
Saturday, January 10, 2009
क्या अंतर है मनुष्य और जानवरों में

Friday, January 9, 2009
दिमाग के रसायनों को बदल देता है ध्यान

विनय बिहारी सिंह
हाल के शोध से पता चला है कि आक्सिटोसिन नामक रसायन मनुष्य के दिमाग में प्रेम तत्व उत्पन्न करता है। कैसे? यूरोप के वैग्यानिकों ने कहा है कि अगर एक कमरे में किसी अपरिचित स्त्री- पुरुष को रख दिया जाए और उन्हें आक्सिटोसिन की संतुलित खुराक दे दी जाए तो उनके बीच प्रेम हो जाएगा। भले ही वे खुराक लेने के पहले इस मूड में न हों। उनका कहना है कि मस्तिष्क में पहुंचने वाले रसायन और मेड्युला आब्लांगाटा (जो मस्तिष्क के नीचे यानी हमारी गरदन और सिर के जोड़ के पास स्थित है) के प्रभाव से यह चमत्कार होता है। इसके पहले वैग्यानिकों ने कहा था कि जिस चीज के बारे में आप ज्यादा सोचेंगे, आप खुद भी उसी तरह के बनते जाएंगे। इसीलिए ऋषि- मुनियों ने कहा है कि हमेशा ईश्वर के बारे में सोचिए। कामकाज करते समय सोचिए कि आप यह सब ईश्वर के लिए कर रहे हैं। अनेक वैग्यानिक कह ही चुके हैं कि ध्यान से आपके दिमाग में अल्फा किरणें बढ़ती हैं। अल्फा किरणें आपके तनाव को फ्यूज कर देती हैं। अल्फा किरणों मनुष्य को शांत, बुद्धिमान और तनाव रहित बनाती हैं। आप जितना अधिक ध्यान करेंगे यानी मेडिटेशन करेंगे उतना ही आप ईश्वर के करीब पहुंचेंगे। नतीजा यह होगा कि आपका जीवन ज्यादा सुव्यवस्थित होगा। ध्यान करने से आपका भौतिक जीवन भी समृद्ध होता है। आध्यात्मिक जीवन तो समृद्ध होता ही है।
Thursday, January 8, 2009
अगर ईश्वर भी कह दे कि मेरे पास समय नहीं है, तब?

विनय बिहारी सिंह
यूरोप के दार्शनिक और अध्यात्मवादी एंड्रू कोहन का कहना है कि जहां द्वैत है, वहीं द्वंद्व है। यानी जहां दो चीजें हैं, वहीं टकराव और तनाव है। इसे जरा और विस्तार से समझें। दो चीजें यानी- सुख- दुख या हानि- लाभ, रात- दिन या शत्रु- मित्र। उनका कहना है कि सब कुछ तो ईश्वर ही है। एंड्रू कोहन की विचारधारा वही है जो रामकृष्ण परमहंस की थी। यानी अद्वैतवाद। प्रत्येक मनुष्य की उत्पत्ति ईश्वर से हुई है, वह ईश्वर में ही रह रहा है और उसका विलय ईश्वर में ही होगा। यही बात हर वस्तु पर भी लागू होती है, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव। अगर यह कहें कि निर्जीव वस्तु कैसे ईश्वर से आई है तो इसका उत्तर यह होगा कि जितनी भी चीजें हमें दिखाई देती हैं- वे सभी ईश्वर ने ही निर्मित की हैं। अब आप पूछेंगे कि तो फिर जो चीजें नहीं दिखाई देतीं वे किसने बनाई हैं- जैसे हवा, हमारा मन, हमारी भावनाएं। ये सब तो दिखाई नहीं देतीं। तो इन्हें किसने बनाया है? इसका भी जवाब वही होगा- ईश्वर ने ही इन्हें भी बनाया है। तो ईश्वर ने क्या- क्या बनाया है? इसका उत्तर है- समूचा ब्रह्मांड ही ईश्वर ने बनाया है। जब संपूर्ण ब्रह्मांड ईश्वर ने बनाया है तो जाहिर है ब्रह्मांड की सभी वस्तुएं भी ईश्वर ने ही बनाई हैं। अब आइए बात करें परमहंस योगानंद जी की। सन १९२० से लेकर १९५२ तक यूरोप में योग की उन्होंने वैग्यानिक व्याख्या की और योग के प्रति प्रबल आकर्षण पैदा किया। परमहंस जी कहते थे- ईश्वर के पास ब्रह्मांड की समस्त वस्तुएं हैं लेकिन एक चीज वह हमेशा खोजता है, वह है- मनुष्य का प्यार। जब कोई उन्हें सच्चे मन से प्यार करता है तो वे उसके पास दौड़े चले आते हैं। यानी ईश्वर भी हमसे कुछ खोजते हैं। वे हमें बार- बार कहते हैं- मेरे बच्चों, एक बार मेरे पास आओ। लेकिन हम कहते हैं- नहीं, अभी नहीं। अभी तो हमें अपना कैरियर बनाना है, बच्चे को नौकरी दिलानी है। या बेटी की शादी करनी है। अभी नहीं। जब सब कर लूंगा तो भगवन तुम्हें प्यार करूंगा। लेकिन मान लीजिए भगवान भी कह दें- ठीक है तो फिर मेरे पास भी तुम्हारे लिए समय नहीं है। तब? तब तो हमारा जीवन ही समाप्त हो जाएगा। लेकिन भगवान अत्यंत दयालु हैं। वे ऐसा नहीं करते। वे कहते हैं- ठीक है मेरे बच्चे मैं हमेशा तुम्हारे प्यार की प्रतीक्षा करूंगा। सचमुच सबकुछ ईश्वर से ही आया है औऱ ईश्वर में ही विलीन हो जाएगा। फिर भी हम ईश्वर को तभी याद करते हैं जब दुख या तकलीफ में होते हैं। सुख में उनको कौन याद करता है। क्यों न हम भगवान को ईश्वर को रोज याद करें। कम से कम सोते समय या जागते समय। ईश्वर इसी से प्रसन्न हो जाएंगे। रामकृष्ण परमहंस ने कहा है- मनुष्य का जन्म ही ईश्वर को पाने के लिए हुआ है। वरना खाना, शौच करना, सोना औऱ बच्चे पैदा करना तो पशुओं को भी अच्छी तरह आता है। फिर मनुष्य और पशु में अंतर ही क्या रह जाएगा?
Wednesday, January 7, 2009
यहां मिलते हैं विग्यान और आध्यात्म
यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया के फिजिक्स के प्रोफेसर मणि घोष ने एक पुस्तक लिखी है-
कास्मिक डिटेक्टिव। उन्होंने कुछ पाश्चात्य वैग्यानिकों के साथ लेजर टेक्नालाजी में महत्वपूर्ण अविष्कार किए हैं। इसी वजह से आज चिकित्सा जगत में लेजर आपरेशन हो पा रहे हैं। इस पुस्तक के लिखने के पीछे अपनी सोच जाहिर करते हुए उन्होंने कहा है- मनुष्य अपनी चेतना ब्रह्मांडीय चेतना से से प्राप्त करता है। उन्होंने कहा है- बहुत से लोग कहते हैं कि ईश्वर उनके लिए अपरिचित है। लेकिन ईश्वर के बिना हमारा परिचय पूरा नहीं हो पाता। यहां विग्यान (तकनीकी कारणों से ग्य ऐसे ही लिखना पड़ रहा है।) और आध्यात्म एक में मिल जाते हैं। ऋषियों ने कहा है कि न तो हम शरीर हैं और न मन या बुद्धि। हम तो विशुद्ध चेतना हैं। ब्रह्मांडीय चेतना। जो पांच तत्व- अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल और आकाश ब्रह्मांड में हैं, वही हमारे भीतर भी हैं। लेकिन हम ये पांच तत्व भी नहीं हैं। जब हम गहरे ध्यान में जाते हैं तो इन पांच तत्वों के भी पार चले जाते हैं जहां शुद्ध चैतन्य है। जब तक हम कुछ न कुछ सोचते रहते हैं, तब तक आंखें बंद रहने पर भी ठीक से ध्यान नहीं हो पाता। खुली आंखों से जो सोचते हैं, वही आंखें बंद करके सोचने लगते हैं। ऋषियों ने कहा है कि हमें सोचना बंद कर सिर्फ ईश्वर पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इस तरह हम अपने भीतर जाएंगे और आत्मा से साक्षात्कार करेंगे। वैग्यानिक मणि घोष ने जो विचार व्यक्त किए हैं, वह हजारों साल पहले हमारे ऋषि- मुनियों ने कहा है और अगर कोई वैग्यानिक इस तथ्य को रेखांकित करता है तो इस बात की पुष्टि होती है कि हम यह गलती करते हैं कि सिर्फ अपने शारीरिक सुखों के बारे में सोचते हैं। हमें ईश्वर के बारे में भी सोचना चाहिए। इसीलिए शायद पातंजलि ने कहा है- योगश्चित्तवृत्ति निरोधः। यानी चित्त की वृत्तियों को रोक देना ही योग है।
Tuesday, January 6, 2009
जरूरी है प्रकृति से तालमेल
सचमुच प्र
कृति के साथ हमारा तालमेल बहुत जरूरी है। सुदूर जंगल के पास चिड़ियों की आवाज, शुद्ध हवा- पानी और सबसे बढ़ कर एकांत मनुष्य को ईश्वर के करीब ला देता है। वहां न कोई तनाव था और न ही भागदौड़। जो मिल जाता था, खा लिया और खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते रहे। लगा महानगरों में हम कितना कृत्रिम जीवन जी रहे हैं। पिछले दिनों उत्तरांचल के अल्मोड़ा जिले के द्वारहाट में जाने का मौका मिला। हरियाली से ओतप्रोत विराट पर्वत मालाओं के बीच रहना अत्यंत सुखद अनुभव था। एक दिन सुदूर एक जंगल प्रांत में गया तो लगा कि एकाएक अकेले हो जाना कितना कुछ सिखा देता है। साधु- संतों ने ठीक ही कहा है- हम अकेले आए हैं और अकेले ही जाएंगे। हमारे साथ न तो हमारा कुटुंब जाएगा और न दोस्त रिश्तेदार। सुदूर जंगल प्रांत में अकेले चलते हुए लगा कि मेरे एक मील पीछे और एक मील आगे कोई नहीं है। मैं नितांत अकेले चल रहा हूं। मेरे साथ सिर्फ जंगल के पंछी और पेड़ पौधे हैं। वैग्यानिक (ग्य इसी तरह हो पा रहा है) जगदीश चंद्र बसु ने जब कहा है कि पेड़- पौधों में भी मनुष्य की तरह संवेदना होती है। उनकी बात लगातार मेरे दिमाग में कौंध रही थी। खूबसूरत पेड़ों के पास कुछ पल खड़े रह कर चारो तरफ की पर्वतमालाओं को देखना भी कितना सुखद अनुभव है। संतों ने कहा है कि जब आप अकेले रहते हैं तो आपके साथ ईश्वर होते हैं। मनुष्य देह नहीं है, मन नहीं है, बुद्धि भी नहीं है। वह तो है शुद्ध सच्चिदानंद। अपने दुख ईश्वर को समर्पित कर दें और निश्चिंत हो जाएं। आपका भार ईश्वर ने ले लिया तो चिंता किस बात की। लेकिन समर्पण सच्चा होना चाहिए। यह नहीं कि समर्पण भी किया और भीतर ही भीतर डर भी रहे हैं कि कहीं कुछ घटित न हो जाए। यह तो बनावटी समर्पण है। एक बार पूरे दिल और दिमाग से हम ईश्वर को अपना भार दे देते हैं तो कितना आनंद आता है, यह उस सुदूर जंगल में अकेले घूमते हुए जाना। बेफिक्र होकर अनजानी दिशा में जाना और कभी न देखे हुए पौधों की पत्तियों और तनों को परखना। नीचे कई हजार फुट की घाटी में स्थित अत्यंत पतली नदी को देखना और प्रकृति के सामने, विराट पहाड़ के सामने खुद का अस्तित्व खोजना नए अनुभव थे।
Saturday, January 3, 2009
वह मरने जा रहा था, तभी कौंधी उम्मीद की किरण
विनय बिहारी सिंहThursday, January 1, 2009
नए साल का नया संकल्प

विनय बिहारी सिंह
बहुत अच्छा लगता है जब कोई व्यक्ति नए साल में अपना कोई व्यसन छोड़ देने का संकल्प लेता है। व्यसन यानी सिगरेट, पान, चाय या ज्यादा तली- भुनी चीजें- जैसे समोसे वगैरह। कुछ लोग संकल्प लेते हैं कि मैं अनावश्यक बातों की चिंता नहीं करूंगा, जैसे कुछ लोगों की आदत होती है कि वे सोचते रहते हैं- अगर अमुक बात हो जाए तो मेरे लिए बड़ी मुश्किल होगी। जबकि देखा जाता है कि वैसी कोई बात ही नहीं हुई जिसकी वे आशंका कर रहे थे। यानी वे व्यर्थ में ही चिंता किए जा रहे थे। मनोचिकित्सकों ने भी कहा है कि फिजूल की चिंता करने वाले हमेशा भीतर ही भीतर डरे, घबराए या चिंतित रहते हैं और अनजाने में ही अपने मानसिक स्वास्थ्य को चौपट करके रखते हैं। तो नए साल में लोग यह संकल्प भी लेते हैं कि मैं अनावश्यक चिंताएं नहीं करूंगा। बुजुर्गों ने कहा ही है-
चिंता से चतुराई घटे, दुख से घटे शरीर।
मान लीजिए जर्दे वाला पान खाना छोड़ना है। किसी को इसकी लत है। तो यह नशा छोड़ना उसके लिए पहाड़ सिर पर उठाने जैसा लगता है। यह सोचना उसके लिए मुश्किल है कि पान के बगैर वह रहेगा कैसे? एक बार दृढ़ हो कर अच्छी बातों का संकल्प लेने और उसका पालन करने का मजा ही कुछ और है। अपनी प्रबल इच्छा शक्ति से जब वह पान छोड़ ही देता है तो उसे लगता है- - हे भगवान, यह पान तो मेरा शत्रु ही था। इससे सारे दांत खराब हो रहे थे और घिस भी रहे थे। मुंह की कोमल झिल्ली नष्ट हो रही थी, वगैरह वगैरह। यानी जितना नशा करने में आनंद है उससे कई गुना ज्यादा हर नशे से दूर रहने में है। कोई भी व्यसन हमें बांधता है, हमें गुलाम बनाता है। क्यों न हम आज से इसी तरह का कोई संकल्प लें कि अपने भीतर से अमुक कमी को दूर करना है, अमुक व्यसन को छोड़ना है। यह संकल्प भी कि हर महीने कोई न कोई अच्छी आदत खुद में जोड़ते जाना है। इन सब बातों का अपना ही आनंद है।