Thursday, December 23, 2010

यह है भगवान की कृपा


विनय बिहारी सिंह


लंदन की खबर है। छियालीस साल की महिला डेलिया नाक्स २३ साल तक व्हील चेयर पर अपंग का जीवन बिताने के बाद अचानक उठ खड़ी हुई हैं और आराम से चल फिर रही हैं। कैसे? वे कहती हैं- जब एक दु्र्घटना में मेरी कमर के नीचे का हिस्सा अपंग हो गया तो डाक्टरों ने बहुत कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। डाक्टरों ने कहा- अब आपको पूरा जीवन व्हील चेयर पर बिताना होगा, लेकिन हिम्मत रखिए, बहुत से लोग व्हील चेयर पर रहते हैं। डेलिया ने इसे अपनी किस्मत मान ली और व्हील चेयर पर बिठा दी गईँ। जैसे- तैसे जीवन बीत रहा था। तभी एक मित्र ने एक आध्यात्मिक व्यक्ति का पता बताया। मुझे बताया गया कि ईश्वर कृपालु हैं और वे हमें सजा नहीं देते, बल्कि हम खुद ही अपने कर्मों की सजा भुगतते हैं। कार्य और परिणाम के सिद्धांत के मुताबिक। मुझसे कहा गया कि मैं उस आध्यात्मिक व्यक्ति के पास चलूं। लेकिन मैं खुद को तमाशा नहीं बनाना चाहती थी। इसलिए मैंने वहां जाने से इंकार कर दिया। तब मेरे पति वहां जाने लगे। वे उस आध्यात्मिक व्यक्ति के साथ मिल कर भगवान से प्रार्थना करते। कभी- कभी तो मेरे पति मेरे स्वास्थ्य के लिए कई- कई घंटे तक प्रार्थना करते। इस तरह कई साल बीत गए। एक दिन अचानक ईश्वर ने मेरे कानों में कहा- उठो, उठ कर चलो। तुम स्वस्थ हो गई हो। और मैं सचमुच उठ खड़ी हुई। मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। अब मैं सामान्य आदमी की तरह चल फिर सकती हूं। हां, इतना जरूर कह सकती हूं कि भगवान में मेरा विश्वास था। मैं मानती रही हूं कि ईश्वर की कृपा मनुष्य के ऊपर बरसती है। बस मनुष्य को ईश्वर के साथ खुद के दिमाग को ट्यून करना पड़ता है। आज तो मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि ईश्वर है और उसकी मर्जी के बिना कुछ नहीं हो सकता। न रात होगी, न दिन होगा और न जीवों की सांस चलेगी।
ईश्वर हम सबका कल्याण करें।
(मित्रों, क्रिसमस का त्यौहार आ गया। इस ब्लाग पर आप जल्दी ही जीसस क्राइस्ट के संबंध में एक छोटा सा भक्तिपूर्ण लेख पढेंगे)

Wednesday, December 22, 2010

शबरी ने ३५ वर्ष इंतजार किया राम का



विनय बिहारी सिंह


शबरी की प्रबल इच्छा थी कि वह भगवान राम को अपने हाथों से खिलाए। वह दिन रात राम का आह्वान करती रहती थी। हमेशा उसके मन में एक ही बात उच्चारित होती थी- राम, राम, राम। जब वह बहुत अधिक व्याकुल होती थी तो गहरे ध्यान में बैठ जाती थी और राम को मौन संदेश भेजती थी- हे मेरे प्रियतम भगवान, आपको अपने हाथों से खिलाने की मेरी इच्छा क्या पूरी नहीं होगी? कहां छुपे हो भगवान। आओ नाथ। ऋषियों का कहना था कि ऐसे करुण संदेश पाकर भगवान राम सूक्ष्म शरीर में शबरी के पास खिंचे चले आते थे। उस समय शबरी भले ही भगवान को नहीं देखती थी, लेकिन वे उसके साथ होते थे। उस समय शबरी दिव्य आनंद में डूब जाती थी। उसे लगता था यह भगवान को प्रेम करने के कारण है। यह सच भी था। क्यंकि जब तक भगवान का स्पर्श नहीं होता, भक्त को दिव्य आनंद का अनुभव नहीं होता। लेकिन शबरी तो भगवान राम को सशरीर चाहती थी। आखिर ३५ वर्षों बाद बनवास के दौरान भगवान ने शबरी की इच्छा पूरी की। शबरी के घर में कुछ ऐसा खाने को नहीं था कि वह भगवान को दे सके। तब उसकी निगाह अपने आंगन के बेर के पेड़ पर गई। बेर पके हुए फलों से लदा था। शबरी ने तुरंत चुने हुए फल तोड़े और एक टोकरी में रखा। फिर राम को पास बिठा कर बेर चख चख कर उन्हें देती। भगवान राम वही जूठे बेर खाते। लेकिन शबरी को इसका होश नहीं था कि वह जूठे बेर खिला रही है। वह तो भगवान के प्रेम में सराबोर थी। और भगवान राम भी बेर खाते रहे। यह वह क्षण था जब भगवान और भक्त एक हो गए थे। प्रेम की धारा बह रही थी। आनंद का उत्कर्ष था। किसको खबर कि बेर जूठे थे या नहीं। भक्त और भगवान का संबंध अनूठा ही है। भक्त के बिना भगवान को अच्छा नहीं लगता और भगवान के बिना भक्त छटपटाता रहता है। कुछ लोग भगवान को पिता के रूप में तो कुछ लोग मां के रूप में देखते हैं। कुछ तो भगवान को वात्सल्य भाव में देखते हैं।कुछ महिलाएं बाल गोपाल को पूजती हैं- पुत्र भाव में। चाहे किसी भाव में पूजें बस अपने हृदय को भक्ति में गहरे डुबो दें तो भगवान से रहा नहीं जाएगा। वे भक्त के वश में आ जाते हैं।

Tuesday, December 21, 2010

मां काली के एक भक्त से भेंट


विनय बिहारी सिंह


कल मां काली के एक भक्त से भेंट हुई। मैंने कहा- ठंड थोड़ी सी बढ़ी है। वे बोले- मां जैसे रखें, वही ठीक है। मैंने पूछा- आजकल आप रात में जाग कर जप इत्यादि कर रहे हैं कि नहीं? वे हंसे और बोले- मैं कहां कुछ करता हूं। करने वाली तो वही हैं। ऐसा आकर्षण है उनमें कि अपने आप मनुष्य जप करने बैठ जाता है। जैसे जैसे आप जप में आगे बढ़ते जाते हैं आपको दिव्य आनंद की अनुभूति होती जाती है। जप जीभ भले कर रही हो लेकिन मेरा हृदय मां के चरणों में अर्पित रहता है। अब मां जाएंगी कहां? मैं कहता हूं कि मां मैं वह सब कुछ सौंप रहा हूं जो मेरे पास है। अपना हृदय, अपना मन और बुद्धि। सारी संपत्ति। लेकिन तुम दर्शन दो। मुझे प्रेम करो। क्योंकि मैं तुम्हारा बेटा हूं। तुम बेटे की पुकार को अनसुना नहीं कर सकती। मैंने पूछा- तो क्या मां आपका जवाब देती हैं? वे बोले- हमेशा नहीं देतीं। लेकिन तो भी मैं जानता हूं कि वे मेरी भक्ति को चुपचाप महसूस कर रही हैं। भले ही छुपी हुई हैं। मैंने पूछा- वे छुप क्यों जाती हैं? उन्हें तो दिखता है कि उनके भक्त उनके लिए तड़प रहे हैं? वे बोले- मां, लीलामयी हैं। सभी लोग अपने बच्चों के साथ खेलते हैं। तो जगन्माता नहीं खेलेंगी। वे इसलिए छुपती हैं कि हम उन्हें खोजें। हमारी आंखों में उनके लिए आंसू आएं। तब वे दौड़ कर हमें अपनी गोद में उठा लेती हैं और हम आनंद में हो जाते हैं। बस तभी अचानक वे गायब हो जाती हैं। लेकिन उनकी नजर हमारे ऊपर हमेशा रहती है। कौन मां होगी जो अपने बच्चे का ख्याल नहीं करेगी? जगन्माता का छुपना भी भक्त के कल्याण के लिए ही है।
उनसे बातें करके बहुत अच्छा लगा।

Saturday, December 11, 2010

वैष्णव देवी की यात्रा में एक चमत्कार


विनय बिहारी सिंह

यह घटना मेरे कार्यालय के एक सहकर्मी ने सुनाई। उनके एक मित्र अपनी पत्नी और मां के साथ वैष्णव देवी के दर्शन करने गए। वहां पहाड़ी रास्ते की चढ़ाई थी। मित्र की मां के घुटने में अचानक तकलीफ बढ़ गई। लेकिन उनके मन में प्रबल इच्छा थी कि माता के पिंड का दर्शन करूं। बेटे ने हालांकि मना किया था कि तुम्हारे घुटने में तकलीफ है। मत जाओ। हम माता का प्रसाद यहीं ला देंगे। लेकिन उनकी मां ने कहा- बचपन से मेरी साध है कि मैं मां वैष्णव देवी के पिंड का दर्शन करूं। चाहे जो हो जाए, मैं जाऊंगी जरूर। लेकिन कुछ दूर चढ़ने के बाद उनका शरीर साथ नहीं दे पा रहा था। वे थक कर बैठ गईं और मन ही मन माता की गुहार लगाने लगीं। तभी उन्होंने देखा कि नीचे थोड़ी दूरी पर कोई महिला बुर्का पहने खड़ी है। उनके मन में डर बैठ गया। पता नहीं कौन है। कोई महिला के वेश में गुंडा- बदमाश तो नहीं । इस डर से वे उठ खड़ी हुईं और मंदिर की तरफ चढ़ने लगीं। बुर्काधारी महिला भी चलने लगी। जब वे लोग रुकते तो वह भी रुक जाती। जब वे लोग चलने लगते तो वह भी चलने लगती। उन लोगों के मन में और शंका और भय गाढ़ा होने लगा। मित्र की मां थोड़ी देर बैठ- बैठ कर चलती रहीं। लेकिन एक समय ऐसा आया कि उन्हें लगा अब वे और नहीं चल सकतीं। उन्होंने कहा- अब और नहीं। माता को अगर यही मंजूर है कि मैं बीच रास्ते से घऱ लौट जाऊं तो यही सही। तभी भीड़ का कोलाहल सुनाई पड़ा। बेटे ने कहा- मां, देखो मंदिर आ गया। यह शोर- गुल मंदिर से ही आ रहा है। थोड़ी सी हिम्मत और कर दो, तुम्हें माता के दर्शन मिल जाएंगे। सचमुच मंदिर पास आ गया था। मित्र की मां के चेहरे पर खुशी छलक आई। वे बोलीं- क्या? माता का मंदिर आ गया? वे झटके से उठीं और चल पड़ीं। आखिर उन्होंने माता वैष्णव देवी का दर्शन किया और प्रसाद पाया। उनके जीवन की साध पूरी हुई। बाहर आकर उन्होंने बुर्काधारी महिला की बहुत खोज की। वह कहीं दिखाई नहीं पड़ी। तभी बेटे ने कहा- मां, वह बुर्काधारी महिला कोई गुंडा- बदमाश नहीं था। मुझे तो लगता है, वह स्वयं माता वैष्णव देवी थीं। तुम्हें मंदिर तक पहुंचा गईं।
उनकी मां ने कहा- ठीक कहते हो बेटा। वह माता ही थीं। मेरी साध पूरी कर गायब हो गईं। उनका मैं सदा ऋणी रहूंगी। वही संसार चला रही हैं। मेरी साध कैसे नहीं पूरी करतीं.।

Friday, December 10, 2010

राम और ओउम


विनय बिहारी सिंह

विभिन्न संतों ने कहा है कि राम में ओउम छिपा हुआ है। ओउम या ओम ही इस सृष्टि का आदि शब्द है। उसी से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। वही ब्रह्मांड का पोषण कर रहा है। और सारे जीवों का लय उसी में होगा। उच्च कोटि के संतों ने कहा है- अ, उ और म का अर्थ है- ब्रह्मा, विष्णु और महेश। तो ओउम क्या है? इसका उत्तर है- ओउम ब्रह्म है। ईश्वर है। भगवान है। मंदिरों में घंटे की आवाज भी ओउम का ही द्योतक है। हर शब्द में ओउम छुपा हुआ है। एक संत हैं जो दिन रात ओम नमः शिवाय का जप करते रहते हैं। कभी मुंह से तो कभी मन ही मन। वे कहते हैं- ओम नमः शिवाय के जाप से मुझे असीम आनंद मिलता है। मैं पहले कई आशंकाओं से डरा रहता था। मैं घूमने वाला साधु हूं। किसी ने कुर्ता दे दिया तो पहन लिया। खाना दे दिया तो खा लिया। मैं सोचता था कि मैंने घर क्यों छोड़ा। यह ठीक है कि मैंने शादी नहीं की। मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं थी। मेरे मां- बाप का देहांत हो गया था। मेरे भाई- बहन अपने अपने संसार में रम गए थे। मुझे घर पर खाना, चाय और जलपान मिल जाता था। लेकिन मैं खुद को बंधन में पड़ा हुआ महसूस करता था। लेकिन जब से मैने ओम नमः शिवाय का जाप करना शुरू किया, मुझे असीम शांति मिली। मेरे मन के भीतर का डर खत्म हो गया। मैं निर्भय हो गया। अब मुझे इसकी चिंता नहीं कि मेरा क्या होगा। जैसे रामजी रखेंगे, रहूंगा। जब तक जीवित रखेंगे, रहूंगा। फिर उन्हीं में लीन हो जाऊंगा। जब वे हैं तो मुझे चिंता किस बात की। मेरा काम है- उनकी अराधना करना। मुझे दान में जो पैसे मिलते हैं, उन्हीं से कभी वृंदावन तो कभी मथुरा तो कभी बद्रीनाथ- केदारनाथ का दर्शन करता रहता हूं। ओम नमः शिवाय मेरे जीवन का आधार है। उनकी बातें सुन कर अच्छा लगा।

Wednesday, December 8, 2010

आदि शंकराचार्य



विनय बिहारी सिंह


आदि शंकराचार्य अवतार थे। बत्तीस साल की कम उम्र में उन्होंने देह त्याग कर दिया और अपने परम प्रिय भगवान में जा मिले। लेकिन इसके पहले ही उन्होंने- भज गोविन्दम्, विवेक चूडामणि, भवान्यष्टकम्
और अन्य अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। इसी अवधि में उन्होंने अपने देश भारत के चारों कोनों पर चार आश्रम स्थापित किए। सन्यासियों की दशनामी परंपरा उन्हीं की दी हुई है। सिर्फ सात साल की उम्र में उन्होंने भगत्प्राप्ति के लिए घर छोड़ दिया। वे केरल के एक छोटे से गांव कालड़ी के रहने वाले थे। सन्यास की दीक्षा लेने के बाद जब वे धार्मिक कामों में अत्यंत व्यस्त थे तभी उनकी मां का देहांत हो गया। उन्होंने उनका अपने हाथों से अंतिम संस्कार किया। आदि शंकराचार्य के एक शिष्य थे कमलपाद। उनका नाम कमलपाद कैसे पड़ा, इसके पीछे एक अत्यंत रोचक कथा है। शंकराचार्य किसी नदी के किनारे अस्थाई रूप से रह रहे थे। कमलपाद (उनका पूर्व नाम स्मरण नहीं है) किसी काम से उस पार गए। लेकिन उनका मन गुरु में ही लगा रहा। इधर शंकराचार्य ने किसी काम से कमलपाद को पुकारा। कमलपाद तो नदी के उस पार थे। उन्हें गुरु की पुकार वहां भी सुनाई पड़ गई। वजह यह थी कि वे तो गुरु में ही खोए हुए थे। वे दौड़ कर नदी किनारे आए। वहां उन्होंने देखा- कोई भी नाव नहीं है। उनसे और इंतजार नहीं हो पाया। वे पानी पर ही चलने लगे। लेकिन आश्चर्य- वे जहां भी पानी में पांव रखते एक कमल के फूल पर उनका पांव पड़ता। इस तरह अनेक कमल के फूलों पर पांव रखते हुए उन्होंने नदी पार की और गुरु के पास पहुंचे। गुरु ने पूछा- कहां थे? कमलपाद ने सारा किस्सा सुनाया। गुरु हंसे। वे बोले- आज से तुम्हारा नाम कमलपाद होगा। तुम जहां पांव रखते हो कमल के फूल तुम्हारे चरण छूते हैं। कमलपाद गुरु के चरणों में गिर पड़े। वे जानते थे- यह सब गुरु शंकराचार्य की ही कृपा थी। शंकराचार्य जी को शिष्य के साथ कौतुक करने की नहीं सूझी थी। वे तो शिष्य को यह बताना चाहते थे कि जो ईश्वर पर पूर्ण विश्वास करता है और अपने समूचे हृदय से हमेशा उनकी अराधना करता रहता है, उसके लिए वे कोई भी चमत्कार कर सकते हैं। शंकराचार्य का एक शिष्य जरा सुस्त था। उनके सारे शिष्य पढ़ने के लिए आ चुके थे। बस सुस्त शिष्य नहीं आ पाया था। कक्षा में बैठे शिष्यों ने कहा- गुरुवर, आप उसकी प्रतीक्षा न करें। पढ़ाना शुरू करें। शंकराचार्य जी पढ़ाना शुरू कर दिया। विषय था-यजुर्वेद। तभी सुस्त शिष्य आया। शंकराचार्य ने उससे कहा- तुम्हें यजुर्वेद के पहले दस श्लोक याद हैं? सुस्त शिष्य ने हां में सिर हिलाया। वहां बैठे सारे शिष्य चकित हो गए। शंकराचार्य ने कहा- सुनाओ। सुस्त शिष्य ने धाराप्रवाह, स्पष्ट उच्चारण और अर्थ के साथ श्लोक सुना दिए। सभी शिष्यों का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया। तब शंकराचार्य ने कहा- देखो, किसी की उपेक्षा कभी मत करो। वह आज से सुस्त नहीं रहेगा। फिर सबने साथ गुरु के उपदेशों को सुना। यह चमत्कार आदि शंकराचार्य ही कर सकते थे। कहा जाता है- आदि शंकराचार्य, भगवान शंकर के ही अवतार थे।

Monday, December 6, 2010

एक अद्भुत घटना


विनय बिहारी सिंह


यह घटना मेरे कार्यालय में काम करने वाले एक व्यक्ति के साथ घटी। उनकी पत्नी अपनी एक महिला रिश्तेदार के साथ पुरी मंदिर में गई हुई थीं। यह रथयात्रा के चार- पांच दिन पहले की बात है। जो पुरी के जगन्नाथ मंदिर की प्रथाओं को जानते हैं उन्हें मालूम है कि वहां भगवान के दर्शन उन दिनों नहीं होते क्योंकि मंदिर के कपाट रथयात्रा के सात दिन पहले बंद रखे जाते हैं। बोलचाल की भाषा में कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ को बुखार हुआ है। लेकिन विद्वानों का है कि उस समय भगवान अपने भक्तों के कष्टों, दुखों और तनावों को विशेष रूप से अपने ऊपर लेते हैं और कष्टों का नाश करते हैं। वैसे तो भगवान हर समय अपने भक्तों का दुख हरते हैं। लेकिन रथयात्रा के पूर्व वे यह काम विशेष रूप से करते हैं। चूंकि इस काम के लिए एकांत चाहिए इसलिए वहां के भक्त कपाट बंद कर देते हैं। यह मंदिर प्रबंधन के आदेश पर होता है। तो मेरे सहकर्मी की पत्नी अपनी महिला रिश्तेदार के साथ मंदिर में गईं। मुख्य मंदिर के कपाट बंद देख कर उन्होंने पूछा- मंदिर बंद क्यों है? वहां के पंडितों ने जवाब दिया- भगवान जगन्नाथ को बुखार है। तब ये दोनों महिलाएं ठहाका लगा कर हंस पड़ीं। वे इस बात का मजाक उड़ाने लगीं कि भगवान को भी बुखार होता है। चूंकि ये महिलाएं बुखार के अंदर छिपे तत्व को नहीं जानती थीं, इसलिए वे हंसती रहीं। पंडितों इसका बुरा माना और कहा कि आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए। ये महिलाएं कुछ देर तक मंदिर परिसर में घूमती रहीं। तभी उन्हें लगा कि उनका शरीर ठीक नहीं है। वे अपने होटल लौट आईं। होटल में लौटते ही उन्हें जोर का बुखार आया। दोनों ही महिलाएं बुखार से तप रही थीं। होटल वालों ने डाक्टर का प्रबंध किया। दवा शुरू हुई। वे लोग जब तक पुरी में रहे, बुखार से पीड़ित रहे। घर लौटे तो स्वस्थ हुए। चूंकि उस महिला के पति मरे कार्यालय में काम करते हैं, इसलिए उन्होंने पूरी गंभीरता से यह घटना सुनाई। इस पर एक व्यक्ति ने कहा- भगवान तो कृपालु हैं। वे प्रेम और दया के सागर हैं। इन महिलाओं को जो बुखार आया तो निश्चित रूप से इस बुखार के बहाने उनका भी कोई कष्ट, पाप या बुरा कर्म कट गया। इससे इन महिलाओं का लाभ ही हुआ। इस घटना को कुछ लोग अंध विश्वास भी कह सकते हैं। लेकिन मैंने इसमें अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा है। उन्होंने मुझसे जो कुछ कहा, वही मैंने यहां लिख दिया है। यह उनकी आप बीती है। आप इस घटना को जो कुछ भी कहें लेकिन यह सच है।
ईश्वर की लीला कौन जानता है। हो सकता है उन महिलाओं के लाभ के लिए ही ज्वर हुआ हो..