिखे। यहां गुरु जी परमहंस जी के लिए कहा गया है।
मैंने उनसे पूछा- परमहंस जी ने क्या पहना था। चट्टराज जी ने कहा- उन्होंने भूरे रंग का सन्यासियों का गाउन पहन रखा था। मैंने पूछा- गेरुए रंग का नहीं। उन्होंने कहा- नहीं। उनका वस्त्र भूरा था। वे जिस तेजी से आए आश्रम में घूमे और गए, वह चकित करने वाला था। अब मैं सोचता हूं कि उनके पैर छू लेता तो मेरा जीवन सार्थक हो जाता। लेकिन वे तो मानो हवा की तरह चल रहे थे। मैं उन्हें छू ही कैसे सकता था।
जीवन में पहली बार मैं किसी व्यक्ति से मिला, जिसने एक दिव्य योगी का शरीर छोड़ने के बाद दर्शन किया है। मैंने चट्टराज जी से कई प्रश्न किए। पर वे तो उसी क्षण के बारे में बार- बार बता रहे थे। मानो वह उनके जीवन का केंद्रीय अनुभव बन गया हो। मैं उनके सौभाग्य को महसूस कर सकता हूं।
जब यह आश्रम स्कूल रांची स्थानांतरित हो गया तो यह डिहिका की यह जमीन कई लोगों के हाथों में बिकी। तभी सन १९९२ में योगदा आश्रम के एक भक्त ने अचानक उस जगह की पहचान की। उसने कहा- यही वह जगह है जहां गुरुदेव ने अपना पहला आश्रम स्कूल खोला था। यहीं पर परमहंस जी के संस्कृत अध्यापक स्वामी केवलानंद जी ने बच्चों को पढ़ाया और अपनी साधना भी जारी रखी। यहीं पर स्वामी केवलानंद जी ने सन्यास लेकर गेरुआ वस्त्र धारण किया। वे स्कूल के धर्माचार्य थे। इसी वयोवृद्ध भक्त ने बताया कि किस सेमल के वृक्ष के नीचे बैठ कर परमहंस जी ध्यान करते थे। उसने अब तक मौजूद उस पेड़ को भी दिखाया। संयोग यह कि सन १९३५ में परमहंस योगानंद जब अपने गुरु से मिलने अमेरिका से भारत आए तो डिहिका आए और उसी पेड़ के नीचे बैठ कर गहन ध्यान किया। योगदा सत्संग सोसाइटी (वाईएसएस) और सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप (एसआरएफ) की संघमाता और अध्यक्ष दयामाता भी जब भारत आईं तो उन्होंने इस पवित्र स्थल पर आईं। मूल आश्रम की दो तिहाई जमीन लेकर विभिन्न लोगों ने अपना घर बना लिया है। मार्च १९९७ में सिर्फ एक तिहाई जमीन यानी ६५००० स्क्वायर फीट जमीन आश्रम खरीद सका। डिहिका में यहीं पर है योगदा सत्संग ध्यान केंद्र। तालाब के घाट पर एक तरफ प्राचीन पत्थर की सीढ़ियां हैं। इन पत्थरों पर परमहंस जी ने अपने पैर रखे होंगे, यह सोच कर मैंने उन्हें छू कर अपने माथे पर लगाया। वहां एक सुखद गेस्ट हाउस, ध्यान केंद्र बन गया है। आश्रम के चारो तरफ चारदीवारी बना दी गई है। इस आश्रम के कायाकल्प की तैयारियां चल रही हैं। अभी बहुत काम बाकी है। उस पवित्र सेमल का पेड़ जहां परमहंस जी बैठते थे, को बिजली विभाग बार- बार काट रहा है। उसका कहना है कि इस पेड़ के ऊपर से बिजली के जा रहे तारों को यह पेड़ डिस्टर्ब कर रहा है। आश्रम के कर्मचारी आग्रह करते हैं कि इन तारों और खंभों को हटाने की जगह तो है, हटा क्यों नहीं देते। तो बिजली विभाग कह रहा है- आश्रम रुपए देगा तब हम खंभा और तार हटाएंगे। बिजली विभाग यानी वेस्ट बेंगाल इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड। जिस परमहंस योगानंद जी की स्मृति में भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया था, जिन्होंने अमेरिका और समूचे विश्व में क्रिया योग का प्रचार प्रसार किया ऐसे महान योगी की स्मृति चिन्ह भी बनाए रखने की शालीनता वेस्ट बेंगाल इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड नहीं कर पा रहा है। क्या विडंबना है। बिजली विभाग को समझाने की कोशिशें जारी हैं। ईश्वर करें इस पवित्र पेड़ का महत्व उनकी समझ में आए।
परमहंस योगानंद के इस ब्रह्मचर्य स्कूल में भोर से ही गतिविधियां शुरू हो जाती थीं। बच्चे अपने अध्यापकों के साथ वेदों और पुराणों के श्लोक गाते थे। इसकी गूंज पूरे माहौल को पवित्र बना देती थी। फिर ध्यान। इसके बाद जलपान। स्कूल इसके बाद ही शुरू हो जाता था। विभिन्न विषयों का गहन अध्ययन। एक से एक विद्वान अध्यापक। स्कूल की सफाई, बर्तनों की सफाई खाना इत्यादि सब छात्र करते थे। वे समय पर ध्यान करते थे। योगानंद जी चाहते थे कि स्कूलों में नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा भी दी जाए ताकि स्कूल से पास हो कर निकले बच्चे देश और दुनिया के लिए कुछ करें। एक स्वस्थ राष्ट्र और समाज का निरंतर विकास हो। शनिवार की शाम को योगानंद जी का प्रवचन होता था। पास ही दामोदर रेलवे स्टेशन है। वहां के कुछ कर्मचारी आ जाते थे। आसपास के गांवों के लोग भी आते थे। कभी- कभी आसपास के जंगल और पहाड़ों पर योगानंद जी के साथ अध्यापक और छात्र घूमने जाते थे। वहां उन्हें प्रकृति के असली रूपों का दर्शन होता था। नदी और पहाड़ बच्चों से मौन संवाद करते जान पड़ते थे। परमहंस योगानंद जी तब स्वामी योगानंद जी थे। वे कभी- कभी खुद खाना बनाते थे। देर होने पर कहते- यह देर क्षमा करने योग्य है क्योंकि भोजन पकाना एक कला है। देर हो ही सकती है। वे भोजन बनाने के नए तरीकों पर प्रयोग करते रहते थे। लेकिन बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। योगानंद जी ने कासिम बाजार के महाराजा से कहा कि वे इस स्कूल में और कमरे बनवा दें। लेकिन महाराजा नंदी ने कहा- इससे ज्यादा स्थान रांची में है। कृपया वह जगह आप ले लें। स्कूल के अध्यापक यह मनोरम स्थल छोड़ना नहीं चाहते थे। लेकिन कोई उपाय नहीं था। साल भर बाद उन्हें स्कूल को रांची स्थानांतरित करना पड़ा। कई उत्सुक लोग पूछते हैं कि इस स्कूल की स्थापना का संयोग कैसे बैठा। उनके लिए यह जानकारी जरूरी है कि जब योगानंद जी के मन में एक आदर्श स्कूल की कल्पना चल रही थी तो अपना संक्षिप्त ब्लू प्रिंट लेकर वे कासिम बाजार के महाराजा मणिंद्र चंद्र नंदी से मिले। महाराजा नंदी तो ब्लू प्रिंट देखते ही खुशी से उछल पड़े और कहा- स्वामी जी, क्या अद्भुत संयोग है। मैं भी एक ऐसा ही स्कूल खोलना चाहता था। कृपा कर इस योजना की विस्तृत रूपरेखा बनाएं। योगानंद जी ने वहीं बैठ कर विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत कर दी। महाराजा इस स्कूल को खोलने के लिए तत्पर हो गए। स्कूल खुला और खूब लोकप्रिय हुआ। वेस्ट बेंगाल इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के उच्चाधिकारी इन सारे तथ्यों से शायद परिचित नहीं हैं।

Wednesday, December 29, 2010

जीवन संरचना में नए तत्व की खोज



पारुल अग्रवाल
बीबीसी संवाददाता

अब तक यह माना जाता था कि धरती पर जीवन के छह प्रमुख तत्त्व हैं-कॉर्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सल्फ़र और फ़ॉस्फ़ोरस.

इस साल अनुसंधानकर्ताओं ने कैलिफ़ॉर्निया की झील में एक ऐसा जीवाणु पाया जिसने फ़ॉस्फ़ोरस के बदले ज़हरीले रसायन आर्सेनिक को अपनी संरचना में शामिल कर लिया है.

इस खोज से यह धारणा पुष्ट हुई कि दूसरे ग्रहों पर अलग-अलग रसायनों से मिलकर बने जीवाणु और जीवन संरचनाएं भी मौजूद हो सकती हैं.

इस साल विश्व में पहली बार इस साल वैज्ञानिकों ने एंटी मैटर या प्रतिपदार्थ के अणुओं को कुछ क्षणों के लिए पकड़ने में भी सफलता पाई.

पदार्थ उसे कहते हैं जिससे कि पूरी दुनिया का निर्माण हुआ है. जब पदार्थ और प्रतिपदार्थ एक साथ जुड़ते हैं तो एक दूसरे का अस्तित्व समाप्त कर देते हैं और शेष कुछ नहीं बचता. इससे दुनिया की उत्पत्ति के बारे में काफ़ी जानकारी मिल सकती है.

उधर अमरीका में मंदी की मार का असर साल 2010 में नासा के अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर पड़ा.

अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वित्तीय तंगी के चलते 2020 में एक मानव दल के चांद पर जाने के कार्यक्रम को रद्द कर दिया. माना जा रहा है कि ये कार्यक्रम अब निजी हाथों में सौंपा जाएगा.

भारत के लिए एक दुखद घटना-- श्रीहरिकोटा से जीएसएलवी-एफ़06 यान के ज़रिए किया गया उपग्रह प्रक्षेपण विफल हो गया. प्रक्षेपण के कुछ ही समय बाद इसमें विस्फोट हो गया.

वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि नए संचार उपग्रह से टीवी, टेलीमेडीसन, टेलीशिक्षा और टेलीफ़ोन सेवाओं को बेहतर करने में मदद मिलेगी.

अगर ये मिशन सफल होता तो भारत अमरीका और रुस जैसे उन पाँच देशों की श्रेणी में शामिल हो जाता जिनके पास इस तरह की तकनीक है.
मैक्सिको की खाड़ी में हुआ तेल का रिसाव अमरीका के इतिहास में अब तक की सबसे भीषण पर्यावरण संबंधी दुर्घटना है.

साल 2010 को संयुक्त राष्ट्र की ओर से अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष घोषित किया गया. ये मौका था दुनिया को आगाह करने का कि जैव विविधता को नुकसान पहुंचा कर इंसान मुफ़्त में मिल रही प्राकृतिक सुविधाओं को किस तरह खत्म करता जा रहा है.
इस साल के इतिहास में अब तक की सबसे भीषण पर्यावरण संबंधित दुर्घटना भी दर्ज हुई. 20 अप्रैल 2010 को दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी के तेल के कुएं में विस्फोट हुआ.
मैक्सिको की खाड़ी में हुई इस दुर्घटना में 11 लोगों की मौत हो गई और समुद्र में 40 लाख बैरल से भी ज़्यादा तेल का रिसाव हुआ. समुद्री जीवन को भारी नुकसान के बाद तेल का यह रिसाव जुलाई में बंद हुआ.
अप्रैल के महीने में आइसलैंड में फटे एक ज्वालामुखी की राख ने यूरोप के कई देशों में हवाई सेवा को ठप कर दिया. एयर लाइंस की चिंता थी कि ज्वालामुखी की राख विमानों के इंजनों को जाम कर सकती है. छह दिनों तक हज़ारों उड़ानें बाधित रहीं और लाखों यात्री प्रभावित हुए.
25 साल की लगातार खोज के बाद मैडास्कर की एलाओट्रा झील में पाई जाने वाली चिड़िया एलाओट्रा ग्रेब को 2010 में विलुप्त घोषित कर दिया गया.
पीली चोंच वाले इस पक्षी का आकार इतना छोटा था कि यह ज़्यादा लंबी उड़ान नहीं भर सकता था. यही वजह है कि झील में मानवीय गतिविधियां बढ़ने के साथ यह पक्षी विलुप्त हो गया.
भारतीय पत्रकार पल्लव बागला को साल 2010 के लिए ‘अमेरिकन जियोफ़िसिकल यूनियन’ की ओर से विज्ञान क्षेत्र का प्रतिष्ठित ‘डेविड पर्लमेन अवार्ड’ मिला.
अपनी रिपोर्ट के ज़रिए पल्लव ने अमरीकी संस्थान आईपीसीसी द्वारा 2035 तक हिमालय के ग्लेशियर पिघलने के दावों की कलई खोली.
आईपीसीसी ने इस संबंध में अपनी गलती को स्वीकार किया और आंतरिक जांच के आदेश दिए.


ब्रिटेन के वैज्ञानिकों का कहना है कि अंडे और मुर्गी में से पहले मुर्गी आई.

बढ़ती उम्र इंसान को कभी रास नहीं आई. शायद यही वजह है कि हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोधकर्ताओं ने वृद्ध चूहों को जवान बनाने का प्रयोग शुरु किया.
वृद्ध चूहों के शिथिल अंगों में सुधार ने उनकी उम्र की रफ़्तार को उलट दिया गया और ये चूहे वृद्धावस्था से जवानी की ओर चल पड़े.
शोध कहता है कि ये प्रयोग इंसान पर सफल रहे तो वह दिन भी दूर नहीं जब उम्र नहीं ढलेगी और लोग सदा जवान रहेंगे.
सदियों से ये सवाल हमें उलझाता रहा है कि पहले कौन आया अंडा या मुर्गी, लेकिन इस साल ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने इस उलझन को भी सुलझा लिया.
वैज्ञानिकों ने पाया कि मुर्गी के अंडे ‘ओवोक्लेडिडिन-17’ नामक एक प्रोटीन से बनते हैं जो अंडे का खोल बनाने के लिए बेहद ज़रूरी है और मुर्गी के गर्भाशय में ही पाया जाता है.
यानी अंडा तभी बन सकता है जब मुर्गी का अस्तित्व हो!
इस साल अमरीका के वैज्ञानिकों ने दृष्टिहीनों के लिए कार बनाने का बीड़ा भी उठाया. इस गाड़ी में ऐसी तकनीक लगाई जाएगी कि दृष्टिहीन स्वतंत्र तौर पर गाड़ी चला सकेंगे.
गाड़ी में लगे सेंसर बीच रास्ते में आए मोड़ का अंदाजा लगाएंगे और ऑडियो संकेतों के ज़रिए नेत्रहीन चालक गाड़ी को नियंत्रित कर सकेंगे.
संगीत-प्रेमियों के हमजोली बन चुके ‘वॉकमैन’ को इस साल सोनी कंपनी ने अलविदा कह दिया.
1979 में सोनी ने एक ऐसा कैसेट प्लेयर बाज़ार में उतारा जिसे लोग अपने साथ कहीं भी ले जा सकते थे. ये एक क्रांतिकारी उपकरण था और युवा पीढ़ी के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ.
फिर तकनीक ने प्रगति की और बाज़ार में सीडी की धूम मच गई. ऐसे में कंपनी ने अब वॉकमैन को भी अलविदा कर दिया.
(courtesy- BBC Hindi service)

Tuesday, December 28, 2010

आखिरी सांस कब?



विनय बिहारी सिंह


एक साधु से युवक ने पूछा- अच्छा बाबा, आप कोई एक उदाहरण दीजिए जिससे समझ में आए कि भगवान हैं। साधु ने कहा- बेटा, तुम्हें याद है कि तुमने कब सांस लेना शुरू किया? युवक बोला- नहीं। साधु ने पूछा- तुम्हें मालूम है कि तुम्हारी सांस कब तक चलेगी? युवक ने कहा- नहीं बाबा। यह मैं कैसे बता सकता हूं। यह तो निश्चित नहीं है। मेरी सांस अभी भी बंद हो सकती है और बाद में किसी दिन भी। साधु ने कहा- बेटा, यह तुम्हारी सांस या मेरी सांस ईश्वर की दी हुई है। हमारा अधिकार जब अपनी सांस पर नहीं है तो जीवन पर कैसे रहेगा? इसे भगवान नियंत्रित करते हैं। लेकिन हम मान बैठे हैं कि सांस तो चलती ही रहती है। इस पर क्या ध्यान देना। इसीलिए तुम भी पूछ रहे हो कि भगवान के होने का प्रमाण क्या है। इस दुनिया में रात- दिन का होना, चांद- सितारों और ग्रहों का निश्चित समय पर ही तय है। ये ग्रह आपस में टकराते नहीं। रात और दिन ठीक समय पर होते हैं। यह सब कौन नियंत्रित करता है? यह भगवान ही हैं जो पूरी सृष्टि को चला रहे हैं।
सुन कर युवक शांत हो गया। वह गहरे सोच में डूब गया। उसे लगा कि जिन घटनाओं को वह सामान्य समझ रहा है, वे दरअसल सामान्य नहीं हैं।

Monday, December 27, 2010

भगवान की अद्भुत लीला का प्रसंग




विनय बिहारी सिंह


कल ब्रह्मचारी गोकुलानंद जी ने दिल को छू लेने वाली एक कथा सुनाई। एक बार एक भक्त ने भगवान को प्रकट होकर वर देने के लिए मजबूर कर दिया। कैसे? वह भाव विह्वल होकर करुणा के साथ कहता रहता था- हे मेरे नाथ, क्या दर्शन नहीं दोगे? आखिर मैंने क्या गलती की है? मैं अपने मन से तो जन्मा नहीं। आपकी मर्जी से ही जन्म लिया। अब आप दर्शन दीजिए। उसकी पुकार में इतनी गहराई और करुणा थी कि भगवान को उसके सामने प्रकट होना पड़ा। भगवान ने कहा- वर मांगो। भक्त ने कहा- मेरी एक ही इच्छा है। मैं अपने घर पर अपने हाथों से आपको भोजन कराऊं। बस। भगवान ने कहा- ठीक है। कल मैं दिन का भोजन तुम्हारे ही घर करूंगा। तुम मुझे अपने हाथों से खिलाना। भक्त तो खुशी से उछल पड़ा। वह घर गया और अपने घर की खूब सफाई की। घर चमकने लगा। अगले दिन उसने तरह- तरह के पकवान बनवाए और भगवान का इंतजार करने लगा। दोपहरी बीतने लगी। तभी भक्त को बैठे- बैठे नींद आ गई। अचानक उसने शोर गुल सुना। देखा- एक कुत्ता रसोई में घुस कर मालपुए खा रहा है। भक्त ने उसे जोर से डंडा मारा। वह कुत्ता चिल्लाते हुए भागा।
भक्त इंतजार करता रहा। भगवान नहीं आए। अगले दिन फिर वह मंदिर में बैठा और करुण पुकार कर भगवान से दर्शन देने की प्रार्थना करने लगा। उस दिन भगवान रात को उसके स्वप्न में आए। भक्त ने उनसे पूछा- भगवान आप मेरे घर क्यों नहीं आए? भगवान ने कहा- मैं तो आया था, लेकिन तुमने मुझे डंडे से इतनी जोर से मारा कि मैं रोता हुआ चला गया। भक्त ने कहा- तो आपको मैं कैसे पहचानता? भगवान बोले। मैं तो कुत्ते के रूप में ही तुम्हारे दरवाजे पर बहुत देर तक खड़ा रहा। तुम्हारे दरवाजे की तरफ देखता रहा। कोई भी मुझे उस रूप में देख कर समझ सकता था कि मैं कुछ चाहता हूं। लेकिन तुम तो अपने घर के भीतर बैठे थे। अगर बाहर रहते तो तुम्हें साफ पता चलता कि मैं उस रूप में क्या चाहता हूं। अपनी आंखें खोल कर रहो।
बाद में उसके पड़ोस के लोगो ने बताया कि यह कुत्ता विलक्षण था। वह तो भों- भों की आवाज में घर मालिक को देर से बुला रहा था। हम लोगों ने ऐसा कुत्ता आज तक नहीं देखा है। साफ पता चल रहा था कि वह कुछ खाने को मांग रहा है। तुम अगर आधी रोटी भी दे देते तो वह खा कर चला जाता। घंटे भर बाद ही वह तुम्हारे घर में गया। तभी तुमने उसे मार भगाया। भक्त को इस बात पर बहुत अफसोस हुआ।
भक्त को संतों की यह वाणी याद आई - ना जाने किस भेष में मिल जाएं भगवान।


Saturday, December 25, 2010

GITA

My dear friends

Please read some verses of holy book GITA - chapter 6)


श्रीभगवानुवाच

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥६- १॥


कर्म के फल का आश्रय न लेकर जो कर्म करता है, वह संन्यासी भी है और
योगी भी। वह नहीं जो अग्निहीन है, न वह जो अक्रिय है।

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन॥६- २॥

जिसे सन्यास कहा जाता है उसे ही तुम योग भी जानो हे पाण्डव।
क्योंकि सन्यास अर्थात त्याग के संकल्प के बिना कोई योगी नहीं बनता।

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥६- ३॥

एक मुनि के लिये योग में स्थित होने के लिये कर्म साधन कहा जाता है।
योग मे स्थित हो जाने पर शान्ति उस के लिये साधन कही जाती है।

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥६- ४॥


जब वह न इन्द्रियों के विषयों की ओर और न कर्मों की ओर आकर्षित होता है,
सभी संकल्पों का त्यागी, तब उसे योग में स्थित कहा जाता है।

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥६- ५॥


स्वयं से अपना उद्धार करो, स्वयं ही अपना पतन नहीं। मनुष्य स्वयं
ही अपना मित्र होता है और स्वयं ही अपना शत्रु

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥६- ६॥


जिसने अपने आप पर जीत पा ली है उसके लिये उसका आत्म उसका मित्र है।
लेकिन स्वयं पर जीत नही प्राप्त की है उसके लिये उसका आत्म ही शत्रु की तरह वर्तता है।


Friday, December 24, 2010

ईश्वर के सच्चे पुत्र थे जीसस क्राइस्ट



विनय बिहारी सिंह

जीसस क्राइस्ट यानी ईसा मसीह ईश्वर को पिता के रूप में देखते और महसूस करते थे। वे कहते थे- माई फादर एंड आई आर वन ( मेरे पिता और मैं एक हैं), लेकिन उन्होंने आगे कहा- बट व्हाट माई फादर नो, आई नो नाट ( लेकिन जो ग्यान मेरे पिता के पास है, वह मेरे पास नहीं है)। निश्चय ही जीसस ईश्वर के अवतार थे। अपने जीवन के १८ वर्ष उन्होंने भारत के उच्च कोटि के ऋषियों के साथ बिताया था। उनके जीवन के इन १८ वर्षों का उल्लेख कहीं नहीं मिलता (१४ वर्ष की उम्र के बाद के वर्ष)। उन्होंने असंख्य लोगों के रोग ठीक किए, मरे हुए कुछ लोगों को जीवित किया। उनका उद्देश्य चमत्कार दिखाना नहीं था। वे लोगों को यह विश्वास दिलाना चाहते थे कि ईश्वर आपके सबसे करीब हैं। सबसे प्रियतम हैं और वे सभी मनुष्यों को बहुत प्यार करते हैं। मनुष्य अपने कर्मों के कारण दुखों और परेशानियों में फंसा हुआ है। इसीलिए उन्होंने कहा- सीक ये द किंगडम आफ गॉड, रेस्ट थिंग्स विल बी एडेड अन टू यू ( पहले भगवान को पाओ, बाकी चीजें तुम्हें अपने आप मिल जाएंगी)। लेकिन मनुष्य को पहले सांसारिक वस्तुएं चाहिए। भगवान नहीं। लेकिन विडंबना यह है कि सांसारिक वस्तुएं आपको सुख नहीं दे सकतीं। और ये वस्तुएं आती कहां से हैं? भगवान के ही पास से तो आती हैं। उनकी इच्छा के बिना क्या कुछ भी संभव है? लेकिन फिर भी मनुष्य भगवान को भूल कर वस्तुओं के पीछे पागल की तरह दौड़ता रहता है। जीसस क्राइस्ट करुणा के अवतार थे। मनुष्य को कोई कुछ कटु बोल देता है तो वह उसका जवाब और कटु ढंग से देता है। लेकिन जीसस क्राइस्ट को जो लोग सूली पर चढ़ा रहे थे, उनके लिए उन्होंने कहा- गॉड फारगिव देम, फार दे नो नॉट, व्हाट दे डू। ( हे भगवान इन्हें माफ कर दें, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं)। अपनी जान लेने वालों पर इस तरह की करुणा बहुत कम देखने को मिलती है। जीसस क्राइस्ट के बारे में मैंने परमहंस योगानंद जी के माध्यम से ही जाना। उन्होंने कहा है- जीसस क्राइस्ट ने मनुष्य को ईश्वर से जुड़ना सिखाया। लेकिन उनकी लोकप्रियता से दुखी शासन ने उन्हें सूली पर चढ़ा दिया। शासन चाहता था कि लोग अंधविश्वासों में डूबे रहें। ईश्वर से भयानक रूप से डरते रहें। लेकिन जीसस क्राइस्ट ने भगवान से प्रेम करना सिखाया। उन्होंने कहा कि भगवान तो सभी जीवों को प्रेम करते हैं। उनसे भय क्यों? वे हमारे करुणामय पिता हैं। ऐसे पिता के पास जाना तो आनंद में डूबना है। लोगों महसूस किया कि उनकी बातें सच हैं। उनका सदियों से चला आ रहा भय खत्म हुआ। जीसस ने बताया कि तुम्हें अगर कोई सबसे अधिक सुरक्षा दे सकता है तो वह है- ईश्वर। तुम उन्हीं के लिए मतवाला होओ। और लोग जीसस के दीवाने हो गए।