Monday, January 11, 2010

विष्णु सहस्रनाम की अनंतता

विनय बिहारी सिंह

विष्णु सहस्रनाम अद्भुत प्रभाव वाला है। ऋषियों ने कहा है कि विष्णु और विश्व एक ही है। यह ब्रह्मांड को विश्व कहा गया है। यानी समूचा ब्रह्मांड विष्णु का प्रतीक है। विष्णु सहस्रनाम में प्रत्येक नाम गहरे अर्थ को लिए हुए है। इन नामों का क्रम यूं ही नहीं रखा गया है। एक- एक नाम अपने आप में मंत्र है। इसीलिए विष्णु सहस्रनाम पाठ करने वाले लोग इसका नाम सुनते ही आह्लादित हो जाते हैं। विश्वं और विश्वमूर्ते विष्णु का ही नाम है। सहस्र नामों में कोई भी नाम कम ओजस्वी नहीं है। और हर नाम अनंतता लिए हुए है। इसी तरह शिव सहस्रनाम भी है। विष्णु सहस्रनाम पढ़ते हुए आपको लगेगा कि इस ब्रह्मांड के कण- कण में विष्णु भगवान हैं और बिना उनकी इच्छा के एक पत्ता भी नहीं हिलता। तो इन नामों का महत्व क्या है? ये नाम अपने आप में अनंत सागर हैं। इनमें डुबकी लगाइए और अमृत का आनंद पाइए। लेकिन हां, जो लोग मेकेनिकल ढंग से इसका पाठ करेंगे उन्हें इसका रस नहीं मिल पाएगा। कई लोग मशीन की तरह धड़ाधड़ नाम पढ़ कर आसन से उठ जाते हैं और भोजन करने बैठ जाते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। जो नाम आप पढ़ रहे हैं, उसके अर्थ में जाइए। तब उसका आनंद आएगा। अगला नाम पिछले नाम का ही विस्तार है। आपके सामने अनंत विस्तार फैला हुआ है। विष्णु भगवान अपनी बाहें फैला कर आपके सामने खड़े हैं और प्रतीक्षा कर रहे हैं कि आप उनके आगोश में चले जाएं और उन्हें अपने अंक पाश में बांध लें। आखिरकार आप उनके पुत्र हैं। आपका अधिकार बनता है। लेकिन कई लोगों का दिमाग अपने काम में इस तरह चक्कर काटता रहता है कि वे पढ़ते तो हैं विष्णु सहस्रनाम लेकिन दिमाग कहीं औऱ चक्कर काटता रहता है। ठीक है, हर आदमी को अपने काम पर केंद्रित रहना चाहिए। कहने का अर्थ यह नहीं है कि आप सारा कामधाम छोड़ कर विष्णु सहस्रनाम पाठ कीजिए। लेकिन एक समय एक ही काम कीजिए। अगर आप पाठ कर रहे हैं तो अपना पूरा ध्यान पाठ पर ही लगाइए। बीच में कोई चिंतन दिमाग में आने न दीजिए। आता भी है तो क्षण भर में झटक दीजिए। और जब काम कीजिए तो बस पूरी तन्मयता से काम ही कीजिए। जो भी काम कीजिए बस तन्मयता उसी के प्रति हो। वैग्यानिकों ने हाल ही में कहा है कि दो चित्त हो कर यानी डाइवर्टेड माइंड वाला आदमी किसी भी बीमारी का जल्दी शिकार होता है। उसे भय भी जल्दी पकड़ता है। इसके उलट एकाग्रचित्त व्यक्ति शक्तिशाली और निडर होता है। जिन लोगों ने विष्णु सहस्रनाम या शिव सहस्रनाम नहीं पढ़ा है, उन्हें इसे अवश्य पढ़ना चाहिए। अगर खरीदने की सुविधा न हो तो किसी लाइब्रेरी में ही सही। लेकिन पढिए जरूर। आनंद आएगा।

Saturday, January 9, 2010

ईश्वर कहां है?

विनय बिहारी सिंह

यह कथा योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया के ब्रह्मचारी निगमानंद जी ने सुनाई। एक ईश्वर प्रेमी सैलून में बाल कटा रहे थे। नाई कहने लगा- लगता है ईश्वर नहीं है। अगर होता तो क्या इतना दुख, बीमारी और कष्ट होता? ईश्वर भक्त ने तर्क दिया। लेकिन नाई कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। वह एक ही रट लगाए जा रहा था। ईश्वर कहां है? रहता तो संसार में इतना कष्ट होता? ईश्वर प्रेमी बाल कटा कर बाहर निकला। देखा कि दाढ़ी और बाल बढ़ाए कुछ लोग गांजे का दम लगा रहे हैं। वह वापस सैलून में गया और नाई से बोला- कोई नाई नहीं है। नाई बोला- क्यों, मैं तो हूं ही। ईश्वर प्रेमी बोला- नहीं। तुम मेरे साथ बाहर आओ। नाई के पास अभी कोई ग्राहक नहीं था। इसलिए वह बाहर आया। बोला- क्या है? ईश्वर प्रेमी ने कुछ दूरी पर पेड़ के नीचे दाढ़ी- बाल बढ़ाए गांजा पी रहे लोगों को दिखाते हुए कहा- अगर कोई नाई होता तो इनके दाढ़ी और बाल क्यों बढ़े होते? नाई ने कहा- अगर कोई मेरी दुकान पर आएगा, तब तो मैं उसके बाल काटूंगा। ईश्वर प्रेमी ने कहा- ठीक कहा। जब कोई ईश्वर के पास जाएगा, तब तो वे बताएंगे कि वे कहां हैं। ऋषि और महापुरुषों ने तो न जाने कितनी बार कहा है- ईश्वर हमारे हृदय में हैं। लेकिन हम हृदय की गहराई में जाते ही नहीं। हम चाहते हैं कि इंद्रियों का दास भी बने रहें। भोगी भी बने रहें और ईश्वर का भी दर्शन कर लें। ईश्वर को जानने और अनुभव करने के लिए उनके प्रति सर्वोच्च भक्ति, असीम प्रेम और उत्कंठा होनी चाहिए। तुलसीदास ने कहा है- भाद्रपद महीने में नदी व ताल तलैयों के अलावा छोटे- मोटे गड्ढे और यहां तक कि रास्ते भी पानी से भर जाते हैं। इसका मतलब यह तो नहीं कि सबको नदी कह दिया जाए। जब जेठ की दुपहरी आती है तब आप देखते हैं कि ये गड्ढे और ताल- तलैया सूख गए, लेकिन नदी लगातार बह रही है। जिसमें अत्यंत गहरी निष्ठा रहेगी वही ईश्वर का अनुभव कर पाएगा। उसे असली नदी बनना पड़ेगा। जो भाद्रपद में तो बहती ही है, जेठ की दुपहरिया में भी बहती है यानी संकट आने पर या कष्ट में भी जो ईश्वर से उतना ही प्रेम करता है जितना सुख में रहने पर।

Friday, January 8, 2010

नए युग की शुरूआत

विनय बिहारी सिंह

अगर किसी को जीवन की सारी सुख सुविधाएं और अरबों- खरबों धन दे दिया जाए तो क्या वह सुखी हो जाएगा? यह प्रश्न बार- बार मन में आता है। हो सकता है कि वह पहले खूब खुश हो और तरह- तरह के भोगों में डूब जाए। लेकिन आखिरकार तो वह ऊब ही जाएगा। दुनिया की कोई भी भौतिक चीज आपको हमेशा के लिए सुख नहीं दे सकती। उससे आप जल्दी ही ऊब जाएंगे और किसी नए आनंद की खोज में लग जाएंगे। इसीलिए हमारे ऋषियों ने कहा है- नित नवीन आनंद सिर्फ एक ही जगह मिल सकता है- वह हैं ईश्वर। सिर्फ वही सच हैं। ईश्वर के बिना जीवन का आनंद फीका है। आज एक और जीवंत व्यक्ति से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा- जबसे चीनी ४५ रुपए किलो हुई है, मैंने मिठाई खाना छोड़ दिया है। इसका दोहरा फायदा मिला है। ज्यादा मिठाई या मीठी चीजें खाने से शरीर में कार्बन बनता है जो स्वास्थ्य के लिए घातक है। दूसरा नुकसान यह होता है कि मिठाई खाने वाले की रक्त शर्करा बढ़ जाती है। इस तरह पूरा शरीर तंत्र नुकसान से बच जाता है। मिठाई न खाने और चीनी वाली चाय कम पीने से उन्होंने जो फायदा बताया वह नोट करने लायक था। हां, वे मिठाई के बड़े शौकीन थे और रोज ही अलग- अलग किस्म की तीन- चार मिठाइयां खा लेते थे। धन की कमी नहीं है। वे सामान्य से ज्यादा मीठी चाय भी पीते थे। लेकिन चीनी महंगी होने से उन्होंने अपने खान- पान में बदलाव कर दिया है। उनका पैसा तो बच ही रहा है, स्वास्थ्य भी सुधर रहा है। एक बार जब प्याज महंगा हुआ था तो उन्होंने प्याज ही खाना छोड़ दिया था। उन्होंने प्याज खरीदना बंद कर दिया और तब तक बंद रखा जब तक कि उसका दाम नहीं घटा। हां, वे कहते हैं कि चावल और आटा महंगे होंगे तो यह नियम नहीं लागू हो सकता। उनका कहना है कि वे ईश्वर के भक्त हैं और सभी लोगों से यह आग्रह करना चाहते हैं कि वे मीठा खाने के अपने अभ्यास को नियंत्रित करें। भारत जैसे गरीब देश के लिए यह नुस्खा अच्छा लगा। घी-तेल महंगे हों तो लोग उन्हें खाना बंद कर दें। हालांकि पूरे देश में यह नियम लागू नहीं हो सकता। लेकिन हां, जो कर सकते हैं वे करें तो अच्छा ही है। बाजार में ऐसे कई मसाले और पदार्थ आए हैं जो लुभाते हैं लेकिन अंततः वे हमें नुकसान ही पहुंचाते हैं। तो लोग बाजार से मुंह मोड़ें और उतनी ही चीजें खरीदें जो जरूरत भर की हैं। तो कितना संतुलित जीवन हो जाएगा? हां, उन्होंने आज यह भी कहा- साबुन और सर्फ का कोई विकल्प नहीं है। इसे महंगा कर देने पर दिक्कत हो जाएगी। लेकिन उनके साथ खड़े एक अन्य व्यक्ति ने कहा- क्यों, लोग सस्ते साबुन इस्तेमाल करेंगे। सस्ता माल भारत के बाजारों में हमेशा था और रहेगा। उनके साथ एक बुजुर्ग खड़े थे। उन्होंने कहा- जो दुष्ट लोग जान बूझ कर महंगाई बढ़ा रहे हैं उन्हें सजा अवश्य मिलेगी। इस तरह आज एक नए अनुभव वाला दिन रहा।

Thursday, January 7, 2010

अर्जुन ने कहा- मुझे सिर्फ कृष्ण चाहिए

विनय बिहारी सिंह

क्या अद्भुत कथा है। जब कौरवों और पांडवों में युद्ध तय हो गया तो वे भगवान कृष्ण के पास मदद के लिए गए। कौरवों की तरफ से दुर्योधन और पांडवों की तरफ से अर्जुन कृष्ण के द्वारकापुरी पहुंचे। सबसे पहले दुर्योधन पहुंचे तो देखा कृष्ण सो रहे हैं। वह अहंकार में था। इसलिए कृष्ण जिधर सिर करके सोए थे, उधर ही रखे सिंहासन पर बैठ गया। थोड़ी ही देर बाद अर्जुन पहुंचे। देखा कि दुर्योधन पहले ही पहुंचे हुए हैं। इसलिए वह कृष्ण के पैर की तरफ बैठ गया। तभी कृष्ण की नींद खुली और सामने उन्होंने अर्जुन को पाया। उन्होंने पूछा- कब आए अर्जुन? अर्जुन ने उन्हें प्रणाम कर बताया कि थोड़ी देर पहले। तभी दुर्योधन बोला- मैं इससे पहले आया हूं महाराज। कृष्ण ने उसका भी मुस्करा कर स्वागत किया। स्वागत सत्कार के बाद कृष्ण ने उन दोनों से पूछा कि वे किसलिए आए हैं। दोनों ने कहा- आपकी मदद के लिए। दुर्योधन बोला- महाराज, मैं पहले आया हूं, इसलिए पहले मैं आपकी मदद मांगूंगा। कृष्ण ने कहा- तुम्हारी बात ठीक है। लेकिन सबसे पहले तो मैंने अर्जुन को देखा और चूंकि वह तुमसे छोटा है, इसलिए उसी को पहले अपनी बात कहने दो। दुर्योधन अब क्या कहते। तभी कृष्ण ने कहा- एक तरफ मेरी एक अक्षौहिणी सेना है। जो बल में मेरे बराबर है। दूसरी तरफ मैं अकेला हूं। मैं लड़ाई में शस्त्र नहीं उठाऊंगा। अर्जुन तुम किसे चाहते हो- मेरी सेना या अकेले मुझे। अर्जुन ने कहा- प्रभु, मैं सिर्फ और सिर्फ आपको चाहता हूं। कृष्ण ने कहा- सोच लो। मैं युद्ध नहीं करूंगा। सिर्फ तुम्हारी ओर रहूंगा। अर्जुन ने कहा- ठीक है भगवन। मुझे तो अकेले आपकी ही जरूरत है। दुर्योधन यह सुन कर बहुत खुश हुआ। उसे एक अक्षौहिणी सेना मिल गई। बाहर निकलते हुए वह सोच रहा था- अब तो पांडवों को हराना चुटकी बजाने जैसा है। जब कृष्ण की सेना मेरे साथ है तो फिर बात ही क्या है। जब दुर्योधन चला गया तो भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा- अर्जुन तूने मूर्खता की है। अकेले मुझ निहत्थे को लेकर क्या करोगे। अर्जुन बोला- प्रभु। मेरे अस्तित्व के कण- कण में आप विद्यमान हैं। आपके बिना मैं रह ही नहीं सकता। मुझे जीत या हार की चिंता नहीं है। मुझे तो बस यही खुशी है कि आप मेरे साथ हैं। बस, मैं आनंद में हूं। सभी जानते हैं कि अकेले कृष्ण के कारण ही पांडव इस युद्ध में जीते। भगवदगीता में है- जहां कृष्ण जैसे योगेश्वर हैं और अर्जुन जैसा धनुर्धारी है, जीत वहीं होगी। आज जब मैंने रास्ते में एक व्यक्ति को- हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम, हरे राम राम राम हरे हरे, गाते हुए सुना तो यह कथा याद आ गई।

Monday, January 4, 2010

समूचा पहाड़ ही उठा ले गए पवनसुत

विनय बिहारी सिंह

कल हनुमान जी का प्रसंग एक बार फिर पढ़ कर सुख मिला। जब रावण के पुत्र के बाण से लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए तो भगवान राम ने विभीषण से सलाह ली कि वैद्य कहां मिलेंगे। तुलसी दास तो कहते थे कि जो सबके जीवन के मालिक हैं, उन्हें वैद्य की क्या जरूरत? और कोई वैद्य भी तो उन्हीं की कृपा से किसी को ठीक करता है। लेकिन चूंकि भगवान राम ने मनुष्य का अवतार लिया था। इसलिए वैद्य खोजने की बात आई। विभीषण ने कहा कि लंका में एक वैद्य हैं सुषेण। लेकिन वे आएंगे कि नहीं, कहना मुश्किल है। यह बात हनुमान जी ने सुन ली। उन्होंने कहा कि मैं उन्हें उठा लाता हूं। वे गए और उस कमरे को ही उठा लाए जिसमें सुषेण जी सोए हुए थे। उन्हें जगाया गया। सुषेण समझदार थे। समझ गए कि उन्हें किसी अत्यंत बलशाली व्यक्ति ने बुलाया है। वरना घर के एक हिस्से को उठाने की ताकत तो किसी में नहीं है। सुषेण से समस्या बताई गई। उन्होंने कहा कि मंदार पर्वत पर संजीवनी बूटी है। उसका रंग रूप भी बता दिया। कहा कि अगर संजीवनी बूटी मिल जाए तो लक्मण जी तुरंत होश में आ जाएंगे और उनमें पहले से भी ज्यादा शक्ति आ जाएगी। हनुमान जी तुरंत उड़ कर मंदार पर्वत गए लेकिन वहां एक ही तरह की लाखों जड़ी- बूटियां देख कर उन्हें समझ में नहीं आया। इसलिए वे उतना हिस्सा उखाड़ कर ले उड़े। रास्ते में अयोध्या नगरी पड़ती थी। हनुमान जी की विराट छाया जमीन पर पड़ी तो उस समय के राजा भरत ने आसमान की तरफ देखा और पाया कि कोई विशाल जीव उड़ा जा रहा है। उन्होंने तत्काल तीर चलाया और हनुमान जी बेहोश हो कर धरती पर गिर पड़े। लेकिन उनके मुंह से राम, राम निकला। भरत चौंके। हनुमान जी को होश में लाकर उन्होंने उनका परिचय और पहाड़ ले जाने का कारण पूछा। जब हनुमान जी ने बताया कि लक्ष्मण जी बेहोश हैं। यह उन्हीं की दवा है। तो भरत जी बेहद दुखी हुए। उन्होंने खुद को कोसा। वे अनजाने में ही भाई की चिकित्सा में विलंब कर रहे हैं। उन्होंने हनुमान जी का सत्कार किया और एक बाण को छोड़ा जो हनुमान जी को लेकर सीधे राम और लक्ष्मण जी के पास चला गया। सुषेण हनुमान जी के पराक्रम को समझ चुके थे। इसलिए तुरंत उन्होंने उपलब्ध जड़ी- बूटी से लक्ष्मण को ठीक कर दिया। रामायण के विशेषग्य कहते हैं कि हनुमान जी को आठ सिद्धियां और नौ निधियां प्राप्त थीं। यह भगवान राम ने नहीं मां सीता ने उन्हें दिया था। मां सीता जगन्माता हैं। भगवान राम को यह बात मालूम थी। भगवान शिव ने भगवान राम के बारे में रामचरितमानस में कहा है- पग बिनु चलै, सुनै बिनु काना। कर बिनु कर्म करै बिधि नाना।। वे तो अंतर्यामी हैं। सर्व शक्तिमान हैं और सर्व ग्याता हैं। लेकिन चूंकि मनुष्य का अवतार लिया है, इसलिए रावण से युद्ध कर रहे थे। पत्नी वियोग दिखा रहे थे और भाई के मूर्छित होने पर शोक व्यक्त कर रहे थे। जबकि सच्चाई यह है कि वे तो त्रिगुणातीत हैं। न उन्हें सत्व गुण व्यापता है और न ही रज या तम।

Saturday, January 2, 2010

एक बच्चे का आनंद

विनय बिहारी सिंह

आज घर से आफिस आते वक्त एक अद्भुत दृश्य देखा। इस घनघोर ठंड में एक पांच साल का बच्चा फुटपाथ पर पानी भरे टब में बैठ कर नहा रहा था। टब का पानी एक छोटे से प्लास्टिक के मग से अपने सिर पर डालते हुए वह अत्यंत आनंद महसूस कर रहा था। उसे नहाते देखने के लिए मुझे थोड़ी देर के लिए रुक जाना पड़ा। वह जब भी सिर पर पानी डाल रहा था, उसके चेहरे पर चरम आनंद का भाव आ जाता था। क्या दृश्य था। उसके आनंद से मैं खुद आनंदित हुआ। ऐसा ही एक दृश्य चार दिन पहले देखने को मिला। एक मां घर का अत्यंत आवश्यक कार्य निबटा रही थी। उसे सांस लेने की फुरसत नहीं थी। लेकिन उसका छोटा सा बच्चा मां के साथ खेलना चाहता था। उस घर में अत्यंत आग्रह से चाय पर मैं आमंत्रित था। बच्चा बार- बार मां से खेलने की जिद कर रहा था और मां बार- बार बच्चे की जिद को टाल रही थी। अचानक बच्चा उठा और मां के गाल पर अत्यंत प्यार से चुंबन दे दिया। आह, मां के चेहरे का आनंद तो देखते बन रहा था। मां की आंखें आनंदातिरेक में बंद हो गईं। उसके हाथ में जो काम था वह छूट गया। मां ने बच्चे को झपट कर गोद में ले लिया और उसे चुंबन देते हुए उसके साथ खेलने लगी। बच्चा बार- बार खिलखिलाने लगा। उसी मां को मेरे लिए चाय बनानी थी। कुछ देर बच्चे के साथ खेल लेने के बाद मां बोली- सॉरी, आपके चाय में विलंब हो गया। मैंने कहा- कैसा विलंब? जो दृश्य देख रहा हूं, उसकी तुलना चाय से करके क्यों आनंद को सीमित कर रही हैं आप। लेकिन वे नहीं मानीं। बच्चे को ही लिए हुए उन्होंने चाय बनाई और जलपान की कई और वस्तुएं मेरे सामने रख दीं। मेरे लिए बच्चे का यह दृश्य इतना सुखद था कि जलपान के दौरान मैं उसी में खोया रहा। मुझे कई बार लगा कि यह मां जगन्माता का ही रूप है। जैसे हम सब उसके बच्चे हैं और हमारी छोटी- मोटी गलतियों को जगन्माता माफ कर देती हैं, ठीक उसी तरह यह मां भी है। और अगर हम जगन्माता (मां काली, दुर्गा, सरस्वती या पार्वती, राधा या सीता जी वगैरह जगन्माता के ही रूप हैं। जगन्माता एक ही हैं, उनके रूप अलग- अलग हैं।) से प्यार करें और उसका ध्यान अपनी ओर खींचें तो वह भी हमें प्यार करेगी। पश्चिम बंगाल के रामप्रसाद के बारे में मैंने पिछले दिनों इसी जगह चर्चा की थी। वे तो कहते थे कि हर सांस ही जगन्माता के नाम है। और जगन्माता भी उनसे खूब प्यार करती थीं। वे जो चाहते थे उन्हें मिल जाता था। लेकिन मजे की बात यह है कि वे कोई भी भौतिक वस्तु चाहते ही नहीं थे। बस वे कहते थे- मां मुझे तो बस तुम्हारा प्यार चाहिए। मुझे इस योग्य बना दो कि मैं जब चाहूं, तुम्हारा दर्शन कर सकूं। तुमसे सीधे बातचीत कर सकूं। और यह सुविधा उन्हें प्राप्त थी।

Friday, January 1, 2010

नए साल में आप सबको ढेर सारी खुशियां मिलें

विनय बिहारी सिंह

आप सबको नए साल की असंख्य शुभकामनाएं। ईश्वर आप सबकी मनोकामनाएं पूरी करें। नए वर्ष में हम सब कुछ न कुछ अच्छा करने की सोचते हैं और अनेक लोग संकल्प करके भूल जाते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उस पर अमल करते हैं। मसलन मेरे एक परिचित ने पिछले साल नए साल शुरू होते ही कहा था- आज से मैं सिगरेट पीना छोड़ रहा हूं। और सचमुच उन्होंने सिगरेट पीना छोड़ दिया। अब उन्हें सिगरेट की ओर देखने की इच्छा भी नहीं होती। यह है दृढ़ इच्छा शक्ति का प्रमाण। जब उनसे पूछा कि क्या आपको कभी सिगरेट पीने की तलब तड़पा गई? उन्होंने कहा- हां। एक बार तो ऐसा लगा कि मैं सिगरेट के बिना जी ही नहीं सकता। लेकिन तब भी मैंने खुद पर कंट्रोल किया और आज सिगरेट से मुक्त हूं। उन्होंने कहा- दुनिया में कुछ भी करना असंभव नहीं है। दोष सिगरेट का नहीं है। दोष तो हमारा ही है। पैदा होते ही तो हमने सिगरेट पी नहीं। इसकी लत तो बड़े होने पर लगी। सिगरेट हमें गुलाम क्यों बनाए। उनकी बातें सुन कर सुख मिला। संत कहते हैं कि हमें हर वर्ष अपने भीतर झांक कर देखना चाहिए कि हमारे भीतर बुरी आदतों का कचरा क्या है। अगर है तो उन्हें दृढ़ इच्छा शक्ति से हटाने का काम शुरू कर देना चाहिए। यह सच है कि आप उसे जितना छोड़ना चाहेंगे, वह आपको उतना ही पकड़ना चाहेगी। लेकिन जब आप मानसिक रूप से ताकतवर रहेंगे तो वह आदत अंततः छूट जाएगी। आइए एक और पहलू का जिक्र करें। कई लोग नए साल पर संकल्प लेते हैं कि वे आज से रोज सुबह शाम दस मिनट का ध्यान करेंगे या ऊं नमः शिवाय का जाप करेंगे। कुछ लोग तो आलस के शिकार हो जाते हैं। वे तरह तरह के प्रपंचों के लिए समय निकाल लेते हैं लेकिन ईश्वर के लिए दस मिनट भी नहीं निकाल पाते। यह कितना आश्चर्य है? लेकिन कुछ लोग दृढ़ निश्चयी होते हैं। वे लोग जब तय कर लेते हैं कि ईश्वर के लिए आज से दस मिनट का समय रोज निकालेंगे तो वे उसका पालन भी करते हैं और ताजिंदगी उस नियम को निभाते हैं। मजे की बात यह है कि हम दूसरों के नियमों को निभाने में तो कोई कोर कसर नहीं छोड़ते लेकिन अपने बनाए नियम मानो तोड़ने के लिए ही बने हों। नहीं। जो शुभ काम तय कर लिया उसे करना ही चाहिए। जब तय किया तभी से उस पर अमल भी करना शुरू करना चाहिए। कहावत भी है- शुभ काम में देर क्यों? और सुबह- शाम जाप करने या पाठ करने या ध्यान करने का फल कितना सुखदायी होता है, यह तो इसका पालन करने वाला ही जानता है। नए साल की पूर्व संध्या पर मैं एक आश्रम में था और रात वहीं बिताई। पहली जनवरी २०१० को वहीं प्रसाद के रूप में जलपान किया और तब वहां से रवाना हुआ। एक अद्भुत अध्यात्मिक माहौल में नए साल में प्रवेश करना अनिर्वचनीय आनंद था। वहां के सन्यासियों ने ध्यान का एक खंड दूसरों की भलाई के लिए रखा था। यानी जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें हम बिल्कुल नहीं जानते उन सबकी भलाई के लिए ईश्वर से प्रार्थना। क्या आनंद था। सभी लोगों ने हृदय से अन्य लोगों के सुख और उनकी समृद्धि के लिए प्रार्थना की। सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया।। ( सभी सुखी रहें। सबके सुख में अपना सुख है। सबमें हम भी आ गए।) मेरे जीवन का यह सबसे आनंददायी और कभी न भूलने वाला समय था। सुख से सराबोर ऐसा नया साल सबको मिले।