Friday, May 8, 2009

वल्लभाचार्य


भक्तिकालीन सगुणधारा की कृष्णभक्ति शाखा के आधार स्तंभ एवं पुष्टिमार्ग के प्रणेता श्रीवल्लभाचार्यजी का प्रादुर्भाव संवत् 1535, वैशाख कृष्ण एकादशी को दक्षिण भारत के कांकरवाड ग्रामवासी तैलंग ब्राह्मण श्री लक्ष्मण भट्ट जी की पत्नी इलम्मागारू के गर्भ से काशी के समीप हुआ। उन्हें वैश्वानरावतार [अग्नि का अवतार] कहा गया है। वे वेदशास्त्र में पारंगत थे।
श्री रूद्रसंप्रदाय के श्रीविल्वमंगलाचार्यजी द्वारा इन्हें अष्टादशाक्षर गोपालमन्त्र की दीक्षा दी गई। त्रिदंड संन्यास की दीक्षा स्वामी नारायणेन्द्र तीर्थ से प्राप्त हुई। विवाह पंडित श्रीदेवभट्टजीकी कन्या- महालक्ष्मी से हुआ, और यथासमय दो पुत्र हुए- श्री गोपीनाथ व श्रीविट्ठलनाथ। भगवत्प्रेरणा वश व्रज में गोकुल पहुंचे, और उसके बाद व्रजक्षेत्र स्थित गोव‌र्द्धन पर्वत पर अपनी गद्दी स्थापित कर शिष्य पूरनमल खत्री के सहयोग से संवत् 1576 में श्रीनाथ जी के भव्य मंदिर का निर्माण कराया। वहां विशिष्ट सेवा-पद्धति के साथ लीला-गान के अंतर्गत श्रीराधाकृष्ण की मधुर लीलाओं से संबंधित रसमय पदों की स्वर-लहरी का अवगाहन कर भक्तजन निहाल हो जाते।
श्रीवल्लभाचार्यजी के मतानुसार तीन स्वीकार्य तत्त्‍‌व हैं- ब्रह्म, जगत् और जीव। ब्रह्म के तीन स्वरूप वर्णित हैं-आधिदैविक, आध्यात्मिक एवं अंतर्यामी रूप। अनंत दिव्य गुणों से युक्त पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण को ही परब्रह्म स्वीकारते हुए उनके मधुर रूप एवं लीलाओं को ही जीव में आनंद के आविर्भाव का स्त्रोत माना गया है। जगत् ब्रह्म की लीला का विलास है। संपूर्ण सृष्टि लीला के निमित्त ब्रह्म की आत्म-कृति है।
जीवों के तीन प्रकार हैं- पुष्टि जीव जो भगवान के अनुग्रह पर निर्भर रहते हुए नित्यलीला में प्रवेश के अधिकारी बनते हैं), मर्यादा जीव [जो वेदोक्त विधियों का अनुसरण करते हुए भिन्न-भिन्न लोक प्राप्त करते हैं] और प्रवाह जीव [जो जगत्-प्रपंच में ही निमग्न रहते हुए सांसारिक सुखोंकी प्राप्ति हेतु सतत् चेष्टारतरहते हैं]।
भगवान् श्रीकृष्ण भक्तों के निमित्त व्यापी वैकुण्ठ में [जो विष्णु के वैकुण्ठ से ऊपर स्थित है] नित्य क्रीडाएं करते हैं। इसी व्यापी वैकुण्ठ का एक खण्ड है- गोलोक, जिसमें यमुना, वृन्दावन, निकुंज व गोपियां सभी नित्य विद्यमान हैं। भगवद्सेवा के माध्यम से वहां भगवान की नित्य लीला-सृष्टि में प्रवेश ही जीव की सर्वोत्तम गति है।
प्रेमलक्षणा भक्ति उक्त मनोरथ की पूर्ति का मार्ग है, जिस ओर जीव की प्रवृत्ति मात्र भगवान की कृपा से ही संभव है। महाप्रभु वल्लभाचार्यजी के पुष्टिमार्ग [अनुग्रह मार्ग] का यही आधारभूत सिद्धांत है। पुष्टि-भक्ति की तीन उत्तरोत्तर अवस्थाएं हैं-प्रेम, आसक्ति और व्यसन। मर्यादा-भक्ति में भगवद्प्राप्ति शमदमादि साधनों से होती है, किंतु पुष्टि-भक्ति में भक्त को किसी साधन की आवश्यकता न होकर मात्र भगवद्कृपाका आश्रय होता है। मर्यादा-भक्ति स्वीकार्य करते हुए भी पुष्टि-भक्ति ही श्रेष्ठ मानी गई है। पुष्टिमार्गीय जीव की सृष्टि भगवत्सेवार्थ ही है- भगवद्रूप सेवार्थ तत्सृष्टिर्नान्यथाभवेत्। प्रेमपूर्वक भगवत्सेवाभक्ति का यथार्थ स्वरूप है- भक्ति व प्रेम पूर्वक सेवा। भागवतीय आधार (कृष्णस्तु भगवान् स्वयं) पर भगवान कृष्ण ही सदा सर्वदा सेव्य, स्मरणीय तथा कीर्तनीय हैं- सर्वदा सर्वभावेनभजनीयोब्रजाधिप:।..तस्मात्सर्वात्मना नित्यंश्रीकृष्ण: शरणंमम।
ब्रह्म के साथ जीव-जगत् का संबंध निरूपण करते हुए उनका मत था कि जीव ब्रह्म का सदंश [सद् अंश] है, जगत् भी ब्रह्म का अंश है। अंश एवं अंशी में भेद न होने के कारण जीव-जगत् और ब्रह्म में परस्पर अभेद है। अंतर मात्र इतना है कि जीव में ब्रह्म का आनंदांश आवृत्त रहता है, जबकि जड जगत में इसके आनन्दांश व चैतन्यांश दोनों ही आवृत्त रहते हैं।
श्रीशंकराचार्य के अद्वैतवाद केवलाद्वैत के विपरीत श्रीवल्लभाचार्य के अद्वैतवाद में माया का संबंध अस्वीकार करते हुए ब्रह्म को कारण और जीव-जगत को उसके कार्य रूप में वर्णित कर तीनों शुद्ध तत्वों का ऐक्य प्रतिपादित किए जाने के कारण ही उक्त मत शुद्धाद्वैतवाद कहलाया [जिसके मूल प्रवर्तकाचार्यश्री विष्णुस्वामीजीहैं]।
वल्लभाचार्यजी के चौरासी शिष्यों में अष्टछापक विगण- भक्त सूरदास, कृष्णदास, कुम्भनदासव परमानन्द दास प्रमुख थे। श्री अवधूतदास नामक परमहंस शिष्य भी थे। सूरदासजी की सच्ची भक्ति एवं पद-रचना की निपुणता देख अति विनयी सूरदासजी को भागवत् कथा श्रवण कराकर भगवल्लीलागान की ओर उन्मुख किया तथा उन्हें श्रीनाथजी के मन्दिर की की‌र्त्तन-सेवासौंपी। तत्व ज्ञान एवं लीला भेद भी बतलाया- श्रीवल्लभगुरू तत्त्‍‌व सुनायोलीला-भेद बतायो [सूरसारावली]। सूर की गुरु के प्रति निष्ठा दृष्टव्य है- भरोसो दृढ इन चरननकेरो। श्रीवल्लभ-नख-चन्द-छटा बिनुसब जग मांझअधेरो॥श्रीवल्लभके प्रताप से प्रमत्तकुम्भनदासजी तो सम्राट अकबर तक का मान-मर्दन करने में नहीं झिझके- परमानन्ददासजी के भावपूर्ण पद का श्रवण कर महाप्रभु कई दिनों तक बेसुध पडे रहे। मान्यता है कि उपास्य श्रीनाथजी ने कलि-मल-ग्रसित जीवों का उद्धार हेतु श्रीवल्लभाचार्यजी को दुर्लभ आत्म -निवेदन -मन्त्र प्रदान किया और गोकुल के ठकुरानी घाट पर यमुना महारानी ने दर्शन देकर कृतार्थ किया। उनका शुद्धाद्वैत का प्रतिपादक प्रधान दार्शनिक ग्रन्थ है- अणुभाष्य [ब्रह्मसूत्र भाष्य अथवा उत्तरमीमांसा]।अन्य प्रमुख ग्रन्थ हैं- पूर्वमीमांसाभाष्य, भागवत के दशम स्कन्ध पर सुबोधिनी टीका, तत्त्‍‌वदीप निबन्ध एवं पुष्टि -प्रवाह- मर्यादा। संवत् 1587,आषाढ शुक्ल तृतीया को उन्होंने अलौकिक रीति से इहलीला संवरण कर सदेह प्रयाण किया। वैष्णव समुदाय उनका चिरऋणी है। [डा. मुमुक्षु दीक्षित]

मन चंगा तो कठौती में गंगा

मन चंगा तो कठौती में गंगा

यह वाक्य रविदास ने कहा था । हिंदू धर्म कहता है कि आप जात-पाँत से बड़े या छोटे नहीं होते। मन, वचन और कर्म से बड़े या छोटे होते हैं। संत शिरोमणि रविदास जात से मोची थे, लेकिन मन, कर्म और वचन से ब्राह्मण। जो ब्रह्म को जानने में उत्सुक है वही ब्राह्मण। कार्य ही ध्यान है: संत कवि रविदास कबीर के गुरु भाई थे। गुरु भाई अर्थात दोनों के गुरु स्वामी रामानंद थे। लगभग छह सौ साल पूर्व काशी में उनका जन्म हुआ था। चर्मकार कुल में जन्म लेने के कारण जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था। इस व्यवसाय को ही उन्होंने ध्यान विधि बना डाला। कार्य कैसा भी हो यदि आप उसे ही परमात्मा का ध्यान बना लें तो मोक्ष आसान हो जाता है। रविदासजी अपना काम पूरी लगन और ध्यान से करते थे। इस काम में उन्हें इतना आनंद मिलता था कि वे बिना मूल्य लिए ही जूते भेंट कर देते थे। मानो किसी परमात्मा के लिए जूते बनाए हैं तो फिर मूल्य क्या। मूल्य मोक्ष से कम नहीं।मन चंगा तो कठौती में गंगा :उनसे एक बार किसी ने गंगा स्नान करने के लिए चलने को कहा तो उन्होंने कहा कि नहीं, मुझे आज ही किसी को जूते बनाकर देना है। यदि नहीं दे पाया तो वचन भंग हो जाएगा। रविदास के इस तरह के उच्च आदर्श और उनकी वाणी, भक्ति एवं अलौकिक शक्तियों से प्रभावित होकर अनेक राजा-रानियों, साधुओं तथा विद्वज्जनों ने उनको सम्मान दिया है।उनकी इस साधुता को देखकर संत कबीर ने कहा था कि साधु में रविदास संत हैं, सुपात्र ऋषि सो मानियाँ।रविदास राम और कृष्ण भक्त परम्परा के कवि और संत माने जाते हैं। उनके प्रसिद्ध दोहे आज भी समाज में प्रचलित हैं जिन पर कई धुनों में भजन बने हैं। जैसे- प्रभुजी तुम चंदन हम पानी- इस प्रसिद्ध भजन को सभी जानते हैं।

Thursday, May 7, 2009

क्या हैं सूक्ष्म शक्तियां

विनय बिहारी सिंह

सूक्ष्म शक्तियां आखिर हैं क्या? इसे ही माइंड पावर कहा जाता है। यानी अपने मन को पूरी तरह एकाग्रचित्त करके उसे नियंत्रित कर लेना। मन कैसे एकाग्रचित्त होगा? मन को आप ईश्वर के किसी रूप पर एकाग्रचित्त करें। जैसे- भगवान शिव पर या राम या कृष्ण भगवान पर या दुर्गा मां पर या काली मां पर या हनुमान जी पर। फिर उनके नाम का जप, या रूप, गुण, महिमा वगैरह का स्मरण करते हुए मन को उन्हीं में लय कर देना। जैसे आप उस देवता से एकाकार हो गए हों। यह है ध्यान। जब ध्यान लग जाए और मन इधर- उधर न भटके तो आप इससे एक कदम आगे बढ़ें। कोई सकारात्मक काम करना चाहें तो उस काम को लेकर मन को दृढ़ करें कि वह काम हो रहा है और अवश्य पूरा होगा। आप देखिए कि ऐसा कुछ दिनों तक करने से आपका वह सकारात्मक काम हो ही जाएगा। मन का संकल्प दृढ़ हो तो कोई भी अच्छा काम किया जा सकता है। हां, लेकिन मन इधर- उधर नहीं भटकना चाहिए। अगर भटके तो उसे बार- बार खींच कर उसी देवता या देवी पर केंद्रित करते रहें। एक दिन ऐसा आएगा कि आपका मन भटकेगा ही नहीं। जब मन भटकना बंद हो जाता है तो आपकी सूक्ष्म शक्तियां जागृत होने लगती हैं। मैं एक ऐसे मरीज को जानता हूं जिनकी किडनी खराब हो चुकी है और डाक्टरों ने उन्हें डायलिसिस पर रखने की सलाह दी है। लेकिन उन्होंने डायलिसिस लेने से इंकार कर दिया और सिर्फ माइंड पावर से ही खुद को स्वस्थ कर लिया। उनके हृदय का आपरेशन भी हो चुका है। पर वे माइंड पावर का इस्तेमाल कर खुद को लगातार ऊर्जावान और आशावादी बनाए रखते हैं। किडनी की इस हालत में ही उन्होंने मेरे साथ ५०० मीटर एक पहाड़ की चढ़ाई की। उनकी उम्र ६५ साल है फिर भी वे माइंड पावर के कारण खुद को युवा महसूस करते हैं। वे अत्यंत धार्मिक व्यक्ति हैं और हर रोज सुबह- शाम ध्यान करते हैं। आपको एक बार ध्यान करने का अभ्यास हो जाए तो फिर और किसी से कुछ पूछने की जरूरत नहीं है। ऊपर लिखा जा चुका है कि ध्यान किस तरह करें। बस अब बिना किसी आलस्य के जितनी जल्दी शुरू हो सुबह- शाम ध्यान करना शुरू कर दें। चाहे यह ध्यान ५ मिनट का ही क्यों न हो। धीरे- धीरे ध्यान की अवधि बढ़ा सकते हैं। कुछ अच्छे स्कूलों में तो ध्यान की भी कक्षाएं चलाई जाती हैं। कुछ जगहों पर हफ्ते में एक दिन की ध्यान कक्षाएं आयोजित की जाती हैं। लेकिन आप जब जागें, तभी सवेरा। ईश्वर के साथ संबंध जोड़ने में कभी देर नहीं होती। ऐसे भी अनेक साधक हैं जो ५५ साल की उम्र से ध्यान शुरू करते हैं औऱ पांच सालों के भीतर ही इतनी उन्नति कर लेते हैं कि लोग आश्यर्य में पड़ जाते हैं। मन की एकाग्रता के बारे में कहा जाता है कि जैसे लेंस के जरिए कागज पर सूर्य की किरणें एकाग्र करके डालने पर कागज जलने लगता है, उसी तरह मन को एकाग्र करके ईश्वर को पुकारने से वे आपको आपकी इच्छित वस्तु अवश्य देते हैं। बशर्ते कि वह चीज आपके जीवन के लिए आवश्यक हो।

Wednesday, May 6, 2009

ईश्वर तो दिखाई नहीं देते, कैसे मानें कि वे हैं

विनय बिहारी सिंह

अक्सर कई लोग सवाल करते हैं कि कहां है ईश्वर? वे तो दिखाई नहीं देते। फिर हम कैसे मानें कि ईश्वर का अस्तित्व है? शुरू के दिनों में स्वामी विवेकानंद ने भी अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से कहा था- ईश्वर- फीश्वर कुछ नहीं है। मुझे तो ईश्वर का अनुभव ही नहीं होता। तब रामकृष्ण परमहंस खूब हंसे थे। वे जानते थे- यही विवेकानंद एक दिन दुनिया भर में घूम घूम कर ईश्वर से प्रेम करने को कहेंगे। वही हुआ। एक बार किसी ने एक संत से पूछा- कैसे मानें कि ईश्वर हैं? संत ने जवाब दिया- आप कौन हैं? उस आदमी ने जवाब दिया- मैं एक दफ्तर में क्लर्क हूं। संत ने कहा- नहीं। मैं आपका पद या नाम या हैसियत के बारे में नहीं पूछ रहा हूं। आप खुद को क्या समझते हैं? उस आदमी ने जवाब दिया- मैं मनुष्य हूं। संत मुस्कराए। उन्होंने कहा- आप एक जीव हैं। इस ब्रह्मांड में आप ही की तरह अरबों- खरबों जीव रहते हैं। उन्हें कौन नियंत्रित करता है? और यह जो चांद- तारे और ब्रह्मांड की सूक्ष्म और प्रकट गतिविधियां हैं, उन्हें कौन नियंत्रित करता है? उस आदमी ने जवाब दिया- जरूर कोई बहुत बड़ी शक्ति है, जो नियंत्रित करती है। संत ने कहा- उसी बड़ी शक्ति को हम ईश्वर कहते हैं। उस आदमी ने प्रश्न पूछा- क्या हम ईश्वर को देख सकते हैं? संत ने कहा- जरूर। उस आदमी ने पूछा- कैसे? संत ने कहा- जब आपके भीतर उसे देखने की प्रबल इच्छा पैदा होगी और दिन- रात आप उससे प्रार्थना करेंगे कि- दर्शन दीजिए भगवन, दर्शन दीजिए। आपके बिना कुछ अच्छा नहीं लगता। जब ईश्वर को यह विश्वास हो जाएगा कि आप उसके अलावा और कुछ नहीं चाहते तो वे दर्शन देंगे। लेकिन होता यह है कि हम ईश्वर के बदले घर, कार, धन और ख्याति चाहते हैं। ईश्वर को सबसे अंत में चाहते हैं। तब तो बात नहीं बनेगी। परमहंस योगानंद जी कहते थे- भक्त को बिल्कुल बच्चे की तरह रोना पड़ेगा तब जगन्माता दर्शन देंगी। जब तक उन्हें यह नहीं पता चलेगा कि अमुक भक्त उनके अलावा कुछ नहीं चाहते, तब वे अपने आप दर्शन देंगे। उस आदमी ने पूछा- ईश्वर छुपे हुए क्यों रहते हैं? संत ने कहा- वे चाहते हैं कि उनके बच्चे यानी हम उन्हें खोजें। इसीलिए वे छुपाछुपी का खेल खेलते हैं। सच्चाई यह है कि वही हमारे सबकुछ हैं। वही हमारे माता, पिता, बंधु और मालिक हैं। लेकिन रहते हैं छुप कर। आप उन्हें दिल से पुकारिए, वे आज नहीं तो कल जरूर दर्शन देंगे। लेकिन अगर आपके मन में तनिक भी शंका है कि प्रार्थना तो कर रहा हूं, पता नहीं ईश्वर दर्शन देंगे कि नहीं तो आपको वे दर्शन नहीं देंगे। उन्हें तो बस निश्छल, दृढ़ और गहरी श्रद्धा चाहिए। जहां किसी भक्त ने उन्हें गहरा प्रेम दिया, वे तुरंत उस भक्त के पास आ जाते हैं। वे कहते हैं- भक्त हमारे, हम भक्तन के। लेकिन गहरा प्रेम कैसे हो? गहरा प्रेम तभी होगा जब आप ईश्वर के प्रेम को समझेंगे। कैसे? आप आप उनसे आठ आना प्रेम करेंगे तो वे आपसे १६ आना प्रेम करेंगे। आप उनसे एक पैसा प्रेम करेंगे तो वे आपसे उसके दो गुना प्रेम करेंगे। यही ईश्वर का नियम है। क्यों न हम ईश्वर से प्रेम करें और उसके प्रेम की अतल गहराई में डूबते जाएं?

Tuesday, May 5, 2009

पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात


विनय बिहारी सिंह

हमारा स्वागत करने के लिए जो सबसे पहले तैयार रहता है, उसका नाम है- तनाव। संतों ने कहा है- जब हम तनाव को महत्व देने लगते हैं यानी तनाव को बनाए रखते हैं तो वह हमें औऱ ज्यादा सताने लगता है। तो उपाय क्या है? आप तनाव को अपने भीतर ठहरने ही मत दीजिए। जिस कारण से तनाव आया है, उसे दूर करने की पूरी ईमानदारी से कोशिश कीजिए। वैग्यानिकों का कहना है कि तनाव कहीं ठहरने की जगह तलाशता है। जहां आपने उसे थोड़ा सा अपने भीतर ठहरने का मौका दिया कि बस वह वहीं अपना महल खड़ा कर लेगा औऱ आपको दिन- रात, बात- बेबात परेशान करता रहेगा। आप जितना अधिक उसकी पकड़ में रहेंगे, वह उतना ही खुश। इसीलिए संतों ने कहा है- ध्यान कीजिए और यह सोचना छोड़ दीजिए कि आप सब कुछ कर सकते हैं। नहीं। जीवन का भार ईश्वर पर छोड़ना सीखिए। देखिए आप कितना हल्का महसूस करेंगे। इसका अर्थ यह नहीं कि गलत काम करके उसे ईश्वर के हवाले कर दीजिए। लेकिन हां, कई बार समझ में नहीं आता कि अमुक परिस्थिति में क्या करें। ऐसे में ईश्वर की मदद लेना बहुत अच्छा है। एक संत कवि ने कहा है - पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात। यानी मनुष्य क्या है? जैसे पानी का बुलबुला। कब बुलबुला फूट जाए और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। फिर दुबारा यह बुलबुला इस शक्ल में नहीं पैदा होगा। तब शक्ल भी दूसरी होगी, परिवार, मित्र और सगे- संबंधी भी अलग होंगे। इस बुलबुले की एक उम्र है, नाम है, रंग- रूप है और पहचान है। परमहंस योगानंद ने एक भजन में कहा है- ऐसा कर दे भगवन, मैं और तू कभी न बिछड़ें, सागर की लहर सागर में मिला, मैं हूं बुलबुला मुझे सागर बना। यह है हमारी औकात। फिर हाय- हाय क्यों? तनाव क्यों? क्यों न शांत हो कर हम अपनी ड्यूटी करते जाएँ। चाहे वह ड्यूटी घर- परिवार के प्रति हो या आफिस या कारोबार के प्रति। सब कुछ ईश्वर को सौंप दीजिए। बस छुट्टी। अब खूब मेहनत कीजिए और ईश्वर को धन्यवाद देते रहिए। रामकृष्ण परमहंस ने कहा है- एक हाथ से संसार का काम करते रहना चाहिए औऱ दूसरे हाथ से ईश्वर को पकड़े रहना चाहिए। तभी कल्याण है।

Monday, May 4, 2009

देवी दुर्गा के नौ रूप


नवरात्र का समय तो बीत गया। लेकिन देवी दुर्गा के रूपों के बारे में जानकारी चाहने वालों की उत्सुकता बढ़ती जा रही है। आइए आज उसे ही जानें।चैत्र मास की प्रतिपदा के दिन से ही नवरात्र, यानी देवी दुर्गा की पूजा शुरू हो जाती है। यह त्योहार भारत भर में पूरे उल्लास के साथ मनाया जाता है। इसमें देवी दुर्गा यानी शक्ति के नौ रूपों की पूजा की जाती है। शैलपुत्री: नवरात्र के पहले दिन शैलपुत्रीकी पूजा की जाती है। शैल का अर्थ पहाड होता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, पार्वती पहाडों के राजा हिमवान की पुत्री थीं, इसलिए उन्हें शैलपुत्री भी कहा जाता है। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल का फूल है। ब्रह्मचारिणी : देवी दुर्गा ने इस रूप में एक हाथ में जल-कलश धारण किया है, तो दूसरे हाथ में गुलाब की माला। ब्रह्मचारिणी को विद्या और बुद्धि की देवी माना जाता है। देवी रुद्राक्ष की माला धारण करना पसंद करती हैं। चंद्रघंटा: नवरात्रके तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। देवी के इस रूप में दस हाथ और तीन आंखें हैं। आठ हाथों में शस्त्र हैं, तो दो हाथ भक्तों को आशीर्वाद देने की मुद्रा में हैं। देवी के इस रूप की पूजा कांचीपुरम [तमिलनाडु] में की जाती है। कूष्मांडा: देवी का यह रूप बाघ पर सवार है। इनकी दस भुजाएं हैं, जिनमें न केवल शस्त्र, बल्कि फूल माला भी सुसज्जित हैं। स्कंदमाता:देवी इस रूप में बाघ पर सवार हैं और अपने पुत्र स्कंद को भी साथ लिए हुई हैं। इस मुद्रा में वे दुष्टों का संहार करने को आतुर दिखाई देती हैं। कहते हैं कि कवि कालीदासने मेघदूतऔर रघुवंश महाकाव्य की रचना देवी स्कंदमाताके आशीर्वाद से ही की थी। कात्यायनी : देवी दुर्गा ने ऋषि कात्यायन के आश्रम में तपस्या की थी, इसलिए उनका नाम कात्यायनी पडा। कालरात्रि : नवरात्रपूजा के सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा होती है। इस रूप में देवी गधे पर सवार हैं और उनके बाल बिखरे हुए हैं। यह देवी अज्ञानता के अंधकार को मिटाने वाली मानी जाती हैं। कलकत्ता में देवी कालरात्रि की सिद्धि-पीठ है। महागौरी: गौर वर्ण वाली देवी सफेद साडी धारण किए हुई हैं। उनके चेहरे पर दया और करुणाका भाव है। उनके हाथ में डमरू और त्रिशूल भी है। हरिद्वार के कनखल में महागौरी का ख्याति प्राप्त मंदिर है। सिद्धिदात्री: देवी इस रूप में कमल पर सवार हैं। ऐसा माना जाता है कि देवी का यह रूप यदि भक्तों पर प्रसन्न हो जाता है, तो उसे 26 वरदान मिलते हैं। हिमालय के नंदा पर्वत पर सिद्धिदात्री का पवित्र तीर्थस्थान है।

Saturday, May 2, 2009

आनंददायक अनुभूति वाली तंत्रिकाएँ


हमारा शरीर किस तरह से आनंददायक स्पर्श के बाद प्रतिक्रिया व्यक्त करता है इस बारे में वैज्ञानिकों को नई जानकारी मिली है. वैज्ञानिकों के एक दल ने त्वचा में मौजूद ऐसे स्नायुओं का पता लगाया है जो विशेष रूप से आनंददायक अनुभूतियों को हमारे मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं. इसमें यूनीलिवर कंपनी के वैज्ञानिक भी शामिल हैं.. आनंददायक अनुभूति को जागृत करने के लिए आदमी के शरीर को एक सेकेंड में चार-पाँच सेंटीमीटर की विशेष गति से स्पर्श करना होता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस शोध से यह समझने में मदद मिलेगी कि मानवीय संबंधों में किस तरह स्पर्श महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. पिछले कई वर्षों से वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने की कोशिश करते रहे हैं कि किस तरह शरीर को दर्द की अनुभूति होती है और कौन सी तंत्रिकाएँ इन अनुभूतियों को हमारे मस्तिष्क तक लेकर जाती हैं. इस जानकारी के अभाव में लोगों को काफ़ी तक़लीफ़ उठानी पड़ती है. न्यूरोपैथी जिसमें मस्तिष्क की कोशिएँ नष्ट हो जाती हैं, उसमें ये बेहद तकलीफ़देह हो सकती है. इसमें कई बार मस्तिष्क तक अनुभूतियों को पहुँचाने वाले तंत्र में ख़राबी आ जाती है और ऐसे में लोगों को तब भी दर्द की अनुभूति होती है जब कोई कारण नहीं होता. अनुभूतियों की परखहालांकि इस शोध में वैज्ञानिकों ने दर्द के विपरीत आनंद से संबंधित अनुभूतियों को परखा है. जिस गति से लोगों के हाथों को सहलआने पर आनंद की अनुभूति हुई वह उस गति के बराबर थी जिस गति से माँ बच्चों को थपकी देती है और दंपत्ति एक–दूसरे को प्यार की अभिव्यक्ति के समय सहलाते हैं.
फ़्रांसिस मैकग्लोन, शोधकर्ता
स्वीडन के गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय और नार्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने स्पर्श के बाद 20 लोगों में होने वाली प्रतिक्रियाओं को दर्ज किया. बाद में उन्होंने विभिन्न गति से इन लोगों के अग्रहाथ की त्वचा को सहलाते हुए जाँच की. जब लोगों को किसी स्पर्श के बाद आनंद की अनुभूति हुई तब वैज्ञानिकों ने पाया कि 'सी- टेक्टाइल' स्नायु के तंतुओं को सहलाया गया था. एक विशेष गति से ज्यादा या कम गति पर जब स्पर्श किया गया तो लोगों को आनंद की अनुभूति नहीं हुई और न ही स्नायु तंत्र जागृत हुआ. इस शोध से जुड़े प्रोफ़ेसर फ़्रांसिस मैकग्लोन ने कहा, " जिस गति से लोगों के हाथों को सहलाने पर आनंद की अनुभूति हुई, वह उस गति के बराबर थी जिस गति से माँ बच्चों को थपकी देती है और दंपत्ति एक–दूसरों को प्यार की अभिव्यक्ति के समय सहलाते हैं." वैज्ञानिकों ने पाया है कि 'सी- टेक्टाइल' तंत्रिकाएं उस त्वचा पर ही होते हैं जहाँ बाल मौजूद होते हैं और ये हथेली की त्वचा पर नहीं मौजूद होते. (बीबीसी से साभार)