Saturday, July 11, 2009
राजा का भ्रम दूर किया स्वामी विवेकानंद ने
एक बार स्वामी विवेकानंद दक्षिण भारत की यात्रा पर गए और एक जिग्यासु राजा के अतिथि बने। राजा ने जानबूझ कर स्वामी जी के सम्मान का बहाना करते हुए एक नर्तकी बुलाई और उनके सामने उसे नृत्य पेश करने को कहा। स्वामी विवेकानंद मुस्कराते हुए वहां बैठे रहे। जब नृत्य कार्यक्रम खत्म हुआ तो राजा ने उनसे पूछा- कैसा लगा नृत्य? नर्तकी सुंदरी थी न? स्वामी विवेकानंद बोले- हां, अगर जगन्माता की शक्ति नहीं होती, नर्तकी नाचती ही कैसे? और सुंदरी दिखती ही कैसे? इसीलिए इस नर्तकी में मुझे जगन्माता की झलक दिखाई पड़ी। इसीलिए तो मैं लगातार इसके पैर देख रहा था। मानों जगन्माता के ही पैर हों। नर्तकी तो उनके पैरों पर ही गिर पड़ी। राजा भी स्तब्ध हो गए। फिर राजा ने कहा- लोग जो देवी- देवताओं के फोटो की पूजा करते हैं, .यह मुझे एकदम बकवास लगता है। फोटो की पूजा क्या करना है? सामने ही एक राजा की तस्वीर लगी थी। स्वामी विवेकानंद ने राजा से पूछा- यह किसकी तस्वीर है? राजा बोले- मेरे पिता जी की। विवेकानंद बोले- तो इसे अगर कोई जूते मारे तो आपको कैसा लगेगा? राजा का मुंह गुस्से से लाल हो गया। वह बोला- मैं उसकी हत्या कर दूंगा। विवेकानंद बोले- क्यों। ये तो आपके पिता जी नहीं हैं। यह तो सिर्फ फोटो है। इसकी इतनी इज्जत क्यों करते हैं? अब राजा की समझ में आया कि यह तो उसके प्रश्न का उत्तर है। स्वामी विवेकानंद ने कहा- जैसे आप अपने पिता जी के फोटो के प्रति इतने संवेदनशील हैं वैसे ही भक्त अपने देवी- देवता के प्रति संवेदनशील होता है। और फोटो की पूजा करने में बुराई क्या है? क्या भगवान नहीं जानते कि फोटो के रूप में उन्हीं की पूजा हो रही है? वे तो सर्वग्याता हैं। अब राजा की समझ में आया कि देवी- देवताओं के फोटो की पूजा का मतलब क्या है। फिर राजा ने प्रश्न किया- अच्छा लोग तीर्थ क्यों करने जाते हैं? मंदिरों में पूजा क्यों करते हैं? भगवान तो सभी जगहों पर हैं। घर में भी तो पूजा कर सकते हैं। या मन ही में क्यों नहीं पूजा करते? तब स्वामी विवेकानंद ने कहा- आपके घर में पंखा क्यों झला जा रहा है? हवा तो सब जगह है। उसी से काम चलाइए न। जिस तरह आराम के लिए हवा का पंखा चलाया जाता है, उसी तरह भगवान का आशीर्वाद पाने के लिए हर उपाय जरूरी है। तीर्थ भी, मंदिर में पूजा भी। लेकिन हां, अगर मन में अटल भक्ति, श्रद्धा और विश्वास नहीं है तो कोई भी तीर्थ, मंदिर में पूजा या पाठ या मंत्र जाप व्यर्थ हो जाएगा।
Friday, July 10, 2009
लीजिए बन गया शुक्राणु
ब्रिटेन में न्यूकासल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में मानव शुक्राणु बनाने का दावा किया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि दुनिया में पहली बार हुए इस प्रयोग की सफलता से पुरुषों में बंध्यता या बाप नहीं बन पाने की समस्या को दूर करने में मदद मिल सकती है.
न्यूकासल विश्वविद्यालय और नॉर्थईस्ट स्टेम सेल इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में स्पर्म या शुक्राणु विकसित करने के अपने सफल प्रयोग की रिपोर्ट विज्ञान पत्रिका 'स्टेम सेल एंड डेवलपमेंट' में प्रकाशित की है.
इस क्षेत्र से जुड़े कई अन्य वैज्ञानिकों को इस बात पर संदेह है कि पूरी तरह से विकसित शुक्राणुओं को प्रयोगशाला में पैदा किया गया है. लेकिन न्यूकासल के वैज्ञानिकों ने एक वीडियो जारी कर दावा किया है कि उनके द्वारा बनाए गए शुक्राणु पूरी तरह विकसित और गतिशील हैं.
आख़िर प्रयोगशाला में शुक्राणु विकसित करने के इस प्रयोग से क्या फ़ायदा होगा?
इस सवाल के जवाब में न्यूकासल विश्वविद्यालय के प्रयोग से जुड़े वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर करीम नेयर्निया ने बीबीसी को बताया, "इस तकनीक के ज़रिए हम पुरुषों की बंध्यता की समस्या को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे, क्योंकि प्रयोगशाला में हम शुक्राणुओं के विकास के अलग-अलग चरणों का अध्ययन कर सकते हैं. इससे हमें शुक्राणुओं के आनुवंशिक प्रभाव या उन पर पड़ने वाले पर्यावरणीय जैसे बाह्य प्रभावों का भी अध्ययन करने का मौक़ा मिलता है."
गर्भधारण में इस्तेमालशुक्राणु बनाने की प्रक्रियाएक नर भ्रूण से स्टेम कोशिकाएँ निकाली गईं. स्टेम कोशिकाएँ यानि नवविकसित भ्रूण में पाई जाने वाली वो मास्टर कोशिकाएँ जो कि आगे चल कर शरीर के किसी भी अंग का रूप ले सकती हैं. इन स्टेम कोशिकाओं को शरीर के तापमान पर लाकर उसे एक ऐसे रासायनिक घोल में डाला गया जहाँ कि कोशिकाओं में वृद्धि हो सके. इन स्टेम कोशिकाओं से बाद में 'जर्मलाइन' स्टेम सेल नामक कोशिकाओं को अलग किया गया. उल्लेखनीय है कि 'जर्मलाइन' स्टेम कोशिकाएँ ही आगे चल कर अंडाणु या शुक्राणु का रूप लेती हैं. अब इन 'जर्मलाइन' कोशिकाओं को 'मियोसिस' प्रक्रिया से गुजारा गया. क्रोमोज़ोम की संख्या आधी करने वाली ये प्रक्रिया शुक्राणुओं के विकास के लिए ज़रूरी होती है. इस तरह स्टेम कोशिकाओं को शुक्राणुओं में बदलने में चार से छह हफ़्ते का समय लगता है.
जब उनसे ये पूछा गया कि क्या प्रयोगशाला में विकसित शुक्राणुओं का गर्भ धारण कराने में इस्तेमाल किया जा सकता है, तो उन्होंने कहा, "ब्रिटेन में इसकी अनुमति नहीं हैं. क़ानूनन इस पर पाबंदी है. इन शुक्राणुओं का आगे कोई उपयोग हो सके इसके लिए ज़रूरी है कि पहले उन भ्रूणों की गारंटी दी जाए जिनसे स्टेम कोशिकाएँ लेकर शुक्राणु बनाए जाने हों."
प्रोफ़ेसर नेयर्निया के अनुसार, "उसके बाद प्रयोगशाला को आगे के प्रयोगों के लिए सुरक्षित करना होगा. इसके बाद भी पहले जानवरों के शुक्राणुओं के साथ कोई प्रयोग हो सकेगा. उसके पाँच से सात साल बाद ही मानव से जुड़े किसी प्रयोग पर काम किया जा सकेगा."
उनका कहना है कि उनकी टीम को किसी मादा भ्रूण से शुक्राणु विकसित करने में अभी सफलता नहीं मिली है, लेकिन सिद्धान्तत: ऐसा करना संभव है.
जब उनसे उनके प्रयोग से जुड़े नैतिक सवालों के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था, "ये चिंता करना कि हमारा उद्देश्य इन शुक्राणुओं के इस्तेमाल से बच्चे पैदा करने का है, ग़लत है. ये ठीक नहीं है. हम जो कर रहे हैं वो दरअसल पुरुषों में बंध्यता की समस्या को समझने की, शुक्राणुओं के विकास को समझने की कोशिश है."
प्रोफ़ेसर नेयर्निया के अनुसार, "ये नैसर्गिक मानव प्रजनन का विकल्प नहीं, बल्कि बाप बनने में नाकाम पुरुषों की सहायता और समर्थन में एक कार्यक्रम भर है."
लेकिन उनके इस आश्वासन का ज़्यादा असर दिखता लग नहीं रहा है.
कई अख़बारों में सनसनीखेज़ सुर्ख़ियाँ लगी हैं कि बच्चे पैदा करने के लिए अब पुरुषों की ज़रूरत नहीं रह जाएगी.
वहीं कोरइथिक्स नामक एक संस्था ने इस प्रयोग को अनैतिक पागलपन की संज्ञा देते हुए सवाल किया है कि प्रयोगशाला में शुक्राणु विकसित करने के चक्कर में एक स्वस्थ भ्रूण को नष्ट करने को कैसे उचित ठहराया जा सकता है। (बीबीसी हिन्दी से साभार )
हमारे ऋषियों ने यह चमत्कार कई हज़ार साल पहले कर दिया था। उन्होंने तो क्लोन भी बना दिया था।
Thursday, July 9, 2009
महिलाओं को क्यों कहा जाता है मातृ शक्ति
इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि महिलाएं मातृ शक्ति हैं। यह पूरा ब्रह्मांड जग्न्माता ने धारण कर रखा है। वही हमें भोजन देती हैं और जरूरत की अन्य चीजें भी। यहां एक संत की बहुत अच्छी बात मुझे याद आ रही है। उन्होंने कहा था- जब भी मैं किसी सुंदर स्त्री को देखता हूं तो मन में यही ख्याल आता है कि अगर मेरी अभी मृत्यु हो गई तो हो सकता है दुबारा मैं इसी सुंदरी के गर्भ से उसका बेटा हो कर पैदा होऊं। बस यह ख्याल आते ही मेरे मन में उसके प्रति माता का भाव आता है। इस संत के विचार सुन कर मैं सुखद आश्चर्य में था। हां, सच ही तो है। हम भी किसी न किसी माता के पेट से ही तो आए हैं। इसीलिए महिलाओं को मातृ शक्ति कहा जाता है। इसी मातृ शक्ति का अनंत स्वरूप हैं मां काली या मां दुर्गा। हम उन्हीं की संतानें हैं। तब आप कहेंगे कि जब हम अनंत शक्तिशाली मां की संतानें हैं तो जीवन में इतनी परेशानी क्यों है? तो इसका उत्तर है- यह दुख जगन्माता ने नहीं दिए हैं। यह सारे तनाव और दुख हमने खुद पैदा किए हैं। जो भी काम ईश्वर को साक्षी मान कर नहीं किया जाता, ईश्वर को समर्पित करके नहीं किया जाता, उसका परिणाम सुखद नहीं होता। एक बार कोई काम करने से पहले ईश्वर के चरणों में उसे रख तो दीजिए। लेकिन सभी ऐसा नहीं कर पाते। क्योंकि उन्हें लगता है कि वे बहुत बुद्धिमान हैं, ईश्वर से क्या इजाजत लेना। मैं तो कर ही लूंगा- का अहंकार उनमें बना रहता है। बस, यही हमें बाद में डंसता रहता है। हमें परेशान करता रहता है। इन सबसे मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय है ईश्वर की शरण में जाना। जैसे आप किसी ट्रेन या प्लेन में चढ़ते हैं तो अपना सामान आप हाथ में टांगे नहीं रहते। उस ट्रेन या प्लेन में ही रखवा देते हैं। उसी तरह जब आप ईश्वर की शरण में जाएंगे तो आपके सारे दुख, तनाव, तकलीफें और भय ईश्वर दूर कर देंगे।
Saturday, July 4, 2009
अकेलेपन से डरना नहीं, उसका आनंद लेना है
विनय बिहारी सिंह
कई लोग अकेलेपन से बहुत डरते हैं। वे हमेशा किसी न किसी के साथ रहना चाहते हैं। अगर किसी कारणवश उन्हें अकेले रहना पड़ता है तो वे जल्दी से काम खत्म कर किसी न किसी से बात करना या घर है तो वहां जाना चाहते हैं। लेकिन बड़े- बड़े संतों ने कहा है- यह आपका सौभाग्य है कि दिन या रात में आपको अकेले रहने का मौका मिलता है। हालांकि आप बिल्कुल अकेले कभी नहीं होते। भगवान हमेशा आपके साथ होते हैं। लेकिन उन्हें सूक्ष्मता से महसूस करना होता है। भौतिक रूप से अगर अकेले हैं तो उस शांति का आनंद लीजिए जो माहौल में पसरा हुआ है। लेकिन उस शांति को आप तभी महसूस कर सकते हैं जब आपके भीतर भी शांति हो। अगर भीतर शांति नहीं तो बाहर चाहे कितना भी सुंदर दृश्य हो, कितनी भी शांति हो, थोड़ी देर ही आपको आनंददायक लगेगा। आप फिर भीतर की अशांति से प्रभावित हो जाएंगे। इसलिए सबसे पहले भीतर की शांति चाहिए। यह ध्यान या ईश्वर से जुड़ने से सहज ही उपलब्ध हो जाता है। संयोग से या जानबूझ कर पाए हुए अकेलेपन को सुख मानिए। उस समय आप कुछ मत सोचिए। बस उस शांति में ईश्वर की उपस्थिति महसूस करते हुए आप उसमें घुल जाइए, पिघल जाइए। आप ईश्वर की गोद में पिघलेंगे तो आपको गहरी शांति मिलेगी। तब आपको लगेगा कि अकेले होने का आनंद क्या है। यह ठीक है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। लेकिन हमेशा सामाजिक धर्म निभाते हुए आप ऊब जाएंगे। इसलिए अकेलापन ढूंढिए और ईश्वर को साथ लेकर उसमें रम जाइए। तब लगेगा, यह अकेलापन आपको आशीर्वाद के रूप में मिला है। ईश्वर के साथ संपर्क के लिए अकेले होना बहुत जरूरी है। चाहे दस मिनट ही सही, ऐसा समय क्यों न निकालें जब सिर्फ और सिर्फ हम हों और ईश्वर हों। बाकी कोई नहीं। उन क्षणों का आनंद आप शब्दों में नहीं बयां कर सकते। यह तो अनुभव और आनंद की स्थिति है।
Friday, July 3, 2009
संत नामदेव
महाराष्ट्र में जन्मे संत नामदेव के अराध्य विट्ठल (श्रीकृष्ण) थे। विट्ठल के प्रति नामदेव की भक्ति विलक्षण थी। वे विट्ठल के बिना एक पल भी जी नहीं सकते थे। वे उनके सांसों में बसे थे। दिनरात विट्ठल मंदिर में रहना, उनकी भक्ति के गीत गाना, उनके सामने मस्ती में नृत्य करना और उनसे बातें करना ही उनका काम था। मंदिर में वैसे तो विट्ठल की मूर्ति थी। लेकिन अकेले में वह मूर्ति जीवंत हो जाती थी और संत नामदेव के साथ बातें करती। नामदेव को जो पूछना होता था, विट्ठल से ही पूछते थे। बाकी संसार से नामदेव को कोई मतलब ही नहीं था। किसी चीज की जरूरत पड़ी तो बस विट्ठल से कह दिया। वे मंदिर छोड़ कर कहीं जाते नहीं थे। एक बार एक संत सभा में एक कुम्हार संत से संतों ने कहा कि कृपया सभी संतों की हांडी बजा कर देख लीजिए कि सब अच्छी तरह पक गए हैं या नहीं। यानी सभी को ईश्वर प्राप्ति हुई है या नहीं। कुम्हार संत हंसते हुए सबके सिर पर फूल की तरह ठोक कर देखने लगे। जब वे नामदेव के पास पहुंचे तो नामदेव ने ऐतराज किया। लेकिन कुम्हार संत ने उनके सिर पर फूल की तरह स्पर्श कर दिया और आगे बढ़ गए। नामदेव को बुरा लगा। उन्होंने लौट कर विट्ठल भगवान से इसकी शिकायत की। विट्ठल ने कहा- इसका रहस्य तो संत जानें। नामदेव ने उनसे कहा- आप इस समूचे ब्रह्मांड के स्वामी हैं। क्या आप इसका उत्तर नहीं दे सकते? विट्ठल ने फिर मुस्कराते हुए जवाब दिया- इसका उत्तर तो संत ही दे सकते हैं। नामदेव ने फिर पूछा- तो आप सर्वग्य क्यों कहे जाते हैं? विट्ठल ने वही उत्तर दुहरा दिया- इसका उत्तर तो संत ही दे सकते हैं। संत नामदेव की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। उनकी दुविधा देख कर विट्ठल बोले- जंगल के संत से मिलो। तुम्हारी सारी शंकाएं खत्म हो जाएंगी। नामदेव जंगल के मंदिर की तरफ गए। वहां एक भिखारी जैसा दाढ़ी बढ़ाए एक आदमी लेटा हुआ था और उसका पैर शिवलिंग पर था। नामदेव को लगा कि यह आदमी तो पागल सा है। यह संत नहीं हो सकता। तभी उस पागल से आदमी ने कहा- तुम्हें विट्ठल ने भेजा है क्या? नामदेव चौंके। वे समझ गए जिस संत की तलाश करने वे आए हैं, यही हैं। उन्होंने कहा- आपने अपना पैर शिवलिंग पर क्यों रखा है? आप जानते नहीं कि देवता पर पैर नहीं रखते? संत ने कहा- भाई मैं तो बूढ़ा हो गया हूं। तुम्हीं पैर हटा कर वहां रख दो, जहां शिवलिंग न हो। आश्चर्य। नामदेव जहां- जहां पैर रखते, वहीं एक शिवलिंग बन जाता। हार कर नामदेव ने उनका पैर अपने ऊपर रख दिया। ज्योंही उन्होंने संत का पैर अपने ऊपर ऱखा, वे स्वयं शिवलिंग बन गए। अब नामदेव की समझ में आया। भगवान सर्वव्यापी हैं। वे कहां नहीं हैं? भगवान तो कण- कण में हैं। संत ने नामदेव से गूढ मुद्दों पर बातें कीं। वे संतुष्ट हो कर वापस लौटे। लेकिन विट्ठल के पास न जाकर सीधे अपने घर चले गए। जब दो- तीन दिन तक नामदेव विट्ठल मंदिर में नहीं आए तो भगवान विट्ठल स्वयं नामदेव के घऱ गए और पूछा- तुम मेरे पास मंदिर में क्यों नहीं आते? नामदेव ने जवाब दिया- आप क्या सिर्फ मंदिर में ही हैं? आप तो हर जगह हैं। मैंने आपको समझा था कि आप सिर्फ मंदिर में ही रहते हैं। इसीलिए मंदिर के बाहर आता नहीं था। अब समझ में आ गया है कि ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां आप नहीं है। फिर मंदिर क्यों जाऊं। आप तो मेरे घर में भी है। और संतों की सभा में मेरे अहंकार को ठेस लगी थी। जबकि संत में तो अहंकार होना ही नहीं चाहिए। मैं तो आपके साथ रहते रहते अहंकारी हो गया था। यह ठीक नहीं। आप तो सभी भक्तों को उतना ही प्यार करते हैं। जहां प्रेम की पराकाष्ठा होगी, वहां अहंकार कैसा? अहंकार, ईर्ष्या, क्रोध, लज्जा या भय आदि तो पाश हैं, बंधन हैं। बिना इनसे ऊपर उठे आपका प्यार कैसे मिलेगा? और प्यार में तो ये सब पाश या बंधन नष्ट हो जाते हैं। अब मैं आपको और ज्यादा प्यार करने लगा हूं और अब आप मुझे हर जगह दिख रहे हैं।
Thursday, July 2, 2009
नहीं भाई भगवान बुद्ध को ऐसा मत कहो
एक भाई ने भड़ास पर सवाल किया है कि भगवान बुद्ध भगोड़े थे। क्या वे निर्वाण पा कर मृत्यु को जीत पाए? आखिर सन्यासी बन कर उन्होंने क्या कर लिया? मित्र, भगवान बुद्ध मृत्यु पर विजय प्राप्त करने नहीं गए थे। वे गए थे इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ने कि आखिर मनुष्य है क्या? क्या वह शरीर है? क्या वह मन है? या कि आत्मा? जब वे राजकुमार थे। उनका नाम था सिद्धार्थ गौतम। एक दिन उन्होंने कोचवान से नगर भ्रमण के करने की इच्छा व्यक्त की। कोचवान रथ पर उन्हें बैठा कर नगर की सैर करा रहा था। तभी उन्होंने एक बूढ़े व्यक्ति को देखा। उसकी कमर झुकी हुई थी। उन्होंने पूछा- इस आदमी को क्या हुआ है? कोचवान ने बताया- यह आदमी बूढ़ा हो गया है। सभी एक दिन बूढ़े होते हैं। यह राजकुमार के लिए झटके की तरह था। फिर उन्होंने क्रमशः बीमार, विकलांग और साधु को देखा और उनके दिमाग में मनुष्य की नश्वरता को लेकर तरह- तरह के प्रश्न उठने लगे। उनके दिमाग में पहला सवाल उठा- मनुष्य जन्म क्यों लेता है? आगे बढ़ने से पहले हम यह जान लें कि कपिलवस्तु के पास लुंबिनी में वे पैदा हुए थे। उन्होंने लंबे समय तक तपस्या की। वे शाक्य गणराज्य के अगले राजा थे। उनकी पत्नी यशोधरा अत्यंत सुंदरी थी। आप कल्पना करें- अकूत संपत्ति, अप्सरा सी सुंदर पत्नी, विशाल साम्राज्य, चरम भोग के सारे साधन और राजा का पद। यह सारी चीजें सिद्धार्थ गौतम को कूड़ा- करकट लगीं ( आज तो बड़े- बड़े संयमी लोग थोड़ा सा भी धन देख कर पूंछ हिलाने लगते हैं और अपनी तथाकथित नैतिकता की मिट्टी पलीद कर देते हैं।) गौतम बु्द्ध भगोड़े नहीं महान त्यागी थे मित्र। आज तो एक घर या कुर्सी छोड़ने की बात आते ही लोग क्या क्या नाटक नहीं करते। गौतम बुद्ध ने ५०० ईस्वी पूर्व पूरा राजपाट, भोग- विलास और सम्मान छोड़ दिया। आप कल्पना कीजिए एक सुंदर स्त्री और प्यारे से बेटे को छोड़ कर उन्होंने किस मनःस्थित में राजमहल छोड़ा होगा। उनके त्याग के पीछे उनका तीव्र वैराग्य था। उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। वे मनुष्य जीवन के रहस्य जानना चाहते थे। उन्होंने कठोर तप किया। आखिर बोध गया में पीपल के पेड़ के नीचे उन्हें ग्यान (तकनीकी कारणों से ग्यान मैं ऐसे ही लिख पा रहा हूं) प्राप्त हुआ। तब तक उनका शरीर सूख कर कांटा हो गया था। इस तप को भगोड़ा कहना बुद्ध के साथ नाइंसाफी है। जरा कोई घर छोड़ कर इस वैराग्य की हद तक जा कर तो दिखाए। तब पता चलेगा कि गौतम बुद्ध क्या थे। बैठे- बिठाए उन्हें भगोड़ा कह देना ठीक नहीं है।
बुद्ध के उपदेशों का सार इस प्रकार है -
सम्यक ज्ञान बुद्ध के अनुसार धम्म यह है:
जीवन की पवित्रता बनाए रखना। जीवन में पूर्णता प्राप्त करना। निर्वाण प्राप्त करना। तृष्णा का त्याग। यह मानना कि सभी संस्कार अनित्य हैं। कर्म को मानव के नैतिक संस्थान का आधार मानना। बुद्ध के अनुसार सद्धम्म क्या है-- 1. जो धम्म प्रज्ञा की वृद्धि करे। जो धम्म सबके लिए ज्ञान के द्वार खोल दे। जो धम्म यह बताए कि केवल विद्वान होना पर्याप्त नहीं है। जो धम्म यह बताए कि आवश्यकता प्रज्ञा प्राप्त करने की है । जो धम्म मैत्री की वृद्धि करे। जो धम्म यह बताए कि प्रज्ञा भी पर्याप्त नहीं है, इसके साथ शील भी अनिवार्य है। जो धम्म यह बताए कि प्रज्ञा और शील के साथ-साथ करुणा का होना भी अनिवार्य है। जो धम्म यह बताए कि करुणा से भी अधिक मैत्री की आवश्यकता है। वह सभी प्रकार के सामाजिक भेदभावों को मिटा दे। वह आदमी और आदमी के बीच की सभी दीवारों को गिरा दे। वह बताए कि आदमी का मूल्यांकन जन्म से नहीं कर्म से किया जाए जब वह आदमी-आदमी के बीच समानता के भाव की वृद्धि करे । बुद्ध को भगवान यूं ही नहीं कहते। मेरा आग्रह है कि जिन मित्र ने भगवान बुद्ध को भगोड़ा कहा है, वे भगवान बुद्ध पर केंद्रित प्रामाणिक ग्रंथों को बार- बार पढ़ें। ये ग्रंथ एक या दो बार पढ़ने से समझ में नहीं आते। इन्हें किसी बौद्ध विद्वान से समझना पड़ेगा। ।
Wednesday, July 1, 2009
हमारे बिना चाहे, कौन करवाता है हमसे मनमानी
विनय बिहारी सिंह
आज गीता का वह अंश पढ़ें जिसमें भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कामनाओं के विषय में सावधान किया है। अर्जुन का प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण है। आइए गीता की ओर मुड़ें-
( काम के निरोध का विषय )- अर्जुन उवाचः
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः ।अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥
भावार्थ : अर्जुन बोले- हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात् लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है॥36॥॥ श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ॥
भावार्थ : श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में वैरी जान॥37॥
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥
भावार्थ : जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढँका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही उस काम द्वारा यह ज्ञान ढँका रहता है॥38॥
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥
भावार्थ : और हे अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले काम रूप ज्ञानियों के नित्य वैरी द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढँका हुआ है॥39॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥
भावार्थ : इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि- ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है। ॥40॥
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥
भावार्थ : इसलिए हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल॥41॥
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥
भावार्थ : इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं। इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है॥42॥