Tuesday, January 19, 2010

बच्चे ने पूछा- दादी का शरीर तो यहीं है, गई कहां?

विनय बिहारी सिंह

एक परिवार में १२ साल का प्यारा सा बच्चा था। उसकी दादी का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। शव के अंतिम संस्कार की तैयारी होने लगी। बच्चा हैरान था। कल ही तो उसने दादी से कहानी सुनी थी। दादी की गोद में सोया था। नींद खुली तो पाया कि वह मां के पास सोया है। शायद मां रात को उसे अपने पास ले आई। घर के सभी लोग व्यस्त थे। लेकिन बच्चे के दिमाग को एक सवाल लगातार परेशान कर रहा था। लोग कह रहे थे कि उसकी दादी चली गई। लेकिन दादी तो बिस्तर पर मरी पड़ी है। गई कहां है? कुछ लोग कह रहे हैं कि प्राण आंखों से निकला है। इसीलिए आंखें खुली हैं। लेकिन प्राण क्या इतना सूक्ष्म है कि वह आंखों से निकल सकता है? बच्चा अपना सवाल पूछे तो किससे पूछे। वह दादी की मृत्यु के दुख में रो लेता और मन ही मन अपना सवाल दुहराता। लेकिन उसकी सुनने वाला आज कोई नहीं था। कई दिन बीत गए तो उसके नाना जी उसके घर आए। नाना जी जब इत्मिनान से बैठे तो बच्चे ने पूछा- एक बात पूछूं नाना जी? नाना जी ने सहमति दी। बच्चे ने पूछा- अच्छा, दादी जी के प्राण कहां चले गए? नाना जी ने कहा- भगवान के पास। बच्चे ने पूछा- भगवान कहां रहते हैं? नाना जी ने कहा- भगवान हर जगह हैं। मुझमें, तुममें इस समूचे संसार में। बच्चे ने पूछा- लेकिन न भगवान दिख रहे हैं और न ही दादी। भगवान कैसे दिखेंगे? नाना जी ने कहा- भगवान सूक्ष्म से सूक्ष्मतम हैं। तुम्हारी दादी के प्राण भी सूक्ष्तम हैं। इसलिए दोनों नहीं दिखाई दे रहे हैं। लेकिन उनका अस्तित्व है। जो चीजें नहीं दिखती हैं उनका भी अस्तित्व होता है। जैसे कोई तुम्हें पसंद नहीं करता लेकिन तुमसे हमेशा हंस कर बातें करता है तो उसकी भावना तुम देख नहीं सकते। लेकिन उस भावना का अस्तित्व है। भगवान इससे भी उच्च स्तर का है। १२ साल का बच्चा सूक्ष्म बातें नहीं समझ पाया। लेकिन इतना जरूर जान पाया कि प्राण हवा की तरह है जिसे देखा नहीं जा सकता। मनुष्य का जो प्राण सूक्ष्माति सूक्ष्म है, हम उसके शरीर में रहने पर आत्मविश्लेषण नहीं करते। हम तो तरह- तरह के झमेलों और प्रपंचों में समय बिताते रहते हैं। और अचानक एक दिन जाने का समय आ जाता है। कहां जाने का समय? ईश्वर के पास जाने का समय। तब हमें लगता है कि अरे? इतनी जल्दी? अभी मुझे संसार में और रहना चाहिए। लेकिन हमारे सोचने से क्या होगा? हम तो अपने कर्मों के हाथों में कठपुतली हैं। जब हम अपने ही कर्मों के फल भोगते हैं तो ईश्वर को याद करते हैं। एक बार दिल से पुकारने से ही ईश्वर हमारे पास आ जाते हैं। बस सच्ची पुकार होनी चाहिए। आप नितांत अकेले हैं और अचानक आपने दिल से कहा- हे भगवान। बस, उन्होंने सुन लिया। फिर भी हम अपने प्रपंचों में उन्हें पुकारना भूल जाते हैं। जबकि वे नजदीक से भी नजदीक हैं और अगर दूर समझेंगे तो वे बहुत दूर हैं। सबसे ज्यादा करीब तो भगवान ही हैं। वे हमारी तरफ लगातार देख रहे हैं, लेकिन एक क्षण के लिए भी उनकी तरफ देखना, उन्हें याद करना अपना कर्तव्य नहीं मानते। लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए।

Monday, January 18, 2010

ध्यान में शांत होना जरूरी

विनय बिहारी सिंह

कई लोग कहते हैं कि उनका ध्यान ठीक से नहीं लगता। इसकी वजह है कि बाहर की चीजों में उनका मन अंटका रहता है। ध्यान के लिए जरूरी है कि बाहर की सारी चीजें भूल कर अंदर की यात्रा करें। लेकिन अगर आंख बंद है और दिमाग संसार में ही चक्कर काट रहा है तो ध्यान का कोई मतलब नहीं है। प्रसिद्ध पुस्तक आटोबायोग्राफी आफ अ योगी के लेखक औऱ उच्चकोटि के सन्यासी परमहंस योगानंद जी कहते थे कि आंख बंद करते ही आप समूची दुनिया को भूल जाइए। आप अब तक ईश्वर को याद नहीं कर रहे थे, इसका पश्चाताप कीजिए और इस गलती को सुधारते हुए ईश्वर को प्रेम कीजिए क्योंकि वह आपको प्रेम करता है। सिर्फ और सिर्फ ईश्वर पर ध्यान केंद्रित कीजिए। कुछ लोगों का कहना है कि आंख बंद करते ही अंधेरा दिखता है। तो इस अंधेरे में हम क्या देखें। तमाम संतों ने कहा है कि इस अंधेरे में ही प्रेम से देखने के बाद प्रकाश दिखाई देगा। लेकिन हमारे पास धैर्य नहीं है। हम तो चाहते हैं कि आज ही ध्यान शुरू किया और हफ्ते भर में कोई चमत्कार हो जाए। ऐसा नहीं होना चाहिए। वर्षों की साधना के बाद तो कुछ महसूस होता है। कई लोगों का कहना है कि उनके पास इतना धैर्य नहीं है। इससे अच्छा तो है कि टीवी देखी जाए। यानी हम अपने भीतर नहीं उतरेंगे। बाहर- बाहर ही रहेंगे। टीवी देखेंगे, अखबार पढ़ेंगे, गाने सुनेंगे, इंटरनेट पर रहेंगे या गप करेंगे लेकिन कुछ देर बैठ कर ध्यान नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें कुछ महसूस नहीं होता। विचित्र है। आदि शंकराचार्य ने कहा है कि मनुष्य को अकेले में सोचना चाहिए कि वह इस दुनिया में क्यों आया है? यह ब्रह्मांड कैसे बना? इसका मकसद क्या है? इस समूचे ब्रह्मांड को चलाने वाला कौन है? मनुष्य जन्म के पहले कहां था? फिर मरने के बाद कहां जाता है? वगैरह, वगैरह। एक ऋषि तुल्य सन्यासी ने कहा है कि जब तक आपका दिमाग घूमता रहेगा, आप ईश्वर से संपर्क नहीं कर सकते। उन्होंने कहा- पंखा चलता है तो उसके डैने नहीं दिखते। ज्योंही पंखा बंद होता है, उसके डैनों को आप गिन सकते हैं। इसी तरह घूमती चीज को आप ठीक से नहीं देख सकते। तब एक भक्त ने पूछा- पंखा बंद हो जाएगा तो हवा कहां से मिलेगी? प्रश्न करने वाला समझ नहीं पाया कि सन्यासी कह क्या रहे हैं। इसीलिए सन्यासी ने दूसरा उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अगर आपके कमरे में घूमने वाला बलब लगा दिया जाए तो उसकी मदद से आप क्या ठीक से पढ़ सकेंगे। रात हो गई है। आपको कोई किताब पढ़नी है। आपने कमरे का बल्ब जलाया। वह बल्ब जला तो जरूर लेकिन चारो तरफ घूम रहा है। तब आप उसकी रोशनी में कैसे पढ़ पाएंगे। आप तो डिस्टर्ब हो जाएंगे। पढ़ाई तो दूर की चीज है। आपको पढ़ने के लिए स्थिर दिमाग और स्थिर बल्ब का प्रकाश चाहिए। ठीक उसी तरह ध्यान के लिए आपको स्थिर दिमाग और एकाग्रचित्त मन चाहिए। तब वह भगवान में लगेगा। अन्यथा आप घंटे भर आंखें बंद करके रहिए। कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आपका ध्यान कभी नहीं सुधरेगा। दिमाग का चपर- चपर बंद करना पड़ेगा। एकदम शांत और स्थिर। तब मनुष्य गहरे ध्यान में उतरता है। अगर मन भागता है तो उसे बार- बार खींच कर ध्यान में लगाइए। इसे ही अभ्यास योग कहते हैं। धीरे- धीरे मन आपके नियंत्रण में आ जाएगा। लेकिन मन को नियंत्रित करने के लिए धैर्य चाहिए। धीरज चाहिए। हड़बड़ करने या दुखी होने से काम नहीं चलेगा। मन को दृढ़ करके आप डटे रहिए। ध्यान की एकाग्रता में बार- बार जाइए। फिर मन हटता है, तो फिर उसे खींच कर भगवान के पास ले जाइए। अब तक आपका मन आवारा था। अब उसे नियंत्रित करना है। आवारा इसलिए कि जहां जरूरत नहीं है, यह मन वहां भी जाना चाहता है। इसे ही रोकना है।

Saturday, January 16, 2010

वे रात दो बजे तक ओम नमः शिवाय जपते रहे

विनय बिहारी सिंह

यह घटना मेरे किशोर उम्र की है। मेरे गांव से जिला मुख्यालय १२ किलोमीटर दूर है। उस समय वहीं सिनेमा हाल थे। अब तो मेरे गांव तक में सिनेमा हाल है। यह १२ किलोमीटर की दूरी कुछ भी नहीं थी क्योंकि मेरे गांव से सारे साधन मिल जाते हैं। मैं बचपन से ही धार्मिक फिल्में देखना पसंद करता था। उस समय एक धार्मिक फिल्म लगी थी, जिसका नाम अब मैं भूल गया हूं। उन दिनों धार्मिक फिल्में खूब बनती थीं। राजा हरिश्चंद्र इत्यादि फिल्में मैंने बचपन में ही देखी थीं। मैं इस फिल्म को देखने के लिए जा रहा था तो मेरे गांव के एक अत्यंत धार्मिक व्यक्ति ने भी मेरे साथ फिल्म देखने की इच्छा जाहिर की। हम दोनों साथ चले। फिल्म में एक साधक ओम नमः शिवाय का वर्षों तक जाप करते हैं और तब भगवान शिव उन्हें दर्शन देते हैं और वर मांगने को कहते हैं। साधक उनसे वर मांगते हैं कि उनका जीवन जब तक रहे, प्रत्येक दिन शिव जी के प्रति उनकी श्रद्धा, भक्ति और समर्पण बढ़ता जाए और जब उनकी मृत्यु हो तो फिर दुबारा लौट कर पृथ्वी पर न आना पड़े। वे शिव जी में ही समा जाएं, लीन हो जाएं। तब भगवान शिव कहते हैं- ज्यादातर लोग मुझसे धन, यश, पुत्र, स्वास्थ्य, सुंदर स्त्री और सांसारिक सुख मांगते हैं लेकिन तुमने मुझसे मेरे प्रति भक्ति मांगी है इसलिए भक्ति और श्रद्धा तो तुम्हें दे ही रहा हूं, हर तरह का सांसारिक सुख भी दे रहा हूं। इस पर भक्त कहता है- नहीं प्रभु। मुझे सांसारिक सुख नहीं चाहिए। मैं सांसारिक सुखों में आपको भूल जाऊंगा। मुझे शुद्ध रूप से आपकी भक्ति चाहिए। भगवान शिव कहते हैं- नहीं पुत्र। तुम्हारी भक्ति दिनोंदिन बढ़ती ही जाएगी। तुम्हें मैं संसार के सारे सुख दे रहा हूं। हालांकि तुमने इसे लेने से इंकार कर दिया है। जाओ सुख से रहो और ईश्वर के प्रति भक्ति और श्रद्धा का संदेश लोगों में प्रसारित करो। उनका घर मेरे घर के पास ही है। उस दिन वे मेरे यहां ही सोए। वे हल्का खाना खाकर अपने बिस्तर पर बैठ गए और धीरे- धीरे ओम नमः शिवाय का जाप करने लगे। धीरे- धीरे मुझे नींद लग गई। अचानक रोने की आवाज से मेरी नींद खुली। देखता क्या हूं कि वे रो भी रहे हैं और ओम नमः शिवाय का जाप भी कर रहे हैं। जब रोना बंद होता है तो ओम नमः शिवाय का जाप कर रहे हैं। मेरी नींद पूरी तरह टूट गई। मैं उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था। रात दो बजे तक वे जाप करते रहे। मेरे घर से कुछ ही दूरी पर दो शिव मंदिर हैं। एक उत्तर की तरफ और दूसरा दक्षिण की तरफ। मैंने देखा वे रोज किसी न किसी शिव मंदिर में जा कर जल, फूल और अक्षत इत्यादि चढ़ा रहे हैं और रात को भी ओम नमः शिवाय का जाप कर रहे हैं।उनका यह क्रम जीवन भर चलता रहा। कोई फिल्म किसी के जीवन पर इतना गहरा प्रभाव डाल सकती है, यह मैंने पहली बार देखा था। आज वे इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उनकी याद आते ही मन श्रद्धा से भर जाता है।

Friday, January 15, 2010

लकवाग्रस्त कुत्ते को प्यार ने स्वस्थ किया

विनय बिहारी सिंह

दिल्ली की यह घटना बताती है कि प्यार में अनंत ताकत है। प्यार वह है जो निःस्वार्थ हो। जहां स्वार्थ आ गया वहां प्यार शर्तों में बंध जाता है। यहां ऐसे प्यार की बात नहीं की जा रही है। आज के टाइम्स आफ इंडिया में छपी खबर ने बहुतों को आनंद से भर दिया। एक कुत्ता लकवाग्रस्त हो गया था। उसकी देखभाल एक महिला करने लगी। किसी स्वयंसेवी संगठन से संपर्क कर वह महिला लकवा ग्रस्त पैर के बदले पिछले हिस्से में पहिया लगा दिया। कुत्ता चलने लगा। लेकिन उसे और सहारे की जरूरत थी। वह महिला लगातार कुत्ते को प्यार देती रही। प्रोत्साहन देती रही। उसे बिना पहिए के ही चलने को प्रेरित करती रही। बिना पहिए के दो कदम चल कर वह डगमगाता, लेकिन प्यार और प्रोत्साहन ने उसे और चलने की हिम्मत दी। आज वह कुत्ता आराम से चल रहा है। उसकी फोटो भी छपी है। कुछ लोग कहते हैं कि इस दुनिया में खराब ही खराब घटनाएं हो रही हैं। लेकिन सच यह है कि अच्छी घटनाओं की कमी नहीं है। चूंकि अखबार ज्यादातर हत्या, बलात्कार, चोरी, डकैती और दुर्घटनाओं से ही भरे रहते हैं। टीवी का भी यही हाल है। इसलिए अच्छी खबरें दब जाती हैं। वे लोगों तक पहुंचती नहीं। भगवदगीता में भगवान कृष्ण ने कहा है- सच का अभाव नहीं है और झूठ की कोई सत्ता नहीं है। किसी का झूठ ज्यादा दिन तक नहीं चलता। मातृ स्वरूपा स्त्री अंजलि काकाती ने सन २००८ से लेकर आज तक जिस तरह कुत्ते की सेवा की वह नायाब है। मनुष्य सारे जीवों में श्रेष्ठ है। तो यह मनुष्य का ही दायित्व बनता है कि वह मनुष्य के अलावा पशु- पक्षियों की सेवा करे। अंजलि काकाती ने यह काम किया। मैं ऐसे अनेक लोगों से मिल चुका हूं जो पशु- पक्षियों के प्रति दिल से जुड़े हुए हैं। वे उनकी तकलीफ अपनी तकलीफ समझते हैं। किसी पशु की तकलीफ से तो कुछ लोग रो तक देते हैं। यह करुणा मनुष्य में हमेशा रही है और हमेशा रहेगी। बेशक प्यार में अनंत ताकत है। अगर प्यार न हो तो यह दुनिया ध्वस्त हो जाए। मैं फिर यहां याद दिलाना चाहता हूं कि यहां निःस्वार्थ प्यार की बात की जा रही है। मैंने ऐसे छात्र और छात्राओं को देखा है जो पढ़ने में फिसड्डी थे लेकिन प्यार और प्रोत्साहन पाकर उन्होंने सर्वोच्च अंक पाया। क्षमताएं तो सबके भीतर हैं, उन्हें बस मौका मिलना चाहिए। एक बार एक किशोरी १२वीं कक्षा में दो बार फेल हो गई। उसके माता पिता फिर भी निराश नहीं हुए और लगातार उसे प्रोत्साहित करते रहे। इस लड़की को भी अंततः लगा कि कम नंबर पाना तो वाकई अच्छी बात नहीं है। उसने तीसरी बार अत्यंत मेहनत से पढ़ाई की। उसका पक्का इरादा ही था कि तीसरी बार वह प्रथम श्रेणी से पास हुई और अपने शुभचिंतकों को जा कर मिठाई बांट आई। प्यार वाकई अनमोल है। एक बात औऱ- हमें सबसे ज्यादा और बल्कि हद से ज्यादा जो प्यार करता है वह है ईश्वर। लेकिन हम तो अपनी चिंताओं में इतने मशगूल रहते हैं कि उसके प्यार को महसूस नहीं करते। दिमाग शांत कर दो मिनट के लिए उसे याद करने में कोई हर्ज नहीं है। वह हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। (आज सूर्यग्रहण था। यह ग्रहण ११.०६ बजे सुबह शुरू हुआ और दिन 3.35 तक रहा। सूर्य और चंद्रमा के एक सीध में आने से यह घटना हुई।)

Thursday, January 14, 2010

तमाम तरह के सोच का बंडल है दिमाग

विनय बिहारी सिहं

रमण महर्षि कहते थे- माइंड इज बंडल आफ थाट्स। सारी परेशानी की जड़ यह दिमाग ही है। जब आप सो जाते हैं तो सब कुछ भूल जाते हैं। आपको यह भी याद नहीं रहता कि आप कहां हैं। क्या कपड़ा पहना है। नींद आपको बिल्कुल शरीर से अलग कर देती है। लेकिन यह सब कांशस स्टेट है। ध्यान इससे भी बेहतर स्थिति है। इसमें आप जाग्रत रहते हुए चिंतन रहित अवस्था में जाते हैं। इसीलिए जिनका ध्यान गहरा लगता है, उन्हें नींद की जरूरत नहीं पड़ती। ध्यान का अर्थ है दिमाग की सारी चिंताएं, समस्याएं खत्म कर दीजिए और एकमात्र ईश्वर में समा जाइए। अत्यत आनंद का अनुभव होगा। शांति और आनंद का अनुभव। ऋषियों को इसकी चिंता नहीं रहती थी कि भोजन और वस्त्र कहां से आएगा। वे केवल ईश्वर के लिए व्याकुल रहते थे। नतीजा यह होता था कि भोजन और वस्त्र का इंतजाम ईश्वर ही कर देते थे। कैसे? जो परम ईश्वर भक्त थे और धन संपत्ति से भरपूर थे वे इन ऋषियों की सेवा के लिए एक पैर पर खड़े रहते थे। वे प्रतीक्षा करते रहते थे कि ऋषि की किस जरूरत को पूरा करने का मौका मिले। रामकृष्ण परमहंस की सेवा के लिए न जाने कितने लोग तैयार रहते थे। रानी रासमणि जब तक जीवित रहीं, उनकी सेवा की। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद भी रामकृष्ण परमहंस की सेवा के लिए अनेक लोग लालायित रहते थे। रामकृष्ण परमहंस का एक क्षण भी ईश्वर के बिना नहीं बीतता था। वे बहुत कम सोते और खाते थे। दिन में एक छोटी सी प्लेट में प्रसाद खा लिया और रात में थीड़ी सी सूजी की खीर। बस यही उनका भोजन था। वे मुश्किल से दो घंटे और कई बार तो एक घंटा ही सोते थे। बाकी समय ध्यान, समाधि और भजन- कीर्तन व भक्तों से ईश्वर संबंधी बातचीत में बिताते थे। उनके यहां जो भी जाता था वह ईश्वरीय सुख से सराबोर लौटता था। एक बार जो उनके पास चला गया वह दुबारा कब मौका मिले कि जाएं, यही सोचता रहता था। आध्यात्मिक जगत में उन्हें लेकर एक कहावत थी- रामकृष्ण परमहंस आध्यात्मिक अफीम खिला देते हैं। यानी वे ईश्वर के प्रति आसक्ति पैदा कर देते हैं। जो भी उनसे मिला उनका दीवाना हो गया। वे हमेशा ईश्वर के प्रसंगों पर बातचीत करते रहते थे। बातचीत के बीच में ही उन्हें समाधि लग जाती थी। यह समाधिक कभी कभी घंटों चलती थी। तब कोई उन्हें डिस्टर्ब नहीं करता था।

Wednesday, January 13, 2010

एक और छोटी सी कथा

विनय बिहारी सिंह

एक चालाक व्यापारी एक सन्यासी के पास पहुंचा। उसने संत से पूछा- भगवान के लिए तो एक करोड़ रुपए, एक रुपए के बराबर हैं न? सन्यासी ने कहा- हां। व्यापारी ने दूसरा सवाल किया- क्या आप भगवान से बातचीत करते हैं? सन्यासी ने कहा- हां। व्यापारी ने कहा- तो आप मेरे लिए भगवान से कहिए न कि वे मुझे सौ रुपए दे दें। सन्यासी ने कहा- ठीक है आप एक मिनट रुकिए। चालाक व्यापारी जवाब सुन कर ठगा सा रह गया। वह तो एक की संख्या को एक करोड़ मान रहा था और सन्यासी उसका आशय समझ रहे थे।

Tuesday, January 12, 2010

अब नमक कम खाने की सलाह

विनय बिहारी सिंह

अमेरिका में सरकार ने तमाम रेस्टोरेंटों और खाद्य पदार्थ बनाने वालों को एक आग्रह भेजा है कि अगले पांच सालों में प्रत्येक खाद्य पदार्थ में नमक की मात्रा २५ प्रतिशत तक कम कर दी जानी चाहिए। यह लोगों के रक्तचाप को नियंत्रित करने के लिए किया जा रहा है। कहा गया है कि नमक को एकबारगी २५ प्रतिशत कम कर देने से ग्राहकों को तुरंत पता चल जाएगा। इसलिए इसकी मात्रा धीरे- धीरे कम करना ठीक रहेगा। पहले इसी तरह का आग्रह अमेरिकी सरकार ने ट्रांस फैट के लिए किया था। जब देखा कि आग्रह से काम नहीं चल रहा है तो कानून बना दिया। सरकार का कहना है कि ट्रांस फैट से लोगों में मोटापा तो बढ़ता ही है, शरीर में नाना प्रकार की व्याधियां उत्पन्न हो जाती हैं और जीवित रहना अपनी लाश को ढोने जैसा हो जाता है। इसलिए हर रेस्टोरेंट, बेकरियां और खाद्य पदार्थों को बनाने वाले ट्रांस फैट का इस्तेमाल बंद कर दें। हमारे यहां ट्रांस फैट का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। आप अंदाजा नहीं लगा सकते कि जो नमकीन, भुजिया या समोसे आप खा रहे हैं वह किस घी या तेल में बना है। हमारे यहां तो इसे चेक करने वाली कोई एजंसी नहीं है। अगर है भी तो वह कहीं नजर नहीं आती। लापरवाही और भ्रष्टाचार का आलम यह है कि आप कहीं भी कुछ खाइए तो अपने रिस्क पर। सरकार इसकी जिम्मेदारी नहीं लेगी। लेकिन अमेरिकी सरकार अपने नागरिकों के हितों पर लगातार नजर रखती है। अगर हमें पश्चिमी देशों की नकल करते हैं तो उनकी अच्छाइयां ग्रहण करनी चाहिए। साफ सफाई, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और जवाबदेही के प्रति यूरोपीय देश ज्यादा कारगर हैं।
एक संत की सीख- परसो एक सन्यासी ने कहा कि ध्यान उन्हीं लोगों का ठीक से नहीं लगता जो सांसारिक मोह में फंसे रहते हैं। जो यह जानते हैं कि यह संसार नहीं भगवान ही हमारे काम आएंगे, उनका ध्यान खूब बढ़िया लगता है। वे कई घंटे एक ही पोज में बैठे रह जाते हैं और ईश्वर से संपर्क का आनंद लेते हैं। परमहंस योगानंद ने कहा है- आंखें बंद कीजिए और संसार को भूल जाइए। ईश्वर आपसे बातचीत की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कितनी सुंदर बात है।